राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और आधुनिक भारत के निर्माता प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस नेता के रूप में प्रचारित करके सियासी राजनीति के लिए इस्तेमाल करना भाजपा गठजोड़ शासन की पांच साल की उपलब्धियों में गिनाने जैसा है । खासकर महात्मा गांधी के विषय में यह बात और भी मायने रखती है, जिनकी 150वीं जयंती मनायी जा रही है । महात्मा गांधी के ऐतिहासिक डांडी मार्च की 89वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी के और अपने भी गृह प्रदेश गुजरात में राष्ट्रपिता का देश के लिए प्रमुख योगदान यही गिनाया कि महात्मा गांधी कांग्रेस में परिवारवाद के खिलाफ थे । नरेंद्र मोदी ने डांडी मार्च की उपलब्धियों से ज्यादा महात्मा गांधी के इसी योगदान पर बल दिया कि वे कांग्रेस में परिवारवाद के पक्ष में नहीं थे । 2017 में बिहार के चम्पारण सत्याग्रह की 100वीं वर्षगांठ पर भी गांधी के आदर्श और सिद्धांत की जगह राजनीतिक रंग का लेप नजर आया ।

गत हफ्ते का घटनाक्रम तो ऐसा लगा मानो गांधी के सपनों के भारत और कांग्रेस दोनों को ही जवाहर लाल नेहरू ने परिवारवाद के दलदल में डाल दिया । पांच साल के अपने कार्यकाल में नरेंद्र मोदी शासन ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ऐसी तस्वीर पेश करने का प्रयास किया मानो पं. नेहरू ने देश का सिर्फ नुकसान ही किया । नेहरू का नामोनिशान मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी । भाजपा गठजोड़ शासन ने नेहरू की निंदा और आलोचना करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं दिया । तालमेल कुछ इस तरह बिठाया गया कि गांधी और नेहरू के विषय में अच्छी बातें कम, बुरी बातें ज्यादा हुई ।

अभी वैसे समय में कांग्रेस परिवारवाद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी से जोड़ा जब महात्मा गांधी की 150वीं जन्मशती पर लंदन पुस्तक मेले में भारत ने एक पेविलियन लगाया था । लंदन ओलिंपिया में 12 से 14 मार्च तक चले पुस्तक मेले में गांधी पेविलियन में अलग-अलग शीर्षक से इतिहास, संस्कृति पर गांधी की संकलित रचनाएं रखी गयी थीं । लेकिन उसी समय भारत से और खासकर गांधी के अपने ही जन्मस्थान गुजरात से अप्रिय संदेश मीडिया के जरिए लंदन जा रहे थे । गांधीनगर में जो कुछ हो रहा था वो डांडी मार्च के 89वें वर्ष और गांधी की 150वीं जन्मशती दोनों ही समारोहों का माहौल बिगाड़ने के लिए पर्याप्त था । महात्मा गांधी के नाम को चुनावी राजनीति से जोड़ने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति मतदाताओं के गले के नीचे नहीं उतरी । उसका एकमात्र कारण आम लोगों की समझ में यही आया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों ने ही उसी समय नरेंद्र मोदी के खिलाफ रैली गांधीनगर में ही आयोजित की हुई थी । वो भाजपा के खिलाफ चुनावी बिगुल था, जिसमें सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, अहमद पटेल और गुलाम नबी आजाद समेत सभी वरिष्ठ कांग्रेस नेता जुटे थे । कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में पारित प्रस्ताव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया गया ।

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी शहजादा राहुल गांधी वाले अपने पुराने भाषण को महात्मा गांधी से जोड़कर डांडी मार्च की 89वीं वर्षगांठ पर कांग्रेस के खिलाफ चुनावी विरोध प्रकट कर रहे थे । कांग्रेस पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्षी पार्टी की संस्कृति गांधी विचार की एंटि-थेसिस है, क्योंकि गांधी परिवारवाद के समर्थक नहीं थे ।

ठीक उसी दिन अर्थात् 12 मार्च को ही लंदन पुस्तक मेले में गांधी पेविलियन का उद्घाटन हो रहा था । भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव विक्रम सहाय और प्रकाशन विभाग की डायरेक्टर जनरल साधना राउत उस मौके पर लंदन पहुंची हुई थी । लंदन के प्रमुख अखबार ‘दि टाइम्स’, ‘न्यू स्टेटसमैन’ और ‘गार्डियन’, में वही खबर सुर्खियों में छपी, जो गुजरात से पहुंची थी । भारत के अखबारों में तो लंदन आयोजन की खबर को तो तरजीह ही नहीं मिली ।

ठीक उसी समय जैश-ए-मुहम्मद सरगना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के रवैए के बहाने जवाहर लाल नेहरू पर हमला अटपटा-सा लगा । इसमें पं. नेहरू की भाजपा प्रचारित भूल से ज्यादा नरेंद्र मोदी सरकार की अपनी असफलता ज्यादा झलकती है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर वाली स्थायी सीट हासिल करने के नरेंद्र मोदी सरकार के पांच साल के प्रयासों में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता, जो उल्लेखनीय हो । लेकिन भाजपा के रविशंकर प्रसाद और अरूण जेटली ने इसके लिए मूल रूप से पं. जवाहर लाल नेहरू को दोषी ठहराने का जोर-शोर से प्रचार किया । चीन की विदेशनीति का सबसे प्रबल कूटनीतिक पहलू ये है कि वो पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध नहीं कर सकता । यह बात कोई नयी नहीं है । नयी ये है चीन के पास वीटो पावर होना और भारत के पास नहीं होने का प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू के समय की नीति से जोड़कर चीन के आगे आज भी कमजोर पड़ने की झुंझलाहट को चुनावी मुद्दा बनाना कहां तक उचित है । अरूण जेटली मतदाताओं को नेहरू के बारे में इस तरह दिग्भ्रमित कर रहे हैं, मानो संयुक्त राष्ट्र गठन के समय 1945 में सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट हासिल करना नेहरू के हाथ में हो और चीन को स्थायी सदस्यता उन्हीं के समर्थन से मिली । नेहरू नहीं चाहते तो चीन को वीटो पावरयुक्त स्थायी सीट नहीं मिलती और नेहरू ने भारत की सदस्यता के बजाए चीन का पक्ष लेकर भूल की । इस भूल का नुकसान आज इतने दशकों बाद भारत को उस समय उठाना पड़ा, जब कांग्रेस विरोधी भाजपा गठजोड़ शासन को चुनाव का सामना करना है । मसूद अजहर को विश्व आतंकवादी घोषित करने के सुरक्षा परिषद के चार वीटो पावर वाले और अन्य वीटो वंचित सदस्यों के प्रस्ताव को चीन ने वीटो का इस्तेमाल करके रोक दिया । इसको भाजपा नेताओं ने 1945 से जोड़ दिया, जब चीन दूसरे विश्वयुद्ध के विजेता देशों में था । इसीलिए अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने दादागिरी से वीटो पावर से खुद को लैस रखने की हैसियत वाला देश चीन को भी माना । भारत एक आजाद देश भी नहीं था । यह तो सभी जानते हैं । मगर इस पांच साल में नरेंद्र मोदी सरकार की चीन और पाकिस्तान नीति समेत कश्मीर में किसी भी आतंकी हमले के बारे में बिल्कुल स्पष्ट जानकारी आम मदतादाओं तक नहीं पहुंची । नेहरू को इसमें घसीटकर मतदाताओं को कांग्रेस के खिलाफ वोट डालने के लिए उकसाना शोभनीय नहीं लगता । नरेंद्र मोदी शासनकाल में सबसे ज्यादा गांधी-नेहरू समेत नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी विवाद के घेरे में रहे । गांधी जन्मशती का ही हिस्सा माना जाएगा, सुप्रीम कोर्ट में गांधी की हत्या की दुबारा जांच की याचिका लगाना । अभी डांडी मार्च आयोजन से मात्र एक सप्ताह पहले सुप्रीम कोर्ट ने गांधी हत्या की दुबारा जांच की हत्या पर पुनर्विचार याचिका खारिज की । 2018 के मार्च में ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे ठुकरा दिया था । क्या मतदाता भूल गये कि 30 जनवरी को गांधी हत्या की बरसी कथित आरएसएस समर्थकों ने गांधी के पुलते पर नाथूराम गोडसे बनकर गोली चलायी? भाजपा के किसी नेता तक यह जानकारी नहीं पहुंची ।

महान आरएसएस विचारक और जनसंघ के संस्थापकों में से एक दीनदयाल उपाध्याय के दर्शनों का प्रचार ऐसे हुआ मानो वे गांधी से बड़े विचारक हों । लेकिन उनकी हत्या की जांच की मांग आज तक किसी जनसंघी नेता ने कांग्रेस सरकारों के समय में भी नहीं उठायी । दो-दो बार भाजपा शासनकाल में दीनदयाल उपाध्याय मृत्यु रहस्य को डंप रखा गया । मुगलसराय स्टेशन के यार्ड में उनकी लाश पाए जाने के कारण उसका नामकरण दीनदयाल उपाध्याय कर दिया गया । प्रधानमंत्री ने सिर्फ वही खोजा, जिसमें कांग्रेस विरोध और चुनावी हित हो । नेताजी सुभाषचन्द्र बोस मृत्यु / गुमशुदगी रहस्य जांच की कांग्रेस फाइलें डिक्लासिफाई अभियान 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से शुरू होकर 2016 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव तक चला । रहस्य नहीं खुला । नेताजी के प्रपौत्र चन्द्र बोस को भाजपा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ा किया और वे हार गए ।