जनसंघ(भाजपा का मूल नाम) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ‘रहस्यमय मृत्यु’ की जांच की मांग लोकसभा में उठानेवाले सदस्य भाजपा के नहीं थे । यह मांग बीजू जनता दल(बीजद) के वरिष्ठ सांसद भर्तृहरि महताब ने तीन जुलाई को उठायी । भाजपा के एक भी सदस्य उनके समर्थन में भी कुछ नहीं बोले । मुखर्जी द्वारा स्थापित पार्टी की सरकार ने बीजू जनता दल के सांसद की इस मांग पर ध्यान नहीं दिया । भाजपा के किसी सांसद ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी ‘मृत्यु रहस्य’ की मांग उठाना तो दूर, दूसरे दल के सदस्य का साथ देना भी जरूरी नहीं समझा । पश्चिम बंगाल से जीतो भाजपा की लॉकेट चटर्जी मुखर्जी की मृत्यु रहस्य की जांच की मांग पर तो कुछ नहीं बोली । मगर उसका राजनीतिक लाभ अपने प्रबल प्रतिद्वंदी बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ यह कहकर किया - ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बंगाल जल रहा है ।’ 3 जुलाई का यह प्रकरण है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रीगण इससे बिल्कुल बेखबर 6 जुलाई को पड़नेवाली मुखर्जी जयंती भाजपा सदस्यता अभियान समारोह के रूप में मनाने की तैयारी में लगे थे । नरेंद्र मोदी ने इसकी शुरूआत की अपने चुनावक्षेत्र वाराणसी से । मुखर्जी की 118वीं जयंती पर नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 18 फीट ऊँची तांबे की प्रतिमा की आधारशिला रखी और मुखर्जी से ज्यादा लाल बहादुर शास्त्री का देश के लिए योगदान का जिक्र किया ।

श्याम प्रसाद मुखर्जी की 66वीं पुण्यतिथि के दिन 23 जून को भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि 1953 में पूरे देश ने मुखर्जी की मृत्यु की जांच की मांग की थी, लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उस पर ध्यान नहीं दिया । नड्डा ने मुखर्जी की ‘रहस्यमय मृत्यु’ के लिए जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला को जिम्मेदार ठहराते हुए उन दोनों की साजिश बताया ।

आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ और ‘पाञ्चजन्य’ दोनों ने ही इस बयान को प्रमुखता से छापा । लेकिन नड्डा ने अपनी सरकार से जांच कराने की मांग नहीं की। नड्डा ने ये भी नहीं कहा कि इस रहस्य से पर्दा उठना चाहिए कि नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर में मृत्यु कैसे हुई ।

जवाहर लाल नेहरू के लिए भले यह मुद्दा नहीं रहा हो, मगर भाजपा के लिए भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी मृत्यु रहस्य की जांच कोई मुद्दा नहीं है ।

भर्तृहरि महताब ने लोकसभा में कहा कि आज तक श्यामा प्रसाद मुखर्जी मृत्यु रहस्य की जांच नहीं हुई । संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मुखर्जी की मौत की जांच के लिए किसी सरकार ने काई जांच कमिटी नहीं बनायी । सांसद ने कहा कि पश्चिम बंगाल विधान सभा द्वारा इस संबंध में पारित प्रस्ताव आज भी मौजूद है । यह प्रस्ताव उस समय की संघीय सरकार खास तौर पर गृह मंत्रालय को भेजा गया था कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के कारणों का पता लगाने के लिए जांच कमिटी गठित की जाए । महताब की भावनाएं मुखर्जी से जुड़ी हैं, जैसा उन्होंने कहा । महताब का चुनाव क्षेत्र कटक(ओडिशा) है, जहां मुखर्जी गए थे । बीजद सांसद ने भाजपा नेताओं को यह भी याद दिलाया कि कश्मीर मुद्दे पर धारा-370 और 35-ए को लेकर जिन गलतियों का घोलमट्ठा किया गया है, उसके खिलाफ श्यामा प्रसाद मुखर्जी लड़े थे ।

महताब द्वारा सदन में उठायी गयी मुखर्जी की ‘रहस्यमय मृत्यु’ की जांच की मांग के संबंध में ध्यान देनेवाला विंदु ये है कि आज तक इसकी जांच हुई ही नहीं । उन्होंने यह नहीं कहा कि आज तक मुखर्जी की मृत्यु की जांच सदन के अंदर या बाहर उठायी गयी या नहीं । ऐसा कोई रिकार्ड नहीं मिलता कि भाजपा नेताओं ने भी 50 वर्षों में कांग्रेस सरकारों से ऐसी मांग की हो । यह तो हुई कांग्रेस की बात और भाजपा नेता ने मुखर्जी की पुण्यतिथि पर जवाहर लाल नेहरू को इसकी उपेक्षा का दोषी ठहराया ।

लेकिन जब जनसंघ को 1977 में स्वयं सत्ता में आने का अवसर मिला और फिर भाजपा के रूप में जनसंघ की अपनी सरकार बनी तो मुखर्जी की रहस्यमय मौत की जांच के लिए कमिटी क्यों नहीं बनी? अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब पहली बार भाजपा की सरकार बनी तो नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की रहस्यमय मृत्यु/गुमशुदगी की जांच के लिए कमिटी बनी । जबकि सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु की जांच के लिए उसके पहले दो-दो बार जांच कमिटी बन चुकी थी । शाहनवाज कमिटी जवाहर लाल नेहरू ने बनायी और खोसला जांच आयोग इंदिरा गांधी ने । महात्मा गांधी की मृत्यु की जांच के लिए भी कमिटी बनी । नरेंद्र मोदी जब 2014 में प्रधानमंत्री बने तो नेताजी मृत्यु रहस्य की जांच फाइलें किस्तों में ‘डिक्लासिफाई’ किया । यह बहुप्रचारित मामला है । उस अवसर पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के परिजन भी मौजूद थे । उसके बाद नेताजी के प्रपौत्र चन्द्र कुमार बोस पश्चिम बंगाल में भाजपा के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़े और हार गए । ये अभी भाजपा बंगाल यूनिट के उपाध्यक्ष हैं ।

देश जानना चाहता है कि मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु की जांच कराने की जरूरत नरेंद्र मोदी सरकार ने क्यों नहीं समझी? वाजपेयी शासनकाल में और फिर नरेंद्र मोदी शासनकाल में भी किसी भाजपा नेता ने संसद के अंदर या बाहर इसकी मांग तक नहीं उठायी । यही मामला जनसंघ के एक और संस्थापक व विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय के साथ भी लागू होता है, जिनकी लाश मुगलसराय स्टेशन पर यार्ड में पड़ी मिली थी । दीनदयाल उपाध्याय की पूरे वर्ष जयंती मनायी गयी । मुगलसराय स्टेशन का नामकरण उनके नाम पर हो गया । उनके विचार कई खंडों में प्रकाशित प्रचारित हुए । लेकिन दीनयाल उपाध्याय की मृत्यु की जांच नहीं करायी गयी । देश यह जानना चाहता है । पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मृत्यु की जांच की मांग नरेंद्र मोदी सरकार के विचारधीन खाते में है । यह मांग उनके पुत्र ने उठायी है । लाल बहादुर शास्त्री मृत्यु रहस्य पर बनी फिल्म ‘हू किल्ड शास्त्री, दि ताश्कंद फाइल्स’ 14-04-2019 को लोकसभा चुनाव के दौरान रिलीज हुई।

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू का आलेख 6 जुलाई को ही छपा देखने को मिला । लेख में वर्णित तथ्य के अनुसार मुखर्जी ने जीवन के आखिरी 40 दिन 1953 में बंदी के रूप में गुजारे । उसके बाद अस्पताल में संदिग्ध अवस्था में उनकी मौत हुई । वेंकैया नायडू के अनुसार मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने प्रधानमंत्री नेहरू को पत्र लिखकर स्वतंत्र जांच की मांग की, जो अस्वीकार कर दी गयी । पंडित नेहरू के शोक संदेश में मुखर्जी की मां ने लिखा - ‘मैं आपकी संवेदनाओं की आकांक्षी नहीं हूं, परंतु मैं आपसे न्याय की अपेक्षा करती हूँ । मेरा बेटा कारावास में मरा, बिना मुकदमे का कारावास ।’ मुखर्जी की मौत की ऐसी मांग नेहरू शासनकाल में या उसके बाद भी किसी जनसंघी नेताओं ने अगर उठाया होता तो वेंकैया नायडू अपने लेख में उसका जिक्र जरूर करते । उपराष्ट्रपति ने कहा कि कश्मीर चर्चा में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय का आंदोलन चलाया ।

नरेंद्र मोदी के ‘डिक्लासिफाई’ से भी नेताजी मृत्यु/गुमशुदगी रहस्य से पर्दा नहीं उठा । लेकिन मुखर्जी की मृत्यु जांच का मामला जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के खिलाफ राजनीतिक भड़ांस निकालने तक ही सीमित क्यों? गृह मंत्रालय के रिकार्ड से नेताजी मृत्यु रहस्य जांच फाइलें खंगालकर डिक्लासिफाई की गयी । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुखर्जी की मृत्यु की जांच मांग का पश्चिम बंगाल विधान सभा से पारित प्रस्ताव गृह मंत्रालय से निकलवाने में कोई रूचि नहीं ली। इस प्रस्ताव की जानकारी सदन को गैर भाजपा सदस्य ने दी ।

कोई भी भाजपा नेता मुखर्जी की मौत की जांच की वकालत नहीं करते । बीजू जनता दल सांसद ने तीन जुलाई को जब यह मांग उठायी, उसी समय केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर दौरे से इस झमेले के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराकर लौटे थे । लेकिन सदन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की जांच मांग के समय अमित शाह चुप्पी साधे रहे । 6 जुलाई को वाराणसी में प्रधानमंत्री के साथ अमित शाह भी मौजूद थे । दोनों ने इस मसले पर कुछ बोलने से परहेज किया ।