सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शीर्ष कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के लिए पत्र लिखा और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संबंध में संविधान संशोधन लाने का फैसला कर लिया । संसद सत्र समाप्त होने के समय केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह निर्णय लिया है । इसलिए प्रस्तावित संविधान संशोधन तो अब संसद के शीतकालीन सत्र में ही लाया जा सकता है । यह सत्र तो पहले से लंबित संशोधन बिलों को पारित कराने में गया शीर्ष कोर्ट और हाईकोर्टों में जजों की संख्या कम होने के अलावे जजों के रिक्त पदों पर नियुक्तियां लंबित रहने के संबंध में चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा । एक तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों में जितने आवंटित पद हैं, उसमें भी रिक्तियां हैं, दूसरे जजों की संख्या बढ़ाने में सरकार की कोई खास दिलचस्पी नहीं है । कोर्टों में लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है । निष्पादन में समय ज्यादा लगता है । उसका कारण जजों की संख्या कम होने के कारण काम का बढ़ता बोझ है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा इसका असली कारण बढ़ते लंबित मुकदमे के निष्पादन में आ रही दिक्कतों से उन्हें अवगत कराना था । प्रधानमंत्री, कानून मंत्री यदा-कदा कानून और अदालत से जुड़े समारोहों में कोर्टों में लंबित मुकदमे पर चिंता व्यक्त करने के साथ-साथ इसके लिए घुमा-फिराकर कोर्टों को ही जिम्मेदार ठहरा देते हैं । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस स्वयं भी कई बार विभिन्न समारोहों में इस पर चिंता जताते देखे गए हैं ।

लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता और यह कोई भी विचारणीय विषय नहीं मानते कि कोर्टों का सबसे ज्यादा समय राजनीतिक मामलों की सुनवाई में जाता है । विधायिका और कार्यपालिका के रसूख वाले लोग अपने राजनीतिक हित के लिए कोर्टों में मुकदमे, याचिका दायर करते हैं । जो लामेकर हैं - संसद सदस्य, विधायक वे एकओर तो शीर्ष कोर्ट तक को गाहे-बगाहे लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करने की चेतावनी देते रहते हैं । दूसरी ओर अपने राजीतिक हित के लिए आए दिन मामले दायर कर सुप्रीम कोर्ट को मामला निष्पादन तक पहुंचने ही नहीं देते । जिसके पक्ष में फैसला नहीं गया, वो पुनर्विचार याचिका लगा देता है । जब किसी पीड़ित प्रताड़ित को विधायिका + कार्यपालिका नेक्सस से न्याय नहीं मिलता है और निचली कोर्टों का काफी समय बर्बाद हो जाता है, तब भूला-भटका किसी पीड़ित की पीड़ा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाती है । उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता का मामला ताजा है । लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ाने और कोई मामला खतम न होने देने के लिए विधायिका एवं कार्यपालिका दोषी हैं । निचली अदालतों की तो रसूख वाले परवाह ही नहीं करते ।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने जून में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था और उसके पहले भी लिखा था । सरकार ने चीफ जस्टिस के तीसरे पत्र के जबाब में ‘रिस्पांस’ किया और 31 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया गया । चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री को लिखा कि कानून के सवाल से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए पांच जजों की संविधान पीठ गठित करने में आवश्यक जजों की कमी के कारण दिक्कत आ रही है । चीफ जस्टिस ने संविधान की धारा 128 और 224ए में संशोधन करके अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट जजों की कार्यकाल नियुक्ति के प्रावधान का भी आग्रह किया । उसके अलावे हाईकोर्ट जजों के रिटायर होने की उम्र बढ़ाकर 65 वर्ष करने का भी आग्रह किया । अभी हाईकोर्ट जजों की रिटायर होने की उम्र 62 वर्ष है । यह सारा कुछ सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस को लंबित मामले निपटाने के लिए करना पड़ा । 31 जुलाई को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि संशोधन बिल को संसद की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट जजोंं की संख्या 33(चीफ जस्टिस को छोड़कर) हो जाएगी । उसी समय राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कानून मंत्रालय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई तक के लंबित मामलों की संख्या लगभग 60,000 थी । ठीक उसी समय सुप्रीम कोर्ट को सबसे पुराना विवादास्पद राजनीतिक मामला राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद फिर से अपने हाथ में लेकर इसके निष्पादन के लिए रोज सुनवाई की व्यवस्था करनी पड़ी । इसके लिए गठित संविधान पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस स्वयं हैं । इस मामले पर भाजपा संघ परिवार ऐसा फैसला चाहता है, जिसका चुनावी लाभ उठाया जा सके । दूसरा पक्ष बाबरी मस्जिद वाला है, जिससे कोई राजनतिक पार्टी सीधे तौर पर तो जुड़ी नहीं है, मगर मामले को टालना चाहता है । फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता से इस मामले के समाधान के लिए शीर्ष कोर्ट के पूर्व जज एफएमआई कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया । आयोग क किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने के पीछे एकमात्र कारण राजनीतिक है । राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद निबटाने के लिए 2010 में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर 14 अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है । मुस्लिम पार्टी की ओर से वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मामला जल्दी निबटाने के लिए रिट याचिका दायर की । जुलाई 2018 में स्वामी ने यह याचिका लगायी और वे लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट से मामला निष्पादित करने की उम्मीद कर रहे थे । शीर्ष कोर्ट ने जनवरी 2019 की तारीख दी, जिससे सभी भाजपाई नाराज थे ।

यही भाजपा सरकार है, जिसने लोकपाल गठन की सुनवाई अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल तक सुप्रीम कोर्ट में जारी रखी । चुनाव सुधार, ईवोएम, वोवोपीएटी और आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवारों को टिकट न देने का मामला सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस शासनकाल से ही लंबित था । इसे नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 से 2019 तक जारी रखा और सुप्रीम कोर्ट को किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने दिया ।

मामले लंबित होने के कारण जजों की नियुक्ति में सरकार और सुप्रीम कोर्ट में तालमेल न होना भी है । गत हफ्ते इसी झमेले के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 14 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है कि अनिल कुरेशी को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने के लिए कालेजियम की सिफारिश पर निर्णय ले । जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता से भी मदद मांगी थी । चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली कोलेजियम ने 10 मई को जस्टिस कुरैशी के नाम की सिफारिश की और सात जून को केंद्र सरकार ने जस्टिस रविशंकर झा को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का कार्यककारी चीफ जस्टिस बनाने की अधिसूचना जारी कर दी । उसके बाद से टकराव जारी है । शीर्ष कोर्टों में जजों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम और सरकार का टकराव भी पुराना है ।

सरकार ‘विधायिका की सर्वोच्चता’ और कार्यपालिका के महकमे में दलखंदाजी की दुहाई देकर नीचे से लेकर शीर्ष कोर्ट तक को अपने हिसाब से चलाना चाहती है । गत हफ्ते उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता की चिट्ठी पर सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान लेना केंद्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार को अच्छा नहीं लगा । क्योंकि दुष्कर्म के अपराधी भाजपा के कुलदीप सेंगर चार बार चुनाव जीते विधायक हैं । कुलदीप सिंह सेंगर को पार्टी से तब निकाला, जब दुष्कर्म पीड़िता ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी । उस विधायक ने 2017 में उसके साथ बलात्कार किया था । राजनीति के मुताबिक चलनेवाली सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के एक्शन में जाने के बाद जगी । यह मामला लंबा चलेगा । बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित बालिका सुधार गृह में यौनचार की प्रताड़ित गरीब-गुरबा लड़कियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं सज्ञान लिया । इसमें रसूखवाले राजनीतिकर्मी शामिल है ।

राजनीतिक उठापटक का कर्नाटक से उजपा पिछले महीने का किस्सा लोग अभी भूले नहीं है । पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी विश्वासमत से पहले बागी विधायकों के बारे में विधान सभा स्पीकर को निर्देश दिलवाने सुप्रीम कोर्ट गए । जिन बागियों की सदस्यता समाप्त हुई, वे फिर सुप्रीम कोर्ट चले गए । गत वर्ष सीबीआई डायरेक्टरों की आपसी उठापटक और उसके बाद सारदा चिटफंड घोटाले में फंसी पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार के कोलकाता पुलिस आयुक्त के मामले में गहरी रूचि के चलते सुप्रीम कोर्ट का काफी वक्त जाया हुआ ।

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) तैयार करने में भाजपा की राजनीति के चलते उसकी मानीटरिंग भी सुप्रीम कोर्ट को अपने हाथ में लेनी पड़ी । सुप्रीम कोर्ट अंतिम सूची अपडेट करने की 31 जुलाई, 2019 की तारीख पर अड़ी रही । लेकिन केंद्र सरकार और असम की भाजपा सरकार ने हाथ खड़े कर दिए । आखिरकार शीर्ष कोर्ट का एक महीने का और समय देना पड़ा। यह मामला पांच साल से लंबित है ।