भारतीय संविधान में जम्मू व कश्मीर को ‘विशेष दर्जा’ देनेवाली धारा.370 को समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रही है । केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ सरकार के इस कदम को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 02/08/2023 से रोजाना सुनवाई करने का निर्णय लिया है । वर्ष 2019 में 04 अगस्त को संसद के दोनों सदनों से पास जम्मू व कश्मीर(पुनर्गठन) एक्ट, 2019 राष्ट्रपति के आदेश से लागू हो गया । उसके साथ ही धारा.370 हट गयी और जम्मू व कश्मीर का राज्य का भी दर्जा समाप्त हो गया । जम्मू व कश्मीर को भारतीय संविधान में विशेष दर्जा का प्रावधान भारतीय संघीय ढांचे में इस तरह किया गया था, जिसमें जम्मू व कश्मीर के अपने संविधान की व्यवस्थाओं का भी समावेश हो । भारतीय संघ संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत 72 वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था को 2019 में बदल दिया गया । जम्मू व कश्मीर को 2019 में बदल दिया गया । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट पास होते ही तुरंत लागू होने के बाद इस राज्य का पूरी तरह संवैधानिक कायापलट हो गया ।
जम्मू व कश्मीर का अपना संविधान खत्म हो गया और इस राज्य को दो संघशासित क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया । इससे एक ओर जहां जम्मू व कश्मीर पूर्ण राज्य की जगह संघशासित क्षेत्र हो गया, वहीं दूसरी ओर इसी राज्य के हिस्से लद्दाख को यूटी(संघशासित क्षेत्र) का दर्जा मिला । लद्दाख को जम्मू व कश्मीर विधान सभा के ही दायरे में रखा गया । लद्दाख की 2019 से ही पूर्ण राज्य का दर्जा और अपनी अलग विधान सभा की मांग लगातार जारी है ।
लेकिन जम्मू व कश्मीर का अपना संविधान और भारतीय संविधान में प्राप्त विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर करने का सिलसिला जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 लागू होने के कुछ महीने बाद से ही शुरू हो गया । पहली बार ऐसा हुआ, जब एक पूर्ण राज्य का दर्जा घटाकर यूटी बना दिया गया ।
ऐसी लगभग 20 लंबित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 11/07/2023 से सुनवाई शुरू की है । चीफ जस्टिस वाई. वी. चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सुप्रीम कोर्ट जजों की संविधान पीठ के सामने हलफनामे में केंद्र सरकार ने दावा किया कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने से जम्मू व कश्मीर में ‘शांति, प्रगति और समृद्धि का एक नया युग’ शुरू हुआ है ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 20 पृष्ठों के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि ‘तीन दशकों के उथल.पुथल के बाद जम्मू व कश्मीर में जन.जीवन सामान्य चल रहा है ।’ मंत्रालय की ओर से यह हलफनामा 10 जुलाई को दायर किया गया, जबकि अगले दिन 11 जुलाई को जम्मू व कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा से वंचित किए जाने और इसके विभाजन को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई होनी तय थी । केंद्र सरकार की दलील पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की. ‘हलफनामे में केंद्र सरकार ने जो बातें कही हैं वो धारा.370 हटाने के बाद की स्थिति पर संघीय सरकार के विचार से सम्बन्धित हैं, जिनका उन मुद्दों से कोई ताल्लुक नहीं हैं, जो याचिकाओं में उठाए गए हैं । उस मकसद से इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता । यह मामला पूरी तरह संवैधानिक है । याचिकाकर्ताओं ने जो सवाल उठाए हैं, वो संवैधानिक चुनौती का मामला है । विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्था अचानक बदलने का एकतरफा फैसला केंद्र ने उस समय लिया, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था । इसके लिए कानून का शासन से जुड़ी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया ।’ सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इस मामले में हुई संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी पर विचार करने के लिए 02/08/2023 से रोजाना सुनवाई करने का आदेश जारी किया । इससे जम्मू व कश्मीर में राजनीतिक हलचल तेज हो गयी है । दरअसल यह मामला संवैधानिक से ज्यादा राजनीतिक है । सुप्रीम कोर्ट में ऐसे समय में सुनवाई शुरू हुई है, जब लोकसभा चुनाव कुछ महीने बाद होने हैं । सुप्रीम कोर्ट में इस समय सुनवाई शुरू होने का असर जम्मू व कश्मीर के साथ.साथ राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा । धारा.370 समाप्त होने की चौथी बरसी के समय संसद का सत्र चलता रहेगा । जम्मू व कश्मीर के सभी गैर,भाजपा राजनीतिक दलों के नेता गत कुछ महीनों से बार.बार कह रहे हैं कि जम्मू व कश्मीर में सात वर्षों से चुनाव नहीं हुए हैं । लगभग तीन वर्षों से लंबित याचिकाओं को सुनवाई की सूची में लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दी गयी रिमाइन्डर याचिकाओं में भी राज्य में विधान सभा चुनाव नहीं होने पर जोर दिया गया । याचिका लगानेवालों में जम्मू व कश्मीर के कांग्रेस को छोड़ प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता हैं । सबसे बड़े जनाधार वाले नेशनल कान्फ्रेंस के दो लोकसभा सदस्य. मोहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी हैं । मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद युसुफ तारिगामी और जम्मू व कश्मीर पीपुल्स कान्फ्रेंस प्रमुख सज्जाद लोन के अलावे कई रिटायर आईएएस अधिकारियों, सैनिक अधिकारियों तथा सिविल सोसायटी संगठनों से जुड़े पत्रकारों, कलाकारों ने भी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है । सुनवाई के समय सभी प्रमुख दलों की नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी थी । उनके बीच सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने का समय चर्चा का विषय है । पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) के वरिष्ठ नेता नईम अख्तर ने श्रीनगर में कहा कि लगता है, आम चुनाव 2024 से पहले सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा और उसका असर चुनाव पर पड़ेगा । नेशनल कान्फ्रेंस प्रवक्ता तनवीर सादिक को फैसला अपने पक्ष में आने की उम्मीद है । सारे प्रमुख नेता जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 लागू होने के तुरंत बाद जेल में डाल दिए गए थे । काफी दिनों बाद धीरे.धीरे उन्हें छोड़ा गया । सिर्फ कश्मीर तक सीमित उनकी राजनीतिक सोच अब बदली है । लोकसभा चुनाव में भाजपा का मिलकर मुकाबला करने के लिए हुई विपक्षी दलों की दोनों एकजुटता बैठक में नेशनल कान्फ्रेंस सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती पहुंची थी । 23 जून को पटना में जद(यू) नेता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मेजबानी में विपक्षी जुटान हुआ । फिर 17.18 जुलाई को कांग्रेस के बुलावे पर बेंगलुरु में दूसरा जुटान हुआ । दोनों जगह महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला मौजूद थे । जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराने की चर्चा तो है । मगर लोकसभा चुनाव के साथ होने की संभावना नहीं लग रही है । उसके पहले के भी कोई संकेत सरकार और चुनाव आयोग की ओर से नहीं मिल रहे हैं । मगर पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों का कार्यकाल नवंबर, 2023 तक है । रोज
सुनवाई के मद्देनजर उस समय तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला अगर आ गया, तो उसका जम्मू व कश्मीर के स्थानीय चुनावों पर ही असर पहले नजर आ जाएगा ।
कश्मीरी राजनीतिक दलों की नकारात्मक सोच बदली है । महबूबा मुफ्ती के नेतृत्ववाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) ने स्थानीय चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चयन पर मंथन शुरू कर दिया है ।
नेशनल कान्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने जून के अंतिम सप्ताह में ही कहा कि जम्मू व कश्मीर में जो भी चुनाव होंगे, सब में उनकी पार्टी हिस्सा लेगी । नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी ने 2018 में पंचायत तथा शहरी निकाय चुनावों में हिस्सा नहीं लिया था । ये दोनों ही बड़े जनाधार वाली मुख्यधारा की पार्टियां हैं । नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी दोनों को ही बाद में पछतावा हुआ । उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों ही मुख्यमंत्री रह चुके हैं । नेशनल कान्फ्रेंस सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला ने बाद में महसूस किया कि स्थानीय निकाय चुनाव बायकाट का फैसला नकारात्मक था और उचित नहीं था । फारूक अब्दुल्ला धारा.370 हटाने के केंद्र सरकारी के फैसले के खिलाफ संघर्ष के लिए बने विपक्षी एलायंस के संयोजक हैं ।
2018 में भाजपा के समर्थन वापस लेने से गिरी गठजोड़ सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती थी । पीडीपी.भाजपा गठजोड़ सरकार 2014 विधान सभा चुनाव के बाद बनी थी । जम्मू व कश्मीर संविधान के सेक्शन 92 के अंतर्गत सरकार गिरने के बाद राज्यपाल शासन लगाया गया । फिर विधान सभा भंग की गयी । राज्यपाल शासन की निर्धारित 6 महीने की अवधि समाप्त होने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया ।
जनवरी, 2019 से राष्ट्रपति शासन लागू है, जिसकी अवधि हर 6 महीने बाद बढ़ायी जा रही है । जम्मू व कश्मीर की प्रमुख पार्टियों ने इसी को आधार बनाकर किसी भी चुनाव में हिस्सा लेने से इन्कार कर दिया था । लेकिन नेशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने जब ‘बड़ी गलती’ का एहसास दिलाया तब धारा.370 हटाये जाने के बाद 2019 में हुए जिला विकास परिषद चुनाव में सभी दलों ने हिस्सा लिया और उन्हें भारी जीत मिली । उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों ही राज्य का विशेष दर्जा लौटने तक चुनाव नहीं लड़ने पर अड़े थे ।
उसमें भी हार्डलाइनर रूख महबूबा मुफ्ती का रहा । उन्हें 2019 का आम चुनाव याद कर लेना चाहिए । महबूबा मुफ्ती अपने मरहूम पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद के लोकसभा सीट अनंतनाग से खड़ी हुई थी । 230402011 को मतदान के पहले चरण और फिर दूसरे चरण में भी 85 प्रतिशत मतदाता वोट डालने बूथ पर नहीं पहुंचे ।
लद्दाख पर भी सुप्रीम कोर्ट फैसले का असर पड़ेगा । राज्य का दर्जा देने की उनकी मांग पर केंद्र सरकार जम्मू व कश्मीर का ख्याल करके कोई ठोस आश्वासन नहीं दे रही है । लद्दाखियों के असंतोष पर विचार करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2 जनवरी को एक उच्चस्तरीय कमिटी बनायी, जिसे लेह और कारगिल के सदस्यों ने ठुकरा दी । गत 19 जून को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा दिल्ली में आयोजित वार्ता बेनतीजा रही ।(धारा.370 पर मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक से) ।