मणिपुर विधान सभा स्पीकर वाई. खेमचंद ने उन सात कांग्रेस विधायकों को अयोग्य किए जाने के मामले में फैसला टाल दिया, जिनके समर्थन से राज्य में भाजपा सरकार चल रही है । स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट की डेडलाईन के कारण उन सातों विधायकों को अंतिम सुनवाई के लिए अपने ट्रिब्यूनल के सामने आठ मई को उपस्थित होने कहा । लेकिन उन्हें अयोग्य घोषित किए जाने के संबंध में अपना ‘निर्णय सुरक्षित’ रख लिया ।

अब यह मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में जाना लगभग तय है । सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख के चलते मणिपुर विधान सभा स्पीकर को मंत्री थुनाओजाम श्याम कुमार सिंह को 28 मार्च को विधायक के रूप में अयोग्य घोषित करना पड़ा । श्याम कुमार सिंह मार्च, 2017 विधान सभा चुनाव में कांग्रेस टिकट पर जीते और मंत्री बनने के लिए भाजपा में शामिल हो गए । श्याम कुमार सिंह को संविधान की 10वीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्य घोषित करने का फैसला विधान सभा स्पीकर 2017 से ही टाल रहे थे । वन मंत्री श्याम कुमार सिंह को अयोग्य घोषित करने के लिए कांग्रेस विधायक कीशोम मेघचन्द्र ने 2017 में ही स्पीकर के पास अर्जी दी । विधान सभाध्यक्ष (स्पीकर) ने उस पर कोई विचार नहीं किया । उसके बाद कांग्रेस विधायक ने मणिपुर हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी और स्पीकर को तुरंत निर्णय लेने का निर्देश देने का आग्रह किया । सुप्रीम कोर्ट के जज आर. एफ. नरीमन, अनिरूद्ध बोस और वी. रामासुब्रमण्यम की संविधान पीठ इस पर विचार कर रही थी कि लोकसभा या विधान सभा के स्पीकर दलबदल मामले में किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का फैसला कितने समय तक टाल सकते हैं । संविधान की 10वीं अनुसूची के अंतर्गत स्पीकर एक निश्चित समय सीमा से बंधे हैं या नहीं और राजनीतिक कारणों से दल बदलनेवाले लोकसभा और विधान सभा सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने पर निर्णय अनिश्चित समय तक टालना कहां तक न्यायोचित है ।

मणिपुर हाईकोर्ट ने विधान सभा अध्यक्ष के खिलाफ दायर अर्जी पर सुनवाई के दौरान 8 सितंबर 2017 को कहा कि हाईकोर्ट इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं कर सकता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पास यह मामला विचाराधीन है कि स्पीकर को अयोग्य घोषित किए जाने की अर्जी पर एक निश्चित समय सीमा के अंदर निर्णय लेने का निर्देश कोई हाईकोर्ट दे सकता है या नहीं । जनवरी, 2018 में अपीलकर्ता ने दोबारा मणिपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया । उस पर हाईकोर्ट न न्यायपालिका के तल्ख तेवर का परिचय देते हुए विधायिका की राजनीतिक ‘सर्वोच्चता’ की कलई उजागर कर दी । मणिपुर हाईकोर्ट ने 23 जुलाई, 2019 को अपने निचोड़ में कहा कि स्पीकर का पद एक न्यायिक ट्रिब्यूनल जैसा है, जिसे एक निश्चित समय सीमा के अंदर निर्णय लेना है, जो सदन की पांच साल की अवधि पूरी होने से काफी पहले हो । साथ में हाईकोर्ट ने यह भी चेता दिया कि अकारण अगर अनिर्णय की स्थिति बनाए रखते हैं तो फिर न्यायपालिका के हस्तक्षेप से इन्कार नहीं किया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन होने के कारण हाईकोर्ट ने कोई निर्देश स्पीकर को नहीं दिया । 10वीं अनुसूची कहलाने वाला दल-बदल कानून 52वां(संशोधन) एक्ट, 1985 के जरिए संविधान में जोड़ा गया ।

मणिपुर में कांग्रेस विधायकों के समर्थन से भाजपा के एन. बीरेन सिंह मुख्यमंत्री बने और उसके तुरंत बाद अप्रील, 2017 में वन मंत्री श्याम कुमार सिंह तथा समर्थन देनेवाले सात कांग्रेस विधायकों को अयोग्य घोषित करने की अर्जियां विधान सभाध्यक्ष के पास आयी । हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया । स्पीकर कुंडली मारे बैठे रहे । यहां तक कि 21 जनवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी डेडलाईन की भी मणिपुर स्पीकर ने परवाह नहीं की और अपना निर्णय टाले रखा ।

21 जनवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मणिपुर के कांग्रेस विधायक के. मघचन्द्र की अर्जी पर स्पीकर वाई. खेमचंद को चार हफ्ते के अंदर निर्णय लेने का निर्देश दिया । तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ ने यह भी कह दिया कि अगर इस समय सीमा के बीत जाने के बावजूद स्पीकर कोई निर्णय नहीं लेते हैं, तो कोई भी पार्टी या पक्ष आगे के निर्देश के लिए इस कोर्ट में अर्जी दे सकता है । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने ऐसी स्थिति के स्थायी निदान के लिए उसी समय संसद से संविधान में संशोधन करने कहा ।

शीर्ष कोर्ट ने कहा - ‘संसद 10वीं अनुसूची में ऐसा संविधान संशोधन लाने पर गंभीरता से विचार करे ताकि लोकसभा और विधान सभाओं के स्पीकर के समानान्तर एक स्थायी ट्रिब्यूनल का प्रावधान हो, जिसके प्रमुख रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज या हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हों ।’ संविधान पीठ ने ऐसा सुझाव इसलिए दिया ताकि अयोग्य घोषित करने के अर्जियों पर निर्णय लंबे समय तक न टले । जजों का कहना था कि लोकतंत्र को बचाने के लिए ऐसा संशोधन लाया जाए, क्योंकि स्पीकर सत्तारूढ़ दल में बने रहते हैं, जिसका प्रभाव ट्रिब्यूनल के रूप में उनके दायित्व पर पड़ता है ।

नवंबर, 2016 में दो जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने मणिपुर जैसा ही तेलंगाना के स्पीकर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह मामला संविधान पीठ के सुपुर्द कर दिया ।

मणिपुर स्पीकर ने 21 जनवरी, 2020 को शीर्ष कोर्ट द्वारा दी गयी डेडलाईन के अंदर निर्णय लेने के बजाए शीर्ष कोर्ट में अपनी अर्जी भी दायर कर दी । उसके बाद स्पीकर का सुप्रीम कोर्ट से पंगा पूरी तरह राजनीतिक रंग में आ गया । चार हफ्ते की डेडलाईन बीतने के बाद 3 मार्च को केंद्र सरकार की अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल माधवी दीवान स्पीकर की ओर से कोर्ट में उपस्थित हुई और विस्तृत अर्जी दायर करने के लिए 10 दिन का समय मांगा ।

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामले में संविधान से प्राप्त असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करके सीधे आदेश देना पड़ा । धारा-142 के अंतर्गत प्राप्त इस शक्ति का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 18 मार्च को मणिपुर के विधायक और वन मंत्री श्याम कुमार सिंह को अगले आदेश तक विधान सभा में घुसने से रोक दिया । इस आदेश से श्याम कुमार सिंह का मंत्री पद तो स्वतः समाप्त हो गया। ऐसा शायद ही पहले कभी हुआ हो ।

स्पीकर की ओर से केंद्र सरकार के सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कांग्रेस विधायक की ओर से वरिष्ठ वकील कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल कोर्ट में 18 मार्च, 2020 को पेश हुए । तुषार मेहता ने 28 मार्च तक का समय यह कहकर मांगा कि उस दिन स्पीकर अपना निर्णय देंगे । कपिल सिब्बल देर किए बगैर निर्णय के पक्ष में थे । मणिपुर स्पीकर के पास अप्रील, 2017 से लंबित 13 अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही थी । शीर्ष कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 30 मार्च रखी । स्पीकर ने श्याम कुमार को विधायक के रूप में 28 मार्च को ही अयोग्य घोषित कर दिया और सात कांग्रेस विधायकों की अंतिम सुनवाई 8 मई निर्धारित की ।

मणिपुर स्पीकर का सुप्रीम कोर्ट निर्देश के बावजूद कांग्रेस विधायकों को अयोग्य घोषित करने के मामले में 8 मई को ‘निर्णय सुरक्षित’ रखना जरा पेचीदा है । क्योंकि ये विधायक भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं । कांग्रेस विधायक मेघचंद ने 8 मई को ही जैसा कहा, अगर वे यह मामला दोबारा शीर्ष कोर्ट ले जाते हैं तो 10वीं अनुसूची की फिर से समीक्षा हो सकती है । स्पीकर ने 10वीं अनुसूची के अंतर्गत ही ट्रिब्यूनल का गठन करके सुनवाई की, पर ‘निर्णय सुरक्षित’ रख लिया । बागी कांग्रेस विधायकों की सदस्यता समाप्त होने पर भाजपा सरकार अल्पमत में आ सकती है । मार्च, 2017 चुनाव में 60 सदस्यीय विधान सभा में भाजपा को मात्र 21 सीटें मिली थी । कांग्रेस ने 28 सीटें जीती, जो 15 साल से सत्ता में थी । भाजपा ने बहुमत के लिए कम पड़ रही 10 सीटें सात कांग्रेस विधायकों के समर्थन से जुटायी ।

जुलाई, 2019 में कर्नाटक में जद(सेक्यूलर) + कांग्रेस गठजोड़ सरकार को गिराने के लिए भाजपा ने जद विधायकों को फोड़ा । जद मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी सदन में विश्वासमत से पहले बागी विधायकों के बारे में स्पीकर को निर्देश दिलवाने सुप्रीम कोर्ट गए। जिन बागियों की सदस्यता समाप्त हुई, वे भी सुप्रीम कोर्ट चले गए।