राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद नगालैंड जाकर साफ शब्दों में कह आए कि फाइनल नगा डील जल्दी ही हो जाएगा । केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी यही बात कह आए हैं । ऐसा भरोसा इसलिए दिलाना पड़ा है, क्योंकि नगालैंड के मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग ने भारत सरकार को स्पष्ट डेडलाइन दे दिया है कि क्रिसमस से पहले या विधान सभा चुनाव से पहले नगा ‘डील’ पर से सस्पेंस खतम किया जाए और अंतिम रूप से स्थायी नगा शांति समझौता करके उसे सार्वजनिक किया जाए । राष्ट्रपति के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हॉर्नबिल पर्व का उद्घाटन करने नगालैंड के पर्यटन धरोहर शहर हिसामा गए । नगालैंड की जनता, सारे विधायक प्रधानमंत्री के मुंह से नगा ‘डील’ पर स्पष्ट वक्तव्य सुनना चाहते थे । समझौते के बारे में जो कुछ राष्ट्रपति ने कहा वो राज्य के मतदाता प्रधानमंत्री के मुंह से सुनने को बेताब थे । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नगा डील पर संशय और सस्पेंस बरकरार रखा, वे इस संबंध में कुछ नहीं बोले ।
प्रधानमंत्री की मौजूदगी में तीन अगस्त, 2015 को दिल्ली में नगा डील हुआ, जिस पर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड एनएससीएन(मुइवा गुट) के महासचिव एन. मुइवा ने हस्ताक्षर किए । पूर्वोत्तर की नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र संप्रभु ग्रेटर नगालिम’ की मांग को लेकर आजादी के समय से खूनी लड़ाई लड़ रहे विद्रोही गुट एनएससीएन नेता मुइवा किस आश्वासन पर हस्ताक्षर के लिए सहमत हुए, इसे गोपनीय रखा गया है । वो नगा ‘डील’ क्या है, इस संबंध में भी नगालैंड समेत समूचे पूर्वोत्तर की जनता को अंधेरे में रखा गया है । प्रधानमंत्री कुछ बोलने से परहेज करते हैं । गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस संबंध में संवाददाताओं के सवाल टालते है । भारत सरकार के वार्ताकार पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि खुफिया तरीके से ही नगा नेताओं से वार्ता चलाते रहते हैं और पत्रकारों से बचते रहते हैं । जबकि यह पूरी तरह राजनीतिक मामला है और सीधे तौर पर चुनाव से जुड़ा है । लेकिन अभी तक सिर्फ इतनी जानकारी सार्वजनिक की गयी है कि नगा डील हुआ है और अंतिम समझौते के लिए वार्ता जारी है । पूर्वोत्तर के लोग सशंकित हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि अहम जानकारी छिपायी जा रही है ।
ग्रेटर नगालिम बनेगा या नहीं और अगर इसका गठन होगा, तो नगालैंड के अलावे किस-किस राज्य के नगा इलाके उसमें मिलाए जाएंगे, इस पर संशय बना हुआ है । असम, मणिपुर और अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ज्यादा चिंतित हैं । संयोग से तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जो अपने राज्य की एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं । नगालैंड के मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग को एनएससीएन नेता मुइवा से ऐसी ‘दोस्ती’ हो चुकी है कि नगा मुद्दे के स्थायी हल वाला समझौता किए बगैर केंद्र की भाजपा सरकार नगालैंड में कोई चुनावी तालमेल नहीं कर सकती । यह भी गुप्त रखा गया है कि मुइवा ने ‘डील’ पर हस्ताक्षर किस हैसियत से किया है । क्योंकि उनकी अपनी अलग समानान्तर भूमिगत संघीय नगालिम सरकार है, जिसके मुइवा स्वयंभू प्रधानमंत्री हैं । इस सरकार के स्वयंभू राष्ट्रपति थे, आइसाक चिशी स्वू, जो 2015 डील के समय मृत्युशय्या पर पड़े थे । वे हार्डलाइनर थे, डील के कुछ दिन बाद ही सिधार गए । मुइवा भी लटके हुए हैं और वे इसे भारत सरकार और संघीय नगालिम सरकार के बीच हुआ ‘डील’ बताते हैं ।
नगालैंड में अगले वर्ष के आरंभ में ही चुनाव होनेवाले हैं । वहां का राजधर्म है, इसाई और सारी डील मिशनरी संचालित जनसंगठन ‘हो हो’ करती है । इसलिए मुख्यमंत्री क्रिसमस से पहले नगा डील पर से सस्पेंस के बादल छंटने पर जोर दे रहे हैं । इसी वायदे पर उनकी पार्टी नगा पीपुल्स फ्रंट(एनपीएफ) का विधान सभा में एकछत्र राज है । 60 सदस्यों की नगालैंड विधान सभा पूरी तरह विपक्ष मुक्त है । हॉर्नबिल पर्व के साथ ही नगालैंड को राज्य का दर्जा दिए जाने का 54वां समारोह भी एक दिसंबर को आयोजित था । राष्ट्रपति का पूरा भाषण पूर्वोत्तर में उग्रवादो गतिविधियों के इतिहास और उससे उपजी शांति प्रक्रिया पर केंद्रित था ।
नाच-गाना-खाना-पीना सब हुआ, मगर समारोह के लिए जुटे लोगों का ध्यान अपने मुख्यमंत्री के असंतोष पर केंद्रित रहा, जब उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की मौजूदगी में कहा - ‘20 वर्षों तक हमने एक शांति-प्रक्रिया देखी और दो वर्षों से दूसरी शांति प्रक्रिया देख रहे हैं, जो “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” कहा जाता है । मगर झमेला और झंझट जहां का तहां है, अभी तक इस जटिल मुद्दे का ठोस राजनीतिक समाधान नहीं निकल पाया है ।’
उसके हफ्ते भर बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अर्द्धसैनिक बल असम राइफल्स की ओर से आयोजित ‘सैनिक सम्मेलन’ में भाग लेने 8 दिसंबर को पहुंचे । उन्होंने अपने संबोधन की शुरूआत में यह तो कहा कि अंतिम नगा शांति समझौता होते समय अरूणाचल प्रदेश, असम और मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी । जिस प्रकार नगा विद्रोही गुट एनएससीएन(मुइवा) पूर्वोत्तर का सबसे पुराना संगठन है, ठीक उसी तरह असम राइफल्स भी सबसे पुराना अद्धसैनिक बल है । गृहमंत्री ने असम राइफल्स का मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि पूर्वोत्तर की विद्रोही गतिविधियों में 75 से 80 प्रतिशत की कमी आयी है । शांति-प्रक्रिया का इतिहास ये है कि वार्ता हमेशा उस समय शुरू हुई, जब सेना और अर्द्धसैनिक बल उग्रवादियों पर काबू पाने में विफल रहे । सारे समझौते चुनावी हुए और विद्रोही गतिविधियों का स्थायी निदान नहीं निकला ।
एनएससीएन उसमें सबसे पेचीदा है और नगालैंड में इसी शांति के मुद्दे पर चुनाव हो रहे हैं । असम, अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर की सीमा से छेड़छाड़ किए बगैर ‘ग्रेटर नगालिम’ बनाना असंभव है । एनएससीएन नेता एन. मुइवा मणिपुर के हैं । वहां का सेनापति जिला उनका जन्मस्थान है । मुइवा मणिपुर से अपना दावा नहीं छोड सकते । उसके बाद नंबर आता है असम का, जहां से काटकर नगालैंड राज्य बनाया गया ।
23 मार्च, 2017 को अपने ‘संघीय नगालिम सरकार’ का गणतंत्र दिवस समारोह को संबोधित करत हुए स्वयंभू प्रधानमंत्री मुइवा एनएससीएन के हेब्रोन स्थित हेडक्वार्टर में कहा कि ‘भारत सरकार ने सारे नगा इलाकों की अखंडता का नगा लोगों के अधिकार को मान्यता दी है ।’ उन्होंने असम के कई जिलों पर दावा ठोंका हुआ है । असम में बवाल मच गया । कई छात्र संगठनों ने नगालैंड की सीमा से सटे गोलाघाट और चराईडिउ जिलों में मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के पुतले जलाए । असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रितुपर्ण कोवनर और विपक्षी नेता देवब्रत साइकिया ने मांग कर डाली कि एनएससीएन के साथ फ्रेमवर्क एग्रीमेंट का मजमून स्पष्ट करें । दोनों नेताओं ने उसमें असम की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ की आशंका जतायी । असम के भाजपा मुख्यमंत्री सोनोवाल इस संबंध में प्रधानमंत्री से दो बार मिल चुके हैं । नगालैंड के हॉनबिल पर्व समारोह से एक हफ्ता पहले मुख्यमंत्री को कहना पड़ा कि ‘असम की जमीन गंवाने का अर्थ अपनी जान गंवाना है ।’
एनएससीएन(मुइवा) के प्रस्तावित ग्रेटर नगालिम वेबसाईट पर नक्शे में समूचे पूर्वोत्तर से लेकर म्यांमार तक का 1,20,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र ‘नगा आबादी वाला इलाका’ दिखाया गया है, जिनमें सबसे ज्यादा असम के जिले हैं । अरूणाचल का तिराप, चांग्लांग, लोहित, नामसाई और मणिपुर के उखरूल, सेनापति, चंदेल तथा तामेंग्लोंग जिले के अधिकांश इलाके हैं । नगालैंड राज्य का रकवा मात्र 16,527 वर्ग कि.मी. है, जिसे मुइवा ‘ग्रेटर नगालिम’ का एक हिस्सा मानते हैं ।
फरवरी, 2016 में मणिपुर विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री को स्पष्ट कहना पड़ा कि नगा ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे मणिपुर के हितों में नुकसान पहुंचे ।
एक तरफ केंद्र सरकार पूर्वोत्तर को विकास के एजेंडे पर लाना चाहती है और दूसरी तरफ हर समारोह में नगा फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को लेकर चल रही आशंकाओं पर बार-बार सफाई देनी पड़ती है । नगावाले मसले पर सबकी नजर है । नगा विद्रोही नेता कहते हैं कि नगालैंड की संस्कृति परंपरा का विशिष्ट इतिहास रहा है, जिसे भारत सरकार मान्यता दे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त, 2015 समझौते को ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए यह बात दुहरायी ।
लेकिन नगालैंड की जनता कई बार एनएससीएन(मुइवा) एजेंडे को मंजूरी दे चुकी है । पहले की सभी शांति प्रक्रियाओं का राज्य विधान सभा ने समाधान निकाला, जबकि वार्ता विदेशों में होती रही । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मुइवा और आइसाक चिशी से 27 दिसंबर, 2001 को जापान यात्रा के दौरान ओसाका में मिले । उसके पहले पेरिस में मिले । दोनों की मुलाकातों का ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया । 2003 में सिर्फ इतना पता चला कि वाजपेयीजी ने नगालैंड जाकर जब कहा कि ‘नगा मसले के हल के लिए संविधान में संशोधन को तैयार हैं’, तब एनएससीएन से चुनावी तालमेल हुआ । भाजपा ने नगालैंड विधान सभा में पहली बार सात सीटें जीती । उसके बाद सर्वसम्मति से विधान सभा ने दिसंबर, 2003 में सभी नगा इलाकों को मिलाने की मांग को मंजूरी दे दी । तीन अगस्त, 2015 वाले एग्रीमेंट से पहले 27 जुलाई को ‘ग्रेटर नगालिम’ के इस स्वरूप को विधान सभा न अनुमोदन कर दिया । उसके बाद मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग ने कांग्रेस के 8 और भाजपा के 4 विधायकों को अपने दल में ‘ग्रेटर नगालिम’ एकजुटता मुद्दे पर शामिल करक विधान सभा पर कब्जा कर लिया ।
1997 में प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल ने एनएससीएन(मुइवा गुट) से युद्धविराम समझौता किया, उसके लिए दोनों नेता विदेश से आए । 2001 में प्रधानमंत्री वाजपेयी को एनएससीएन खपलांग गुट से वही समझौता करने में सफलता मिली । समझौतों का लोग नाम जानते हैं, मजमून नहीं ।
नगालैंड को जब राज्य का दर्जा मिला उसके बाद दिसंबर, 1964 में भी नगा इलाकों को मिलाने का प्रस्ताव पारित हुआ ।
अभी चुनाव के समय यह सारा मामला कसौटी पर है, और संदेह का निराकरण किए बगैर भाजपा को शायद ही कुछ हाथ लगे । भाजपा को सभी पूर्वोत्तर राज्यों पर कब्जा करना है । लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों की सभी सरकारें अब पहले की तरह केंद्र के इशारे पर क्षेत्रीय नीतियां तय करने के पक्ष में नहीं है । भाजपा महासचिव राम माधव की संस्था ‘इंडिया फाउंडेशन’ की ओर से इंफाल में 21 नवंबर को आयोजित उत्तर पूर्व विकास सम्मेलन में भाग लेने सिर्फ नगालैंड और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री पहुंचे, जबकि उद्घाटन राष्ट्रपति ने किया ।
पांच दिसंबर को हॉर्नबिल पर्व के अंतिम दिन मणिपुर के मुख्यमंत्री वीरेन सिंह ने नगालैंड आकर क्षेत्रीय एकजुटता दिखायी । समारोह के समय नगालैंड के राज्यपाल पी. वी. आचार्या ने एनएससीएन(खपलांग गुट) को भी इस संदिग्ध शांति प्रक्रिया के लिए आमंत्रित किया । जबकि खपलांग से संघर्षविराम समझौता रद्द होने के बाद मुइवा से एग्रीमेंट किया गया । खपलांग का भी दावा मुइवा जैसा है। मणिपुर में राष्ट्रपति के दौरे के विरोध में छह विद्रोही गुटों ने 26 घंटे की हड़ताल आयोजित की । सब शांति प्रक्रिया खुल में चाहते हैं ।