केरल की घटना अन्य नक्सल मुठभेड़ों से इस मायने में अलग है और एक नया सवाल खड़े करने वाला है, क्योंकि वहां वाममोर्चा सरकार है । सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा(एलडीएफ) के दूसरे सबसे बड़े घटक सीपीआई(भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी) ने ही इस मुठभेड़ की असलियत पर सवाल उठा दिया । ‘बिग ब्रदर’ सीपीएम (माक्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन को विधान सभा में इस संबंध में दिए गए वक्तव्य पर छोटे भाई सीपीआई ने ही कड़ा एतराज किया । मुख्यमंत्री ने पुलिस का बचाव करते हुए केरल विधान सभा को बताया कि पुलिस ने माओवादी मुठभेड़ में आत्मरक्षा में गोली चलायी । इस पर विपक्षी कांग्रेस से ज्यादा सरकार की सहयोगी सीपीआई भड़क उठी । सीपीआई राज्य सचिव कणम राजेबुन ने मुख्यमंत्री के बयान पर कड़ा एतराज जताते हुए इस मुठभेड़ को फर्जी बताया और न्यायिक जांच की मांग कर डाली । कांग्रेस नेता चेन्नीथला ने भी उसका समर्थन किया ।

घटनाक्रम कुछ इस प्रकार सिलसिलेबार है कि सरकार के लिए अपने ही अतीत और वर्तमान को संभालना कठिन हो रहा है । गौरतलब है कि माओवादी उग्रवाद कम्यूनिस्ट आंदोलन से ही 1960 के दशक में उपजा है । केरल के नक्सल गढ़ पलाक्काड जिले में 28 अक्टूबर को तीन माओवादियों के मारे जाने की सूचना जिले के एसपी शिव विक्रम ने दी । एसपी के अनुसार नक्सल विरोधी थंडरबोल्ट कमांडो की टीम नक्सल रोधी अभियान में थे । माओवादियों के एक गिरोह ने पुलिस टीम को देखते ही फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें तीन नक्सली घटनास्थल पर ही मारे गए । पलाक्काड एसपी ने बताया कि नक्सल पांच से ज्यादा ही रहे होंगे, इसलिए लगता है, कुछ घायल भी हुए । फिर 29 अक्टूबर को पलाक्काड जिले के ही अट्टापड्डी जंगल में पुलिस ने एक और हार्डकोर नक्सली मणिवासाकम को भी मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया । नक्सलियों ने लाश ढूंढ रहे दस्ते पर गोली चलायी । पुलिस के अनुसार चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए थ्रिसूर भेज दी गयी । दोनों ही मुठभेड़ों को सीपीआई, कांग्रेस और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने फर्जी बताया । प्रदर्शन, विरोध, आंदोलन लगातार जारी है । 30 अक्टूबर को मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने विधान सभा में मुठभेड़ को सही बताते हुए कहा कि पुलिस ने बचाव में गोली चलायी । लेकिन उनके सहयोगी इससे सहमत नहीं हैं और न्यायिक जांच की मांग पर कायम हैं । कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया है और वे दोबारा पोस्टमार्टम की मांग कर रहे हैं । सीपीआई, कांग्रेस उनका समर्थन कर रही है । 2 नवंबर को एक और ऐसी घटना हुई, जिसने सरकार का नेतृत्व कर रही सीपीएम को पसोपेस में डाल दिया । पुलिस ने दो सीपीएम एक्टिविस्ट को कथित रूप से माओवादी पर्चे रखने और बांटने के कारण गैरकानूनी गतिविधियां(रोक) एक्ट(यूएपीए) के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया । सीपीएम ने गृह विभाग से इस कार्रवाई पर पुनर्विचार करने कहा है, जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री मुश्किल में हैं । सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य और मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन के ही अधीन गृह विभाग है । पुलिस इस बात पर अड़ी है कि दोनों एक्टिविस्टों पर लगे आरोप हटाए नहीं जा सकते । उत्तरी प्रक्षेत्र के आईजी अशोक यादव ने दोनों सीपीएम कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगे आरोपों की जांच की और कहा कि दोनों के खिलाफ लगी यूएपीए की धाराएं 20, 38 और 39 सही हैं । क्योंकि दोनों के खिलाफ सबूत हैं । पुलिस के अनुसार दोनों के पास से काफी प्रतिबंधित माओवादी कागजात मिले हैं । लेकिन सीपीआई फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच पर अड़ी है और अपनी टीम भी घटनास्थल पर भेजी है । एक ओर तो मुख्यमंत्री मुठभेड़ में पुलिस का बचाव कर रहे हैं और दूसरी ओर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को पुलिस से बचाना कठिन हो रहा है । केरल हाईकोर्ट का 2015 का आदेश दोनों पर लागू होता है, जिसमें जस्टिस मुहम्मद मुश्ताक ने कहा कि माओवादी होना कोई अपराध नहीं है । सीपीआई नेता कनक राजेन्द्र ने मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए पलाक्काड मुठभेड़ को यह कहकर फर्जी बताया कि नक्सल निरोध दस्ते थंडरबोल्ट ने 28 अक्टूबर को उस समय माओवादियों पर गोली चला दी, जब वे अपने तंबू में खाना खा रहे थे । वरिष्ठ माओवादी मणिवासाकम शरीर से इतने लाचार थे कि चल-फिर भी नहीं सकते थे, जिन्हें पुलिस ने अगले दिन मुठभेड़ बताकर मार दिया । सीपीआई राज्य सचिव ने संवाददाताओं को बताया कि यह कैसी मुठभेड़ थी, जिसमें एक भी पुलिसकर्मी हताहत नहीं हुआ, हमारे पास पक्की सूचना है कि यह मुठभेड़ फर्जी थी ।

विपक्षी कांग्रेस ने इसे ज्यादा तूल नहीं दिया । भाजपा ने ऐसा रूख अपनाया मानो कुछ हुआ ही न हो । दोनों ही दलों ने साबरीमाला मंदिर वाला राजनीतिक मुद्दा उठा दिया । 17 नवंबर से शुरू होनेवाले मंडला-मकाशविलक्कू पर्व की तरफ रूख कर दिया । चार नवंबर को फिर से विधान सभा में मुख्यमंत्री ने संदिग्ध माओवादी मुठभेड़ का बचाव किया और साथ में अपनी पार्टी के दो कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का भी उन्हें बचाव करना पड़ा । लेकिन ज्यादा सफाई मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन को साबरीमाला मंदिर पर देनी पड़ी, जिसे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही मुद्दा बनाया । उसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस ने उठाया । मुख्यमंत्री ने चार नवंबर को विधान सभा में प्रश्नकाल में फिर से सफाई दी कि वे साबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिला के प्रवेश की अनुमति देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कायम हैं और इसकी काट में कोई बिल लाने के पक्ष में नहीं हैं ।

इसी दौरान केरल के पूर्व कानून सचिव और यूएपीए मामलों की समीक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष बी. जी. हरीन्द्रनाथ के एक वक्तव्य ने वाममोर्चा सरकार को नयी फांस में डाल दिया । हरीन्द्रनाथ ने कहा कि -प्रायः धार्मिक कट्टरपंथी माओवादी का लबादा ओढ़कर अपना धक्का चलाते रहते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि केरल में धार्मिक कट्टरपंथियों और माओवादियों का लिंक है । चूंकि यहां मजबूत वामपंथ है, इसलिए राज्य में माओवादियों के प्रति लोगों की सहानुभूति और सम्मान है । इसका फायदा धार्मिक कट्टरपंथी माओवादी बनकर उठाते हैं ।

पूरी प्रक्रिया पर केंद्र सरकार चुप है । नक्सल मुठभेड़ के फर्जी मामलों में यह नया इजाफा है केरल, जहां यदा-कदा ही ऐसा मामला आता है। केरल पुराने नक्सल प्रभावित राज्यों में आता है ।

आंध्र प्रदेश-ओडिशा सीमा के निकट वहां के नक्सल रोधी दस्ते ग्रेहाउंड्स ने पांच माओवादियों के मुठभेड़ में मारे जाने का दावा उस दौरान किया, जब सीपीआई(माओवादी) 21 से 28 सितंबर के बीच क्रांतिकारी सप्ताह मना रहे थे । एक भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ । उसके पहले छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सीमा पर अगस्त में वैसी दुर्गम जगह पुलिस ने सात नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया, जहां बरसात में पहुंचना कठिन है ।

केरल की घटना से गैर कानूनी गतिविधियां(रोक) कानून(यूएपीए) का इस्तेमाल भी कटघरे में है । केरल हाईकोर्ट के अनुसार माओवादी होने का अपराध यूएपीए के दायरे में नहीं आता । इसी कानून के अंतर्गत महाराष्ट्र के कई जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता सीपीआई(माओवादी) गुट से संपर्क रखने के कारण बंबई हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का चक्कर लगा रहे हैं। उनमें से एक गौतम नवलखा की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 15 अक्टूबर को लगायी गयी रोक की अवधि इसी हफ्ते खत्म हो रही है । 15 अक्टूबर को ही बंबई हाईकोर्ट ने जेल में बंद सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वर्नोन गोन्साल्विस को यह कहकर जमानत देने से इन्कार कर दिया कि ये प्रतिबंधित सीपीआई(माओवादी) गुट के वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं ।