नक्सल प्रभावित राज्यों में सुरक्षा स्थिति की सालाना समीक्षा बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नक्सली प्रभाव वाले जिलों में असंतोष का मुख्य कारण विकास का वहां तक नहीं पहुंचना है और आजादी के समय से यही हालत बनी हुई है ।
लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री ने नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और आला अधिकारियों के साथ बैठक में इस बात के सभी पहलुओं पर समेकित विमर्श जरूरी नहीं समझा कि आखिर आजादी के 75 वर्षों तक माओवादी की गिरफ्त वाले जिलों में विकास की गाड़ी पहुंची क्यों नहीं ।
पूरे देश में आजादी के 75वें वर्ष का अमृत महोत्सव का जश्न मनाया जा रहा है । ऐसे माहौल में नक्सल प्रभावित जिलों का वातावरण विषाक्त बने रहने के पीछे आखिर मूल कारण क्या है । इस पर विचार करने के बजाए केंद्रीय गृह मंत्री ने सिर्फ सुरक्षा स्थिति की समीक्षा बैठक की महज औपचारिकता पूरी कर दी, जो हमेशा नक्सल दमन अभियान तेज करने के उपायों पर केंद्रित होती है । बैठक का नतीजा यह निकला कि नक्सल इलाके में अमन और विकास के रास्ते में वामपंथी उग्रवाद(. लेफ्ट विंग एक्सट्रेमिज्म) बाधक है, इसलिए इनका दमन किया जाना चाहिए । नक्सली/माओवादी गुटों को सरकारी भाषा में वामपंथी उग्रवाद कहा जाता है ।
जैसा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नक्सल प्रभावित जिलों में आजादी के समय से ही असंतोष का मूल कारण विकास का लोगों तक नहीं पहुंचना है और नक्सलियों को खत्म किए बिना न तो लोकतंत्र को नीचे तक प्रसारित कर पाएंगे न ही, अविकसित क्षेत्र का विकास कर पाएंगे । आजादी के समय से ही नक्सलियों के विनाश का अभियान चलाया जा रहा है और इसमें अभी तक सफलता नहीं मिली है । नक्सलियों को विकास का दुश्मन बतानेवाले अमित शाह कोई पहले गृहमंत्री नहीं हैं । केंद्र सरकार और नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें इतने वर्षों के तजुर्बे से सीखने के बजाए सुरक्षा बलों की बदौलत नक्सल दमन अभियान चलाए रखना ही इस जटिल सामाजिक समस्या का निदान मानती है । आजादी के 75वें वर्ष में नक्सल दमन की समीक्षा के दौरान अगर अमन के सुरक्षा बलों के इतर विकल्पों पर अगर विचार किया जाता तो, विकास से वंचित नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों को अच्छा लगता । नक्सल समस्या को विकास कार्य में बाधक और इनके विनाश में आ रही कठिनाइयों के पीछे प्रभावित राज्यों के अलग-अलग राजनीतिक कारणों के अलावे सुरक्षा बलों को लेकर भी आपसी तालमेल का अभाव है । इसके विकास योजनाओं के कार्यान्वयन और नक्सली विनाश की समेकित रणनीति नहीं बन पाती ।
केंद्र सरकार और राज्य सरकारें नक्सल प्रभावित जिलों में दुहरी मार झेल रहे बेकसूर नागरिकों की टीस की जमीनी हकीकत समझना नहीं चाहती । नक्सल हिंसा का जवाब हिंसा से और आक्रामक रवैए के जवाब में सुरक्षा बलों के आक्रामक रवैए की नीति का परिणाम आंखों के सामने है । केंद्रीय गृह मंत्री ने गरीब बेकसूरों के विकास से वंचित होने की बात की और उसके लिए नक्सली हिंसा को जिम्मेदार ठहराया । लेकिन इसका दूसरा पहलू भी देखिए । राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों के हथियार, कैंप, वाहन, नक्सलियों के संदिग्ध ठिकानों की तलाश में बेखटके पहुंच जाते हैं । अगर नक्सली हमले में उड़ गए तब, आक्रामक रवैया तेज करने पर बल दिया जाएगा । बचे रह गए तो सुरक्षा बल धरपकड़ और तलाशी अभियान के दौरान गांवों में घुसकर स्थानीय लोगों के किसी भी निहत्थे जमावड़े पर फायरिंग करके बेकसूरों को मारकर मुठभेड़ दिखा देते हैं । पुलिस की यह स्टोरी किसी से छिपी नहीं है कि वो संदिग्ध नक्सलियों का जुटान था और उनलोगों ने पुलिस बल पर देखते ही फायरिंग शुरू कर दी । पुलिस अपनी फायरिंग को हमेशा जवाबी बताती है । पुलिस की ज्यादातर मुठभेड़ें फर्जी निकलती है, जिसे केंद्र और राज्य सरकारें मानने को तैयार नहीं होती । इसकी जांच की मांग अनसुनी करती है । सुरक्षा बलों को बौखलाहट और झुंझलाहट में सरकार के दबाव में ऐसा करना पड़ता है, ताकि सुरक्षा बलों की तैनाती को ही नक्सल समस्या का हल बताकर उचित ठहराया जा सके । घरों में घुसकर भी लोगों को बाहर निकालना और संदिग्ध नक्सली बताकर जवाबी फायरिंग में गोली मार देने की खबरें अब आम हो गयी है। पुलिसकर्मियों का यह दोष नहीं है, कानूनी अधिकारों से लैस काम है तो कार्रवाई क्या होगी ।
इस काम में सरकारों को कोई बाधा नहीं होती । लेकिन विकास योजनाओं का लाभ नक्सली इलाकों में घर-घर पहुंचाने में नक्सल बाधक बन रहे हैं, जैसा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों का मानना है । नक्सली जब भी सुरक्षा बलों के कैंपों पर हमला करते हैं या उनके वाहन बारूदी विस्फोट से उड़ाते हैं, उसमें मारे जानेवाले पुलिस और सीआरपी के जवान भी बेकसूर नागरिक हैं। वे सब के सब गरीब परिवारों से आते हैं । दोनों ही जवाबी हमले में गरीब बेकसूर मारे जाते हैं और दोनों की जान दांव पर लगाकर सरकारें विकास का पैसा विनाश पर खर्च कर रही है । नक्सली इलाके के लोगों को विश्वास में लेने के बजाए सरकारों ने सुरक्षा बलों को समानान्तर दहशत की छूट दी हुई है । जिससे लोगों के सामने अपनी सुरक्षा के लिए नक्सली गुटों पर निर्भर रहने की मजबूरी है ।
अभी सितंबर के अंत में जो दिल्ली में नक्सल सुरक्षा की समीक्षा बैठक हुई, उसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों के एजेंडे अलग-अलग थे । जब सरकारों में ही सुरक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष है तो नक्सली इलाकों में लोगों को संतोष कैसे होगा । बैठक की प्राइमा फेसी रिपोर्ट है कि किसी को भी इसमें दिलचस्पी नहीं थी । इसके पीछे के ताजा राजनीतिक और सियासी कारण सबके सामने है ।
पहली बात तो ये कि नक्सल प्रभावित 10 जिलों में से छह राज्यों के मुख्यमंत्री बैठक में पहुंचे । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी दिल्ली नहीं गए । उनकी ओर से वरिष्ठ अधिकारियों ने राज्य का प्रतिनिधित्व किया । बैठक में शामिल होनेवाले मुख्यमंत्रियों में थे - ओडिशा के नवीन पटनायक, बिहार के नीतीश कुमार, झारखंड के हेमंत सोरेन, महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे, मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान और तेलंगाना के चन्द्रशेखर राव ।
सभी राज्यों ने नक्सली इलाके के सुरक्षा और विकास खर्च में केंद्र का सहयोग बढ़ाने की मांग की । पुलिस आधुनिकीकरण पर जोर दिया । झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ज्यादा ध्यान जातीय जनगणना पर केंद्रित रहा । अमित शाह ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा कि डीजीपी और केंद्रीय एजेंसियों के साथ कम-से-कम हर तीन महीने पर बैठक करें । बस हो गई बैठक समाप्त ।
नीतीश कुमार जब वापस पटना लौटे तो झारखंड से लगी सीमा के लातेहार में जगुआर के डिप्टी कमांडेंट बिहार के नक्सल प्रभावित जिला मुंगेर निवासी राजेश कुमार के नक्सली हमले में शहीद होने की खबर मिली ।
पिछली घटनाओं को छोड़ दें तो गत सितंबर महीने की दो रिपोर्ट सरकारों की आंखें खोलनेवाली हैं । केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय संसद के हाल में संपन्न मानसून सत्र में सीआरपी जवानों के मारे जाने का आंकड़ा प्रस्तुत करते हुए नक्सलियों का काबू पाने का दावा कर चुके हैं । उसी आलोक में सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में तैनात सीआरपी की 21 सितंबर को अंदरूनी सुरक्षा समीक्षा बैठक को देखा जाना चाहिए । नक्सल गढ़ वाले सुकमा, कोंटा, बीजापुर, जगदलपुर, दंतेवाड़ा और रायपुर में तैनात सीआरपी टुकड़ियां रोबोट टाइप ड्यूटी से ऊब चुकी हैं । उन्हें सरकारी खानापूरी के लिए नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाने और मुस्तैदी से उनके सफाया अभियान में कोई रुचि नहीं रह गयी है । एक अधिकारी ने अपना नाम बताने से इन्कार करने के बाद रिपोर्ट दिया कि वरिष्ठ कमांडरों का रुख उदासीन होता जा रहा है और एलीट कोबरा बटालियन के लोग भी हिंसा का टूल बनने का खामियाजा लगातार भुगतना नहीं चाहते ।
02/02/2021 को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने बजट सत्र में संसद को बताया कि 2019 में 263 नक्सली वारदातों में 22 सुरक्षा जवान और 22 आम नागरिक मारे गए । 2020 में 315 नक्सली वारदातों में 36 सुरक्षा कर्मी और 75 नागरिक मारे गए ।
27/07/2021 को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में राज्य पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के संयुक्त ऑपरेशन में 22 जवानों के मारे जाने की जानकारी दी ।
छत्तीसगढ़ में आठ साल पहले भाजपा शासनकाल के समय हुई एक मुठभेड़ की न्यायिक जांच की रिपोर्ट 09/09/2021 को सामने आयी । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर जज बी. के. अग्रवाल ने उस मुठभेड़ को फर्जी करार दिया जिसमें सीआरपी ने चार बच्चे समेत आठ लोगों को संदिग्ध नक्सली बताकर मार दिया और मुठभेड़ बताया । जज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बीजापुर जिले के एडेसमट्टा में, जहां 17 मई, 2013 को मुठभेड़ दिखायी गयी, वहां गांव के 25-30 लोग निहत्थे एक फसल पूजा आयोजन के लिए इकट्ठे हुए थे । उस पर हमला करने के लिए 1,000 जवान जुटे और उसे मुठभेड़ दिखा दिया ।
मई, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस मुठभेड़ की सीबीआई जांच चल रही है । एडेसमेट्टा ‘मुठभेड़’ के हफ्तेभर बाद सुकमा जिले के झीरमघाटी नक्सली हमले में मारे गये 27 लोगों में राज्य के कई टॉप कांग्रेस नेता शामिल थे । उसमें पुलिस ने नक्सलियों का हाथ होने से इंकार किया । राज्य सरकार ने नक्सली हिंसा की काट में युवकों को हथियार देकर लाइसेंसी नक्सली दस्ता सलवा जुडूम बनाया था । सरकार पोषित इस हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार के साथ रोक लगायी ।