भारत के प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने जो अभी नौ नाम सुप्रीम जज के रूप में नियुक्ति के लिए सुझाए हैं, यह 22 महीने के गतिरोध के बाद संभव हो पाया है । सुप्रीम कोर्ट जज, हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीश, जज के रूप में किसी वकील या सीनियर जजों की नियुक्ति की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम के जिम्मे है । कोलेजियम की ओर से की गयी सिफारिशें मानना/ना मानना केंद्रीय कानून मंत्रालय की मर्जी पर है । प्रायः कोलेजियम और सरकार के बीच जजों के नाम को लेकर जिच रहती है । केंद्र सरकार चाहती है कि इसमें उसकी भी मर्जी चले, मगर सुप्रीम कोर्ट के आगे चल नहीं पाती ।

गत हफ्ते जो गतिरोध टूटा है, वो सुप्रीम कोर्ट के अंदर कोलेजियम सदस्य जजों में आपस का था । वैसी स्थिति में कानून मंत्रालय कोलेजियम द्वारा सिफारिश स्वीकार कर लेगा, ऐसी उम्मीद कम लगती है । हाल में रिटायर हुए दूसरे वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट जज फाली नरीमन ने जाते-जाते भी कोलेजियम के अंदर जजों की नियुक्ति को लेकर मतभेद पर अफसोस जाहिर किया, जो मार्च 2019 से कोलेजियम का हिस्सा थे ।

सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एन. वी. रमण ने ऐसे समय में केंद्र सरकार के पास कोलेजियम की सिफारिश भेजी है, जब सुप्रीम कोर्ट की और विभिन्न हाईकोर्टों की केंद्र तथा राज्य सरकारों से जनहित के कई मुद्दों पर ठनी हुई है ।

सबसे ताजा मामला पेगासस जासूसी और धनबाद में एक जज की हत्या का है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच/खुफिया एजेंसियों के काम पर सवाल उठाया है । उससे भी बड़ा मामला है, कलकता हाईकोर्ट द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद व्यापक हिंसा की जांच सीबीआई को सौंपने का, जो केंद्र-राज्य पंगा का विषय है ।

गुजरात हाईकोर्ट द्वारा वहां की भाजपा सरकार के धर्मान्तरण-विरोधी कानून की छह धाराओं पर रोक को लेकर भी राजनीतिक सनसनी है । केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार के छह पूर्व पार्टी विधायकों द्वारा विधान सभा के अंदर तोड़फोड़ का मामला कोर्ट ट्रायल से बचाने के प्रयास को सुप्रीम कोर्ट ने जबर्दश्त झटका दिया । इसके लिए केरल सरकार निचली अदालत के फैसले के खिलाफ केरल हाईकोर्ट गयी और वहां बात नहीं बनी तो अपने विधायकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट गयी । यह 2015 से 2021 के बीच का बाकया है ।

लेकिन अभी सबसे चर्चित पेगासस जासूसो मुद्दा है, जो राजनीतिक विवाद संसद के अंदर तूल पकड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा । इसके चलते संसद का मानसून सत्र चल नहीं पाया, क्योंकि समूचे विपक्ष की इस पर चर्चा की मांग सरकार ने नहीं मानी । इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा सरकार बताती रही और संसद नहीं चलने देने के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराती रही । जबकि इस ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के लिए पेगासस स्पाईवेयर का सीधा ताल्लुक विदेश(इजराइल) से है, जिसकी पहुंच भाजपा शासनकाल के समय से भारत के अंदर गहराई तक है ।

देश के गणमान्य नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस को इस संबंध में पत्र लिखा, जिसमें उनसे आग्रह किया गया कि भारत-सरकार और पेगासस स्पाईवेयर सप्लायर इजराइली कंपनी एनएसओ को भारतीय नागरिकों के खिलाफ सरकार संचालित जासूसी से जुड़े सवालों का जवाब देने कहा जाय । उसके बाद पेगासस जासूसी विवाद की जांच का आदेश देने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में कई अर्जियां दायर की गयीं ।

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ की नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ क लिए पेगासस जासूसी का सारा विवरण सार्वजनिक करने से इन्कार कर दिया । 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलील ठुकराते हुए कहा कि इस पर विस्तृत चर्चा के बाद अगला कदम तय होगा । 16 अगस्त को केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पेगासस जासूसी पर याचिकाकर्ता के सारे आरोपों से इन्कार कर दिया । उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने मानसून सत्र में ही संसद से पास ट्राबनल सुधार बिल पर सरकार से कैफियत मांगी । सत्र समाप्त होते ही इस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी । ट्राइबुनलों के सदस्यों के चयन और कार्यकाल से जुड़ा यह कानून सरकार ने तब बनाया, जब इसी के लिए जारी अध्यादेश के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट पहले रोक लगा चुकी है । चीफ जस्टिस एन. वी. रमण ने खुद 16 अगस्त को केंद्र से कहा - ‘संसद को कानून बनाने का हक है, बनाए । उससे हमें कोई समस्या नहीं है । लेकिन जब एक बार रोक लगायी जा चुकी है तो फिर वही बिल दुबारा लाने का कारण क्या था ।’

उससे कुछ ही दिन पहले 6 अगस्त को एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली शीर्ष कोर्ट पीठ ने धनबाद के जिला व सेशन्स जज उत्तम आनंद की हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई और खुफिया एजेंसी आईबी को फटकार लगायी । 28 जुलाई को झारखंड के धनबाद जिला जज उत्तम आनंद की ऑटो से टक्कर में मौत हो गयी थी । जजों को गैंगस्टर और हाईप्रोफाईल व्यक्तियों से जुड़े आपराधिक मामले में जजों को धमकियों की शिकायतें मिल रही थीं । उस पर नाराज होकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई और आईबी कोर्ट की मदद नहीं कर रही है । ऐसी शिकायतों पर ये दोनों एजेंसियां कोई कार्रवाई नहीं करती ।

कलकता हाईकोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट ने बंगाल व गुजरात सरकार को सकते में डाला है । दोनों ही राज्य सरकारों का यह मामला राजनीतिक विवाद का है, जिसमें दोनों हाईकोर्टों ने हस्तक्षेप किया है । धर्मान्तरण विरोधी कानून को लेकर पूरे देश में बवेला मचा हुआ है । यह कानून तो हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश ने भी बनाया है । लेकिन हालिया विवाद उत्तर प्रदेश और फिर गुजरात की भाजपा सरकारों के बनाए धर्मान्तरण विरोधी कानून से खड़ा हुआ है । गुजरात हाईकोर्ट ने वहां की सरकार के धार्मिक आजादी(संशोधन) एक्ट, 2021 की छह धाराओं पर 19 अगस्त को रोक लगा दी । इसमें सबसे प्रमुख है अन्य धर्म के साथ शादी को जबरन धर्मान्तरण के दायरे में लाना । हाईकोर्ट ने उस पर यह आदेश जारी किया, जिसमें याचिकाकर्ता मुस्लिम नागरिकों ने इसके नाम पर परेशान किए जाने के मामले हाईकोर्ट के सामने पेश किए । राज्य सरकार के एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी ने इस कानून के अंतर्गत तीन मामले दर्ज होने की बात हाईकोर्ट में स्वीकारी । उत्तर प्रदेश सरकार के भो ऐसे कानून से परेशान नागरिकों के कुछ मामले इलाहाबाद हाइकोर्ट में चल रहे हैं ।

कलकता हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को ही पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव समाप्त होने के बाद हुई हत्या, बलात्कार की घटनाओं की जांच का जिम्मा सीबीआई को दे दिया । कार्यकारी चीफ जस्टिस राजेश बिंदल की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने आदेश में यह भी कह दिया कि सीबीआई जांच की मानीटरिंग कोर्ट करेगी । हाईकोर्ट ने अगर ऐसा नहीं किया होता तो, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सीबीआई को जांच का काम सौंपे जाने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जरूर जाती । क्योंकि सीबीआई की निष्पक्षता लगातार संदिग्ध बनी हुई है । इस पर हर तरफ से ऊंगलियां उठ रही हैं कि सीबीआई राजनीतिक/सरकारी जांच एजेंसी के रूप में काम करती है, जिसका कोई विधिसम्मत संवैधानिक अस्तित्व नहीं है ।

बंगाल में 27 मार्च से 29 अप्रील के बीच विधान सभा संपन्न हुए । उसके बाद की हिंसा से पैदा हुई अराजक स्थिति का मामला कलकता हाईकोर्ट गया । हाईकोर्ट ने पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के जरिए जांच करवायी । मानवाधिकार आयोग टीम के सदस्यों को घटनास्थलों पर जाने नहीं दिया गया । आयोग ने हाईकोर्ट को रिपोर्ट दिया कि पीड़ित परिवारों की एफआईआर पुलिस ने दर्ज नहीं की ।

उस रिपोर्ट के आधार पर कलकता हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को ही विशेष जांच दल भी गठित कर दिए । सीबीआई ने अपना काम शुरू कर दिया । जबकि 18 अगस्त को मद्रास हाईकोर्ट ने सीबीआई पर सुप्रीम कोर्ट की बहुचर्चित टिप्पणी की याद दिला दी, जिसमें सीबीआई को ‘सरकार की भाषा बोलने वाला पिंजरे का तोता’ कहा था । मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण के बिना सीबीआई को उसकी स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए वैधानिक दर्जा देनेवाला कानून केंद्र बनाए ।

जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर ने सीबीआई को ‘सरकार की भाषा बोलनेवाला पिंजरे का तोता’ कहा था ।

उनके बाद चीफ जस्टिस बने पी. सदाशिवम ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले पर 9/11/2013 को अपने आवास पर सुनवाई करके स्टे दे दिया, जिसमें सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया था । अभी तक उसी स्टे पर सीबीआई चल रही है, जिसकी आगे कोई सुनवाई नहीं हुई ।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 47 साल पहले रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र को उनके गृह राज्य बिहार में हुई हत्या के मामले की दोबारा जांच करने का आदेश 20 अगस्त को दिया है ।

28/07/2021 को केरल विधान सभा से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का फैसला गौर करने लायक है । 13 मार्च, 2015 को सत्तारूढ़ वाममोर्चा के विधायकों ने सदन के अंदर गुंडागर्दी की और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया । जब उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हुए तो ‘विशेषाधिकार’ कवच के इस्तेमाल का प्रयास किया गया । इसके लिए दोषी पाए गए छह विधायकों के साथ उनकी सरकार ने भी 2016 में पहले तिरूवनंतपुरम में मुख्य मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के पास केस वापसी की अर्जी दी । सीजेएम ने अर्जी ठुकरा दी । उसके बाद केरल हाईकोर्ट से भी ‘माननीयों’ को वही झटका मिला । फिर वे सुप्रीम कोर्ट गए । सुप्रीम कोर्ट जज डी. वाई. चन्द्रचूड़ और एम. आर. शाह ने 28/07/2021 को साफ कहा कि ‘अभियुक्त विधायकों का सदन के अंदर का कृत्य दंड के योग्य है और विशेषाधिकार से बचने का कोई प्रावधान आपराधिक कानून से ऊपर नहीं है, जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है ।’