केंद्र सरकार ने नगालैंड में आफ्प्सा की अवधि छह महीने के लिए बढ़ा दी है, जबकि उसने स्वयं इस कानून को हटाने पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की थी। यह फैसला मोन जिले में सेना की गोलीबारी में 14 नागरिकों की मौत के बाद व्यापक जन असंतोष और नगा शांति वार्ता पर इसके संभावित नकारात्मक प्रभाव के बावजूद लिया गया है। नगालैंड सरकार और विभिन्न नगा गुटों ने आफ्प्सा हटाने की मांग की है, लेकिन केंद्र ने अपनी ही समिति की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया।
यह लेख नगालैंड शांति वार्ता में गतिरोध पर केंद्रित है, जिसका मुख्य कारण नेशनल सोसलिस्ट कांउसिल ऑफ नगालिम (आईएम) की अलग झंडे और संविधान की मांग है। नगालैंड विधानसभा ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर एनएससीएन(आईएम) से बातचीत करने का आग्रह किया है। लेख में 2015 के फ्रेमवर्क डील और 2021 की मोन जिले की फायरिंग जैसी घटनाओं का भी जिक्र है, जो शांति प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
यह लेख नगा शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाओं और परिसीमन प्रक्रिया को लेकर नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि और मुख्यमंत्री नेफियू रियो के बीच मतभेदों पर प्रकाश डालता है। इसमें 2015 के 'नगा फ्रेमवर्क डील' की गोपनीयता, 'अलग झंडे और संविधान' की मांग, और चुनावी लाभ के लिए शांति वार्ता के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेख में मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश के हितों का भी उल्लेख है, जो 'ग्रेटर नगालिम' की अवधारणा से प्रभावित हो सकते हैं।
नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि ने मुख्यमंत्री नेफियू रियो को पत्र लिखकर राज्य में कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति और सशस्त्र नगा गुटों द्वारा समानांतर सरकार चलाने व टैक्स वसूली पर चिंता जताई है। इस पर एनएससीएन(आईएम) ने अपनी 'संप्रभु सरकार' के अधिकार के रूप में टैक्स वसूली को उचित ठहराया, जबकि मुख्यमंत्री ने स्थिति को बेहतर बताया। यह लेख राज्यपाल, मुख्यमंत्री और नगा गुटों के बीच चल रहे गतिरोध और नगा शांति वार्ता की जटिलताओं पर प्रकाश डालता है।
यह लेख नगा शांति वार्ता के निर्णायक दौर में उत्पन्न हुए गतिरोध पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे नगा विद्रोही संगठन एनएससीएन-आईएम के सुप्रीमो टी. मुइवा ने नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि को हटाने की मांग की है, उन पर 2015 के 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' से 'संप्रभुता' शब्द हटाने का आरोप लगाया है। लेख में राज्यपाल के कानून-व्यवस्था पर कड़े रुख और मुख्यमंत्री नेफियू रियो के साथ उनके मतभेदों को भी उजागर किया गया है, जिससे शांति प्रक्रिया और जटिल हो गई है।
नगा शांति वार्ता एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ नगालैंड के राज्यपाल आर.एन. रवि ने 'फाइनल डील' के लिए 31 अक्टूबर की समय सीमा तय की है। यह डील अलग नगा राष्ट्रध्वज और संविधान की मांग पर अटकी हुई है, जिसे भारत सरकार ने खारिज कर दिया है। एनएससीएन(आईएम) इस मांग पर अड़ा है, जबकि अन्य नगा गुट फिलहाल इसे टालने को तैयार हैं, जिससे गतिरोध बना हुआ है।
यह लेख नगा शांति वार्ता में पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बनाए जाने पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि 2015 की 'नगा डील' के चार साल बाद भी नगा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकला है, क्योंकि नगा गुट अलग संविधान और झंडे की अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। लेख वार्ता की गोपनीयता और नगा सिविल सोसाइटी के असंतोष पर भी प्रकाश डालता है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नगालैंड के 6 पूर्वी जिलों को मिलाकर अलग आदिवासी राज्य की मांग पर चुनाव के बाद विचार करने का आश्वासन दिया है। यह लेख नगा अलगाववाद, शांति प्रक्रिया की ठप स्थिति, और भाजपा नेताओं द्वारा चुनावी वादों में विकास पर जोर देने के बावजूद अलग राज्य की मांग पर चुप्पी साधने का विश्लेषण करता है। इसमें AFSPA के विरोध और नगालैंड में महिला प्रतिनिधित्व की कमी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख भारत सरकार और नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आइसाक मुइवा गुट) के बीच हुए 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' पर बढ़ते सस्पेंस पर केंद्रित है। एनएससीएन सुप्रीमो टी. मुइवा ने स्पष्ट किया है कि नगा लोग अपनी संप्रभुता, अलग संविधान और ध्वज पर कोई समझौता नहीं करेंगे, जबकि भारत सरकार समझौते के विवरण को सार्वजनिक करने से बच रही है। लेख में यह भी बताया गया है कि अन्य नगा गुटों, विशेषकर खपलांग गुट, के साथ भी संघर्ष जारी है, जिससे शांति प्रक्रिया और जटिल हो गई है।
वयोवृद्ध नगा नेता टी. मुइवा ने अपने पैतृक गांव सोमडेल का दौरा कर नगा लोगों को याद दिलाया कि नगा मसले का हल केवल 'स्वतंत्र सार्वभौम नगालिम संविधान और झंडे' को मान्यता देने से ही संभव है। यह लेख बताता है कि मुइवा का यह अड़ियल रवैया भारत सरकार के साथ 28 वर्षों से चल रही शांति वार्ता में मुख्य बाधा है, जबकि पूर्वोत्तर में शांति स्थापित करने के लिए अन्य उग्रवादी समूह लचीला रुख अपना रहे हैं। लेख मुइवा की इस जिद को हताशा का परिणाम मानता है, क्योंकि उनके साथी नेता गुजर चुके हैं और उनकी मांग को अब पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा है।
नगा संकट के अंतिम समाधान की दिशा में केंद्र सरकार के वार्ताकार अक्षय कुमार मिश्र सभी नगा गुटों, सिविल सोसायटी और नगालैंड सरकार के साथ गहन बातचीत कर रहे हैं। यह प्रयास 1997 के बाद पहली बार हो रहा है, जिसमें मिश्र ने NSCN(IM) के भूमिगत मुख्यालय का भी दौरा किया। हालांकि, NSCN(IM) अभी भी अलग संविधान और झंडे की अपनी मांग पर अड़ा है, जबकि पूर्वोत्तर के कई जिलों से AFSPA हटाने जैसे हालिया घटनाक्रमों ने वार्ता के लिए सकारात्मक माहौल बनाया है।
केंद्र सरकार ने नगा विद्रोही संगठन नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) के खपलांग गुट के साथ संघर्षविराम की अवधि एक साल के लिए बढ़ाई और नगालैंड के राज्यपाल व वार्ताकार आर. एन. रवि को तमिलनाडु स्थानांतरित कर दिया। यह लेख नगा शांति प्रक्रिया में आर. एन. रवि की भूमिका, उनके हटाए जाने के कारण और एनएससीएन (आई-एम) की अलग झंडे व संविधान की मांगों के कारण प्रक्रिया में आई बाधाओं का विश्लेषण करता है। इसमें अन्य नगा गुटों और राज्य सरकार की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है, जो इस जटिल मुद्दे को और उलझाती है।
यह लेख नगा शांति प्रक्रिया में 'फाइनल डील' के अटके होने का विश्लेषण करता है, विशेषकर नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आइसाक-मुइवा गुट) के सुप्रीमो टी. मुइवा की 'अलग झंडा' और 'अलग संविधान' की मांग के कारण। इसमें वार्ताकार आर. एन. रवि के प्रयासों, विभिन्न नगा गुटों के रुख और केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में बदलाव पर प्रकाश डाला गया है। लेख मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों के हितों पर भी चर्चा करता है।
यह लेख नगा शांति समझौते पर छाए रहस्य और अनिश्चितता पर केंद्रित है। राष्ट्रपति और गृह मंत्री द्वारा जल्द समझौते के आश्वासन के बावजूद, नगालैंड के मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग ने क्रिसमस से पहले अंतिम डील सार्वजनिक करने की मांग की है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी, जिससे 'ग्रेटर नगालिम' की मांग और पड़ोसी राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
यह लेख नगा शांति वार्ता में जारी गतिरोध का विश्लेषण करता है, जिसमें केंद्र सरकार और विभिन्न नगा गुटों, विशेषकर एनएससीएन (आई-एम) के बीच बातचीत शामिल है। लेखक दीमापुर और कोहिमा में अपने अनुभवों के आधार पर नगा लोगों की भावनाओं, अलग झंडे और संविधान की मांग, और AFSPA के प्रभाव पर प्रकाश डालते हैं। लेख में मोन जिले में असम राइफल्स की गोलीबारी की घटना और 'फ्रंटियर नगालैंड' राज्य की मांग का भी उल्लेख है, साथ ही नगालैंड के लिए एक अलग उच्च न्यायालय की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
यह लेख नगा विद्रोहियों की 'अलग झंडा और अलग संविधान' की मांग पर केंद्रित है, जिसे भारत सरकार वर्तमान संवैधानिक ढांचे में असंभव मानती है। इसमें 1997 के संघर्षविराम और 2015 के फ्रेमवर्क डील सहित वार्ताओं के इतिहास का उल्लेख है। गृह मंत्री अमित शाह के जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने के बयान के संदर्भ में, यह लेख नगा नेताओं को अपनी मांगों की जमीनी हकीकत समझने का संदेश देता है।
यह लेख नगा विद्रोही गुट नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (आइसाक-मुइवा) और केंद्र सरकार के बीच चल रही 'फ्रेमवर्क डील' पर केंद्रित है। एनएससीएन(आईएम) अलग संविधान और झंडे की अपनी मांग पर अड़ा है, और हिंसा पर लौटने की धमकी दे रहा है। लेख में 'फ्रंटियर नगालैंड' की मांग करने वाले ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) और मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के संदर्भ में नगा समुदाय की भूमिका पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख नगा शांति वार्ता में नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) द्वारा अलग झंडे और संविधान की मांग को मुख्य बाधा बताता है। टी. मुइवा ने इस मांग को नगाओं की विशिष्ट संस्कृति और इतिहास का हिस्सा बताया है, जबकि भारत सरकार इसे संवैधानिक ढांचे के विपरीत मानती है। लेख मणिपुर में जारी जातीय हिंसा और अन्य नगा गुटों के लचीले रुख के बावजूद एनएससीएन-आईएम की हठधर्मिता पर प्रकाश डालता है, जिससे शांति प्रक्रिया ठप्प पड़ी है।
लेख बताता है कि नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) की 'स्वतंत्र संप्रभु ग्रेटर नगालिम' की मांग, जिसमें अलग झंडा और संविधान शामिल है, नगा शांति वार्ता में मुख्य बाधा बनी हुई है। नेता टी. मुइवा इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करना चाहते, जबकि अन्य नगा गुट लचीला रुख अपनाने को तैयार हैं। मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के बावजूद, एनएससीएन-आईएम अपने 'आजादी फोबिया' पर अड़ा है, जिससे शांति प्रक्रिया ठप्प है।