इस बीच दिल्ली में एक ही मंच पर जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमना ने न्यायपालिका.विधायिका.कार्यपालिका के विषय में जो कुछ कहा उससे देश की जनता के बीच स्पष्ट संदेश गया कि इनके आपसी रिश्ते सहज नहीं चल रहे हैं ।
यह अवसर था, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों का 30 अप्रील को विज्ञान भवन में आयोजित 11वें संयुक्त सम्मेलन का प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दोनों इसमें मौजूद थे । न्यायपालिका और कार्यपालिका के इन दोनों शीर्ष प्रमुखों ने एक-दूसरे की कार्यप्रणाली पर ऊंगली उठायी, तथा विभिन्न कोर्टों में लंबित मुकदमे के लिए एक-दूसरे को जनता के कटघरे में दोषी ठहराया ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने जितनी बातें कहीं, उनमें से किसी पर भी सहमति नजर नहीं आयी । उनमें सबसे अहम था, कार्यपालिका.विधायिका और न्यायपालिका के बीच वर्षों तक झूलता लंबित मुकदमे का मामला । टकराव का यह एकमात्र ऐसा विषय है, जो हर न्यायिक सम्मेलन में और ऐसे सम्मेलनों में हमेशा चर्चा में आता है । विधायिका और कार्यपालिका से जुड़े लोग प्रायः न्यायपालिका पर अपने खंडन सियासी हित में आरोप लगाते हैं, जिसका न्यायपालिका को खंडन करके माकूल जवाब देना पड़ता है ।
गत हफ्ते संपन्न मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों के सम्मेलन में भी वही देखने को मिला । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री के आरोप का जवाब दिया । इस बार ऐसे समय में यह सम्मेलन हुआ है, जब केंद्र सरकार(कार्यपालिका) और विधायिका का सीधे सुप्रीम कोर्ट से टकराव उफान पर है ।
प्रधानमंत्री ने अपना संबोधन इस सुझाव से शुरू किया कि हाईकोर्टों में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल पर विचार करें, जिससे आम लोगों को न्याय को समझने में सहूलियत होगी, लेकिन उसके बाद उन्होंने ऐसी न्याय व्यवस्था पर बल दिया, जिसमें न्याय आसान, जल्द तथा सभी के लिए हो । प्रधानमंत्री ने कार्यपालिका और विधायिका का बचाव करते हुए लंबित मुकदमों के लिए अदालतों को जिम्मेदार ठहराया । प्रधानमंत्री ने समय.सीमा के अंदर न्यायपालिका के लिए रोडमैप तैयार करने और मध्यस्थता पर एक अंब्रेला कानून बनाने की बात कही ताकि हर क्षेत्र में मध्यस्थता में आसानी हो ।
चीफ जस्टिस एन. वी. रमना का भाषण प्रधानमंत्री के आरोपों का जवाब पर केंद्रित था । उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत लंबित मुकदमे के लिए सरकारें ही जिम्मेदार हैं । चीफ जस्टिस ने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका की विभिन्न शाखाओं के अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं करने के कारण लंबित मामलों का अंबार लगा हुआ है । उन्होंने कार्यपालिका द्वारा न्यायिक आदेशों की अवहेलना से उत्पन्न अवमानना मामलों की बढ़ती संख्या का भी उल्लेख किया । चीफ जस्टिस ने हाईकोर्टों में स्थानीय भाषाओं में कार्यवाही के प्रधानमंत्री के सुझाव को भी नकारते हुए कहा कि फिलहाल ऐसा करना संभव नहीं है ।
प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से टकराव टालना चाहती है । जबकि जज लोग अच्छी तरह समझ रहे होते हैं कि सरकार अपने सियासी हित में राजनीतिक कारणों से संविधान और कानून के साथ छेड़छाड़ कर रही है । सुप्रीम कोर्ट का इसके खिलाफ जनहित याचिकाओं को स्वीकार करना और सुनवाई करना सरकार बर्दाश्त नहीं करती । ऐसा नौबत आने पर सरकार बार-बार समय लेकर सुप्रीम कोर्ट नोटिस का जवाब टालती है और देशहित की दुहाई देकर कोर्ट को झांसा देने की कोशिश करती है ।
इस सम्मेलन से पहले और समाप्त होने के तुरंत बाद इसका सबूत सामने आया । अभी सबसे ज्यादा विवादास्पद मामला भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करनेवालों को देशद्रोह कानून के तहत जेल में डालने का बढ़ता चलन बना हुआ है । इसमें देशभर के सामाजिक,राजनीतिक और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग मतभेद के जुर्म में बंद किए जा रहे हैं । देशद्रोह कानून की इस धारा आईपीसी 124। की संवैधानिक वैद्यता को चुनौती देनेवाली जनहित याचिकाओं पर 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई की तारीख 5 मई तक की । 30 अप्रील को विज्ञान भवन सम्मेमलन में प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस आमने.सामने थे । 2 मई को केंद्र सरकार ने अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए और समय मांगा । इस मामले की सुनवाई करनेवाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस स्वयं हैं । उन्होंने साफ कह दिया कि इस मामले में कोई स्थगन नहीं होगा । चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने गत वर्ष जुलाई में ही सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस भेजा था । 27.04.2022 को चीफ जस्टिस की देशद्रोह कानून के राजनीतिक दुरूपयोग पर टिप्पणी गौर करने लायक है. ‘आजादी के 75वें(अमृत) वर्ष में भी इस औपनिवेशिक कानून की जरूरत क्यों है । गुलामी के दिनों में इसी कानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किया था ।’ जस्टिस एन. वी. रमना ने कहा. ‘विवाद कानून को लेकर है । हमारी चिंता इस कानून के दुरूपयोग और कार्यपालिका के अपनी जवाबदेही से मुकरने की है ।’
30.04.2022 के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने न्याय सुनिश्चित और त्वरित करने की प्रणाली बनाने के सुझाव के समय आजादी की 75वीं वर्षगांठ की दुहाई दी ।
उसके पांच दिन पहले 25 अप्रील को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को असहज करनेवाले एक और मामले में अपना रूख स्पष्ट किया । यह मामला है 05.08.2019 को जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट बनाकर जम्मू व कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा देनेवाले 72 वर्ष पुराने प्रावधान अनुच्छेद 370 को खत्म करके इस राज्य को दो संघशासित क्षेत्रों में बांटने का । इस कानून की संवैधानिक वैदयता को जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों ने 2019 में ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । लेकिन शीर्ष कोर्ट भाजपा के राजनीतिक मकसद से किए गए इस विवादास्पद फैसले पर सुनवाई तीन वर्षों तक टालती रही । याचिकाकर्ताओं ने बार-बार सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी । 25 अप्रील को जब चीफ जस्टिस को बताया गया कि यह धारा.370 का मामला है और चुनाव की तैयारी के लिए विधान सभा सीटों का परिसीमन जारी है, तब सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि गर्मी की छुट्टी के बाद सुनवाई के लिए लिस्टिंग की जाएगी । चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने यह भी कहा कि यह पांच जजों की पीठ का मामला है, वे पीठ पुनर्गठित करेंगें । गत 08.04.2022 को भी चीफ जस्टिस एन. वी. रमना को कहना पड़ा कि सरकार द्वारा न्यायपालिका जजों को बदनाम करने का नया चलन शुरू हुआ है ।
जजों, राजनीतिक विरोधियों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी करनेवाले पेगासस स्पाईवेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख सरकार को अच्छा नहीं लगा । यह विवाद गत वर्ष संसद में गूंजा । जवाब में राष्ट्रीय सुरक्षा की सरकार की दुहाई पर चीफ जस्टिस ने कहा. ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार हमेशा फ्री पास नहीं ले सकती और न्यायिक समीक्षा से बच नहीं सकती । संविधान(कानून) दिवस के दिन 26 नवंबर को हर साल सुप्रीम कोर्ट और सरकार के मतभेद उभरते हैं । 2021 के समारोह में अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट बन गया है. कोर्ट ऑफ अपील । प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायपालिका उपनिवेशवादी मानसिकता समझे और इसकी आड़ में विकास प्रोजेक्टों को लटकानेवाली याचिकाओं को तबज्जो न दे ।