छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के जिस खंदक के पास नक्सल विस्फोट में सीआरपी के नौ जवान शहीद हुए, उनकी जान बचायी जा सकती थी । यह खुलासा सीआरपी डीजी आर. आर. भटनागर ने हादसे के दिन ही किया । 13 मार्च को सीआरपी की वैसी गाड़ी नक्सलियों द्वारा बिछायी गयी बारूदी सुरंग विस्फोट में उड़ गयी, जो बारूदी सुरंग सुरक्षा कवच से लैस थी । नक्सलियों ने सीआरपी से ज्यादा शक्तिशाली आईईडी का इस्तेमाल करके एमपीवी (माइन प्रोटेक्टेड वेहिकल) गाड़ी उड़ाकर नौ सीआरपी जवानों की जान ली । उसके बाद से नक्सल विरोधी अभियान में तैनात पुलिस अधिकारियों के लगातार ऐसे बयान आ रहे हैं, जिससे जाहिर होता है कि आक्रामक नीति में बार-बार चूक हो जा रही है ।
सीआरपी डीजी आर. आर. भटनागर हमले के दिन छत्तीसगढ़ में ही थे और जहां विस्फोट हुआ, उसी जगह पर उसी दिन सवेरे एलीट कोबरा कमांडो के साथ नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी । मुठभेड़ की रिपोर्ट सीआरपी डीजी को सुबह नौ बजे रायपुर हवाईअड्डे पर मिली, जब वे दिल्ली रवाना हो रहे थे । सीआरपी सूत्रों के मुताबिक डीजी को शायद खतरे का अंदाजा लग गया, इसलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ स्थित अपने आईजी को तत्काल कहा कि किस्ताराम और पलोडी के बीच से जवान न गुजरें, क्योंकि नक्सली ज्यादा घातक हमला कर सकते हैं । यह जगह सुकमा का वैसा इलाका है, जिसे नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपी के लिए ‘प्रवेश वर्जित’ क्षेत्र बना रखा है । यह खुफिया जानकारी होने के बावजूद उस जोखिम वाले रास्ते से गुजरने के लिए सीआरपी जवानों पर दबाव डाला गया । यही बात विवाद का विषय बनी हुई है और विस्तृत ब्योरा देने से सभी अफसर परहेज कर रहे हैं । प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार सुकमा जिले के एसपी अभिषेक मीना भारी खतरे की पूरी जानकारी होने के बावजूद तकरीबन 11 बजे किस्ताराम पहुंचे और पलोडी जाने पर अड़ गए । सीआरपी कमांडेंट प्रशांत धर ने एसपी को सुबह की मुठभेड़ की याद दिलाते हुए यह भी कहा कि डीजी भटनागर का उस इलाके की सड़क से न गुजरने का निर्देश है । उसके बावजूद सुकमा एसपी सीआरपी जवानों को उस जानलेवा खंदक की ओर साथ ले जाने पर अड़े रहे ।
सूत्रों के अनुसार एसपी के काफिले में पहले से ही जिला रिजर्व गार्ड और स्पेशल टास्क फोर्स के लगभग 100 जवान थे । कमांडेंट धर को दबाव में एसपी के पीछे सीआरपी बटालियन को एमपीवी गाड़ी भेजनी पड़ी । न एसपी का कुछ बिगड़ा न राज्य और जिला पुलिस का कुछ बिगड़ा । सिर्फ सीआरपी के नौ जवानों की जानें गयी ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ‘सीआरपी कमांडेंट को कभी दबाव में नहीं आना चाहिए था, भले एसपी जीवित न बचे । यह हमारे सीआरपी जवानों की जान का सवाल है । कमांडेंट को अपने डीजी के निर्देशों का पालन करना चाहिए था ।’ इससे तो जाहिर है कि सीआरपी और राज्य पुलिस में आक्रामक नीति में तालमेल नहीं था । जबकि दोनों ही सुरक्षा बलों को अपनी-अपनी खुफिया एजेंसियों से पूरी रिपोर्ट मिल चुकी थी कि नक्सली मोर्चाबंदी सुनियोजित है और वे सुरक्षा बलों को शिकस्त देने के लिए मुस्तैद हैं । सुबह ही इसका सबूत सीआरपी जवानों को मिल चुका था । उसी खुफिया सूचना के आधार पर सीआरपी डीजी ने समझा कि उनकी तैयारी इतनी मजबूत नहीं है ताकि नक्सलियों से निबटा जा सके, ऐसे में सीआरपी जवानों को गंवाने के सिवाए कुछ हासिल होनेवाला नहीं है । इसलिए उन्होंने किस्ताराम-पलोडी के आस-पास किसी भी गतिविधि से मना कर दिया ।
नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ बस्तर में नक्सल सफाया ऑपरेशन के प्रमुख और राज्य खुफिया ब्यूरो के स्पेशल डीजी डी एम अवस्थी ने भी ‘नक्सल हमला अलर्ट’ के विषय में पहले से संबद्ध अधिकारियों को पत्र लिखा । डी एम अवस्थी द्वारा बस्तर में तैनात सीनियर सीआरपी और पुलिस अफसरों को 18 फरवरी को लिखे गए पत्र का मजमून यों है - ‘किस्ताराम थाना क्षेत्र के आकलेर और गुदराई गांवों के बीच पड़ोसी राज्य तेलंगाना से आकर माओवादियों ने कुछ दिनों से विशाल जमावड़ा बना रखा है । इनकी संख्या 120 से 150 के बीच है । ये लोग पलोडी स्थित सीआरपी कैंप की गतिविधियों की रोजाना रिपोर्ट ले रहे हैं और किसी भी समय हमला कर सकते हैं । तुरंत कार्रवाई की जरूरत है ।’
यहां विचारणीय विषय ये नहीं है कि किसने किसे खुफिया अलर्ट किया और कौन अधिकारी अलर्ट के बावजूद 9 सीआरपीएफ जवानों की मौत के लिए जिम्मेदार है । आक्रामक रवैए के घात-प्रतिघात, हमले और जवाबी हमले की रिपोर्ट आए दिन मिलते हैं। यह भी खुफिया रिपोर्ट मिल चुकी थी कि पलोडी कैंप को निशाना बनाने के लिए माओवादियों ने घात लगाकर हमले की तैयारी की हुई है ।
केंद्र सरकार बार-बार प्रचार कर रही है कि माओवादी विकास के दुश्मन हैं, विकास के लिए चल रहे सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालते हैं । सरकार के मुताबिक गरीबों के विकास के लिए सड़कें बनायी जा रही हैं । इसमें बाधा डालनेवाले नक्सलियों के विनाश के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई, 2017 को आक्रामक रवैया अपनाने की नीति तैयार की, जब इसी सुकमा जिले में नक्सलियों ने 24 अप्रैल, 2017 को 25 सीआरपी जवानों की हत्या कर दी । उसका काट तैयार करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री ने नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की 8 मई को दिल्ली में बैठक बुलायी और ‘समाधान’ (SAMADHAN) का आक्रामक फार्मूला पेश किया - (एस) स्मार्ट लीडरशिप, (ए) एग्रेसिव स्ट्रैटजी, (एम) मोटिवेशन एंड ट्रेनिंग, (ए) एक्शनेबल इंटेलिजेंस, (डी) डैशबोर्ड की परफॉर्मेंस इंडिकेटर, की रिजल्ट एरिया (KPI, KRA), (एच) हार्नेशिंग टेक्नोलॉजी, (ए) एक्शन प्लान फॉर ईच थिएटर, (एन) नो एक्सेस टु फाइनेंसिंग ।
आक्रामक ‘समाधान’ के इन सभी एक्शन प्लान का परिणाम सबसे ज्यादा सुकमा और छत्तीसगढ़ से मिल रहे हैं । हर तरफ से गरीब मजदूर किसान मारे जा रहे हैं, जिनका जन-धन खाता खुलवाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चार साल की सबसे बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं ।
सीआरपी कांस्टेबल बनने वाले सारे जवान गरीब किसान परिवार के हैं । गरीब परिवारों के ही सबसे ज्यादा किशोर और युवक जमीन्दारी शोषण से रैयतों को छुटकारा दिलाने के लिए नक्सली बनते हैं । सीआरपी के अंदर भी यह रैयती सोच हावी है, जिसका खामियाजा कमजोर भुगतता है । 13 मार्च को सुकमा के पलोडी हमले में नौ सीआरपी जवानों की जान जोखिम में डालने के लिए कमांडेंट प्रशांत धर को दोषी पाया गया । उस अधिकारी का तबादला सुकमा से ज्यादा खतरनाक जगह नगालैंड कर दिया गया । सुकमा एसपी से लेकर किसी भी बड़े अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा ।
मारे गए जवान ज्यादातर उन्हीं परिवारों के थे, जिनके जन-धन खाते में पैसा जा रहा है । दो मार्च को छत्तीसगढ़ के ही भद्राचलम में सुरक्षा बलों के आक्रामक रवैए में मारे गए 10 माओवादी रैयत परिवारों के ही थे ।
सुकमा के बुरकापाल में 24 अप्रैल, 2017 को सीआरपी जवानों पर हमले की योजना नक्सलियों ने अपनी खुफिया रिपोर्ट के आधार पर बनायी थी । वे सारे जासूस गांव के गरीब हैं, जिनके बीच आज भी नक्सलियों की पैठ है । वे सारे सीआरपी जवान सड़क निर्माण कंपनियों की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए थे । पलोडी इलाके में दिसंबर, 2017 में ही नक्सलियों ने सड़क निर्माण कंपनी की 13 गाड़ियां बारूदी सुरंग से उड़ा दी ।
माओवादियों के प्रभाव वाले इलाके में सड़क निर्माण की विनाशमूलक छवि बन रही है कि दुर्गम जंगल पहाड़ी इलाकों में सीआरपी जवानों की पहुंच आसान बनाने के लिए सड़कें बनायी जा रही हैं । दो मार्च 2018 को छत्तीसगढ़ तेलंगाना सीमा पर माओवादियों को मारने के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की एलीट नक्सल-रोधी पुलिस ग्रेहाउंड्स के साथ मिलकर अभियान चलाया । सितंबर, 2007 में इसी ग्रेहाउंड्स पुलिस को लक्ष्य करके नक्सलियों ने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एम. जनार्दन रेड्डी के काफिले पर जानलेवा हमला किया । जनार्दन रेड्डी पत्नी समेत बच निकले, लेकिन उनकी सुरक्षा में तैनात ग्रेहाउंड्स पुलिस के सारे जवान मारे गए । ये वो पुलिस दस्ता है, जिसे खासतौर से नक्सल सफाया अभियान के तहत नक्सल टाइप छापामार हमले की ट्रेनिंग दी गयी है । जून, 2018 में माओवादियों ने आंध्र-ओडिशा सीमा पर 36 ग्रेहाउंड्स पुलिसकर्मियों को नदी पार करते समय मार दिया ।
आक्रामक नीति वास्तव में भ्रामक साबित हो रही है । इसकी समीक्षा के लिए 50 साल कम नहीं होते । मई 2017 में नक्सल आंदोलन की 50वीं सालगिरह उसी नक्सलबाड़ी में मनायी गयी, जहां से 1967 में चारू मजुमदार ने नक्सल आंदोलन की नींव रखी थी । 24-25 मई, 1967 को उस हमले की सूत्रधार शांति मुंडा अभी 74 वर्ष की हैं और उन्हें इस बात का अफसोस है कि जोतदारों का शोषण अभी भी जारी है । वे आज भी जमीन जोतकर खर्च चलाती हैं । व्यवस्था बदलने के लिए चारू मजुमदार ने ‘जमींदारों का सफाया’ वाली नीति अपनायी जो आज दर्जनों नेतृत्व में बिखरी हुई है । उसके बावजूद नक्सलियों का 23 से 28 मार्च तक 10वां राष्ट्रीय जुटान पंजाब के मनसा में हो रहा है । यह सम्मेलन हर पांच साल पर होता है । नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत से बनी भाजपा सरकार ने कांग्रेस सरकारों की सभी नीतियां बदल दी। उसके लिए नीति(नेशनल इंस्टीच्यूशन्स ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) आयोग बनाया । चार साल में नीति आयोग का एक साथ सभी चुनाव कराने को छोड़ बाकी कोई प्रस्ताव स्पष्ट सामने नहीं आया है । प्रधानमंत्री हमेशा उसी का जाप करते हैं, चारू मजुमदार ने भी ‘ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ का माओवादी रास्ता अपनाया । केंद्र सरकार जब दावा करती है कि माओवादी हिंसा में कमी आयी है तो वे बढ़ोतरी का परिचय दे देते हैं । बात सुरक्षा चूक फेंकाफेंकी समीक्षा तक सीमित रह जाती है । नीतियों में चूक के विषय में अभी तक विचार ही नहीं किया गया । यही दिग्भ्रमित हाल माओवादियों का भी है । कम्यूनिस्ट पार्टियों के बिखराव से निकले नक्सलियों को नरेंद्र मोदी की हर नीति फासीवादी लगती है । जबकि 1967 में पश्चिम बंगाल में पहली गैर-कांग्रेसी कम्यूनिस्ट सरकार के गृहमंत्री के रूप में ज्योति बसु ने ही कहर ढाना शुरू किया । फिर 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल में नक्सल आंदोलन को लगभग समाप्त कर दिया । जो कुछ कसर रह गयी, उसे कांग्रेस ने पूरा कर दिया । आक्रामक रवैए के कारण चारू मजुमदार द्वारा अप्रैल 1969 में गठित सीपीआई(एमएल) में गठन के समय ही फूट पड़ गयी ।