पूर्व सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के राज्य सभा सदस्य बनने को लेकर बहस जारी है और रहेगी । संविधान के तीनों अंगों - न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच यह चर्चा का विषय बनी हुई है । रंजन गोगोई के राज्यसभा के लिए मनोनीत होने पर राजनीतिक हलकान में सवाल उठने का कारण ये है कि गोगोई भारत के प्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं, जो राष्ट्रपति के बाद और अमूमन समकक्ष सर्वोच्च संवैधानिक पद है । संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एक-दूसरे को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं । संविधान से सुप्रीम कोर्ट को इतना अधिकार(पावर) प्राप्त है कि संसद से पारित किसी भी एक्ट पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद उसके लागू होने पर रोक लगा सकता है । संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को कई असाधारण शक्तियां भी दे रखी हैं । सुप्रीम कोर्ट के प्रति देश की जनता में इतनी आस्था और श्रद्धा है कि कार्यपालिका तथा विधायिका के धक्कों से पीड़ित-प्रताड़ित लोग न्याय की अंतिम आशा के लिए शीर्ष कोर्ट की ओर टकटकी लगाए रहते हैं ।
राज्य सभा में गत हफ्ते रंजन गोगोई के मनोनीत सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण के समय जो कुछ देखने -सुनने को मिला, उससे जनसाधारण के बीच अच्छा संदेश नहीं गया । एक ही बात चर्चा में है कि रंजन गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचायी और चीफ जस्टिस जैसे पद की गरिमा को निजी लाभ के लिए दांव पर लगा दिया । राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्य क्यों मनोनीत किया और इसके पीछे क्या-क्या कारण हैं, यही सारी बातें लोगों के बीच चर्चा में है । चीफ जस्टिस के रूप में रंजन गोगोई के सरकार की मर्जी के अनुकूल दिए गए कई फैसले और उनके निजी चरित्र को लेकर उठे विवाद का रफा-दफा हाना इस मनोनयन का कारण माना जा रहा है । रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की ही एक महिला कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया था । उस समय कई संसद सदस्यों ने चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाकर उन्हें हटाने की बात उठायी थी । सरकार ने संसदीय कमिटी के अंदर-अंदर ही मामला निबटा कर गोगोई को ‘क्लीन चिट’ दे दिया । ऐसे बदनाम चरित्र वाले चीफ जस्टिस को मनोनीत किए जाने का विपक्षी सदस्यों ने विरोध किया । यह विरोध सरकार की नजर में भले गलत हो, अवाम विपक्ष के कदम को सही मानता है ।
चीफ जस्टिस के रूप में रंजन गोगोई का कार्यकाल विवादास्पद रहा । रंजन गोगोई 03/10/2018 को चीफ जस्टिस बने और 14 नवंबर, 2019 को रिटायर हुए । अपने कार्यकाल के दौरान रंजन गोगोइ समझ रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट की छवि को लेकर देश में अच्छी चर्चा नहीं हो रही है। इसलिए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई जोर देकर कहते थे कि रिटायर होने के बाद जजों का किसी पद पर नियुक्ति या कोई एसाइनमेंट स्वीकारना न्यायपालिका की स्वतंत्रता में बाधक है । 2018 में सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में रंजन गोगोई ने उस समय यह बात कही, जब उनका चीफ जस्टिस बनना निश्चित हो चुका था । रामनाथ गोयनका मीमोरियल लेक्चर देते हुए रंजन गोगोई ने 2018 में कहा कि रिटायरमेंट के बाद कोई पद स्वीकार करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता में यह अड़चन है । चीफ जस्टिस बनने के बाद भी मार्च, 2019 में इससे सम्बन्धित एक सुनवाई के दौरान रंजन गोगोई ने इस पर बल दिया । मामला था ट्रिम्यूनल के कामकाज से जुड़े वित्त एक्ट में संशोधन का, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी । उसकी सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ कर रही थी, जिसके अध्यक्ष चीफ जस्टिस रंजन गोगोई थे । याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने दलील दी कि रिटायर जजों को विशेष ट्रिब्यूनलों का अध्यक्ष बनाये जाने की जरूरत है । इस पर चीफ जस्टिस ने अपनी बात दुहरायी कि रिटायरमेंट के बाद कोई पद स्वीकरना न्यायपालिका की आजादी पर धब्बा है, आप कैसे काम करेंगे और इसे ‘अपना बेहद मजबूत विचार’ बताया । यह सुनवाई 17 मार्च, 2019 को थी । रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस पद से रिटायर होने के कुछ ही महीने बाद न्यायपालिका की ‘आजादी’ से समझौता करके राज्य सभा सदस्य बन गए । सुप्रीम कोर्ट क अंदर अपना ‘बेहद मजबूत विचार’ व्यक्त करनेवाले पूर्व चीफ जस्टिस ने उसके ठीक एक साल बाद 19 मार्च, 2020 को सरकार का ‘ऑफर’ स्वीकार कर लिया । राज्यसभा के लिए रंजन गोगोई के मनोनयन की खबर से ही टीका-टिप्पणियां होने लगी । गोगोई ने कहा कि शपथ लेने के बाद बोलूंगा । 19 मार्च को पद व गोपनीयता की शपथ तथा संविधान के एक महत्वपूर्ण पद के प्रति उनकी धारणा सार्वजनिक हो गयी । तीन दिन बाद उन्होंने मुंह खोला और वरिष्ठ कांग्रेस नेता तथा वकील कपिल सिब्बल के खिलाफ हमला बोला । कपिल सिब्बल ने रंजन गोगोई के राज्यसभा मनोनयन पर सबसे पहले सवाल उठाया था । पूर्व चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी विवाद का हवाला देकर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी को उचित ठहराया । रंजन गोगोई ने एक टीवी चैनल को बताया - ‘जनवरी 2018 में तत्कालोन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ कांग्रेस ने महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी की थी । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों ने दीपक मिश्रा के कामकाज के खिलाफ 12 जनवरी, 2018 को बजाप्ता संवाददाता सम्मेलन आयोजित करके अपना असंतोष व्यक्त किया था । मैं वरिष्ठता के क्रम में तीसरे नम्बर पर था । कपिल सिब्बल महाभियोग लाने के लिए समर्थन मांगने मेरे घर आये आर मैंने उन्हें अपने घर में घुसने नहीं दिया था ।’ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने महाभियोग मुद्दे पर बात करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जजोंं स आगे आने की अपील की थी ।
बहस का विषय ये नहीं है कि जजों को रिटायर होने के बाद सरकारी ऑफर स्वीकार करना चाहिए या नहीं । क्योंकि ऐसा पहले भी होता रहा है। चर्चा का मुख्य विंदु रंजन गोगोई का ‘बेहद मजबूत विचार’ है, जो वे सुप्रीम कोर्ट जज और चीफ जस्टिस के रूप में न्यायपालिका की ‘स्वतंत्रता’ का ख्याल करके व्यक्त करते रहे हैं ।
शपथ ग्रहण के लिए 19 मार्च, 2020 को रंजन गोगोई के राज्यसभा में घुसते ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत विपक्षी सदस्यों ने ‘शेम-शेम है आप पर’ नारेबाजी के साथ उनका स्वागत किया और विरोध में सदन से बाहर निकल गये । राज्यसभा में उस समय न तो प्रधानमंत्री थे और न गृहमंत्री अमित शाह । ऐसा कदाचित् पहली बार हुआ, जब किसी नए सदस्य के शपथ लेने के समय नारेबाजी और वाकआउट देखा गया हो । रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने का फैसला विवाद के घेरे में आयेगा, इसका आभास प्रधानमंत्री को शायद पहले से था ।
सरकार के इस फैसले को ‘न्यायोचित’ ठहराने के लिए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इतनी सफाई दी कि उसमें कांग्रेस सरकारों द्वारा पहले ऐसा किये जाने का जिक्र किया । उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्र और सुप्रीम कोर्ट जज बहरूल इस्लाम को राज्यसभा सदस्य बनाने का हवाला दिया ।
रंजन गोगोई अपने परिवार जनों के साथ शपथ लेने सदन में गये, जिन्हें यह दृश्य अच्छा नहीं लगा होगा । वैसे समय में रंजन गोगोई ने चीफ जस्टिस की तुलना में साधारण पद स्वीकार कर लिया, जब सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका के मामले में संविधान से प्राप्त अपने असाधारण ‘पावर’ का इस्तेमाल किया है । मणिपुर की भाजपा सरकार के एक मंत्री थुनाआजम श्याम कुमार सिंह को विधान सभा के लिए अयोग्य घोषित किये जाने पर स्पीकर वाई खेमचंद द्वारा फैसले लगातार टालने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने असाधारण संवैधानिक पावर का इस्तेमाल किया । जस्टिस आर एफ नरोमन और रविन्द्र भट्ट ने 18 मार्च, 2020 को संविधान की धारा-142 के तहत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल करते हुए मंत्री श्याम कुमार सिंह को तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक विधान सभा प्रवेश पर रोक लगा दिया । इससे उनका मंत्री पद तो स्वतः समाप्त हो गया । ऐसा शायद पहली बार हुआ है । 2017 में मणिपुर में भाजपा सरकार बनने के समय से ही विधायक श्याम कुमार सिंह की सदस्यता पर विधान सभा स्पीकर फैसला टाल रहे थे । धारा-142 ज्यादा लोग नहीं जानते थे कि इसके अंतर्गत शीर्ष कोर्ट को किसी भी मामले में फैसले लेने के असाधारण पावर प्राप्त हैं ।
श्याम कुमार सिंह कांग्रेस टिकट पर जीते थे और मंत्री बनने के लिए भाजपा में चले गये । जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से लोकसभा या विधान सभा स्पीकर के पावर पर ‘पुर्नविचार’ करने कहा कि दल-बदल कानून के अंतर्गत किसी सदस्य को अयोग्य घोषित किये जाने के मामले पर स्पीकर आखिर कितने समय तक फैसला टाल सकते हैं । स्पीकर को चुनाव आने तक फैसला टालने का अधिकार है या नहीं । 10वीं अनुसूची कहलाने वाला दल-बदल कानून 52वां संशोधन है जो 1985 में संविधान में जोड़ा गया । 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने धारा-142 वाला असाधारण आदेश जारी किया और 19 मार्च को पूर्व चीफ जस्टिस विधायिका का हिस्सा बन गये ।
2014 में भाजपा गठजोड़ शासनकाल में पूर्व सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस पी. सदाविशम केरल के राज्यपाल बने । सदाशिवम ने 2013 में कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल के समय सीबीआई को असंवैधानिक घोषित करनेवाले गुवाहाटी हाइकोर्ट के फैसले पर स्टे दिया । उसके लिए चीफ जस्टिस सदाशिवम के आवास पर 09/11/2013 को देर शाम विशेष सुनवाई हुई । सीबीआई पर लगे स्टे का लाभ कांग्रेस सरकार को मिला, भाजपा सरकार को मिल रहा है । स्टे देने वाले सुप्रीम कोर्ट जस्टिस को उसका इनाम भाजपा गठजोड़ शासन में मिला ।
रंजन गोगोई ने नरेंद्र मोदी सरकार के मनोनुकूल कई फैसले देकर सुप्रीम कोर्ट को विवाद की सुर्खियों में रखा । अयोध्या पर ऐतिहासिक फैसला, राफेल रक्षा सौदा पर सरकार को राहत और धारा-370 को निरस्त करनेवाले जम्मू व कश्मीर पुर्नगठन एक्ट 2019 बनने के बाद अगस्त में कश्मीर से संबंधित हेबियाज कॉरर्पस याचिकाओं पर ‘गो स्लो नीति’ चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की ‘उपब्धियों’ में शुमार है । असम में विवादित भाजपा के पसंदोदा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने का आदेश चीफ जस्टिस गोगोई ने दिया, जो विवाद असम में नहीं सुलझा और अब पूरा देश उसके लपेटे में है ।