केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि अगर नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में आए तो 3 साल में नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा । उन्होंने साथ-साथ यह भी कहा कि नक्सली या तो आत्मसमर्पण करें या 2 साल के अंदर अपना अस्तित्व ‘खत्म’ करें । अमित शाह ने यह बात मुख्य रूप से नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ छत्तीसगढ़ में बार-बार दुहरायी है । इसके पीछे दो कारण हैं । पहला तो ये कि छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों को नक्सलियों से निबटने में बहुत बड़ी सफलता मिली है । लोकसभा चुनाव प्रक्रिया और नक्सल सफाया अभियान छत्तीसगढ़ में लगभग साथ-साथ चल रहा है । दूसरा कारण है कि आज चुनाव वर्ष 2024 आने से कुछ ही दिन पहले भाजपा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को हटाकर सत्ता में वापस लौटी है ।

छत्तीसगढ़ में 16 अप्रैल को सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए, जो सीपीआई (माओवादी) गुट से संबद्ध बताए जाते हैं । पुलिस के अनुसार कांकेर जिले के घने जंगलों में सुरक्षा बलों की धरपकड़-तलाशी अभियान टीम पर नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी । पुलिस की ओर से हुई जवाबी फायरिंग में 29 नक्सली मारे गए ।

कांकेर के ‘अबूझमाड़’ (अज्ञात) पहाड़ी के नाम से जानी जानेवाली जगह से 29 शव बरामद किए हैं, जो माओवादियों का अभेद्य किला माना जाता है । वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सुरक्षा बलों की यह बहुत बड़ी सफलता है । राष्ट्रीय स्तर पर भी आंकड़ा देखने से पता चलता है कि 16/04/2024 से पहले 2018 में एक ही बड़ी मुठभेड़ महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले में हुई, जिसमें 37 नक्सली मारे गए । छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की तरह महाराष्ट्र में भी गढ़चिरोली माओवादियों की मजबूत गढ़ है ।

कांकेर से पहले 02/04/2024 को छत्तीसगढ़ के ही बीजापुर में 13 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए । लोकसभा मतदान का दौर शुरू होने से चार दिन पहले 22 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री ने कांकेर जिले में ही चुनावी सभा में सुरक्षा बलों के हौसले बुलंद किए और छत्तीसगढ़ की पूर्व काँग्रेस सरकार पर भी निशाना साधा । अमित शाह ने दो ही बातों पर जोर दिया कि अगर नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में लौटे तो तीन वर्षों में नक्सलियों का सफाया हो जाएगा और बचे-खुचे माओवादी आत्मसमर्पण करें, अन्यथा साफ हो जाएंगे। 2 वर्षों में नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा, क्योंकि लड़ाई का परिणाम निश्चित है ।

अमित शाह ने पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर नक्सलियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया और दावा किया कि विष्णुदेव साय के मुख्यमंत्री बनने के चार महीने के अंदर 90 नक्सली मारे गए, 123 गिरफ्तार किए गए तथा 250 ने आत्मसमर्पण कर दिया ।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कहने का तात्पर्य यह था मानो नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले केंद्र की कांग्रेस गठजोड़ और कांग्रेस समर्थित सरकारों ने नक्सलियों के प्रति नरम रवैया अपनाया ।

अमित शाह के चुनावी भाषणों में जो थोड़ी-बहुत कसर रह गयी, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं झारखंड में चुनाव प्रचार के दौरान पूरी कर दी । छत्तीसगढ़ के बाद दूसरा राज्य झारखंड है, जहां नक्सली मजबूत स्थिति में हैं । इनके साथ मिलती-जुलती बातें ये है कि दोनों राज्यों का 2000 में केंद्र में भाजपा शासनकाल के दौरान हुआ है । झारखंड में इस वर्ष के अंत में विधान सभा चुनाव होनेवाला है । नरेंद्र मोदी की सियासी नजर उस पर भी है । प्रधानमंत्री जितनी बार झारखंड के चुनावी दौरे पर आए, उन्होंने यहां की झारखंड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस गठजोड़ सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के साथ-साथ कांग्रेस-नक्सल सांठगांठ आरोप भी उछाला । नरेंद्र मोदी ने झारखंड के घाटशिला और जमशेदपुर में 19 मई को अपने चुनावी भाषण की शुरुआत ही इस पंक्ति से की: ‘शहजादे (राहुल गांधी) माओवादियों की भाषा बोल रहे हैं । कांग्रेस ने रंगदारी की परिभाषा बदल दी है और नक्सलियों की भाषा बोलती है । नक्सलियों की तरह कांग्रेस उद्योगपतियों से रंगदारी वसूलती है।’ इसके बाद 21 मई को रांची से छपनेवाले अखबारों के पहले पृष्ठ पर विज्ञापन की एक पट्टी ऊपर में छपती है: ‘वामपंथी उग्रवाद का जड़ से होगा खात्मा, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से होगा विकास ।’ शुक्र है, इस विज्ञापन में नक्सली की आड़ में कांग्रेस पर प्रहार नहीं था । भाजपा का ऐसा विज्ञापन तो अखबारों में पूरी मतदान प्रक्रिया के दौरान छपा । लेकिन झारखंड में यह विज्ञापन तभी छपाए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी भाषणों में कांग्रेस की भाषा नक्सली वाली बतायी । उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, हमीरपुर और फिर मुंबई में 17 मई को चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस मैनिफेस्टो(चुनाव घोषणापत्र) को ‘वामवादी डॉक्युमेंट’ करार दिया । उन्होंने कहा कि इसे लागू किया तो देश दिवालिया हो जाएगा । उसके बाद नरेंद्र मोदी मतदान प्रक्रिया के अंतिम चरण तक कांग्रेस को माओवादी सोचवाली पार्टी बताते रहे । 10 मई को ही छत्तीसगढ़ के बीजापुर से 12 नक्सलियों के मुठभेड़ में मारे जाने की खबर आयी । नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों वोटिंग की तारीखों के हिसाब से नक्सल प्रभावित झारखंड आते रहे । 23 मई को भी प्रधानमंत्री झारखंड में थे, जब वहां से भी खूंटी, सरायकेला, चाईबासा सीमा पर कोबरा बटालियन के साथ मुठभेड़ में एक माओवादी एरिया कमांडर मारा गया । उधर छत्तीसगढ़ से माओवादियों के मुठभेड़ में मारे जाने का सिलसिला जारी रहा । 23 मई को भी छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में सात नक्सलियों के मुठभेड़ में मारे जाने की खबर आयी । यह एक महीने में छत्तीसगढ़ पुलिस की चौथी बड़ी सफलता थी । भाजपा सरकार के पांच महीने के कार्यकाल में इसे जोड़कर मारे गए माओवादियों की संख्या 112 हो जाती है । इनमें किसी भी मुठभेड़ में पुलिसकर्मियों के हताहत होने की खबर नहीं है । प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री इन मुठभेड़ों की सफलता के आधार पर बता रहे हैं कि नक्सली अब कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । सुरक्षा बलों ने नक्सली हिंसा की काट में जवाबी हिंसा का तरीका अपनाया है और यह बात सही है कि माओवादी अब सिमट चुके हैं । केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में अब मात्र 70 नक्सल प्रभावित जिले हैं और ‘25 मोस्ट वांटेड जिलों’ में से 15 सिर्फ छत्तीसगढ़ के हैं । 8 जिले झारखंड में हैं । मुठभेड़ों तक तो बात ठीक है । मगर सवाल वहां पैदा होता है जब इस हिंसा और जवाबी हिंसा की आड़ में सियासी राजनीति का संदेश मतदाताओं तक जाता है । इसकी शुरुआत छत्तीसगढ़ से ही स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 विधान सभा चुनाव के समय की और फिर उसे 2019 लोकसभा चुनाव के समय भी दुहराया । मतदाताओं के लिए यह समझना कठिन नहीं है कि भाजपा केवल नक्सली सफाया की आड़ लेकर कांग्रेस सफाया का राजनीतिक अभियान चला रहा है । इसमें छत्तीसगढ़ पुलिस सवाल के घेरे में है और भाजपा के 15 साल के शासनकाल के दौरान चलाए गए नक्सल अभियान पर मतदाता जवाब चाहते हैं । 2018 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार गिरीए कांग्रेस सत्ता में आयी और 2023 में फिर सत्ता में भाजपा वापस आ गयी । 2018 के छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह तीनों ने कांग्रेस पर सीधा आरोप लगाया कि इस पार्टी की नक्सलियों से मिलीभगत है, जो युवाओं को गुमराह कर रहे हैं । उस वक्त अमित शाह भाजपा अध्यक्ष और राजनाथ सिंह गृहमंत्री थे । छत्तीसगढ़ की दो वारदातें आज तक नक्सल अभियान का जवाब खोज रही हैं ।

25 मई, 2013 को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में हुए कथित माओवादी हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत राज्य के सभी कांग्रेसी नेता मारे गए । चुनावी रैली के दौरान हुए उस हमले में 29 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है । लेकिन उस हमले की जांच रिपोर्ट को लेकर चल रही सियासी राजनीति की कानूनी और चुनावी दावों की पुष्टि ‘कवरअप’ अभियान में उलझी है । 10 साल बाद 2023 में विधान सभा चुनाव के समय उस घटना की जांच रिपोर्ट का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया । यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उस एक हमले में माओवादियों का हाथ था या नहीं, जिसमें सारे कांग्रेसी नेता मारे गए ।

2020 में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने 2013 झीरम घाटी हमले में मारे गये एक कांग्रेसी नेता के पुत्र की एफआईआर दर्ज की, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) इसके पीछे षड्यंत्र की जांच नहीं कर पायी । एनआईए ने उस एफआईआर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी और खारिज हो गयी । फिर एनआईए सुप्रीम कोर्ट गयी, जहां सीजेआई डी. वाई. चन्द्रचूड़ की पीठ ने छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया । यह आदेश 24011023 को आया ।

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा चलाया गया सलवा जुडूम अभियान के तहत नक्सली काट में युवकों को हथियार देकर लाइसेंसी नक्सली बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2008 में कहा: ‘अगर किसी को सरकार हथियार देती है तो वह छद्म पुलिस का दावा करता है और वह कोई भी अपराध कर सकता है ।’ इस तीखी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगाने कहा ।

अब जरा दार्जिलिंग चलते हैं, जहां स्थित नक्सलबाड़ी में शांति मुंडा 82 साल की उम्र में वृद्धावस्था पेंशन पाते हुए जवाबी हिंसा को कोस रही हैं । याद रहे 25 मई, 1967 को हाथीघीसा में शांति मुंडा ने ही 15 दिन के बच्चे को पीठ पर बांधे पुलिस इंस्पेक्टर पर पहला तीर चलाया था । उसी घटना से नक्सल आंदोलन की शुरुआत हुई थी । अब उस समय की एकमात्र वही नेता जीवित बची हैं । उन्होंने जवाबी हिंसा से पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के नक्सली सफाया अभियान को जी भरकर कोसा और फर्जी मुठभेड़ दिखाकर बेकसूरों को निशाना बनाने की निंदा की । शांति मुंडा ने कहा: ष्टातमेर राजनीति गलत है, कितनों को आप मारेंगे । इससे मिला क्या, मुझे सिर्फ अपनी जोतवाली जमीन के सिवाए कुछ नहीं मिला ।’ जमीन्दार के कब्जे से रैयती जमीन छीनने के लिये जुटी महिलाओं के साथ पुलिस इंस्पेक्टर से शांति मुंडा भिड़ी थीं । नक्सल आंदोलन के जन्मदाता चारु मजुमदार के पुत्र अभिजित मजुमदार ने 2009 में दार्जिलिंग से लोकसभा चुनाव लड़ा था ।

हर मुठभेड़ के बाद इसके फर्जी होने के आरोप को एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता । क्योंकि नक्सली प्रायः मुठभेड़ की नौबत कम ही आने देते हैं । छत्तीसगढ़ से आरोप आ रहे हैं कि पुलिस हाट-बाजार, खरीदारी करनेवाले लोगों को मारकर नक्सली बता देती है ।