राष्ट्रपिता / बापू महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती बीत गयी । इन दोनों महान नेताओं के राष्ट्रवादी होने में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनके विषय में देश की जनता काफी कुछ जानती है । गांधी तो राष्ट्रपिता ही कहे जाते हैं । लेकिन राष्ट्रपिता की दो अक्टूबर जयंती इस तरह नहीं मनी, जैसे वे राष्ट्रवादी विचारक हों और उन्होंने भारत निर्माण के लिए बहुत लिखा, बोला । महात्मा गांधी के ‘सपनों का भारत’ की कोई झलक नहीं दिखी । महात्मा गांधी को ‘स्वच्छता अभियान’ से ज्यादा तवज्जो नहीं मिली । राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बापू के जन्मस्थल पोरबंदर जाकर ग्रामीण गुजरात को शौचमुक्त करने की नींव रखी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में राजघाट जाकर बापू की समाधि पर ‘सच्ची’ श्रद्धांजलि अर्पित करते समय महात्मा गांधी को शौचमुक्त करनेवाला नेता बताया । सुनकर लगा मानो महात्मा गांधी का योगदान देश को खुले में शौचमुक्त करके ‘स्वच्छता अभियान’ से ज्यादा नहीं था । इसकी तीसरी वर्षगांठ मनायी गयी । महात्मा गांधी की भारतीयता शौचालय तक ही सीमित है । ये है राष्ट्रपिता की जयंती का राष्ट्रीय जुमला । दो अक्टूबर को ही लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पड़ती है । उनके लायक प्रासंगिक जुमला का माहौल भी था । प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देकर भारत पाक युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे । अभी भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव इतना बढ़ा हुआ है कि द्विपक्षीय वार्ता बंद है । लाल बहादुर शास्त्री को उसी में निबटा दिया गया । ‘जय जवान जय किसान’ के नारों के साथ दिल्ली में विजय घाट पर श्रद्धासुमन चढ़े । उसके एक दिन पहले दशहरा के मौके पर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जवानों का हौसला बुलंद करने नियंत्रण रेखा की ऊंची चोटी पर पहुंची ।

भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री में वैसी भारतीयता नजर नहीं आयी जिसे राष्ट्रवादी एजेंडे में शामिल किया जाए । शास्त्री जी विचारक की श्रेणी में नहीं आए और महात्मा गांधी के विचार दर्शन में ऐसा कुछ नहीं लगा, जिससे राष्ट्रवाद झलके । इसलिए बापू की 148वीं जयंती ‘स्वच्छ भारत मिशन’ तक सिमटी रही और उसकी समाप्ति के साथ गत दो अक्टूबर को गांधी चर्चा भी समाप्त हो गयी । इतना जरूर सुनने को मिला कि बापू जयंती अहिंसा दिवस के रूप में भी मनायी जाती है मगर हिंसा और असहिष्णुता के देशव्यापी वातावरण में अहिंसा की बात किसी ‘राष्ट्रीय’ नेता के मुंह से नहीं निकली । गांधीजी के सपनों के भारत से भटकने के विरोध में समाजसेवी भ्रष्टाचार जेहादी अन्ना हजारे ने राजघाट पर एक दिन का सत्याग्रह किया ।

इससे ठीक विपरीत हिंदुत्व वाले ‘राष्ट्रवादी’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती पर समारोहों, आयोजनों और देश के चप्पे-चप्पे पर उनका नाम प्रचारित करने का सिलसिला लगातार जोर पकड़ता जा रहा है । पं. दीनदयाल उपाध्याय की तुलना कभी महात्मा गांधी से तो कभी स्वामी विवेकानंद से करके देश की जनता को बार-बार बताया जा रहा है कि ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ तय करने के लिए दीनदयाल उपाध्याय को जानें । जनादेश का मतलब यह नहीं होता कि सरकार अपनी सोच, नीतियां और विचार जनता पर आदेश की तरह थोपे । अभी तक दीनदयाल उपाध्याय को लोग आरएसएस विचारक के रूप में जानते थे । वे वास्तव में जनसंघ के नेता थे और भारत की संस्कृति, सभ्यता, सोच को सिर्फ हिंदुत्व नजरिए से देखा । उनके विचारों का भारतीय संविधान और भारतीयता भी एक खास धर्म के प्रभुत्व पर केंद्रित थी ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं समेत लगभग सभी भाजपा नेता पं. दीनदयाल उपाध्याय की तुलना महात्मा गांधी से ऐसे कर रहे है मानो वे गांधी के टक्कर के नेता हों । बल्कि यों कहें कि दीनदयाल उपाध्याय को गांधी से बड़ा नेता साबित करने की असफल कोशिश की जा रही है । सितंबर में दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती के समय तो प्रधानमंत्री ने अमेरिका के शिकागो जाकर स्वामी विवेकानंद से दीनदयाल उपाध्याय की तुलना कर डाली । महात्मा गांधी के लिए विचारक या चिंतक शब्द किसी भाजपा नेता के मुंह से नहीं निकलता । लेकिन दीनदयाल उपाध्याय को चिंतक, विचारक, दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरू और सांस्कृतिक पुरोधा बताया जा रहा है । तभी तो नरेंद्र मोदी ने गांधी से भी आगे छलांग लगाकर स्वामी विवेकानंद से दीनदयाल उपाध्याय की तुलना कर डाली । 11 सितंबर को शिकागो में नरेंद्र मोदी के इस संबोधन भाषण समारोह की वीडियो रिकार्डिंग दिखाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) ने देश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को सर्कुलर भेजा । नरेंद्र मोदी अपने ‘राष्ट्रवादी’ विचारक को विश्वस्तरीय दिखाना चाहत थे । पढ़े-लिखे और साक्षर मतदाताओं को यह जबरन थोपी जा रही विचारधारा समझ में नहीं आ रही है । जनादेश का उद्देश्य सिर्फ सत्ता परिवर्तन था, जबकि भाजपा नेता देश की सोच, विवक का कायापलट करने में जुटे हैं । भाजपा नेता जनता पर अपनी सोच थोप रह हं । संघी नेता जीतोड़ प्रयास में हैं कि जनता वही सही माने जो वे बार-बार बता रहे हैं । वे मान बैठे हैं कि लोग वही जानना चाहते हैं जो केंद्र में बैठी भाजपा सरकार और उनके समर्थक संघी नेता बताते हैं ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 सितंबर को शिकागो में विश्व धर्मसंसद सम्मेलन के अवसर पर स्वामी विवेकानंद की 125वीं जयंती और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती इकट्ठे मनायी । अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने एक ही मंच से देश-विदेश को यह समझाने का प्रयास किया कि दीनदयाल विवेकानंद जैसे ही दार्शनिक थे । 18वीं सदी में शिकागो में ही विवेकानंद ने विश्व धर्मसंसद को संबोधित करके भारतीय दर्शन का डंका बजाया था । नरेंद्र मोदी अपने संघी नेता दीनदयाल उपाध्याय को विवेकानंद के समान दार्शनिक साबित करने का डंका बजा आए । वे चाहते थे कि इसकी आवाज सभी सुनें । मगर भारत के लोगों के ही गले नहीं उतरी तो विदेश में दीनदयाल उपाध्याय का नाम कौन जानेगा ।

खास तौर से इसी समारोह की ऑडियो-विजुअल दिखाने के लिए यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रमुखों को विशेष सर्कुलर भेजा । वैसे तो पूरे देश के लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में विवेकानंद और दीनदयाल उपाध्याय को एक समान विचारक मानने को बाध्य किया जाए । परंतु सबसे तीखी प्रतिक्रिया बंगाल में हुई । शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने अपने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को सर्कुलर पर बिल्कुल ध्यान न देने कहा और इसे भगवाकरण का ‘तुगलकी’ फरमान बताया ।

विवेकानंद से दीनदयाल उपाध्याय की तुलना करने के बावजूद नरेंद्र मोदी को विवेकानंद इस लायक नहीं लगे कि उनकी जयंती दीनदयाल उपाध्याय की तरह पूरे वर्ष मनायी जाए । क्योंकि विवेकानंद में दीनदयाल उपाध्याय टाईप ऐसा ‘हिन्दुत्व’ दर्शन खोजना असंभव है, जिसका राजनीतिकरण और सरकारीकरण किया जाए ।

हिन्दुत्व और भारत-पाक तनाव के मद्देनजर इस मायने में भी दीनदयाल उपाध्याय प्रासंगिक हैं कि उन्होंने भारत-पाक सीमा पर 10 माईल कोरीडोर बनाने का प्रस्ताव दिया था, जहां मुसलमानों को बसने की इजाजत न दी जाए ।

15 खण्डों में दीनदयाल उपाध्याय ‘हिन्दुत्व कर्म दर्शन’ प्रकाशित किया गया है, जो भाजपा शासित राज्य झारखंड, मध्यप्रदेश, असम, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश ने थोक भाव में प्राप्त किया है । इसमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर जिले के एक नगर पंचायत का नाम दीनदयाल करने को प्रतिबद्ध हैं । स्कूलों में उपाध्याय दर्शन वितरित किया गया है । मुगलसराय स्टेशन और आगरा हवाई अड्डे का नाम दीनदयाल उपाध्याय हो गया ।

देश की जनता जो जानना चाहती है, उससे भाजपा बचना चाहती है । लोग जानना चाहते हैं कि कथित रूप से इतने बड़े ‘विचारक’ दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु की जांच नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की रहस्यमय मृत्यु की तरह क्यों नहीं करायी गयी । मुगलसराय स्टेशन पर यार्ड में 1968 में उनकी लाश पायी गयी । स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय रखने से रहस्य नहीं ढंका । गांधी की मौत पर संघी नेता बौखलाते हैं । लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु जांच डंप हैं । मगर दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु पर संघी नेता की चुप्पी संदेह पैदा करती है । संघी(भाजपाई) नेताओं की झुंझलाहट का कारण यह है कि इनके पास ऐसा कोई राष्ट्रीय नेता नहीं है जिसका आजादी की लड़ाई में और उसके बाद भी भारत निर्माण में योगदान हो । ले-दे के एक दीनदयाल उपाध्याय हैं, जिनके दर्शन में राष्ट्र है, उससे ऊपर हिन्दुत्व है लेकिन ऐसा भारत नहीं है जिसमें सर्वधर्म और संस्कृति का समन्वय हो । कांग्रेस खेमे से सरदार बल्लभ भाई पटेल को लपकने की कोशिश में सफलता नहीं मिली । वास्तविकता ये है कि नरेंद्र मोदी नेहरू परिवार के विकल्प बने हैं, कांग्रेस के नहीं ।

अटल बिहारी वाजपेयी के समकालीन होने के बावजूद दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व वैसा सर्वस्वीकार्य नहीं बन पाया । असम में भाजपा सरकार की केंद्र पोषित सभी मोडल डिग्री कॉलेजों का नाम ‘दीनदयाल उपाध्याय आदर्श महाविद्यालय’ रखने की योजना का विरोध हो रहा है ।

वाममोर्चा शासित केरल से ही प्रधानमंत्री ने दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती आयोजनों की भड़काऊ शुरूआत की, जहां आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है । कर्नाटक में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का कारण भाजपा के खिलाफ लिखना बताया जाता है ।

प्रधानमंत्री द्वारा 2015 में गठित विधि आयोग समान नागरिक संहिता पर इस साल के अंत तक अपनी रिपोर्ट सौंप देगा । उसके पहले नरेंद्र मोदी अपनी ‘विचारसंहिता’ लादने पर तुले हैं ।