‘अरे सुनती हो, मैंने गांव के बाहर भीमा और गोपा को बंदूकें लटकाए इधर आते देखा है । दोनों मैदान में खेलते बच्चों से कुछ बातें कर रहे थे । अपना बबुआ भी वहीं खेल रहा है । हाल ही में ये नक्सली कुछ बच्चों को उठा ले गए थे’ । केंद्रीय गृह मंत्रालय(एमएचए) प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारण की शुरूआत इन्हीं पंक्तियों से होती है । आकाशवाणी एफ एम रेडियो के विविध भारती, रेनबो, गोल्ड, इन्द्रप्रस्थ समेत सभी चैनल सुननेवाले हर घंटे ये कार्यक्रम सुनते हैं । इन्द्रप्रस्थ ए एम रेडियो चैनल है और गोल्ड एफ एम का । इसकी आवाज राजधानी दिल्ली और आसपास ही सुनाई देती है ।

अब याद कीजिए कि इन प्रसारणों में नक्सल प्रभावित किसी गांव के एक परिवार में आगे क्या होता है । शाम को खेत से लौटकर किसान पति जब अपनी घरवाली को यह सूचना दे रहे हैं, उसी समय भीमा और गोपा उनके घर में प्रवेश करते हैं । दोनों की उस परिवार से बातचीत की रिकॉर्डिंग इस प्रकार है. ‘क्या भाभी चाय नहीं पिलाइएगा । आज रात में हम आप ही के यहां रहेंगे । मुर्गा बनाइएगा । और इ बबुआ को गोद में कब तक खिलाइगा? इसको जरा बाहर खेलने घूमने दीजिए’ । उसके बाद बबुआ की मां वात्सल्य देख दोनों बंदूकधारी नक्सली अपना फरमान सुनाते हैं. ‘देखिए भाभी साफ-साफ बता देते हैं कि हम आपके बच्चे को ले जाने आए हैं । हमारे कमांडर का हुक्म है और उसका पालन होना है । संगठन में काडर कम हो गए हैं ।’ मां कलपती है. ‘कितनी बार तुमलोगों को खाना खिलाया । पुलिस से छिपने के लिए अपने घर में रखा । क्या इसी दिन के लिए कि तुमलोग हमारे ही बच्चे को उठा ले जाओ’ । बबुआ के पिता की आवाज. ‘अभी इसके पढ़ने-लिखने की उम्र है । 14 साल का भी नहीं हुआ है । इसे नक्सली बनाने ले जाना चाहते हो, तुमलोग क्या कर रहे हो, समझ रहे हो?’ उसके बाद गोपा भीमा कहते हैं. ‘ऐसे रोने-धोने से संगठन कैसे चलेगा? समाज में बदलाव क्रांति कैसे आएगी?’ फिर दोनों नक्सली की आवाज. ‘अच्छा भाभी आप खाना बनाइए, हमलोग देखते हैं क्या होता है । फिर दोनों की बातचीत. ‘दूसरे को उदास देख एक कहता है. क्या हुआ भीमा, अचानक मां की याद आ गयी यार । इसी उमर में नक्सली मुझे उठा ले गए थे । मां रोती रह गयी । मुझे बिना खिलाए खाना नहीं खाती थी, मुझे अपने साथ सुलाती थी ।’ सुबह दोनों किसान दंपती से कहते हैं. ‘ठीक है हम बाबू को नहीं ले जाएंगे’ लेकिन यह बात किसी को मालूम नहीं होनी चाहिए’ ।

इस प्रकार के कई प्रसारण आकाशवाणी चैनलों से दिन-रात सुनाए जा रहे विकास योजनाओं और उनके कार्यान्वयन में पुलिस तथा सीआरपी समेत अन्य अर्द्धसैनिक बलों की भूमिका का भी प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । नक्सल-माओवादी मामलों से जुड़े सभी पहलुओं को शामिल किया गया है । छोटे-छोटे एपिसोड में प्रसारण जारी है । इनमें ग्रामीण परिदृश्य को सूत्रधार बनाकर नक्सली चाचा द्वारा गांव के गरीब बच्चों को मिठाई खिलाकर पैसे देकर बंदूक दिखाकर अपने संगठन में शामिल करने का प्रलोभन और उसके खिलाफ मां का आक्रोश भी सुनाया जाता है । नक्सली के प्रभाव में न आकर गांव की एक बेटी के डॉक्टर बनने और सड़क के अभाव में समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण दर्द से छटपटाकर प्रसूता की मौत का भी कहानी मार्मिक स्वर में सुनायी देती है ।

केंद्रीय गृह मंत्रालय प्रायोजित इन प्रसारणों को बार-बार दुहराए जाने का गांववालों पर असर हो रहा है । जिनकी ज्यादा आबादी रेडियो सुबह-शाम सुनती है । ये कार्यक्रम नक्सल प्रभावित जिलों में आक्रामक रवैए और विकास योजनाओं के अलावे है । नक्सली सिमट रहे हैं और उनके संगठनों में नए काडरों की भर्ती कम होती जा रही है । यह सिर्फ सरकारी प्रचार-प्रसार का आंकड़ा नहीं है । नक्सली कमजोर पड़ रहे हैं और उनका बदलाव/क्रांति लाने का सपना टूट रहा है, यह बात सही है ।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की 25वीं बैठक में गत 17 दिसंबर को कोलकाता में कहा कि वाम उग्रवाद(एलडब्ल्यूई) पूर्वी क्षेत्र में अब लगभग जड़ से उखड़ रहा है और ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए कि ये पुनः उभर नहीं पाए और ये राज्य देश के अन्य हिस्सों के साथ प्रगति करें । इस बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) समेत नक्सल प्रभावित राज्य झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और ओडिशा की ओर से यहां के मंत्री प्रदीप आमा मौजूद थे ।

इस बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के अलावे राज्यों के गृह विभाग के भी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे । सबसे खास बात ये देखने को मिली कि एक-दूसरे के धुर विरोधी अमित शाह और दीदी ने 15 मिनट तक गुफ्तगू की । पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक नबन्ना सभागार में आयोजित की गयी थी, जहां दीदी का मुख्यमंत्री सचिवालय है । केंद्रीय गृह मंत्री ने बंगाल की मुख्यमंत्री के कार्यालय में गुफ्तगू की । दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने इसे ‘शिष्टाचार’ मुलाकात बताया । लेकिन इन दोनों के विरोधी कांग्रेस और सीपीएम ने इसकी निंदा की । दीदी और अमित शाह ने अपनी गुफ्तगू का विवरण देने से इन्कार कर दिया ।

पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक इस क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाले राज्यों में होती है और मुख्य रूप से नक्सल समस्या से निबटने के लिए इसका गठन हुआ है । इसलिए हर बैठक में इसी समस्या पर चर्चा केंद्रित होती है और दलगत राजनीति से परे इसमें समन्वय देखा गया है । नक्सलियों के सिमटने का यह एक प्रमुख कारण माना जा सकता है । क्योंकि नक्सली अपने हमले को अंजाम देने में आपसी समन्वय के कारण सफल होते हैं । छोटे-छोटे गुटों में बंटकर नक्सली सुरक्षा बलों को घेरकर हमले करते हैं । टीम के साथ धरपकड़ अभियान चलानेवाले जवानों को जान गंवाकर ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है ।

वर्ष 2022 की समाप्ति ऐसी ही एक बड़ी वारदात की याद दिला गयी, जो नक्सलियों के मजबूत गढ़ छत्तीसगढ़ की है । छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के टेकालगुडियाम गांव में 3 अप्रैल, 2021 को नक्सल मुठभेड़ अभियान में 22 पुलिसकर्मी मारे गए । 300-400 की संख्या में नक्सलियों ने 1000 सुरक्षाबलों को घेर लिया । बीजापुर में 10 टीमों में बंटे होने के बावजूद सुरक्षाकर्मी एक-दूसरे की मदद के लिए ज्यादा दूर-दूर तक फैले हुए नहीं थे । नक्सलियों ने हर तरफ से गोलीबारी की, जिसमें गंभीर रूप से घायल जवानों की संख्या भी 35 थी । सीपीआई(माओवादी) गुट से जुड़े इन नक्सलियों ने अपने हथियारों के साथ और सुरक्षाबलों के भी हथियार लूटकर भाग गए ।

गत 22.12.2022 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) ने सीपीआई(माओवादी) गुट के 23 काडरों के खिलाफ चार्जशीट दायर किया है, जो कथित रूप से उस जानलेवा हमले में शामिल थे । उस वारदात के बारे में एक और जानकारी सामने आयी कि नक्सलियों की तैयारी का सामना करने के लिए सीआरपी, छत्तीसगढ़ पुलिसए जिला रिजर्व गार्ड(डीआरजी) और सीआरपी के एलीट नक्सल रोधी दस्ता कोबरा ने मिलकर मोर्चाबंदी की थी । मगर राज्य पुलिस के साथ समन्वय नहीं था, जिसका फायदा नक्सलियों ने उठाया ।

23.12.2022 को रायपुर से ही समन्वय की एक रिपोर्ट मिलने से पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक की तरह ही नक्सल अभियान के लिहाज से 2023 अनुकूल वर्ष कहा जा सकता है । बीजापुर जिले के महाराष्ट्र से लगी सीमा के निकट जंगल में मुठभेड़ में एक महिला समेत दो नक्सली मारे गए । छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र पुलिस के संयुक्त नक्सल रोधी अभियान के तहत इस मुठभेड़ को अंजाम दिया गया । इस टीम में महाराष्ट्र के नक्सली गढ़ जिला गढ़चिरोली में तैनात 300 कमांडो और छत्तीसगढ़ के डी आर जी कमांडो शामिल थे । बिलासपुर के एसपी अंजनेया वार्ष्णेय के अनुसार मारी गयी नक्सली महिला इनामी हार्डकोर माओवादी तेलंगाना की स्टेट कमिटी सचिव मीलाटापू अदेलू उर्फ भास्कर की पत्नी थी । यह पहला अवसर है, जब गढ़चिरोली(महाराष्ट्र) पुलिस ने बीजापुर(छत्तीसगढ़) पुलिस के साथ मिलकर घने जंगल में अभियान चलाया ।

गत दिसंबर में ही संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के जवाब में राज्यसभा में बताया कि 2009 और 2021 के बीच नक्सली हिंसा में 77% कमी आयी है । उन्होंने ज्यादा प्रभावित झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की खास तौर से जिक्र किया ।

अब संसद का बजट सत्र 31 जनवरी से शुरू होनेवाला है, जो लंबा चलेगा । फिर नक्सली हिंसा पर सवाल उठेंगे, सरकार के पास हिंसा का आंकड़ा और कम होगा, ऐसी उम्मीद लग रही है । ज्यादा नक्सल प्रभावित तीसरे राज्य बिहार में भी नक्सलियों के सिमटने की रिपोर्ट है ।

यहां तक तो ठीक है । लेकिन इतना सब होने के बावजूद सरकार का रवैया बदलना जरूरी है । नक्सल समस्या को चुनावी राजनीति का मुद्दा न बनाया जाए । नक्सल नेताओं को विश्वास में लाने के लिए उनसे बातचीत करके उन्हें मुख्यधारा में लिया जाए जैसे उत्तर पूर्व के विद्रोही गुटों के साथ किया गया है । पूर्वोत्तर नीति का जो लाभ मिला है वही शांति नीति नक्सलियों के साथ भी अपनायी जाए । विनाश और विकास के इतर भाईचारा का भी रास्ता निकले ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी शीर्ष भाजपा नेता कांग्रेस से अपने मतभेद का इजहार कांग्रेस की नक्सलियों से मिलीभगत का आरोप लगाकर करते हैं ।

2022 में संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताया और जोर देकर कहा कि यह पार्टी नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है ।

गत सितंबर(2022) में गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को निशाना बनाते हुए ‘शहरी नक्सलियों’ को विकास योजनाओं का दुश्मन बताया ।

2018 में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी प्रधानमंत्री, तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह और उस वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर नक्सलियों से ‘सांठगांठ’ आरोप का प्रचार किया ।

अब संसद को बजट सत्र आनेवाला है और छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश का चुनाव भी इसी वर्ष है । देखते हैं, प्रधानमंत्री क्या बोलते हैं । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जिन दो नक्सल प्रभावित राज्यों(ओडिशा, झारखंड) से आती हैं, वहां गैर-भाजपा सरकार है ।

महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा की जिस घटना के कारण एक जनवरी, 2018 से ‘शहरी नक्सली’ सुर्खियों में आया, वहां इस वर्ष उसी जगह उसी आयोजन के दौरान शांति रही । ऐतिहासिक कोरेगांव भीमा युद्ध की 205वीं वर्षगांठ पुणे के पर्मे गांव में जयस्तंभ के पास एक जनवरी, 2023 को शांतिपूर्वक मनायी गयी । इसके लिए 5000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे और कई मंत्री वहां मौजूद थे ।

01.01.2018 को उसी जगह आयोजन/सभा में कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कई बुद्धिजीवी अभी तक जेल की चक्की में पिस रहे हैं । उनमें वकील, प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, जो सीपीआई(माओवादी) से कथित संपर्क होने के आरोप में जेल में बंद हैं । कइयों की जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट तक गयी हैं और सुप्रीम कोर्ट स्वास्थ्य के आधार पर भी आश्वस्त नहीं हो पा रही है कि इन्हें जेल से बाहर होने दिया जाए अथवा नहीं । हमारे समाज में एक चलन है बुद्धिजीवी कहलाने के लिए मार्क्सवादी(माओवादी) बनने का ।