इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी अच्छी टिप्पणी की. ‘जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है’ । दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट जज बी. आर. गवई और के. बी. विश्वनाथन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि अब समय आ गया है कि निचली अदालतें तथा सभी हाईकोर्ट इस सिद्धांत को स्वीकारें कि ‘जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है’ ।
दिल्ली सरकार की आबकारी नीति में कथित घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग(धन शोधन) मामलों में जेल में बंद मनीष सिसोदिया को इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट पीठ से जमानत मिली और वे 17 महीने बाद रिहा हुए । उन्हें ईडी(प्रवर्तन निदेशालय) ने 09.03.2023 को गिरफ्तार किया था । उसके पहले फरवरी में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था ।
सुप्रीम कोर्ट जजोंं ने एक.दो और ऐसी बातें कही जो जमानत के लिए कई-कई महीने अदालतों में एड़ी घिस रहे गैर.राजनीतिक अभियुक्तों के लिए भी नजीर का काम कर सकती हैं । शीर्ष कोर्ट ने अधीनस्थ अदालतों की आलोचना करते हुए कहा कि लंबित रखे जाने से मनीष सिसोदिया शीघ्र सुनवाई के अधिकार से वंचित हुए हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि निचली अदालतेंं और हाईकोर्ट जमानत देने के मामले में बचने का प्रयास करते हैं । सीधे.सरल और पेचीदा मामलों में भी जमानत न दिए जाने से सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिकाओं की बाढ़.सी आ गयी है । इससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ी है ।
इन टिप्पणियों के साथ मनीष सिसोदिया को जमानत मिलने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सुप्रीम कोर्ट का रूख किया । उनके खिलाफ भी सीबीआई और ईडी दोनों ने कथित भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया हुआ है । सीबीआई गिरफ्तारी को चुनौती देनेवाली अरविंद केजरीवाल की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में खारिज होने के बाद उन्होंने उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी । 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई सूचीबद्ध करने पर सहमत हो गया । इसके पहले मई में लोकसभा चुनाव प्रचार के समय भी सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के लाख विरोध के बावजूद केजरीवाल को जमानत दे दी और चुनाव समाप्त होते ही उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया ।
इन दोनों नेताओं को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलते ही तेलंगाना राष्ट्र समिति(बी आर एस) नेता के. कविता और अरविंद केजरीवाल नीत आम आदमी पार्टी के संचार प्रभारी विजय नायर ने भी जमानत की अर्जी लगायी । कविता और नायर के खिलाफ भी ईडी तथा सीबीआई दोनों का केस चल रहा है ।
के. कविता 5 महीने से हिरासत में है और विजय नायर 23 महीने से । दोनों का मामला आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ है । के. कविता ‘साउथ ग्रुप’ की सदस्य हैं, जिसने दिल्ली में आबकारी नीति बदलने के एवज में कथित रूप से आम आदमी पार्टी को रिश्वत दी । इनकी जमानत दिल्ली की ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने ही 01 जुलाई को खारिज कर दी । विजय नायर को सीबीआई के केस में जमानत मिल चुकी है । पीएमएलए(मनी लाउंड्रिंग रोक एक्ट) केस में वे जमानत की गुहार लगा रहे हैं । के. कविता और विजय नायर दोनों ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट के नरम रवैए का हवाला देते हुए राहत मांगी । 12 अगस्त को ही कविता और नायर की सुनवाई को अलग-अलग सुप्रीम कोर्ट पीठ ने की । ईडी और सीबीआई से जवाब मांगा गया ।
यह सब ऐसे समय में हुआ, जब ईडी पर चारों ओर से आरोप लग रहे हैं कि इसकी कार्रवाई राजनीति प्रेरित है और चुन-चुनकर ऐसे राज्यों में गैर.भाजपा नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जहाँ विधान सभा चुनाव होनेवाले हैं । केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तो टकराव जैसी नौबत है ही । साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के साथ भी निचली अदालतों और हाईकोर्ट का सामंजस्य नहीं है । इसमें भी राजनीतिक कारण उभरकर सामने आए हैं । 07 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए पर अपने ही आदेश पर पुनर्विचार की याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति दी और उसी दिन केंद्र सरकार ने संसद में इस संबंध में जवाब दिया ।
तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई 28 अगस्त तक के लिए मुल्तवी कर दिया । याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट से अपने 270702022 के आदेश पर पुनर्विचार का आग्रह किया गया है । इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी(प्रवर्तन निदेशालय. एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट) के मनी लॉन्ड्रिंग केसों में तलाशी, जब्ती, कुर्की और गिरफ्तारी के पीएमएलए, 2002 कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया था । मनी लॉन्ड्रिंग(धन शोधन) रोक एक्ट(पीएमएलए)ए 2002 में समय.समय पर इन प्रावधानों से संबंधित संशोधन किए गए हैं । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि इस बात की जांच की जाएगी कि याचिकाकर्ता वास्तव में पुनर्विचार चाहते हैं या इसी बहाने अपील दायर की गयी है ।
उस समय संसद चल रहा था । ईडी कार्रवाई के संबंध में उठे एक सवाल के लिखित जवाब में लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि विगत 6 वर्षों में ईडी ने वर्तमान और पूर्व संसद सदस्यों, विधायकों और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ 132 धन शोधन मामले दर्ज किए हैं ।
उसके एक हफ्रता पहले 28 जुलाई को कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की जानकारी देते हुए संसद को बताया कि विगत 5 वर्षों में सिर्फ शीर्ष कोर्ट में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी लंबित केसों में हुई है, जबकि सुप्रीम कोर्ट जजोंं की पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा है ।
केंद्रीय कानून मंत्री संसद में यह नहीं बता सकते कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ रहे केसों के कारण लंबित होते मामलों के लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और सबसे ज्यादा सत्तारूढ़ दल भाजपा के मत्थे यह ठीकरा जाता है । सरकारी कानून अनुपालन और जांच एजेंसियों का सियासी राजनीतिक इस्तेमाल इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है । ईडी, सीबीआई इस प्रयास में कोई कमी नहीं छोड़ती कि विपक्षी दलों के नेता एक बार जेल जाने के बाद बाहर न निकल पाएं । ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ चुनौती याचिकाओं की झड़ी लगा देते हैं । प्रायः देखा जा रहा है कि राजनीतिक नेताओं से जुड़ मामलों में अदालतेंं जल्द सुनवाई करती हैं और उनकी जमानत याचिकाओं को प्राथमिकता दी जाती है । जहाँ तक जमानत सुनवाई, ट्रायल का मामला है, पैसा और रसूख की बदौलत धाकड़ वकीलों को खड़ा करके अदालतों को प्रभावित करने वाली इस राजनीतिक चक्की में आम कैदी पिस रहा है ।
किसी आम कैदी की फरियाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना और उसे शीघ्र सुनवाई का अधिकार मिलना अपवाद है । दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने जो टिप्पणी की, उसका लाभ एक सिपाही को मिला । सुप्रीम कोर्ट जज अभय एस. ओखा और औगस्टाईन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 13 अगस्त को जो फैसला सुनाया, वो पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण है । जजों ने गैर.कानूनी गतिविधियां रोक एक्ट(यूएपीए नच) जैसे बड़े कानून के प्रावधानों के अंतर्गत 2 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद एक पूर्व सिपाही को इसी आधार पर जमानत दे दी । पीठ ने इस टिप्पणी को नजीर जानकर दुहराया कि ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद है’ और कहा कि जमानत से इन्कार कैदी के अधिकारों का उल्लंघन है । उस सिपाही को कट्टरपंथी गुट पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया(च्यपीएफआई) से कथित संपर्क के कारण यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था । सुप्रीम कोर्ट जजोंं ने ट्रायल कोर्ट और पटना हाईकोर्ट की इस पूर्व सिपाही को जमानत नहीं दिए जाने के कारण आलोचना की । सुप्रीम कोर्ट फैसले का ही दूसरा पहलू देखिएए जो तकरीबन 6 महीने पूर्व यूएपीए के ही अंतर्गत एक अन्य कैदी के मामले में देखने को मिला । 6 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट पीठ ने उस कैदी को जमानत देने से यह कहकर इन्कार कर दिया कि आतंक विरोधी कानून के प्रावधानों में जेल और गंभीर अपराधों में ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत मांगने में ‘जमानत नियम और जेल अपवाद’ लागू नहीं होता । अब इस नीति वाक्य का तीसरा पहलू भी देखिए । 09 अगस्त को मनीष सिसोदिया को जिस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी, उस आधार पर रांची में पीएमएलए के स्पेशल जज पी के शर्मा ने झारखंड के पूर्व मंत्री सह कांग्रेस विधायक आलमगीर आलम को जमानत नहीं दी । जज ने अपने फैसले में लिखा कि अभियुक्त आलमगीर आलम मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जेल में बंद हैं, और इनके मामले में ‘जेल ही नियम है, बेल अपवाद है’ वाली नीति लागू होगी । आलम को 15 मई को गिरफ्तार किया गया । ध्यान रहे कि झारखंड और हरियाणा में विधान सभा चुनाव की तैयारी में चुनाव आयोग जुटा है । इन दोनों राज्यों से ज्यादा विवादास्पद मामले लगातार आ रहे हैं । झारखंड के गैर.भाजपा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मनीलॉन्ड्रिंग और जमीन खरीद.फरोख्त घोटाला आरोप में केंद्रीय एजेंसियों ने लगभग पांच महीने जेल में रखा । झारखंड हाईकोर्ट ने जब सबूत नहीं होने के कारण हेमंत सोरेन को जमानत दी तो ईडी ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और ईडी की अर्जी खारिज कर दी । इस दौरान हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जेल में रहते हुए कानूनी लड़ाई लड़ी और फिर वापस मुख्यमंत्री पद पर लौटे । गत 12 अगस्त को ही ईडी ने कथित अवैध खनन मामले में पीएमएलए कानून के अंतर्गत हरियाणा के कांग्रेस विधायक सुरेन्द्र पंवारए इ ने लो के पूर्व विधायक दिलबाग सिंह और कुछ अन्य व्यक्तियों की लगभग 122 करोड़ की संपत्ति जब्त की है । हरियाणा से ही 13 अगस्त को समाचार मिला कि महिला शिष्या से दुष्कर्म मामले में सजायाप्ता डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह फिर 21 दिन के पेरोल पर छूटे हैं । विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता चुनाव के समय इनसे आशीर्वाद लेते हैं । अफसर, जज भी इनके शिष्य हैं । गुरमीत राम रहीम सिंह को जेल से बाहर आने में कोई दिक्कत नहीं होती है । जनवरी में भी उन्हें 50 दिनों का पेरोल मिला था ।
07 अगस्त को दो ऐसे मामले आएए जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक न्यायिक मजिस्ट्रेट को शीर्ष कोर्ट की उपेक्षा करने के कारण दोषी ठहराया और एक हाईकोर्ट जज को चेतावरी देनी पड़ी । अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का मामला गुजरात का है, जिसने एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल जाने के बावजूद गिरफ्तार करने का आदेश गुजरात पुलिस को दिया । सुप्रीम कोर्ट जज बी. आर. गवई और संदीप मेहता की पीठ ने न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा पुलिस दोनों की बचाव में दी गयी दलील को ठुकरा दी और स्वयं उपस्थित होकर दंड भुगतने कहा ।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज राजवीर सहरावत ने सुप्रीम कोर्ट को ‘कूड़ा’ कह डाला । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने ऐसी अपमानजनक टिप्पणी को गंभीरता से लिया । 07 अगस्त को सुनवाई के दौरान अटोर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील पर सुप्रीम कोर्ट जज सहमत हुए कि जस्टिस सकरावत ने न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाया है । विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी देकर छोड़ दिया और इस ‘अवांछित’ टिप्पणी को रिकार्ड से हटा दिया ।
अभी सबसे ज्यादा सुर्खियों में है एस सी एस टी को सरकारी नौकरियों में प्राप्त आरक्षण में वर्गीकरण करके ‘क्रीमी लेयर’ को इस लाभ से वंचित करने के सुप्रीम कोर्ट सुझाव को केंद्र सरकार द्वारा खारिज किया जाना । 09 अगस्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले में कहा गया कि शीर्ष कोर्ट की व्यवस्था सरकार लागू नहीं करेगी । 01 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी नीति बनाने का सुझाव दिया था कि एस सी एस टी समुदाय के बीच क्रीमी लेयर की पहचान के लिए एक नीति बनायी जाए ।
भाजपा राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ समाज की रीति रिवाज, धार्मिक संस्कृति से जुड़ी प्रथा भी बदलने पर तुली है । ऐसे मामले में भी कोर्ट का समय जाया होता है । सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के एक प्राइवेट कालेज की तीन छात्राओं की हिजाब और टोपी पहनने पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ दायर अर्जी पर अनुकूल रूख अपनाया । छात्राओं की अर्जी को बंबई हाईकोर्ट ने ठुकरा दी, तो उन तीनों ने इन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेज के ड्रेस कोड निर्देश पर रोक लगा दी ।