वयोवृद्ध नगा नेता टी. मुइवा ने अचानक अपने गांव सोमडेल(मणिपुर) पहुंचकर नगा लोगों को फिर से याद दिला दिया कि नगा मसले का एकमात्र हल यही है कि भारत सरकार ‘स्वतंत्र सार्वभौम नगालिम संविधान और झंडे’ को मान्यता दे । उनका जन्मस्थान सोमडेल मणिपुर के उखरूल जिले में पड़ता है ।
यह बात कमोवेश नगालैंड और मणिपुर के लोग भूल चुके थे । नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (आइसाक मुइवा गुट) के सुप्रीमो हैं टी. मुइवा और अपनी समानान्तर भूमिगत संघीय नगालिम सरकार के स्वयंभू प्रधानमंत्री’ हैं । एनएससीएन(नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम. आई एम) की भारत सरकार से 28 वर्षों से बेनतीजा वार्ता चल रही है, जिसके रास्ते का एकमात्र रोड़ा टी.(थुइन्गालेंग) मुइवा का यही अड़ियल रवैया है ।
भारत की संघीय व्यवस्था से विद्रोह करके हिंसक लड़ाई ठानने के लिए 1970.71 में मुइवा ने अपना गांव छोड़ा और 55 वर्षों बाद वैसे समय में आकर अपने पैतृक घर, समाज के लोगों को भड़का गए, अब हालात सामान्य हैं । तनाव का माहौल नहीं है । लड़ाई के इतने वर्षों में मुइवा समेत एनएससीएन और अन्य नगा गुटों के भारत सरकार से शांति समझौता हुए । मुइवा के साथ वाले नेता अपनी मुहिम पूरी न हो पाने की हताशा लिए स्वर्ग सिधार गए । 91. वर्षीय टी. मुइवा भी अंतिम सीढ़ियां गिनने की हालत से गुजर रहे हैं । मुइवा अपने संगठन के दीमापुर स्थित हेब्रन हेडक्वार्टर से निकलकर सोमडेल गए और वहां एक हफ्ता गुजारकर लौटे । मुइवा ने नगा समाज और अपने जिला. जबाड़ी के विभिन्न नगा समुदायों को संबोधन के जो कुछ कहा, उसकी किसी भी हलकान में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । कयास यही लगाए जा रहे हैं कि यह मुइवा की अपने साथियों की तरह हताशा और निराशा को ढंकने की झुंझलाहट है ।
1997 में एनएससीएन(आई एम. आइसाक मुइवा) की भारत सरकार से संघर्षविराम सहमति हुई । अगस्त, 2015 में भारत सरकार के साथ एनएससीएन(आईएम) की ‘फ्रेमवर्क डील’ हुई, जिसे फाइनल समाधान डील की रूपरेखा बतायी गयी । ‘फ्रेमवर्क डील’ के एक साल बाद जून, 2016 में मुइवा के वरि’ साथी और उनके संगठन के अध्यक्ष आइसाक चिशी स्वू का दिल्ली में ही निधन हो गया । ‘फ्रेमवर्क डील’ पर तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में दोनों नगा नेताओं ने दस्तखत किए । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस डील को ‘ऐतिहासिक’ बताया ।
एक साल बाद 2017 के जून महीने में ही एनएससीएन के दूसरे गुट के नेता एस. एस. खपलांग भी चले गए । खपलांग को भी अलग ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ ए अलग झंडा और संविधान के साथ चाहिए था । वे भी अपनी भूमिगत नगालिम सरकार के स्वयंभू ‘प्रधानमंत्री’ थे । टी. मुइवा से खपलांग का मतभेद इसी मुद्दे पर हुआ कि मुइवा सिर्फ हिंसा की बदौलत दबाव डालकर अपनी मांग मनवाना चाहते थे और खपलांग भारत सरकार से वार्ता के पक्ष में थे । 1980 में खपलांग ने अपना अलग एनएससीएन बना लिया । 2002 में एनएससीएन(खपलांग गुट) की भारत सरकार से संघर्षविराम सहमति बनी और अंतिम हल तक वे नहीं पहुंच पाए । दोनों गुटों से भारत की वार्ता चलती थी । आइसाक चिशी संघीय नगालिम सरकार(भूमिगत) में थे स्वयंभू ‘राष्ट्रपति’ । मुइवा एनएससीएन महासचिव हैं । 28 वर्षों से हिंसा की ओर लौटने की बेजान धमकी को यदा.कदा दुहराते हुए मुइवा के नेतृत्व में भारत सरकार से वार्ता चला रहे एनएससीएन प्रतिनिधिमंडल इसे ‘नगा इंडिया’ वार्ता बताते हैं । वे यह भी बार.बार कहते हैं कि नगाओं का भारत से अलग अपनी विशिष्ट संस्कृतिए पहचान रही है और इतिहास रहा है ।
अभी इस हफ्ते टी. मुइवा इस बात को फिर से 55 वर्षों में पहली बार मणिपुर में अपने गांव में कह गए कि ‘अलग झंडा और अलग नगा संविधान’ के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा । नगा समझौते का हल तभी निकलेगाए जब भारत सरकार इसे मान्यता दे । मुइवा ने दावा किया कि 1997 और 2015 के समझौतों में भारत सरकार ने अलग नगा पहचान स्वीकारी है ।
अभी वैसे समय में टी. मुइवा अपने वजूद का उजड़ा आशियाना बसाने की घिसी जीद में गांव पहुंचे, जब मणिपुर, नगालैंड समेत समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र में सारे उग्रवादीधविद्रोही गुट भारत सरकार से शांति समझौते कर चुके हैं या बैकफुट पर जा चुके हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तर पूर्व को हिंसा से मुक्त कर शांति और विकास के युग में लाने का प्रयास बिल्कुल सफल चल रहा है । लगता है, नक्सल मुक्त भारत के अभियान में जल्द ही उग्रवाद मुक्त पूर्वोत्तर भी शामिल हो जाएगा ।
मणिपुर में भी मई, 2023 में भड़की जातीय हिंसा के बाद अभी हालात शांतिपूर्ण हैं । मणिपुर प्रशासन ने मुइवा के आने.जानेए रहने या किसी भी गतिविधि पर कोई रोक नहीं लगायी । नगा समाज को उकसाने वाली मुइवा की बोली प्रचारित होने के बावजूद मणिपुर प्रशासन ने उनका दौरा शांतिपूर्वक संपन्न हो जाने दिया । मुइवा ने मणिपुर पहुंचने की खबर 10 अक्टूबर को ही प्रचारित कर दी, मगर कहीं से इसका विरोध नहीं हुआ । जिला प्रशासन ने भी बेरोकटोक मुइवा का कार्यक्रम होने दिया । मुइवा अक्टूबर का अंतिम सप्ताह सोमडेल में गुजारकर वापस अपने दीनापुर हेडक्वार्टर लौट गए ।
मणिपुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार मुइवा का अपने गांव में परंपरागत तरीके से झंडे लहराते उत्साह के साथ स्वागत हुआ । उनकी उमर के इक्का.दुक्का ही बचे हैं, जिनसे मिलना.जुलना हुआ । मुइवा के तान्खुल समुदाय के लोगों ने उनके स्वास्थ्य और दीर्घायु की चर्चों में प्रार्थना की । उखरूल जिले का ये वही गांव सोमडेल है, जहां से टी. मुइवा ने नगा नेशनल काउंसिल(एनएनसी) महासचिव के रूप में पूर्वोत्तर के सभी नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र नगालिम देश’ बनाने की लड़ाई ठानी और भूमिगत हुए । मुइवा के नाम पर पहले 1ए00ए000 रूपये का इनाम रखा गया, फिर कई बार वो राशि बढ़ायी गयी ।
मुइवा ने नगालैंड के दीमापुर में अपना हेब्रन डेडक्वार्टर बनाया और अपने विदेशी अड्डे से लौटकर यहीं रहते थे । मुइवा अपनी शर्तों पर विदेशी अड्डों पर ही भारतीय प्रधानमंत्रियों से मिला करते थे । उन साब बातों की तरह अब नगा संघर्ष और मुइवा स्वयं भी इतिहास का विषय बन चुके हैं ।
सोमडेल में मुइवा के एक परिजन 84 वर्षीय असुई मुइवा ने उनके स्वागत में कहा - ‘म्यांमार से सटे उखरूल का दौरा करनेवाले इंडिया में वे पहले ‘प्रधानमंत्री’ हैं । 1964 में स्वतंत्र संप्रभु नगालिम के लिए सशस्त्र आंदोलन छेड़नेवाले टी. मुइवा गवर्नमेंट ऑफ दि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालिम के ‘ऑटो किलोन्सेर’(नजव ज्ञपसवदेमत) प्रधानमंत्री हैं ।’ सैकड़ों लोगों के बीच एक अखंड संघीय भारत के अंदर दूसरा देश(नगालिम) का दिवास्वप्न बुनते रहने का माहौल बनाकर मुइवा ने अपने साथियों को अपनी हठधर्मी पर कायम रहने का संदेश दिया ।
‘आजाद’ नगालिम की हिंसक नींव भारत की आजादी से पहले रखनेवाले एनएससीएन के संस्थापक जापुओ फिजो को 1952 में पहले आम चुनाव का बायकाट करने के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वार्ता के लिए बुलाया । पं0 नेहरू ने फिजो से कहा - ‘भारत के अंदर अलग स्वतंत्र संप्रभु नगालिम की मांग मैं तो क्या भारत के कोई भी प्रधानमंत्री पूरी नहीं कर सकते ।’ आज तक ये बात सही साबित हो रही है । फिजो गुजर गए । कुछ वर्ष पहले तक किसी भी नगा वार्ता में खपलांग और मुइवा की तरह बुलाए जाने का लंदन से भारत को संदेश भेजनेवाली फिजो की बेटी ऐरिनो फिजो का भी कोई अस्तित्व नहीं है ।
यह सब जानते देखते हुए मुइवा ने ढलती उम्र में भी कहा - ‘आजादी कभी मुफ्त के उपहार में नहीं मिलती । नगा लोगों को हमेशा अपनी आजादी की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा । संघर्षविराम समझौता लड़ाई की बदौलत हो पाया है । नगा लोग कभी.भी अलग राष्ट्रीय झंडा और संविधान पर वार्ता न करेंए जो दशकों पहले उनके गुट ने तय किया ।’
उखरूल से सटे सेनापति जिले में पहले एक जनसभा को और फिर संवाददाताओं को बहुत धीमी आवाज में मुइवा ने जोश भरा. उनका गुट अपने दावे से एक इंच पीछे नहीं हटेगा और पूर्वोत्तर के सभी नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर स्वतंत्र नगालिम गठन की एकमात्र मसले का हल है ।’
2010 में मणिपुर में कांग्रेस की सरकार थी, जिसने एनएससीएन नेता मुइवा को नगालैंड की सीमा से निकलकर मणिपुर में प्रवेश की इजाजत नहीं दी । सीमा पर उपजी हिंसा में 6 लोग मारे गए । नगालैंड में 2003 से ही लगातार नगा शांति वार्ता चलाने और नगा मसले का राजनीति हल के समर्थन वाली सरकार बन रही है ।
2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी शासनकाल में एसएससीएन(आईएम) के साथ चल रहे संघर्षविराम के दायरे में अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर के भी नगा आबादी वाले इलाके को भी लाने का फैसला केंद्र सरकार ने किया । उसको लेकर इन राज्यों में बवाल मच गया । अरूणाचल प्रदेश, असम और मणिपुर की सरकारों ने विरोध किया । गैर नगा आबादी वाले इलाके की जनता सड़कों पर उतर आयी । उन राज्यों को एनएससीएन(आईएम) गुट के साथ संघर्षविराम का दायरा नगालैंड से बाहर बढ़ाने से अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर खतरे की आशंका हो गयी ।
खासकर मणिपुर में हिंसा ऐसी भड़की की काबू पाना कठिन हो गया । विरोध करनेवाली आम जनता ने मणिपुर विधान सभा भवन समेत कई सरकारी कार्यालयों में आग लगा दी । राजधानी इंफाल में पुलिस फायरिंग में एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए । आखिरकार केंद्र सरकार को अपन फैसला वापस लेना पड़ा । उस समय से टी. मुइवा का दीमापुर इंफाल मार्ग से गुजरकर अपने गांव पहुंचना कठिन हो गया । सोमडेल गांव एनएससीएन(आई एम) के दीमापुर(नगालैंड) स्थित हेब्रन हेडक्वार्टर से 160 कि.मी. उत्तर.पश्चिम में स्थित है । 1997 में केंद्र सरकार के साथ एनएससीएन(मुइवा) की संघर्षविराम सहमति राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा और इन्द्रकुमार गुजराल के प्रयासों से हुई थी । यह कोई नगा शांति समझौता नहीं था । केंद्र और नगा गुट सिर्फ इस बात से सहमत हुए थे कि एक.दूसरे के सुरक्षा बलों पर हमले नहीं करेंगे । गैरतलब है कि एनएससीएन(आई एम) की स्वयं भू नगालिम सरकार की भारत सरकार की तरह अपनी समानान्तर पुलिस और सेना है, जो भारत सरकार की जानकारी में है । उस संघर्षविराम का दायरा सिर्फ नगालैंड तक था, जहां नगा आंदोलन की नींव रखी गयी और जहां से मुइवा अपना आंदोलन चलाते रहे हैं ।
उसी समय मुइवा को चेत जाना चाहिए था, जब संघर्षविराम का दायरा बढ़ाने के केंद्र के फैसले के विरोध में उफने नगा आबादी समेत सभी लोगों ने एनएससीएन(मुइवा) के प्रस्तावित नगालिम को ठुकरा दिया । सभी अन्य बातों के अलावा मुइवा ने समूचे पूर्वोत्तर के नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ के लिए लड़ाई जारी रखने के लिए भी अपने गांव, जिले के लोगों को हमेशा तैयार रहने कहा है ।
जबकि केंद्र से एनएससीएन(मुइवा) की वार्ता काफी समय से डंप चल रही है ।
नरेंद्र मोदी ने 2014 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नगा समस्या को प्राथमिकता के आधार पर लिया और पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि को नगा नेताओं से वार्ता के लिए अधिकृत किया । रवि के प्रयासों से 2015 में फ्रेमवर्क डील’ होने के बाद 2017 में सात अन्य नगा गुटों के साथ भी केंद्र का समझौता हो गया । एनएससीएन(नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप) के बैनर तले केंद्र की यह डील मुइवा गुट से इस मायने में अलग है, क्योंकि इन सातों गुटों ने स्वतंत्र संप्रभु नगालिम और अलग झंडा, अलग संविधान’ हठ छोड़कर लचीला रूख अपनाया है, ताकि केंद्र से वार्ता का रास्ता खुला रहे । एनएससीएन(आई एम) ने इन सातों गुटों की केंद्र से डील को नगा मसले के हल के लिए खतरनाक’ बताकर इसके साथ चलने से इन्कार कर दिया है ।
केंद्र के वार्ताकार आर. एन. रवि को फिर नगालैंड का राज्यपाल बना दिया गया और वे वार्ता चलाते रहे, मगर बात आगे बढ़ी नहीं । फिर रवि को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाए जाने के बाद केंद्र ने दूसरे रिटायर खुफिया प्रमुख अक्षय कुमार मिश्र को नया वार्ताकार नियुक्त किया ।
अक्षय मिश्र से एनएससीएन(आई एम) की अंतिम वार्ता की जानकारी अप्रैल, 2023 में मिली, जब मैं संयोग से दीमापुर में ही था । दीमापुर में हुई उस बैठक में शामिल होने मुइवा अपने संगठन के 20 प्रतिनिधियों के साथ पहुंचे । वार्ता पहले की तरह बेनतीजा रही, क्योंकि अक्षय मिश्र केंद्र की ओर से ऐसा आश्वासन नहीं दे पाएए जो मुइवा चाहते हैं । केंद्र के वार्ताकार ने एनएससीएन के सातों नगा गुटों से भी मुलाकात कीए जिन्होंने अड़ियल रवैया पर जोर नहीं दिया ।
मैं नगा झमेले की खोज में नगालैंड का सोनोमा गांव अप्रैल, 2023 में पहुंचा । इसी गांव में नगा आंदोलन के संस्थापक फिजो पैदा हुए । गांव के एक स्कूल शिक्षक बिजोले ने बताया कि. ‘खोनोमा गांव में आज कोई उग्रवादी गतिविधि नहीं, जहां फिजो जन्मे ।’
जनवरी, 2025 में एनएससीएन(आई एम) की ओर से जारी एक वक्तव्य में धमकी दी गयी कि ‘अगर किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से जल्द समझौता नहीं हुआ तो फिर हिंसा की ओर लौटेंगे ।’ मुइवा के दस्तखत से जारी इस वक्तव्य के बारे में केंद्र सरकार के सूत्रें को पता चला कि यह मुइवा के चीन स्थित सलाहकार फुनथिंग शिमरे और पामशिन मुइवा का ड्राफ्ट किया हुआ है ।
जनवरी, 2025 में ही केंद्रीय गृह मंत्रालय को पूर्वी नगालैंड के 6 जिलों को मिलाकर ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन(म्छच्) की अलग फ्रंटियर नगालैंड टेरिटरी(थ्छञ्) गठन की मांग पर वार्ता करनी पड़ी । उस वार्ता में भी केंद्र का प्रतिनिधित्व अक्षय मिश्र ने किया । इस संगठन ने फरवरी, 2023 में नगालैंड विधान सभा चुनाव बायकाट की धमकी दी, जिसमें सभी नगा जनजातीय समुदाय के लोग हैं । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के आश्वासन पर बायकाट वापस ले लिया ।
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जनवरी 2025 में ही अक्षय मिश्र ने नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप(एनएसपीजी) नेताओं से गुवाहाटी में वार्ता अब एनएससीएन(आई एम) के मुइवा खुद सोच लें कि वे कहां ठहरते हैं और नयी पीढ़ी को किधर ले जाना चाहते हैं ।