नगा विद्रोही संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(एनएससीएन) के खपलांग गुट के साथ संघर्षविराम की अवधि एक साल के लिए बढ़ाए जाने के साथ ही केंद्र सरकार ने नगालैंड के राज्यपाल और नगा वार्ताकार आर. एन. रवि को तमिलनाडु भेज दिया । पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही केंद्र सरकार की ओर से विभिन्न नगा गुटों से शांति वार्ता चला रहे हैं ।
आर. एन. रवि का राज्यपाल पद बरकरार है, सिर्फ राज्य बदल गया । अभी इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि नगा वार्ताकार आर. एन. रवि ही रहेंगे, या किसी अन्य खुफिया अधिकारी को यह जिम्मा दिया जाएगा । असम के राज्यपाल जगदीश मुखी को नगालैंड का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है । लेकिन नगा वार्ताकार हमेशा से कोई रिटायर खुफिया प्रमुख होते आए हैं, इसलिए आगे भी संभवतः ऐसा ही हो ।
आर. एन. रवि को नगालैंड के राज्यपाल पद से नगा विद्रोही गुटों की मांग पर हटाया गया है, जैसी कि रिपोर्ट है । 2019 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बनाकर नगा झंझट का स्थायी हल निकालने का टास्क सौंपा ।
2014 में वार्ताकार नियुक्त किए जाने के बाद आर. एन. रवि की नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(आइसाक-मुइवा गुट) नेताओं से गुपचुप मुलाकातें, बातें होती रही । नगालैंड से लेकर दिल्ली तक इस संबंध में कोई खबर बाहर नहीं आती थी । उत्तर पूर्व में अलगाववादी विद्रोह की नींव रखनेवाले नगालैंड, मणिपुर के सबसे मजबूत और प्रभावशाली संगठन एनएससीएन(आई-एम-आइसाक-मुइवा) से 1997 से संघर्षविराम चल रहा है । 2014 में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार बनने तक 70 दौर की बेनतीजा वार्ता की रिपोर्ट थी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघर्षविराम की हर साल बढ़ोतरी, शांति वार्ता दोनों को विराम देकर देश के सबसे पुराने और जटिल नगा झंझट का स्थायी समाधान निकालना चाहते थे । इस सिलसिले में एक कदम आगे बढ़ाने में वार्ताकार आर. एन. रवि को आंशिक सफलता 2015 में मिली । 03/08/2015 को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में हुए ‘नगा डील’ पर दस्तखत करने एन एस सी एन(आई एम) सुप्रीमो टी. मुइवा अपनी टीम के साथ दिल्ली पहुंचे । इस डील को ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ बताया गया, जिस पर केंद्र की ओर से आर. एन. रवि ने और नगा गुट की ओर से मुइवा ने हस्ताक्षर किए । प्रधानमंत्री ने स्वयं इस डील को ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए 1997 से लटके इस झंझट का हल निकाल लेने का दावा किया । लेकिन ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के मजमून पर दोनों पक्षों ने चुप्पी साध ली । दिल्ली से नगालैंड समेत नगा झमेले से जुड़े पड़ोसी राज्य मणिपुर, असम, अरूणाचल प्रदेश तक को इस ‘डील’ के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी । अभी तक यह डील गोपनीय और रहस्यमय बना हुआ है ।
आर. एन. रवि अन्य नगा गुटों को भी शांति प्रक्रिया में शामिल करने और संघर्षविराम के लिए राजी करने में जुटे रहे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर. एन. रवि को अगस्त, 2019 में नगालैंड का राज्यपाल बनाया और 31 अक्टूबर तक ‘फाइनल डील’ की डेडलाइन दे दी। यह काम आसान नहीं था । क्योंकि निर्णायक भूमिका की दबंग हैसियत वाले ‘डील’ के हस्ताक्षरकर्ता मुइवा ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ की मांग पर अड़े रहे । अपना अलग नगा झंडा, संविधान के अड़ियल रवैये से एनएससीएन(मुइवा) टस से मस नहीं हुआ । बहरहाल अन्य नगा गुटों से संघर्षविराम समझौता करने और उन नेताओं को वार्ता के टेबुल पर लाने में राज्यपाल आर. एन. रवि कुछ हद तक सफल हुए । उनमें से कुछ गुट लचीला रवैया अपनाने को राजी तो थे, ताकि वार्ता एकदम से ठप्प न हो, मगर वे अपनी मांग छोड़ने को तैयार नहीं थे । हर गुट को ‘अलग स्वतंत्र नगालिम’ चाहिए थी, जिस पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण न हो ।
31 अक्टूबर की डेडलाइन पूरी करने के लिए आर. एन. रवि ने राज्यपाल बनने से पहले नगा गुटों को विश्वास में लेने और राज्यपाल बनने के बाद उन पर थोड़ा शिकंजा कसने की भी नीति अपनायी । दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय के सहयोग से मैराथन वार्ता चली, मगर ‘फाइनल डील’ में एनएससीएन(आईएम) का ‘अलग संविधान, अलग राष्ट्रीय झंडा’ का फंडा अड़ंगा बना रहा । लेकिन उस समय तक आर. एन. रवि अन्य नगा गुटों से संघर्षविराम गुटों से भी संघर्षविराम समझौता कर चुके थे । वार्ताकार आर. एन. रवि की योजना एनएससीएन (आईएम) को दरकिनार करके अन्य गुटों को विश्वास में लेने की थी । इसमें तकरीबन सात नगा गुट थे, जिन्होंने एनएनपीजी(नगा नेशनलिस्ट पोलिटिकल ग्रुप) के बैनर तले अलग मंच बना रखा था । ये मंच ‘फाइनल डील’ को सिर्फ एक मुद्दे पर डंप करने के बजाए शांति प्रक्रिया का सिलसिला जारी रखने के पक्ष में था ।
नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि या तो वहां की जमीनी हकीकत समझ नहीं पाए, अथवा उन्हें लगा कि राज्य सरकार और एनएससीएन(आईएम) दोनों को दरकिनार करके नगा संगठनों में फूट डाला जा सकता है । फिर कमजोर करके उन्हें फाइनल डील के लिए विवश किया जा सकता है । लेकिन वैसा हो नहीं पाया । क्योंकि मुख्यमंत्री नेफियू रियो एन एस सी एन(आईएम) से बिगाड़ मोल नहीं ले सकते थे । उनकी पीपुल्स डेमोक्रेटिक एलायंस(पीडीए) में भाजपा भी शामिल थी, जो एनएससीएन(आईएम) के बिना ‘फाइनल डील’ के पक्ष में नहीं थी ।
2020 आते-आते मुख्यमंत्री और राज्यपाल में नगा मुद्दे पर मतभेद गहरा गए । राज्यपाल आर. एन. रवि ने नगालैंड सरकार और सरकारी कर्मचारियों की उस असलियत को उजागर कर दी, जो सभी को पता है । राज्यपाल ने उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के इशारे पर मुख्यमंत्री पर दबाव बनाना शुरू किया । राज्य सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसमें सभी सरकारी कर्मचारियों से कहा गया कि ‘भूमिगत गुटों’ में शामिल अपने रिश्तेदारों को सूचीबद्ध करें । इससे शांति समझौते के समर्थक सिविल सोसाइटी संगठनों का भी गुस्सा भड़क उठा । मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि ऐसा आदेश राज्यपाल के दबाव में जारी किया गया । उसके बाद जुलाई, 2020 में राज्यपाल ने कह दिया कि ‘सशस्त्र गिरोहों’ की समानान्तर सरकारें चल रही हैं, वे हिंसा और वसूली में शामिल हैं । कानून और व्यवस्था के लिए संवैधानिक रूप से जिम्मेदार राज्य सरकार के औचित्य को चुनौती दे रहे हैं । उसी समय स्पष्ट हो गया कि नगा ‘फाइनल डील’ के लिए आर. एन. रवि का वार्ता चैप्टर बंद होना है । नगा गुट राज्यपाल को हटाने की मांग पर अड़ गए । इसमें राज्य सरकार समेत सभी दलों के विधायकों का समर्थन था । नगालैंड में हर पार्टी को चुनाव जीतने के लिए नगा गुटों की मदद लेनी पड़ती है । और सबका अप्रत्यक्ष संचालन एनएससीएन(आईएम) के जिम्मे है । यही एकमात्र गुट है, जिसके साथ केंद्र सरकार की 2015 से ‘डील’ चल रही है । कोई भी नगा गुट एनएससीएन(आईएम) की सहमति के बगैर कुछ नहीं कर सकता ।
जुलाई, 2021 में पेगासस जासूसी कांड में एनएससीएन के मुइवा समेत टॉप कमांडरों पर निगरानी की भी खबर छिपी न रह सकी । 17 अगस्त को सभी(दलों) के सारे विधायक एक ही संयुक्त मंच के बैनर तले आ गए और नगालैंड देश का पहला ‘विपक्ष मुक्त’ राज्य बन गया । विपक्षी नगा पीपुल्स फ्रंट(एनपीएफ) के सभी विधायकों ने सत्तारूढ़ गठजोड़ में शामिल होकर ‘नगालैंड युनाइटेड सरकार’ गठित करने के प्रस्ताव पर दस्तखत करके विपक्ष समाप्त कर दिया । प्रस्ताव में कहा गया कि ‘नगा मसले का शांतिपूर्ण स्थायी हल निकालने के लिए आपसी मतभेद भुलाकर संयुक्त राजनीतिक मंच बनाया गया है ।’
और फिर 9 सितंबर को आर. एन. रवि को नगालैंड से तमिलनाडु भेजने की खबर आयी । उसी समय एनएससीएन(खपलांग गुट) से संघर्षविराम एक साल के लिए बढ़ाया गया । केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी वक्तव्य के अनुसार एनएससीएन(निकी सुमी), एनएससीएन(आर) और एनएससीएन(खांगो) गुटों के साथ संघर्षविराम पहले से चल रहा है। इनमें से किसी भी गुट से वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है । जबकि इसी 4 सितंबर को असम सरकार, केंद्र सरकार और पांच विद्रोही कर्बा एंग्लोंग गुटों के साथ त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं । कर्बा एंग्लोंग गुटों का 1946 से आंदोलन का दावा एनएससीएन(आईएम) से मिलता है । फर्क सिर्फ इतना है कि कर्बी एंग्लोंग गुट अलग राज्य की मांग कर रहे थे । नगा विद्रोहियों को नगालैंड समेत मणिपुर, असम, अरूणाचल प्रदेश के नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘अलग स्वतंत्र संप्रभु नगालिम राष्ट्र’ चाहिए ।
जनवरी, 2020 में बोडो समझौता हुआ और संघर्षविराम पर अटकी वार्ता का अंत हुआ । उसके पहले अगस्त, 2019 में त्रिपुरा के विद्रोही गुट नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा(सबीर देवबर्मा) गुट के साथ समझौता हुआ ।
गत 17 अगस्त, 2021 को जब नगालैंड में नगा झंझट के हल के लिए एकजुट सरकार बन रही थी, उसी समय असम के दीमा हासाओ जिले से कई निजी व्यावसायिक ट्रकों पर हमले की रिपोर्ट आयी, जिसमें पांच लोग मारे गए । अलग राज्य की मांग करनेवाले कथित हमलावर विद्रोही दीमासा नेशनल लिबरेशन फ्रंट एनएससीएन (आईएम) को अपना मार्गदर्शक मानता है । 2003 से इस गुट से वार्ता शुरू हुई और 2012 से संघर्षविराम चल रहा है ।