प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद की 134वीं जयंती जोधपुर चुनावी सभा में उनके नाम पर नेहरू परिवार पर छींटाकसी करके तीन दिसंबर को मना रहे थे । राजेन्द्र बाबू के गृह राज्य बिहार में राज्यपाल लालजी टंडन ने भी नेहरू परिवार का नाम तो नहीं लिया, मगर निशाना उसी पर साधा ।

अयोध्या मंदिर विवाद को लेकर संघ परिवार के उग्र तेवर पर लगातार चुप्पी साधे रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर का मामला जोधपुर चुनाव सभा में उछाला और मतदाताओं को बताया कि किस प्रकार प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर जाने के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के कार्यक्रम का विरोध किया था । नरेंद्र मोदी ने यह भी बताया कि विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा तोड़े गए सोमनाथ मंदिर का गृहमंत्री सरदार पटेल ने जब पुनर्निमाण कराया उसके बाद उन्होंने वहां राष्ट्रपति का कार्यक्रम रखा । नरेंद्र मोदी के अनुसार जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का भी विरोध किया और राष्ट्रपति के कार्यक्रम का भी । प्रधानमंत्री ने कहा कि देश प्रथम राष्ट्रपति की जयंती मना रहा है। उन्होंने स्वयं कैसी जयंती मनायी, यह तो देश की जनता ने देखा । इसी संदर्भ में बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन का बयान भी मायने रखता है । राज्यपाल पटना के टी. के. घोष अकादमी में राजेन्द्र बाबू की प्रतिमा का अनावरण और स्मृति समारोह को संबोधित करने 3 दिसंबर को गए थे । राजेन्द्र बाबू ने इसी स्कूल से पढ़ाई की थी । लालजी टंडन ने कहा - ‘राजेन्द्र प्रसाद जैसे जो महान लोग थे, उनके व्यक्तित्व पर एक परिवार हावी हो गया । महात्मा गांधी भी किनारे हो गए । कुछ लोग ऐसे सामने आए, जिन्होंने अपनी पूरी वंशावली बना ली ।’ इस कथन से उस ‘कथित वंशावली’ के प्रति राज्यपाल की सियासी टिप्पणी से ज्यादा यह संदेश जनता के बीच गया, मानो देश के प्रथम राष्ट्रपति का अपना कोई व्यक्तित्व ही न हो । उससे भी ज्यादा ध्यान देने योग्य राज्यपाल का यह कथन है कि गुजरात में सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा खड़ी हुई है, आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति का दर्जा किसी से कम है क्या । राज्यपाल ने टी. के. घोष अकादमी को धरोहर विद्यालयों में शामिल किए जाने की बात कही ।

शुक्र है, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का, कम-से-कम उन्होंने देशरत्न राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व और कृतित्व के उन पहलुओं का जिक्र किया जो नरेंद्र मोदी व लालजी टंडन को अपने मतलब का नहीं लगा । नरेंद्र मोदी ने तो जवाहर लाल नेहरू की बखिया उधेड़ने में अपनी सियासी राजनीति का कोई बिंदु अछूता नहीं छोड़ा । ‘हिन्दूवाद’ का वर्चस्व मजबूत करने के लिए वे सरदार पटेल को पहले ही अपने पाले में ले चुके हैं । अब राजेन्द्र बाबू को भी लपेटे में ले लिया । जयंती और चुनाव प्रचार के क्रम में नरेंद्र मोदी ने जवाहर लाल नेहरू के जैकेट में गुलाब लगाने के शौक को भी नहीं बख्शा और उसका इस्तेमाल करने के लिए कह डाला कि ‘नेहरू गुलाब और बाग के बारे में जानते थे, मगर किसानों के बारे में नहीं जानते थे, जिसके चलते किसानों ने कष्ट उठाया ।’

नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषण सुनते-देखते लोगों का ध्यान बिहार के राज्यपाल ने उस समय खींचा जब उन्होंने गुजरात में सरदार पटेल की सबसे ऊंचा कद में राजेन्द्र बाबू से तुलना की। सरदार पटेल को अगर भुला दिया गया तो आज उनकी चर्चा जनसंघ नेताओं से ज्यादा सुनते हैं। लेकिन इस पांच साल में राजेन्द्र बाबू की जयंती बिहार से बाहर मनाने की चर्चा सुनने को नहीं मिली। क्योंकि संयोगवश उस समय कहीं चुनाव नहीं था और अयोध्या मंदिर निर्माण जोर नहीं पकड़ा था।

नेहरू जयंती(14 नवंबर) की चर्चा अभी ठंडी नहीं पड़ी । राजेन्द्र बाबू की धरोहर बिहार विद्यापीठ के खंडहर बन जाने की ओर आज तक किसी भाजपाई या कांग्रेसी का ध्यान नहीं गया । लेकिन नेहरू मीमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी तथा नेहरू मीमोरियल फंड का अस्तित्व मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है । नेहरू जयंती करीब आने से पहले नेहरू मीमोरियल फंड को तीन मूर्ति एस्टेट कॉम्प्लेक्स खाली करने की नोटिस दी गयी । दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा स्टे मिल जाने से रूक गया ।

अहमदाबाद में 29 अक्टूबर को सरदार पटेल की 182 मीटर ‘एकता प्रतिमा’ उनकी जयंती पर स्थापित हुई और एक नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहरू मीमोरियल फंड को तीन मूर्ति कॉम्प्लेक्स खाली करने से राहत दी ।

नेहरू जयंती के समय बेंगलुरु की टीपू जयंती की चर्चा ज्यादा गरम रही । कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने 2014 से टीपू जयंती मनाने का सिलसिला शुरू किया । अभी वहां कांग्रेस और जद(एस) की मिलीजुली सरकार है और जद(एस) के एच. डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री हैं । 10 नवंबर को विधान सौधा में आयोजित टीपू जयंती समारोह में मुख्यमंत्री शामिल नहीं हुए । उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने भी इस सरकारी समारोह से खुद को अलग रखा । विपक्षी भाजपा ने इस बात को लेकर विरोध जताया, लेकिन जयंती समारोह शांतिपूर्वक संपन्न हुआ । 18वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की जयंती आयोजन में 2015 में पूरे देश में हिंसा भड़की । भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं ने पूरे प्रदेश में बवाल मचाया । दो लोग मारे गए । भाजपा के पूर्व मंत्री के. जी. बोपैया को पुलिस ने हिरासत में ले लिया । कांग्रेस सरकार के इस आयोजन से मुस्लिम मतदाता खुश हुए । भाजपा ने इस वर्ष भी टीपू जयंती का विरोध किया ।

ये सारी बातें तो आयी-गयी हो गयी । लेकिन ‘श्वेत क्रांति’ के जन्मदाता डा. वर्गीज कूरियन के 97वीं जयंती के अवसर पर एक भाजपा नेता का बयान देश के किसी भी धर्म या संप्रदाय के गले नहीं उतरा । भारत में ‘मिल्कमैन’(दूधवाला) के रूप में प्रख्यात डा. वर्गीज कूरियन किंवदंती और सामान्य ज्ञान का हिस्सा बन चुके हैं । दूध के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनानेवाली डेयरी क्रांति वर्गीज की देन है, जिसे ‘श्वेत क्रांति’ कहा जाता है । ‘अमूल’ के नाम से दुनिया भर में मशहूर गुजरात सहकारिता संघ अंतरराष्ट्रीय संगठन बन चुका है । 26 नवंबर को जिस दिन देशभर के डेयरी संचालक वर्गीज कुरियन की जयंती ‘राष्ट्रीय दूध दिवस’ के रूप में मना रहे थे, उस दिन एक भाजपा नेता दिलीप संघानी ने कहा कि कुरियन गुजरात दूध कोऑपरेटिव का पैसा इसाई मिशनरियों को भेज रहे थे । पूर्वमंत्री और सांसद दिलीप संघानी पिछले साल तक कांग्रेस में थे, तो उन्हें अमूल डेयरी के धंधे पर एतराज नहीं था । अभी भाजपा में आने के बाद उन्होंने इसे इसाई मिशनरी को फंड देनेवाला और धर्मान्तरण से जोड़ दिया । 2012 में कूरियन की मृत्यु हुई, तब तक और उसके बाद भी सब ठीक था । लेकिन आज वर्गीज कूरियन की धर्मनिरपेक्षता पर उनकी बेटी निर्मला कूरियन को सफाई देनी पड़ी कि वे नास्तिक थे और सिर्फ समाज सेवा उनका धर्म था । भाजपा की कौन कहे, कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी ने दिलीप संघानी द्वारा कूरियन पर की गयी इस टिप्पणी को नोटिस में नहीं लिया । कूरियन ने गुजरात के ही प्रतिष्ठित व्यक्ति त्रिभुवन दास पटेल के सहयोग से अमूल डेयरी शुरू किया । अमूल के चेयरमैन रामसिंह परमार दिलीप संघानी की टिप्पणी के खंडन करनेवाले दूसरे व्यक्ति थे ।

भाजपा की चुप्पी सियासी है । मिशनरी प्रभाव वाले मिजोरम में अगर चुनाव परिणाम 11 दिसंबर को भाजपा के पक्ष में नहीं गया तो वहां के मतदाताओं को ‘देशद्रोही’ बताने से भाजपाई चूकेंगे नहीं । सरदार पटेल की जयंती पर एकता मूर्ति स्थापित करने के समय गांधीवादी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया । गांधी के नाम पर वोट की राजनीति नहीं चल पाती । इसलिए राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती की कहीं कोई चर्चा दो अक्टूबर के बाद नहीं हुई । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साल तक मनाने की बात कही थी ।

अभी 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती आनेवाली है । उस अवसर पर हमेशा की तरह नेताजी की मृत्यु/लापता रहस्य जांच फाइलों की नरेंद्र मोदी ‘डिक्लासिफाई’ हावी रहेगी । नेताजी के पौत्र चन्द्र बोस भाजपा के टिकट पर नेताजी के जन्मस्थान वाली विधान सभा सीट भवानीपुर से 2016 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ असफल चुनाव लड़ चुके हैं । बंगाल में राजनीति करनेवाली नेताजी संस्थापित पार्टी फारवर्ड ब्लॉक के महासचिव देबव्रत विश्वास ने 23 जनवरी को ‘देशप्रेम दिवस’ घोषित करने और नेताजी द्वारा 1943 में सिंगापुर में गठित आजाद हिन्द फौज की कार्यवाहक सरकार को आजाद भारत की पहली सरकार के रूप में मान्यता देने की मांग तेज कर दी है । लोकसभा चुनाव तक इसकी आंच कम नहीं होगी । आजाद हिन्द फौज गठन की 75वीं वर्षगांठ पर 21 अक्टूबर को लाल किले से राष्ट्रध्वज फहराकर और एक प्रतीक चिन्ह का अनावरण करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फारवर्ड ब्लॉक समेत नेताजी के परिजनों की भी राजनीति हाइजैक कर ली है । नरेंद्र मोदी को भी लोकसभा चुनाव में बंगाल में यह ‘काम’ आयेगा ।