नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन देशप्रेम दिवस के रूप में मनाने के लिए दिल्ली से लेकर कोलकाता तक कवायद करने वाली फारवर्ड ब्लॉक अकेली पार्टी है, जिसके वे संस्थापक थे। यहां तक कि वाममोर्चा के मुख्य घड़े मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी को भी नेताजी से ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। भाजपा का नेताजी प्रेम उसी पहलू तक सीमित है, जहां कांग्रेस द्वारा नेताजी की मृत्यु के कारण और उसकी जांच के लिए गठित आयोगों की रिपोर्टों में सिर्फ दिग्भ्रमित करनेवाली जानकारी सार्वजनिक की गई है।
नेताजी के उत्तराधिकारी ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक अशोक घोष ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करके उनसे कहा कि स्वामी विवेकानंद की तरह ही सुभाषचन्द्र बोस का भी जन्मशती वर्ष मनाया जाय। स्वामीजी जयंती के दिन(12 जनवरी) को दीदी ने कहा कि इस दिवस के उपलक्ष्य में उसी तरह पूरे 2012 तक समारोह चलते रहेंगे जैसे 2011 में गुरूदेव रवीन्द्र नाथ जयंती पर चला। फारवर्ड ब्लॉक ने मुख्यमंत्री(दीदी) से आग्रह किया कि 23 जनवरी को नेताजी जयंती देशप्रेम दिवस के रूप में मनाने और पूरे वर्ष इसके आयोजन को वे सरकारी स्तर पर घोषणा करें, जैसे पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने गत वर्ष किया था। 2011 में भी मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली वाममोर्चा सरकार में शामिल फारवर्ड ब्लॉक ने ही इसके लिए दबाव बनाया था। कोलकाता में इस सिलसिले में 18 जनवरी को आयोजित जनसभा में जुटे फारवर्ड ब्लॉक नेता अशोक घोष और महासचिव देवव्रत बिस्वास ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस सरकार नेताजी जन्मशती देशप्रेम दिवस के रूप में मनाने की जानकारी उन्हें दी है। घोष के मुताबिक गत वर्ष 20 दिसम्बर को ममता बनर्जी जब फारवर्ड ब्लॉक पार्टी कार्यालय में आयीं तो उन्होंने यही आग्रह किया कि 2011 से शुरू यह सिलसिला जारी रखा जाय।
कई वर्षों से चल रहा नेताजी के प्रति ऐसा देशप्रेम न तो किसी अन्य पार्टी के अंदर है, न ही देश के बाकी राज्यों में उमड़ा है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में भी कोलकाता से बाहर हलचल नजर नहीं आयी। अपनी पार्टी के संस्थापक के प्रति सरकारी ‘देशप्रेम’ जगाने के लिए राज्य से लेकर केन्द्र तक को बार-बार सचेत करने वाले फारवर्ड ब्लॉक नेता अन्य प्रदेशों से ज्यादा अपने ही राज्य की इस उदासीनता को समझते हैं। इसलिए उन लोगों ने सरकार से कोलकाता के अलावे जिला स्तर से भी जयंती समारोह आयोजित करने का सरकार से आग्रह किया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पहले फारवर्ड ब्लॉक नेताओं ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को 3 दिसम्बर को पत्र लिखकर देशभर में नेताजी जयंती देशप्रेम दिवस के रूप में मनाने की वर्षों पुरानी मांग दोहराई। फारवर्ड ब्लॉक महासचिव देवव्रत बिस्बास के साथ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी महासचिव प्रकाश करात, बुद्धदेव भट्टाचार्य और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी महासचिव ए.बी. बर्द्धन भी प्रधानमंत्री से इसी संबंध में दिसम्बर में मिले। महीना समाप्त होने के समय बिस्बास को प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्र प्राप्ति की सूचना मिली और केन्द्रीय गृह मंत्री के कार्यालय ने यह जानकारी दी कि पत्र संस्कृति मंत्रालय को भेज दिया गया है, जिसको इस पर ‘विचार’ करना है।
नेताजी की याद का स्वाद खराब करनेवाला उनकी मृत्यु से संबंधित विवादित प्रसंग जैसा ही भारत रत्न उपाधि का उनसे जुड़ा पहलू भी अप्रिय है। जयंती के समय उनकी मृत्यु की चर्चा करना अच्छा तो नहीं लगता, लेकिन उसके बगैर यह बातचीत भी अधूरी रह जाती है। नेताजी कदाचित एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी है जिसकी पुण्यतिथि नहीं मनायी जाती। क्योंकि उनकी मृत्यु की सरकारी तौर पर आज तक पुष्टि नहीं हो पायी है और कांग्रेस सरकारों ने कई जांच आयोग गठित करने के बावजूद मृत्यु के असली कारण को रहस्यमय बनाये रखा। इसलिए नेताजी के प्रति कांग्रेस का देशप्रेम भी सरकारी फाईलों के ‘विचारार्थ’ वाले गलियारे से बाहर नहीं निकल पाया।
नेताजी की मृत्यु के कारणों और जांच आयोगों की रिपोर्ट वाली फाईलों से संबंधित जानकारी में सूचना के अधिकार के तहत दिल्ली स्थित संस्था मिशन नेताजी ने 2007 में सरकार से मांगी। तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने यह कहकर कुछ फाईलें आयोग को देने से इंकार कर दिया कि इस ‘टॉप सीक्रेट’ के सार्वजनिक होने से देश में और खासकर पश्चिम बंगाल में बवाल मच सकता है। केन्द्रीय सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने गृहमंत्री के तर्क को कपोलकल्पित बताकर अपने 20 पृष्ठों के आदेश में सारे गोपनीय दस्तावेज मांगे। उसके बावजूद गृहमंत्रालय ने पंडित जवाहर लाल नेहरू और उस समय के खुफिया प्रमुखों के बीच हुए पत्राचार का विवरण छिपाये रखा, जिसे ‘टॉप सीक्रेट’ कहा जाता है। पत्राचार 1945 के उस ताइवान विमान दुर्घटना के बारे में है, जिसमें कांग्रेस सरकारों के मुताबिक नेताजी की मृत्यु हुई।
केन्द्रीय सूचना आयोग के पास आवेदन करने से पहले 2003 में मिशन नेताजी के संयतन दासगुप्ता और अनुज धर ने ताइवान सरकार से इस बात की पक्की जानकारी हासिल कर ली कि नेताजी को लेकर जा रहा कोई विमान ताइवान में कभी दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं। अनुज धर ने अपनी किताब ‘बैक फ्रॉम डेड: इन्साइड दि सुभाष मिस्चरी’ में विस्तार से इसका ब्योरा दिया है। 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाली केन्द्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी की अध्यक्षता में नया जांच आयोग बनाया, जिसने अपनी रिपोर्ट में पंडित नेहरू के समय से गठित कांग्रेस सरकारों के सभी जांच कमिटियों की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया कि 1945 में ताइवान में विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हुई। मुखर्जी आयोग ने इस कथित ‘तथ्य’ को पूरी तरह गलत और मनगढ़ंत बताते हुए कहा कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के तिहोकू हवाई अड्डे पर ऐसी कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं।
2005 में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट आने तक केन्द्र में भाजपा गठजोड़ सरकार गिर गयी और कांग्रेस गठजोड़ सरकार इस रिपोर्ट को संसद में पेश करने से महीनों तक कतराती रही। इसको लेकर संसद में हंगामा करनेवाली विपक्षी भाजपा का साथ सिर्फ फारवर्ड ब्लॉक ने दिया। उस समय कांग्रेस गठजोड़ के सहयोगी अन्य वाम दल तटस्थ रहे।
नेताजी की मृत्यु के कारण की जांच करने के लिए शाहनवाज खान की अध्यक्षता में पहली जांच कमिटी प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने ही 1956 में बनाई। जबकि 15 अगस्त 1947 को उन्होंने लाल किला से आजादी का तिरंगा फहराने के समय नेताजी के बारे में जानने को उत्सुक जनसमूह से कहा कि ‘नेताजी विदेश में झंडा फहरा रहे हैं।’ इसका जिक्र नेहरू के करीबी रहे प्रख्यात पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब ‘इंडिया: फ्रॉम कर्जन टु नेहरू एंड आफ्टर’ में किया है। 1970 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा गठित न्यायमूर्ति जी.डी. खोसला आयोग ने भी ‘दोबारा’ जांच करके विमान हादसे और इसमें नेताजी की मृत्यु की पुष्टि कर दी।
सबसे कमाल तो हुआ 1992 में, जब पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पहले तो नेताजी को मरणोपरांत भारत रत्न से विभूषित करने की घोषणा कर दी और फिर यह कहकर वापस ले लिया कि उनकी मृत्यु की ‘पुष्टि’ नहीं हो पायी है।
2008 में गणतंत्र दिवस समारोह आयोजन के समय यह बात जोरदार चर्चा में आई, जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के लिए दलीय आधार पर अटल बिहारी वाजपेयी, ज्योति बसु से लेकर कपूर्री ठाकुर, बीजू पटनायक, जगजीवन राम, चन्द्रशेखर, मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के नाम सामने आये। अभी सचिन तेंडुलकर का नाम उछल रहा है।
नाजी जर्मनी की सेना में काम करने का ‘फख’ अपनी आत्मकथात्मक कृति ‘दि टिन ड्रम’ में उजागर करके विवादों में आए नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक गुंटर ग्रास ने उसी समय भारत आकर नेताजी को अपने अंदाज में याद किया। कोलकाता में महीनों बिताकर स्वदेश लौटन से पहले दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक सेमिनार में गुंटर ग्रास ने कहा कि ‘मुझे सुभाषचन्द्र बोस इसलिए पसंद हैं, क्योंकि “बीसवीं सदी की बुराइयों की जड़” फासीवादी ताकतों(जर्मनी, इटली, जापान) से उनकी दोस्ती थी।’