पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) का हाईफाई अनशन चर्चा में था ही कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू भी अनशन पर बैठ गए । अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख बनर्जी ने कोलकाता में ही सीबीआई के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘संविधान बचाओ’ अनशन किया । आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़़ तेलुगू देसम पार्टी(टीडीपी) सुप्रीमो मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने अपने राज्य को ‘स्पेशल श्रेणी’ का दर्जा देने की मांग को लेकर दिल्ली में अनशन किया ।

ये खतम होते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने फरवरी के अंतिम सप्ताह में विधान सभा में एक मार्च से भूख हड़ताल का एलान कर दिया । आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल दिल्लो को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठे हैं । अरविंद केजरीवाल और चन्द्रबाबू नायडू दोनों ही नरेंद्र मोदी अर्थात् भाजपा के खिलाफ दीदी के नेतृत्व में बन रहे, ‘महागठबंधन’ का हिस्सा हैं । नायडू और केजरीवाल दोनों ही 19 जनवरी को कोलकाता में ममता बनर्जी की ओर से आयोजित महाजुटान में जुटने से लेकर फिर फरवरी में दीदी के अनशन में भी शरीक हुए । पांच फरवरी को दीदी कोलकाता में अनशन पर बैठी और उसके बाद चन्द्रबाबू नायडू दिल्ली में अनशन पर बैठे । फिर जंतर-मंतर पर नरेंद्र मोदी विरोधी लगभग सभी राज्यों के नेता जुटे । वे लोग फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार से मिलने उनके आवास पर गए ।

उस दौरान पुडूचेरी के कांग्रेसी मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी के अनशन की ओर लोगों का ध्यान कम गया । नारायणसामी के समर्थन में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया 17 फरवरी को पुडूचेरी गए । दिल्ली सरकार और पुडूचेरी सरकार दोनों का अपने-अपने उपराज्यपाल से अधिकारों को लेकर झगड़ा चल रहा है । दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने गत वर्ष जून में एक सप्ताह तक अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ धरना दिया । पुडूचेरी के मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल किरण बेदी के खिलाफ राजनिवास के बाहर धरना दिया ।

वी. नारायणसामी को छोड़ दें तो बाकी सब धरना, अनशन आपस में राजनीतिक रूप से गुंथे हुए हैं और सबका एक ही मकसद है - आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने के लिए मुद्दे की तलाश । इसमें जनहित तो बहुत खोजने पर भी शायद मिले न मिले, राजनीतिक हित स्पष्ट है । चुनाव मुद्दे और एकजुटता की किल्लत से जूझ रहे नरेंद्र मोदी विरोधियों में अनशन साझा मुद्दा है । सबसे ज्यादा चर्चित अभी अरविंद केजरीवाल का आमरण अनशन/भूख हड़ताल है, जो ताजा हॉटकेक है । आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगी मनीष सिसौदिया के साथ पुडूचेरी में वी. नारायणसामी से 17 फरवरी को धरना स्थल पर हाथ मिलाकर दिल्ली लौटै और राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आमरण अनशन का प्रस्ताव तैयार कर लिया । 23 फरवरी को दिल्ली विधान सभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक मार्च से अनशन पर बैठने का एलान कर दिया । उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए यह ‘निर्णायक लड़ाई’ और ‘अंतिम विकल्प’ है । उसके दो दिन बाद आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय ने एक से नौ मार्च तक के कार्यक्रम की भी जानकारी दिल्ली के मतदाताओं को दी । उसमें आम आदमी पार्टी विधायकों के अपने-अपने क्षेत्र में धरना आयोजित करने, सभी मंत्रियों के मुख्यमंत्री के साथ धरना स्थल पर बैठने और वहीं से सरकार का काम चलाने का कार्यक्रम भी शामिल था ।

अरविंद केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने से लेकर पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए धरना आयोजन तक के चुनावी ताल्लुकात एक ही साथ दिल्ली की पूव मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और पुडूचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी से हैं । सामाजिक कार्यकर्ता और लोकपाल गठन आंदोलन के संयोजक अण्णा हजारे के अनशन मंच से अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी दोनों की राजनीतिक पैदाईश हुई है। अण्णा हजारे के अनशन में राजनीति नहीं थी, लेकिन उस जनहित आंदोलन में शरीक होकर भाजपा ने राजनीतिक रोटी सेंकी । पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी अण्णा हजारे के 2011 और 2012 में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित धरना में शामिल हुई । उसके बाद किरण बेदी भाजपा के दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में 2015 में विधान सभा चुनाव लड़ी और अरविंद केजरीवाल के हाथों हारी । उसके पहले अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की लोकप्रिय कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अपदस्थ किया । आम आदमी पार्टी का राजनीतिक तार एक ही साथ कांग्रेस और भाजपा दोनों से जुड़ा है । अरविंद केजरीवाल ने किरण बेदी का दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं होने दिया और शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद छोड़ने को मजबूर किया । भाजपा ने किरण बेदी को उसके बाद पुडूचेरी का उपराज्यपाल बना दिया । दिल्ली में कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल से मुकाबला करने के लिए फिर से पार्टी की कमान शीला दीक्षित को सौंपी है । उनका सीधा मुकाबला आम आदमी पार्टी से है, जबकि अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए कांग्रेस से 2019 लोकसभा चुनाव के लिए गठजोड़ करन को ‘बेताब’ हैं । वी. नारायणसामी के समर्थन में पुडूचेरी जाने से पहले अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से गठजोड़ की ‘उत्सुकता’ वाला बयान देकर दिल्ली से रवाना हुए । शीला दीक्षित इस संभावना को खारिज कर चुकी हैं । पुडूचेरी में एक तो उपराज्यपाल के विरोध में मुख्यमंत्री का धरना, जो अरविंद केजरीवाल की अपनी लड़ाई है और दूसरे कांग्रेस से नरम रवैया अपनाने की उम्मीद - ये चुनावी समीकरण कितना आम आदमी पार्टी(आप) के अनुकूल बैठता है, वक्त बताएगा । दिल्ली के मतदाताओं के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा दिलानेवाला जमा कोई नया नहीं है । दिल्ली में अब तक जितने मुख्यमंत्री हुए, चाहे वो भाजपा के हों या कांग्रेस के सबों ने राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई केंद्र से लड़ी । सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित ने तो केंद्र में अपनी ही पार्टी की सरकार से पंगा लिया । इसलिए शीला दीक्षित ने अरविंद केजरीवाल क अनशन पर जो प्रतिक्रिया दी उसमें दम है कि यह मुद्दा लोकसभा चुनाव से पहले क्यों, चार साल से केजरीवाल क्या कर रहे थे । अनशन की तैयारी से पहले अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया - ‘अगस्त, 2003 में केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी ने दिल्ली को राज्य दर्जा देनेवाला बिल लोकसभा में पेश किया, प्रणव दा के नेतृत्ववाली संसदीय समिति ने दिसंबर 2003 में इसका अनुमोदन कर दिया और उसके बाद यह बिल लैप्स कर गया । दिल्लीवासियों के साथ यह अन्याय क्यों?’ चुनाव के समय इस ट्वीट में अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा को वा दिन याद दिलाया ह, जब उनका खुद राजनीति में कहीं नामोनिशान नहीं था और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बात भाजपाई भी नहीं सोचते थे । राजनोतिक अनशन की इस धूम में वैसे धरने पिट गए जो जनहित में तो थे, मगर चुनाव से उसका सरोकार नहीं था । 30 जनवरी को बापू की पूण्यतिथि के दिन अण्णा हजारे ने अपने गांव रालेगण सिद्धि में लोकपाल गठन को लेकर अनशन शुरू किया । अरविंद केजरीवाल सहानुभूति दिखाने भी नहीं गए । दिल्ली विधान सभा में अरविंद केजरीवाल के अनशन एलान के समय जंतर-मंतर पर ही नर्मदा बचाओ आंदोलन की संचालक मेघा पाटकर का अनशन लो प्रोफाईल में रहा । कई वर्षों से चल रहे इस आंदोलन को आज तक किसी पार्टी ने गंभीरता ने नहीं लिया । जबकि प्रथम दृष्टया में ये आंदोलन जनहित से जुड़ा है । नर्मदा बांध बनने से किनारे बसे ग्रामवासियों का वास और जीविका पर खतरा बना हुआ है । नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं का धरना हमेशा थोड़े-थोड़े अंतराल पर चलता रहता है । किसी का ध्यान उधर नहीं जाता । दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि उपराज्यपाल के अधिकारों पर अपना निर्णय दे । सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने 14 फरवरी को इस पर विवादित फैसला सुनाया । सुप्रीम कोर्ट जज किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए और पता चला कि मामला चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के पास जाएगा जो तीन जजों की नयी पीठ का गठन करेंगे । अगर कुछ क्लियर हो जाता तो केंद्र शासित प्रदेश पुडूचेरी पर भी उसका असर पड़ता । अरविंद केजरीवाल को झटका लगा, क्योंकि वैसे अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी, जो केजरीवाल चाहते थे उसमें प्रमुख ये है कि दिल्ली सरकार अपने अधिकारियों का तबादला नहीं कर सकती तो जनता का काम कैसे करेगी, सरकार चलेगी कैसे । इससे बड़ा चुनावी मुद्दा क्या हो सकता है कि पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अनशन सरकार चलेगी कैसे । इससे बड़ा चुनावी मुद्दा क्या हो सकता है कि पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अनशन

किया जाए । सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के दिन पुडूचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी दिल्ली में थी । पुडूचेरी के मुख्यमंत्री नारायणसामी अपने मंत्री, विधायकों के साथ राजभवन के बाहर फुटपाथ पर सोए । अरविंद केजरीवाल और नारायणसामी दोनों 2015 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से उपराज्यपाल से भिड़े हुए हैं । नारायणसामी के अनुसार उपराज्यपाल मुफ्त चावल योजना समेत 39 सरकारी प्रस्तावों को क्लियरेंस नहीं दे रही हैं ।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत इन तीनों मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने राज्य में धरना दिया । उनमें दीदी का धरना जरा अलग था । क्योंकि उन्होंने राज्य के अधिकारों में केंद्र के हस्तक्षेप का मुद्दा बनाकर इसे ‘संविधान बचाओ’ आंदोलन बताया । दीदी ने कानून व व्यवस्था पर खतरा बताकर राज्य में भाजपा को रथयात्रा आयोजित नहीं करने दिया । कानून व व्यवस्था तथा पुलिस राज्य का विषय है । राज्य का पुलिस व्यवस्था में सीबीआई के हस्तक्षेप को दीदी ने संविधान की संघीय व्यवस्था पर खतरा बताया । इनके पास यही एक मुद्दा है, इसी पर वे पश्चिम बंगाल में भाजपा को वर्तमान दो लोकसभा सीट भी बरकरार नहीं रहने देंगी । भाजपा पूर्वी बंगाल में काफी मिहनत कर रही हैं । दार्जीलिंग को गोरखालैंड से स्विटजलैंड बनाने में भाजपा को दीदी बाधक बता रही है । दिल्ली को लंदन और पेरिस बनाने का अधिकार अगर अरविंद केजरीवाल को मिल गया तो मतदाताओं को क्या मिलेगा? 27 फरवरी को दिल्ली में संसद एनेक्स में दीदी के नेतृत्व में फिर से मोदी विरोधी जुटान हुआ ।

पुलवामा हमले पर उठ रहे विपक्षी सवालों का माकूल जवाब आ जाने से प्रधानमंत्री के खिलाफ तगड़ा चुनावी मुद्दा बनाना और भी मुश्किल हो सकता है । आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भाजपा गठजोड़ स खुद को हाल ही में अलग किया है । ममता बनर्जी की तरह नायडू भी नरेंद्र मोदी के आंध्र प्रदेश दौरे का अब विरोध करते हैं । नायडू के भाजपा गठजोड़ से अलग होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 10 फरवरी को पहले आंध्र प्रदेश दौरे का विरोध किया । एक मार्च को प्रधानमंत्री के विशाखापतनम दौरे की भी विरोधी तैयारी की हुई थी ।

नायडू और भाजपा को कशमकश तेलंगाना राष्ट्र समिति(टीआरएस) प्रमुख चन्द्रशेखर राव के 2009 अनशन के समय से शुरू हुई । तेलंगाना राज्य गठन का एलान कांग्रेस सरकार को संसद में तब करना पड़ा जब चन्द्रशेखर राव की हैदराबाद में हालत बिगड़ी । नायडू राज्य गठन के विरोधी थे और भाजपा इसका श्रेय कांग्रेस को देना नहीं चाहती थी । तेलंगाना में हालिया विधान सभा चुनाव में टीआरसी की जीत से स्पष्ट हो गया कि राव के अनशन का असर है । उसके बाद से चन्द्रशेखर राव न जनहित में पार्टी और सरकार को पारिवारिक संस्था बनाकर रख दिया ।