छत्तीसगढ़ के नक्सल गढ़ दंतेवाड़ा जिले में नक्सली हमले में शहीद 10 पुलिसकर्मियों के घरों में जब मातम छाया हुआ था, उस समय केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ आकाशवाणी प्रसारणों की 100वीं कड़ी पूरे होने के रंगारंग जश्न में पूरे देश को मजबूत करने में जुटी थी ।
वारदात के रोज 26 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ पुलिस पर हमले की निंदा की । अमित शाह ने नक्सलियों के कायराना हमले पर दुख जताया, छत्तीसगढ़ के कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हर संभव सहायता का आश्वासन दिया । प्रधानमंत्री, गृह मंत्री दोनों ने शहीद जवानों के शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने की खानापूरी निभायी और ‘मन की बात’ आयोजन में शरीक हो गए । प्रधानमंत्री ने कहा कि शहीद जवानों के बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा । लेकिन लगता है, तुरंत भूल गए । भूपेश बघेल 27 अप्रैल को जिस समय शहीद जवानों को अंत्येष्टि में ताबूत को कंधा देकर शामिल हो रहे थे, उस दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ के रंगारंग सेलिब्रिटी समारोह में सारे भाजपाई मंत्री, नेता झूम रहे थे । केंद्रीय मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर इस कार्यक्रम को शानदार और यादगार बनाने के लिए जोर-शोर से जुटे थे । आमिर खान, रवीना टंडन समेत विभिन्न स्टारों और ‘मन की बात’ को प्रधानमंत्री के मनमुताबिक मनोरंजक बनाने में सक्षम हस्तियों के मुंह से प्रशस्ति गान निकल रहा था ।
अन्य राजभवनों की तरह छत्तीसगढ़ राजभवन भी राज्य में शोक की लहर से बेखबर ‘प्रोटोकॉल’ का पालन करते हुए प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ समझने-समझाने में तल्लीन था । यहां तक कि छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता भी इसी अभियान को सफल बनाने में जुटे थे । मन की बात रेडियो प्रसारणों की 100 कड़ियों को बारी-बारी से आकाशवाणी से दुहराया जा रहा था और लोगों को इसे सुनने-सुनाने को प्रेरित किया जा रहा था । कर्नाटक चुनाव प्रचार चरम पर है, जहां भाजपा का सत्ता में बने रहना दांव पर है ।
प्रधानमंत्री समेत सभी केंद्रीय और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता आनेवाले कुछ महीनों में नक्सली हमले में जान गंवानेवाले जवानों के परिवारजनों का दर्द अच्छी तरह भूल जाएंगे । भाजपा संस्कृति के इस भावनाशून्य आनंद सागर में शोकाकुल परिवार को भी भूलकर डूबना पड़ा । अभी मन की बात के बाद आ गया योग दिवस, जो प्रधानमंत्री की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है ।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और प्रधानमंत्री का यह चुनावी तकिया कलाम है कि कांग्रेस की नक्सलियों से मिलीभगत है ।’ नवंबर में छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव होना है ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह दावा सही है कि नक्सली सिमट रहे हैं । मंत्रालय से जारी वक्तव्य के अनुसार माओवादी हिंसा वर्ष 2010 से अब तक 77 प्रतिशत कम हुई है । हिंसा से होनेवाली सुरक्षा बलों और नागरिकों की मौतों की संख्या 2022 में घटकर 98 पर आ गयी, जो 2010 में सबसे ज्यादा 1005 थी, यानि कि 90 प्रतिशत गिरावट आयी है । आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल में नक्सल समस्या लगभग जीरो पर है । सिर्फ छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का गढ़ मजबूत है, जिसे ध्वस्त करने में सुरक्षा बलों को शिकस्त देने और नुकसान पहुंचाने में समर्थ हैं ।
एक तरफ तो केंद्र सरकार नक्सल समस्या पर काबू पाने का श्रेय खुद को देने के लिए सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने और उन्हें अत्याधुनिक हथियार, तकनीक से लैस करने का दावा कर रही है । दूसरी तरफ नक्सल मामले का विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक इस्तेमाल का कोई अवसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाथ से नहीं जाने देते । नक्सल समस्या पर काबू पाने में सुरक्षा बलों के जान की कीमत पर संदिग्ध नक्सली कहकर बेकसूर आम लोगों की बलि देकर काफी हद तक सफलता मिली है । सुरक्षा बलों के नक्सल रोधी अभियान के दौरान मुठभेड़ कई बार फर्जी साबित होते हैं । उसमें सुरक्षा बलों के बचाव में बेकसूरों के आंसू दब जाते हैं । फिर उस पर राजनीति होती है और नक्सलियों के जवाबी हमले में फिर गरीब जवान मारे जाते हैं । बेकसूर नागरिकों के परिवारजनों को नक्सलियों का साथ देने में अपनी सुरक्षा दिखती है । नक्सलियों के चमत्कारिक परिवर्तन के भ्रमजाल से उनके प्रभाव वाले ग्रामीणों और शहरी युवाओं का मोहभंग हो रहा है, जुनून का नशा उतर रहा है । इसलिए बड़ी संख्या में नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं, पुलिस में, सीआरपी में भर्ती हो रहे हैं । लेकिन बात इससे आगे बढ़ नहीं रही है । क्योंकि केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने नक्सल प्रभावित जिलों के लोगों को विश्वास में लेने और राष्ट्रीय सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विकास, सुरक्षा कवच के नीतिगत फैसले करने के बजाए इसे चुनावी राजनीति का मुद्दा बनाया हुआ है । इसलिए पूरी समस्या मुठभेड़, हमले और जवाबी हमले तक सिमटी है । भाजपा से असहमति का मतलब ‘देशद्रोही’ और ‘शहरी नक्सल’ होना है ।
तथ्यपरक घटनाक्रम के आलोक में इस द्विविधात्मक स्थिति का जायजा लेते हैं । दंतेवाड़ा की ताजा वारदात के पीछे-आगे टटोलने से पहले राजनीतिक बयानबाजी का जिक्र जरूरी है । क्योंकि इसका पुलिस के मनोबल पर असर पड़ता है, जिससे जवान नक्सलियों की तरह अलर्ट और मौके की तलाश में रहने जैसी मुस्तैदी नहीं दिखा पाते ।
26 अप्रैल को दंतेवाड़ा जिले में अरनपुर और समोली गांव के बीच यह घटना हुई, जिसमें नक्सलियों ने आईईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) का इस्तेमाल करके राज्य की डिस्ट्रिक्ट रिजर्व पुलिस(डीआरजी) दस्ते को ले जा रहे वाहन को विस्फोट से उड़ा दिया । गाड़ी और ड्राइवर दोनों सिविलियन लिये जाने का मतलब नक्सली समझ गये और जब पुलिस कर्मी अपने अभियान से लौट रहे थे तब विस्फोट हुआ । उसमें उनके सिविलियन ड्राइवर समेत 10 जवान मारे गए । बस्तर रेंज के आई जी सुंदरराज पी. ने कहा कि नक्सल दमन अभियान अंतिम चरण में है और माना कि सुरक्षा बलों के ऑपरेशन में चूक हुई । इस चूक की विस्तृत जानकारी फोरेन्सिक जांच रिपोर्ट में मिलेगी । नक्सल रोधी विशेषज्ञ सुंदरराज ने कहा कि हमें धक्का लगा है, मगर अब और आक्रामक रवैया अपनाएंगे । आई जी ने कहा कि हम पता लगाएंगे कि कहां चूक हुई, जिसका नक्सलियों ने फायदा उठाया ।’ ऐसा बयान वे प्रायः नक्सल हमले के बाद देते हैं । छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी दावा किया कि नक्सल किला अब ध्वस्त होने के कगार पर है ।
2 साल के अंतराल के बाद यह सबसे बड़ा नक्सली हमला है । 2021 के अप्रैल महीने में ही बीजापुर के टेकालगुडियम गांव के निकट नक्सल रोधी अभियान में शामिल लगभग 1,000 जवानों को चार दिशाओं से 300-400 माओवादियों ने घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग करके 22 जवानों को मार दिया, कम-से-कम 35 को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया ।
इस अभियान में केंद्रीय सुरक्षा बलों का एलीट दस्ता कोबरा, सीआरपी और डीआरजी सब साथ शामिल थे । नक्सली उनके हथियार, गोलाबारूद लूटने के साथ-साथ एक कोबरा जवान को भी अपने साथ ले गए । उस समय की चूक से अगर चेते होते तो अभी की दुखद घटना टल सकती थी । सुरक्षा बलों को मालूम है कि नक्सली मौसम और सुरक्षा बलों की तैयारी के हिसाब से अब टैक्टिकल हमले को अंजाम देते हैं । बरसात शुरू होने से पहले मार्च से मई तक नक्सली ऐसे हमले को अंजाम देते हैं, जिसका काट सुरक्षा बलों के पास नहीं होता । क्योंकि बरसात में आदिवासी बहुल नक्सल इलाकों का रास्ता दुर्गम हो जाता है । आई जी सुंदरराज के अनुसार अभियान से पहले जांच कर ली जाती है कि कहीं सड़क के नीचे आईईडी तो रखी नहीं है, जो सुरंग बनाकर फिट की जाती है । जांच दल को सुरंग का पता नहीं चला और सड़क से पुलिस गाड़ी गुजरते ही उड़ गयी ।
मारे गए डीआरजी जवानों में ज्यादा वे युवक थे, जिन्होंने नक्सलियों का साथ छोड़कर आत्मसमर्पण किया था और जान बचाने के लिए पुलिस में भर्ती हुए थे । यह अभियान छत्तीसगढ़ में 2008 में शुरू किया गया, जब वहां भाजपा की सरकार थी और रमन सिंह मुख्यमंत्री थे । उन्होंने ही नक्सल प्रभावित इलाकों में युवकों को हथियार और पुलिस ट्रेनिंग देकर सरकारी नक्सली बनाया । ऐसे युवकों को सरकारी संरक्षण में नक्सल इलाके में नक्सल टोली ‘सलवा जुडूम’ अभियान में लगाया गया । हत्या, लूट, आगजनी से पैदा हुई अराजक स्थिति पर बवेला मचा । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार के साथ इस पर 2008 में ही तुरंत रोक लगायी ।
अभी जनवरी, 2023 में बस्तर जिले में सीआरपी ने बस्तरिया बटालियन तैयार किया है, इसमें स्थानीय 400 आदिवासी युवकों को लिया गया है, जो गांव की भाषा जानते हैं और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान में सक्षम होंगे । केंद्र की पिछली भाजपा सरकार में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सीआरपी की बस्तर में महिला यूनिट को हरी झंडी दी । आई. जी. सुंदरराज का कहना है कि हर साल 400 नक्सली आत्मसमर्पण करते हैं, जिनका पुनर्वास किया जाता है ।
यहां तक तो ठीक है । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के समय यह प्रचार शुरू किया कि कांग्रेस की नक्सलियों से ‘मिलीभगत’ है । उस वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इसे दुहराया । फरवरी, 2022 में संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताकर कहा कि यह पार्टी नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है । नक्सल प्रभावित और इस काबू पानेवाले किसी भी राज्य में भाजपा या गठजोड़ की सरकार नहीं है । जो गुजरात कभी नक्सल प्रभावित रहा ही नहीं, वहां भी सितंबर, 2022 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को निशाना बनाकर मतदाताओं से कहा: ‘नक्सली भेष बदलकर घूम रहे हैं’ ।
2013 में छत्तीसगढ़ में भाजपा शासनकाल की दो घटना याद रखने लायक है । सुकमा जिले के झीरम घाटी में मई में हुए नक्सली हमले में मारे गए 27 लोगों में कांग्रेस के सारे टॉप नेता शामिल थे । हमलावर कौन थे? सरकार ने नक्सली हाथ होने से इन्कार किया । उसके हफ्ते भर पहले 17.05.2013 को 1,000 सीआरपी जवानों ने जिस कथित ‘मुठभेड़’ में 4 बच्चे समेत 8 लोगों को मार दिया, वो न्यायिक जांच रिपोर्ट में फर्जी साबित हुई । जांच रिपोर्ट के अनुसार निहत्थे एडेसमेटा गांव के 25-30 लोग फसल पूजा के लिये जुटे थे ।