नक्सलियों के सबसे पुराने गढ़ आंध्र प्रदेश के विशाखापतनम जिले में नक्सलियों ने सत्तारूढ़ तेलुगू देसम पार्टी के विधायक और पूर्व विधायक की गोली मारकर हत्या कर दी । आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री तेलुगू देसम पार्टी(टीडीपी) सुप्रीमो चन्द्रबाबू नायडू को छोड़ किसी ने भी इस घटना की निंदा नहीं की । नक्सल समस्या अर्थात् वामपंथ उग्रवाद(एलडब्ल्यूई) को चुनौती मानकर उसे सिमटने की नौबत लाने के लिए आए दिन वक्तव्य जारी करनेवाले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस हमले को नोटिस नहीं लिया । केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू गृह सचिव राजीव गौवा समेत गृह मंत्रालय से संबद्ध किसी भी बड़े अधिकारी ने इसे टिप्पणी करने लायक नक्सली हमला नहीं माना । घटना के अगले दिन 24 सितंबर को लखनऊ में नक्सल प्रभावित पुरबिया राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश की क्षेत्रीय परिषद की बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री ने कश्मीर उग्रवाद का जिक्र किया । जबकि यह क्षेत्रीय परिषद मुख्य रूप से नक्सलियों से संबंधित खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए गठित की गयी है ।

इसके बाहरी कारणों का अंदाजा तो लग जाता है । पहला तो ये कि नक्सल हमले में किसी सीआरपी, पुलिस सुरक्षाकर्मी की जान नहीं गयी । दूसरा कारण यह था कि ऐसे किसी नागरिक की जान नहीं गयी, जिसे नक्सली संदिग्ध पुलिस मुखबिर बताकर मार देते हैं। इस हमले में नक्सलियों ने अस्पताल या सड़क निर्माण कार्य में लगे ठीकेदारों और उनकी सुरक्षा के लिए तैनात सीआरपी जवानों को निशाना नहीं बनाया । आम तौर पर ऐसे ही हमलों को केंद्र सरकार नोटिस लेती है । गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं नक्सलियों को विकास के दुश्मन, गरीब के दुश्मन और आंतरिक सुरक्षा के लिए कठिन चुनौती बताते हैं ।

आंध्र प्रदेश का विशाखापतनम जिला नक्सलियों का पुराना गढ़ रहा है, जो सरकार की सुरक्षा नीतियों के कारण कमजोर पड़ा है । लेकिन जिन कारणों से नक्सलवाद यहां फला-फूला वो आज भी मौजूद है । फिर इसके अंदर अपने मतलब के राजनीतिक पूर्वाग्रह समा गए । इसलिए कोई नक्सली हमला कानून और व्यवस्था के लिए खतरा है या नहीं, उसमें अंदरूनी बात हो गयी सियासी राजनीति ।

विशाखापतनम जिले की अराकू सीट से विधायक किदारी सर्वेश्वर राव सत्तारूढ़ तेलुगू देसम पार्टी के थे, जिनकी हत्या हुई । सर्वेश्वर राव ने वाईएसआर कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में टीडीपी उम्मीदवार सिवेरी सोमा को हराया था । फिर 2016 में सर्वेश्वर राव टीडीपी में शामिल हो गए । दोनों आदिवासी नेता इकट्ठे अराकू पहुंचे हुए थे । हमले में सर्वेश्वर राव और सिवेरी सोमा दोनों मारे गए । नक्सलियों ने न तो घात लगाकर हमला किया, न ही बारूदी सुरंग(लैंडमाईन) विस्फोट में विधायक की गाड़ी उड़ायी गयी । पुलिस रिपोर्ट के अनुसार नक्सली 50-60 की संख्या में थे और विधायक से उनकी लगभग एक घंटे तक बहस चली । उसके बाद वर्तमान विधायक और पूर्व विधायक की गोली मारकर हत्या कर दी गयी । पुलिस का कहना है कि नक्सलियों को विधायक के आने की पूर्व सूचना थी, लेकिन पुलिस को विधायक ने अपने दौरे की पूर्व सूचना नहीं दी थी । यह आदिवासी बहुल आबादी वाला इलाका है, जहां नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) सक्रिय है। ये नक्सली अराकू में 21 से 27 सितंबर तक अपने गुट का गठन सप्ताह मनाने और सरकार को यह बताने जुटे थे कि उनका वजूद खत्म नहीं हुआ है । अराकू आंध्र-ओडिशा सीमा पर स्थित है । यहीं पर 2004 में तीन नक्सली गुटों -पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी(पीजीए), एमसीसीआई(माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया) और पी. डब्ल्यूजी(पीपुल्स वार ग्रुप) के विलय के बाद एकीकृत मजबूत संगठन सीपीआई(माओवादी) बना । मुप्पना लक्ष्मण राव उर्फ गणपति सर्वसम्मति से महासचिव चुने गए । आंध्र प्रदेश से अलग होकर 2014 में बने तेलंगाना समेत नक्सल हमले से जूझ रहे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा के आदिवासी इलाकों का आतंक माना जाता है -सीपीआई(माओवादी) । हैदराबाद से प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक सीपीआई(माओवादी) गठन सप्ताह को लेकर पुलिस ‘अलर्ट’ थी । हत्या से गुस्साए विधायक के समर्थकों ने दो पुलिस थानों में आग लगा दी, जिनमें नक्सली वारदात से संबंधित कई कागजात रखे थे ।

टीडीपी विधायक सर्वेश्वर राव विकास कार्य की नहीं, अपने खनन कारोबार देखने और मुख्यमंत्री की चुनावी योजना ‘ग्राम दर्शिनी’ की समीक्षा करने गए थे । खनिज संपदा से परिपूर्ण अराकू में बॉक्साईट का भंडार है और विधायक यहां खनन व्यवसाय का ठेका अपने साले के नाम पर चलाते हैं । इस अवैध खनन में कई आदिवासियों के घर उजाड़ दिए गए हैं और उनकी जमीन हड़प ली गयी है ।

नक्सलियों के साथ आसपास के आदिवासियों ने विधायक को साईट पर जाने से रोका और उस पर कहा-सुनी बढ़ गयी । विधायक और पूर्व विधायक घटनास्थल पर ही मारे गए । मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने अमेरिका से घटना की निंदा की। लेकिन उनके किसी समर्थक पार्टी ने इस पर ध्यान नहीं दिया । केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा गठजोड़ से टीडीपी अलग हो चुकी है । 35 वर्ष पहले कांग्रेस विरोध से उपजी टीडीपी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस से चुनावी गठजोड़ की कोशिश में है । 2003 में तिरूमला में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू पर जब नक्सली हमला हुआ था, उस वक्त में केंद्र में भाजपा गठजोड़ के साथ थे । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवानी दोनों ने ही उस हमले की निंदा की थी । अभी अपनी पार्टी विधायक की हत्या पर नायडू ने कहा कि ‘लोकतंत्र में भरोसा रखनेवाले सबों को इस घटना की निंदा करनी चाहिए’ पर किसी ने नोटिस नहीं लिया ।

हैदराबाद से जो रिपोर्ट मिले हैं, उससे अराकू माओवादी हमले के अन्य राजनीतिक पहलू भी सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश गिरिजना संघम सचिव पी. अप्पालानारासा ने एक बयान जारी करके कहा है कि इसका तार महाराष्ट्र की पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से जुड़ा है । उनकी रिहाई का मामला सुप्रीम कोर्ट में है । इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ‘शहरी नक्सली’ बताकर ‘देशद्रोह’ के कथित जुर्म में गिरफ्तार किया हुआ है । गिरफ्तार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में नक्सल विद्रोही कवि वारावारा राव भी हैं, जिन्हें महाराष्ट्र पुलिस ने हैदराबाद पुलिस की मदद से हैदराबाद स्थित उसके आवास से 28 अगस्त को गिरफ्तार किया । कवि, लेखक वारावारा राव के अलावे अन्य कार्यकर्ताओं में प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर समेत अन्य हैं - गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वर्नोन गोन्साल्विस । सरकारी वकील ने पुणे कोर्ट में उन्हें प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) गुट का ‘सक्रिय सदस्य’ बताया । महाराष्ट्र पुलिस ने नक्सलियों के पास से ऐसे पत्र मिलने का भी दावा किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के लिए ‘राजीव गांधी टाईप’ साजिश का पता चला । सुप्रीम कोर्ट को इस नक्सलियों के खिलाफ जुटाए गए सबूतों की जांच करनी है । प्रथम दृष्टया तो सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली सुनवाई पीठ ने 29 अगस्त को ही इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राजनीतिक विरोध को ‘सुरक्षा कवच’ बताते हुए कहा - अगर रोका गया तो प्रेशर से कूकर वर्स्ट कर जाएगा ।’ विधि आयोग के अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. एस. चौहान ने जाते-जाते अपनी रिपोर्ट में कहा - ‘किसी समस्या का हल नहीं निकाल पाने की झुंझलाहट में ‘आलोचकों को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता ।

नक्सल आंदोलन गांव-देहात में रहनेवाले दलित-आदिवासियों के बीच से उपजा है, जो आज भी वहीं रहना पसंद करते हैं । इसलिए नक्सल उन्हीं के बीच सक्रिय हैं । देहाती नक्सलियों को देश के और विकास के दुश्मन बताकर उन पर काबू पाने में सरकार कहां तक सफल हुई है, यह तो अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है । नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर 90 पर आने के गृह मंत्रालय के दावे के बीच ही ‘शहरी नक्सली’ पैदा हो गए और सरकार ने उन्हें देशद्रोही के जुर्म में अनुच्छेद 124 । के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया ।

आंध्र प्रदेश की नक्सल समस्या और राजनीति अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों से जरा अलग है । अक्टूबर, 2016 में आंध्र-ओडिशा सीमा पर 27 नक्सलियों के मारे जाने के बाद से आंध्र प्रदेश सरकार बार-बार नक्सल समस्या समाप्त होने का दावा कर रही थी । नक्सलियों ने इस हमले से अपनी मौजूदगी का सबूत दिया है । 2004 में सीपीआई(माओवादी) के गठन के बाद ही तत्कालीन आंध्र प्रदेश सरकार ने नक्सलियों से सीधी वार्ता की पहल की । उसके पहले 1989-90 में टीडीपी संस्थापक मुख्यमंत्री एन. टी. रामा राव और कांग्रेस मुख्यमंत्री चेन्ना रेड्डी ने नरमी बरती । उसी चेन्ना रेड्डी ने 1978 में केंद्र की जनता पार्टी शासनकाल में नक्सलियों की आम रिहाई नीति के तहत विशाखापतनम जेल में बंद कामरेड कानू सान्याल के साथ रियायत की । पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु का आग्रह ठुकरा दिया । 2005 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने सलवा जुडूम नामक सरकार पोषित नक्सली संगठन बनाया । 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा हथियार देकर लोगों को हिंसा की काट में हिंसक बनाने की नीति पर रोक लगा दी । सरकार भाजपा की थी । 2013 में महेन्द्र कर्मा नक्सली हिंसा के शिकार हुए । छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा जुडूम छोड़ा नहीं । केंद्र के निर्देश पर एक नए टाईप का सलवा जुडूम मई, 2018 में बनाया । नक्सल गढ़ बस्तर में महिलाओं को हथियार और सीआरपी ट्रेनिंग देकर ‘बस्तरिया बटालियन’ बनायी गयी । उन्हें अपने ही इलाकों में नक्सलियों के खिलाफ तैनात किया गया । गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने स्वयं इस बटालियन को हरी झंडी दिखायी ।