नगा संकट के स्थायी समाधान के लिए हुए ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ को फाइनल ‘नगा डील’ में बदलने का मामला एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंच गया है, जिसमें आम चुनाव, 2019 से पहले था । दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने नगा वार्ताकार आर. एन. रवि का नगालैंड का राज्यपाल बनाकर ‘फाइनल डील’ के लिए 31 अक्टूबर तक का डेडलाइन दिया । 31 अक्टूबर के बीते डढ़ महीने होने को हैं । ‘फाइनल डील’ में मुख्य अड़ंगा हार्डलाइनर नगा विद्रोही नेता नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन-आइसाक-मुइवा गुट) सुप्रीमो टी. मुइवा को बताया जा रहा है । तीन अगस्त, 2015 को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुए ‘नगा डील’ पर मुइवा ने और भारत सरकार की ओर से वार्ताकार आर. एन. रवि ने हस्ताक्षर किए । उस समय से लेकर अभी तक किसी को पता नहीं है कि वो नगा डील क्या हुआ, जिसे नगा संकट के खात्मे के लिए ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ बताया गया । यहां तक कि उत्तर पूर्व की निर्वाचित सरकारों को भी अंधेरे में रखा गया । वार्ताकार आर. एन. रवि और प्रधानमंत्री खुद भी इस संबंध में कुछ बोलने से परहेज करते रहे ।
नगालैंड का राज्यपाल बनने के बाद जुलाई, 2019 में आर. एन. रवि ने अचानक यह कहकर खामोशी तोड़ी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतिम समझौते(फाइनल डील) के लिए 31 अक्टूबर तक की डेडलाइन दी है । इस डेडलाइन को पूरी करने के लिए आर. एन. रवि ने भरपूर प्रयास किए । वार्ता तो उन्होंने इसके पहले चार साल से भी जारी रखा हुआ था । लेकिन राज्यपाल बनने के बाद नगा वार्ताकार आर. एन. रवि का तौर तरीका थोड़ा बदल गया । उन्होंने कोहिमा से दिल्ली तक सभी नगा गुटों से कई दौर की बातचीत की । 22 वर्षों से बेनतीजा चल रही वार्ता को विराम देने के लिए 24 और 29 अक्टूबर को दिल्लो में आयोजित बैठक महत्वपूर्ण है । अन्य नगा गुटों के अलावे एनएससीएन(मुइवा गुट) नेता टी. मुइवा भी दोनों बैठकों में शामिल हुए । मुइवा अपने पहले के अड़ियल रवैये से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए कि ‘अलग झंडा’ और ‘अलग संविधान’ से कोई समझौता नहीं । अक्टूबर के अंत में एक हफ्ते के अंदर दो बैठकें बुलाने का मकसद 31 अक्टूबर तक डेडलाइन पूरा करना था, जो नहीं हो पाया । उसके बाद डेडलाइन की कोई अगली तारीख तय नहीं हुई और मामला फिर लटक गया । अब वही बयान जारी है - फाइनल नगा डील जल्द हो जाएगा, जो 2015-2019 के बीच चल रहा था । एनएससीएन नेता मुइवा स्वयं को अपने ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम संघीय सरकार’(भूमिगत) के सर्वेसर्वा मानते हैं । वे भारतीय संविधान को नहीं मानते, भारत को अपना देश नहीं मानते । मुइवा का अलग नगालिम झंडा और संविधान का दावा है, जो वे छोड़ना नहीं चाहते । नगालैंड का राज्यपाल बनने से पहले और उसके बाद भी वार्ताकार आर. एन. रवि ने बार-बार कहा कि ‘अलग झंडा, अलग संविधान’ की शर्त स्वीकारने योग्य नहीं है । उन्होंने मुइवा की शर्त को ‘फाइनल डील’ उलझाने और लटकाने वाला बताया । लेकिन राज्यपाल की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ । मुइवा ने ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के बाद कहा था कि पूर्वोत्तर के नगा बहुल आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘ग्रेटर नगालिम’ बनाने की बात है । मुइवा 2015 से 2019 तक के हर भारतीय स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त के एक दिन पहले नगालिम स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर भारत सरकार पर वायदाखिलाफी का आरोप लगाते रहे । आर. एन. रवि ने कोई प्रतिक्रिया दिए बगैर वार्ता जारी रखा । मुइवा के खिलाफ कोई कड़ा रूख अपनाने से परहेज किया गया । वार्ता के किसी बिंदु का खुलासा तो नहीं हुआ । लेकिन नगा बहुल मणिपुर और नगालैंड में चुनावी राजनीति का प्रमुख मुद्दा नगा डील बना । नगालैंड में विद्रोही गतिविधियों स लेकर चुनावी राजनीति चर्च संचालित नगा जनजातीय सिविल सोसायटी संगठन ‘हो हो’ तय करता है । नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो खुद भी इस झंझट के स्थायी हल के पक्ष में हैं, क्योंकि राज्य में अमन-चैन के लिए मुइवा से बेहतर संबंध उनकी मजबूरी है ।
1997 से एनएससीएन के साथ चल रहे संघर्षविराम के कारण हिंसा अपेक्षाकृत काबू में है । कानून और व्यवस्था के लिए ऐसी यथास्थिति बनाए रखना केंद्र सरकार के लिए भी जरूरी है । क्योंकि सुरक्षा बलों की बदौलत 50 वर्षों में नगा हिंसा पर काबू न कर पाने के बाद संघर्षविराम हुआ । 70 वर्षों में नगा हिंसा का प्रतिकार और शांति वार्ता दोनों ही प्रयोग आजमाए गए । इससे ऊबे नगालैंड के लोग स्थायी शांति चाहते हैं । लेकिन सुरक्षा बलों के पहरे वाली ऐसी शांति के पक्ष में नगा जनजातीय समुदाय नहीं है, जिसमें नगा विद्रोही गुटों और खासकर एनएससीएन(मुइवा) को दरकिनार किया जाए । एनएससीएन जितनी जनता के बीच पैठ किसी राजनीतिक दल या नगा गुट की नहीं है । वर्ना इतना दिन तक यह संकट गहराया नहीं रहता । अड़ंगा का कारण एनएससीएन(मुइवा) का हाडलाईन रूख के अलावे उसी को लेकर मुख्यमंत्री नेफियू रियो और राज्यपाल के बीच मतभेद भी है । 18 अक्टूबर को राज्यपाल आर. एन. रवि के कार्यालय से जारी एक वक्तव्य के अनुसार ‘सभी मुद्दों पर आपसी सहमति के बाद समझौते का मसौदा फाइनल डील के लिए तैयार है । लेकिन सबसे प्रभावशाली गुट एनएससीएन(मुइवा) इसमें शामिल नहीं है, जिसने 03 अगस्त, 2015 फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए ।’ इस पर मुख्यमंत्रो ने यह कहने से इन्कार कर दिया कि राज्यपाल के वक्तव्य से सरकार की सहमति है ।
राज्यपाल आर. एन. रवि डेडलाइन तारीख 31 अक्टूबर विफल होने के 15 दिनों बाद विभिन्न नगा आदिवासी गुटों से मिलने मणिपुर पहुंचे । एनएससीएन के समर्थन से बने मणिपुर के दबंग गुट यूनाइटेड नगा काउंसिल से मिले । जबकि 20 अक्टूबर को ही एनएससीएन(मुइवा गुट) के चेयरमैन सीहेज टिक्कू ने मणिपुर से बयान करके कहा कि भय और आशंका का माहौल बनाकर सरकार ‘नगालिम’ में अपना डिक्टैट थोपना चाहती है ।
एक दिसंबर को नगालैंड राज्य गठन की 57वीं वर्षगांठ पर मुख्यमंत्री ने कहा कि नगा राजनीतिक समस्या का शीघ्र समाधान निकाल लिया जाएगा । कोहिमा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने कहा कि केंद्र और नगा राजनीति गुटों के बीच वार्ता पूरी हो गयी है और शीघ्र ही नगालैंड नया ‘इतिहास’ रचेगा ।
उस समय तक केंद्र सरकार के लिए नगा समस्या का समाधान प्राथमिकता नहीं रह गयी थी । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में पूर्वोत्तर नेताओं की 30 अक्टूबर को बैठक बुलायी, जिसमें नगा मुद्दे की कोई चर्चा नहीं हुई । गृह मंत्री को नागरिकता संशोधन बिल पर विमर्श करना था । उस बैठक में शामिल होने नगालैंड के मुख्यमंत्री और भाजपा शासित मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह नहीं आए । प्रस्तावित ‘ग्रेटर नगालिम’ में नगालैंड और मणिपुर के अलावे असम तथा अरूणाचल प्रदेश के भी नगा आबादी वाले इलाके शामिल किए जाने की बात है । वैसे इस पर भी संदेह और आशंका बरकरार है कि ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट डील’ में यह जिक्र है या नहीं । लेकिन डेडलाइन बीत जाने के बावजूद वार्ताकार आर. एन. रवि प्रयास में जुटे हैं । किसी अन्य राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता से छेड़छाड़ करने/नहीं करने की अटकलबाजी के दौर में असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने सात नवंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर बताया कि ‘फाइनल नगा डील’ में असम के हितों का ध्यान रखा जाए । 31 अक्टूबर डेडलाइन बीतने से पहले और उसके बाद वार्ताकार आर. एन. रवि या अमित शाह में से किसी ने भी आज तक उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोई विमर्श नहीं किया, जिनके हितों पर तलवार लटक रही है । असम और मणिपुर का हित सीधे तार पर नगा मुद्दे से जुड़ा है । एनएससीएन(मुइवा) सुप्रीमो टी. मुइवा का जन्मस्थल मणिपुर है और संघर्षस्थल है, नगालैंड ।
लोकसभा चुनाव से एक साल पहले मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बोरेन सिंह ने अपने सभी 60 विधायकों के साथ दिल्ली में डेरा डाल दिया और केंद्र से कहा कि कोई नगा डील उनसे बात किए बगैर न किया जाए । उस समय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया ।
नगा संकट सिर्फ नगालैंड और एनएससीएन से जुड़ा नहीं है । मणिपुर के 23 कूकी और जो भी नगा समुदाय हैं, जो अलग कूकीलैंड की मांग कर रहे हें । इन गुटों से दस साल से संघर्ष विराम केंद्र का चल रहा है । इनसे संपर्क बनाए रखने का जिम्मा पूर्व खुफिया प्रमुखा ए. बी. माथुर को दिया गया है, जो असम के विद्रोही गुट उल्फा युनाइटैड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम से वार्ता चला रहे हं । खुफिया प्रमुख रह चुके आर. एन. रवि लगता है, अभी तक नगा संकट की बारीकियों को या तो नहीं समझ पाए हैं या समझकर भी उन्हें केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के राजनीतिक हित का ख्याल रखना है ।
आर. एन. रवि ने 2017 में जिन सात नगा गुटों नगा नेशनल पोलिटकल ग्रुप(एनएनपीजी) से समझौता किया, वे ‘अलग संविधान झंडा’ पर लचीला रूख के पक्ष में तो हैं । मगर मुइवा को छोड़ना नहीं चाहते । आर. एन. रवि एनएससीएन मुइवा को दरकिनार करके एनएनपीजी से वार्ता चलाते रहे । इन गुटों से समझौता फरवरी, 2018 में नगालैंड विधान सभा चुनाव से पहले हुआ । चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले दिसम्बर 2017 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कोहिमा जाकर नगा शांति प्रक्रिया को अंतिम डील के करीब बताया और कहा कि नगा लोग जल्द ही ‘नया इतिहास’ देखेंगे । 60 सदस्यीय नगालैंड विधान सभा में भाजपा के 12 और नेफियू रियो की नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के 18 जीते । गठजोड़ सरकार ने डेडलाइन गुजरने के दो हफ्ते बाद 13 नवंबर को नगालैंड विधान सभा से एक प्रस्ताव पारित करके सर्वदलीय फोरम बनाया और पड़ोसी राज्यों से सहयोग मांगेगा । 2016 में मणिपुर चुनाव से पहले ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ हुआ ।
31 अक्टूबर डेडलाइन से पहले एनएनपीजी ने भाजपा समेत सभी विधायकों को अपना रवैया स्पष्ट करने और नगा डील पर ‘तटस्थ’ नीति छोड़ने का आग्रह किया ।
संविधान के इर्द-गिर्द बात घूमती है । नगा संकट को यथावत छोड़कर केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल में 1946 से लेकर 1955 तक के तमाम प्रावधानों में परिवर्तन करके नया विवाद खड़ा कर दिया । संसद से यह बिल पारित होने के समय समूचे पूर्वोत्तर में बवाल मच गया, विरोध प्रदर्शन जारी है ।
2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार कोहिमा जाकर चुनाव के समय कहा कि नगा संकट के हल के लिए अगर जरूरत पड़ी तो संविधान संशोधन किया जाएगा । भाजपा का पहली बार नगालैंड में खाता खुला और सात विधायक जीते । उस समय से लगातार भाजपा की सत्ता में भागीदारी और संवैधानिक विवाद जारी है ।
2003 से लेकर अबतक चौथी बार मुख्यमंत्री बने नेफियू रियो के साथ 8 मार्च, 2019 को भाजपा के पाट्टोन ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।
नगा हो-हो के अध्यक्ष एच. के. झिमोमी नगा एकता पर कायम हैं । उन्होंने साफ कह दिया है कि भारत सरकार के साथ ऐसी डील को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें ‘अलग झंडा और संविधान’ की इजाजत न हो ।