सशस्त्र विद्रोही संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(एनएससीएन -आइसाक मुइवा गुट) के साथ हुए ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ पर भारत सरकार की चुप्पी बरकरार है । लेकिन एनएससीएन सुप्रीमो टी. मुइवा ने खुलासा कर दिया कि वे किसी भी स्थिति में ‘संप्रभुता’ से समझौता नहीं करेंगे । उन्होंने साफ कह दिया कि नगा लोग अपने अलग ‘नगा संविधान और ध्वज’ का अधिकार नहीं छोड़ेंगे । मुइवा ने स्वयंभू ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम राष्ट्र’(राज्य नहीं) के 40वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत सरकार को चेता दिया कि वे ‘संप्रभुता’ मुद्दे पर नहीं झुकेंगे ।
दीमापुर के हब्रन स्थित अपने मुख्यालय में आयोजित हालिया समारोह को एनएससीएन ने अपना 40वां गणतंत्र दिवस समारोह बताया और भारत सरकार पर ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ से मुकरने का आरोप लगाया । तीन साल पहले तीन अगस्त 2015 को भारत और एनएससीएन के साथ हुए डील के बारे में लगातार सस्पेंस कायम है । दिल्ली में हुए उस डील के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह दोनों मौजूद थे । समझौते पर दस्तखत भारत सरकार की ओर से गृह मंत्रालय के अधिकारी और नगा प्रतिनिधिमंडल की ओर से एनएससीएन नेता मुइवा ने किया । इस समझौते के लिए नगा नेताओं को तैयार करने और दिल्ली लाने में मुख्य भूमिका भारत सरकार की ओर से तैनात वार्ताकार आर. एन. रवि ने निभायी । दस्तखत के समय रवि भी मौजूद थे, जिन्होंने इसे ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ बताया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘ऐतिहासिक’ समझौता बताते हुए कहा कि 18 वर्षों से चली आ रही बेनतीजा वार्ता का अंत हुआ और नगा संकट का ‘हल’ निकाल लिया गया ।
लेकिन इस समझौते के मजमून का खुलासा करने की नगालैंड समेत पूर्वोत्तर की सभी राज्य सरकारों की मांग केंद्र सरकार ने अनसुनी की । पूर्वोत्तर समेत पूरे देश को अंधेरे में हाथ-पैर मारने छोड़ दिया गया कि आखिर ‘एग्रीमेंट’ हुआ क्या । किस मुद्दे पर सहमति बनी । यहां तक कि अनुमान और अटकलबाजी पर भी भारत सरकार के किसी अधिकारी ने कोई टिप्पणी नहीं की। इससे यह अंदाजा लगाना आसान था कि इसका मतलब नगा गुट से ऐसा कुछ ‘डील’ हुआ है कि संघर्षविराम को ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ नाम दे दिया जाए और वार्ता जारी रहे । कुल मिलाकर बात संघर्षविराम पर ही अटकी रही, जो 1997 से जारी है ।
एनएससीएन नेता मुइवा भूमिगत समानान्तर ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम सरकार’ के स्वयंभू प्रधानमंत्री हैं । आइसाक मुइवा ‘राष्ट्रपति’ थे, जिनका डील से एक महीना पहले 2015 में दिल्ली के ही एक अस्पताल में निधन हो गया । अभी मुइवा ने अपने ‘देश’ और अपनी ‘सरकार’ का 40वों गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित करके साबित कर दिया कि फ्रेमवर्क एग्रीमेंट समेत अब तक की बातचीत से समझौते की बात बन नहीं रही है । इसी संकट के समाधान के लिए संघर्षविराम सहमति हुई और शांति समझौते के लिए वार्ता चलती रही ।
विद्रोही नगा नेता मुइवा ने भारत सरकार द्वारा कायम ‘सस्पेंस’ का खुलासा करते हुए कहा कि ‘हिस्सेदारो वाली संप्रभुता’ भारत सरकार का अपना प्रस्ताव है, जो नगा अंत-अंत तक स्वीकार नहीं करेंगे । उन्होंने अपने समर्थकों के बीच कहा कि ‘हम अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे । अपने अलग ‘नगा ध्वज’ और संविधान (येझाबो) वाले मुद्दे के साथ न कोई समझौता करेंगे न कभी आत्मसमर्पण करेंगे ।
इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट दीमापुर के अखबार ‘मोरंग एक्सप्रेस’ ने इसी हफ्ते छापी । नगा नेता ने पुराने हार्डलाईन विद्रोही तेवर अपनाते हुए भारत सरकार पर ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के समय किए गए वायदों से मुकरने का आरोप लगाया । ‘मोरंग एक्सप्रेस’ ने बंदूक और झंडा लहराते हुए तस्वीरों के साथ एनएससीएन नेताओं का बयान छापा है । मुइवा के संबोधन भाषण से ‘नगा डील’ पर अब तक जो संशय था, वो काफी कुछ कम हुआ । इससे इतना तो पता चला कि नगा संकट का मुख्य मुद्दा ‘संप्रभुता’ पर कोई सहमति अभी तक बनी नहीं और वार्ता भी नहीं चल रही है । इसलिए कि नगा नेता ने कहा कि अगर वार्ता फिर शुरू हुई तो वे अपने झंडे और संविधान (येझाबो) पर अड़े रहेंगे। मुइवा ने यह भी कह दिया कि उनकी ओर से वार्ता की पहल अब कभी नहीं होगी ।
मार्च, 2019 के अंतिम सप्ताह की ये रिपोर्ट है । लेकिन जनवरी, 2019 में आर. एन. रवि ने जो अचानक मुंह खोला और जो कुछ बोला, उससे तो मामला ज्यादा गोलमटोल हो जाता है । आर. एन. रवि नगा वार्ताकार के साथ-साथ भारत सरकार के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं । एक समारोह में भाग लेने आर. एन. रवि उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की हैसियत से 19 जनवरी को हैदराबाद पहुंचे । फोरम फॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्यूरिटी की आर से ‘रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन था । संवाददाताओं के सारे सवाल स्वाभाविक रूप से नगा वार्ता पर केंद्रित थे, क्योंकि उसी के बारे में जानकारी बाहर नहीं आ रही है । नगा वार्ताकार आर. एन. रवि का जवाब तो था पल्ला झाड़कर कतरानेवाला, मगर इससे समस्या उलझे रहने के संकेत मिले । आर. एन. रवि ने कहा कि नगा सशस्त्र गुटों से प्रस्तावित समझौता ‘जल्द’ ही हो जाने की संभावना है । इससे भी ज्यादा उलझन में डालनेवाला नगा वार्ताकार का यह जवाब है कि एनएससीएन(आइसाक - मुइवा) समेत सात अन्य नगा गुट हैं, जिससे वार्ता चल रही है । उन्होंने कहा कि शांति प्रक्रिया में शामिल कोई भी गुट छूटा नहीं है ।
अभी तक की जानकारी के अनुसार तो एनएससीएन(मुइवा) एकमात्र नगागुट है, जिससे भारत सरकार की ‘डील’ हुई और समझौते की वार्ता जारी है । ‘संप्रभुता’ से कोई समझौता न करने की मांग मनवाने के लिए हिंसा पर आमादा एनएससीएन को खपलांग गुट से नरेंद्र मोदी सरकार ने संघर्षविराम रद्द कर दिया, जो 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने की थी । उसके बाद मुइवा से ‘डील’ हुई । अभी खपलांग गुट से भारत सरकार की ठनी हुई है । इसका अड्डा नगालैंड मणिपुर के अलावे म्यांमार में भी है । म्यांमार सरकार के साथ मिलकर भारत सरकार खपलांग नगा गुट के अड्डे ध्वस्त करने का अभियान चला रही है । सरकारी सूत्रों के अनुसार 17 फरवरी से 2 मार्च तक भारत और म्यांमार की सेना के संयुक्त ऑपरेशन में दोनों देशों ने अपने-अपने झंझट काफी हद तक कम किये । म्यांमार के सागाइंग डिवीजन में टागा स्थित अड्डे से बड़ी संख्या में खपलांग गुट के नगा नेताओं के पकड़े जाने की रिपोर्ट है । म्यांमार का ऐसा ही संकट है अराकान आर्मी, जो अलग स्वतंत्र राज्य की मांग पर अड़ा है । खपलांग गुट और अराकान आर्मी मणिपुर - म्यांमार सीमा पर खुराफात करते रहते हैं ।
खपलांग गुट और भारत सरकार दोनों के एक-दूसरे पर संघर्षविराम रद्द करने का आरोप लगाया । उसके बाद खपलांग नगाओं ने मणिपुर - म्यांमार सीमा पर म्यांमार के साइड से कई सीआरपी जवानों की हत्या कर दी । उसके जवाब में भारतीय सेना ने म्यांमार के अंदर घुसकर कई अड्डे ध्वस्त किए ।
ऐसे में नगाओं के खपलांग गुट के बकौल वार्ताकार आर. एन. रवि बातचीत में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता है । पहले की वार्ता भी सिर्फ मुइवा गुट से चली । अभी अन्य किस-किस गुट से वार्ता चल रही है, इस पर रवि कुछ नहीं बोले । उन्हें उतना भी नहीं बोलना था ।
लेकिन मुइवा गुट के ‘गणतंत्र दिवस’ खुलासे से दो सकारात्मक बातें खुली । एक तो ये कि झंझटिया मुद्दा अलग झंडा और संविधान पर सरकार सहमति बनाकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुटी है । दूसरा है ‘संप्रभुता’, जिसमें हिस्सेदारी की बात मेलजोल पैदा करती है । मुइवा ने फिलहाल भारत सरकार का यह प्रस्ताव भी मानने से इन्कार कर दिया कि ‘अलग झंडा’ नगाओं की ‘विशिष्ट संस्कृति’ की पहचान बनी रह सकती है । लेकिन मुइवा इस पर अड़े हैं कि जब वार्ता राजनीतिक है, तो झंडा सांस्कृतिक कैसे होगा ।
23 फरवरी को दिल्ली के जंतर मंतर पर बड़ी संख्या में नगा छात्रों और नेताओं ने विशाल रैली निकालकर ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को तत्काल राजनीतिक समझौते में तब्दील करने की मांग की । उनके बैनर पर लिखा था - ‘विक्टरी टु नगालिम’ । नेतृत्व कर रहे विधायक अवांगवो न्यूमई नगा पीपुल्स फ्रंट के अध्यक्ष भी हैं । सबों ने ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ का मजमून सार्वजनिक करने की आवाज उठायी ।
नगालैंड के सारे अलगाववादी संकट और समाधान प्रयासों का संचालन चर्च पादरी करते हैं । जनवरी, 2019 में लगभग 39 इसाई संगठनों ने संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा कि ‘नगा लोग भारतीय राज्य नगालैंड से भ्रम में न पड़ें, इस पर वार्ता की स्थिति डेड एंड है ।’
संघर्षविराम से लेकर ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ तक नगा डील चुनावी है । नगा नेता ने भी लोकसभा चुनाव के समय मुंह खोला है । 2017 में मणिपुर में और जनवरी, 2018 में नगालैंड विधान सभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने सफाई दी । नगालैंड विधान सभा चुनाव में तो सभी जन-संगठनों के संयुक्त मंच ने चुनाव मं हिस्सा न लेने की शर्त रखी कि ‘नगा संकट का हल नहीं तो चुनाव नहीं’ । भाजपा बाद में उससे पीछे हट गयी । नागरिकता(संशोधन) बिल के लैप्स कर जाने पर फरवरी में पूर्वोत्तर के लोगों ने जश्न मनाया । नगालैंड विधान सभा ने 26 फरवरी को प्रस्ताव पारित करके इसे ‘विशिष्ट नगा संस्कृति और इतिहास’ के खिलाफ बताया ।