पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आखिरकार पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की स्मृति, धरोहर तीन मूर्ति का स्वरूप न बदलें । मनमोहन सिंह को यह भी बताना पड़ा कि नेहरू सिर्फ कांग्रेस के नहीं, पूरे देश के नेता थे और उनकी धरोहर स्थल तीन मूर्ति परिसर स्थित नेहरू मीमोरियल म्यूजियम लाइब्रेरी का स्वरूप बदलना अशोभनीय होगा, इसलिए तीन मूर्ति के साथ ‘छेड़छाड़’ न करें ।

पूर्व कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्तमान भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे समय में पत्र लिखा, जब पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की अंत्येष्टि और उनकी अस्थि कलश यात्रा पूरे देश में आयोजित की गयी । पवित्र नदियों में भस्म प्रवाहित करने का सिलसिला अभी समाप्त नहीं हुआ है । अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में दो बातों का प्रचार अंत्येष्टि के समय सबसे ज्यादा हुआ - एक, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहा था कि ‘यह युवक एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा ।’ दूसरे, अटल बिहारी ऐसे भाजपा नेता थे, जिनका सभी पार्टियों के नेता सम्मान करते थे ।

मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी के नाम लिखे गए अपने पत्र में अटल बिहारी वाजपेयी की उन पंक्तियों का जिक्र किया है जो उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु पर संसद में शोक प्रकाश के दौरान कहा था - ‘तीन मूर्ति की शोभा बढ़ानेवाले ऐसे निवासी इस भवन को अब कभी नहीं मिलेंगे । ऐसा विशाल बहुआयामी और राष्ट्रनिर्माण में विपक्ष को साथ लेकर चलनेवाले प्रभावशाली व्यक्तित्व अब नहीं मिलेंगे । प्रधानमंत्री नहरू जैस भद्र और महान व्यक्ति निकट भविष्य में फिर नहीं मिलेंगे । वैचारिक मतभेद के बावजूद हम पं. नेहरू के आदर्शों, देश के प्रति प्रेम और दृढ़ता का सम्मान करते थे ।’

मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी का याद दिला दिया है कि जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बनने के बाद मृत्युपर्यन्त(1964) 16 वर्षों तक तीन मूर्ति भवन में ही रहे । यह कोई कांग्रेस की विरासत या धरोहर नहीं, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की स्मृति धरोहर है, जो कांग्रेस के नहीं देश के नेता थे । इस ऐतिहासिक परिसंपत्ति का स्वरूप समय-समय पर बदला गया है । तीन मूर्ति भवन 1930 में फिरंगी फौज के चीफ कमांडर के लिए बना । आजादी के बाद यह भवन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का सरकारी आवास बन गया । इसमें रहनेवाले वे एकमात्र प्रधानमंत्री थे । उनके बाद के प्रधानमंत्री रेसकोर्स में स्थायी आवास बनने तक विभिन्न बंगलो में रहे ।

तीनमूर्ति परिसर में बाद में कांग्रेस सरकारों ने नेहरू तारामंडल बनाया । जवाहर लाल नेहरू मीमोरियल फंड यहीं से काम करता है । इसका कुछ हिस्सा दिल्ली पुलिस के इस्तेमाल में है । भाजपा सरकार का प्रस्तावित फेरबदल मेन बिल्डिंग पर केंद्रित है, जहां नेहरू रहते थे । जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस नेता नहीं, आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में देशवासी जानते हैं । पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा गया यह पत्र अखबारों के जरिए सार्वजनिक किया है, ताकि देशवासियों को इसकी जानकारी हो । मनमोहन सिंह ने अपने पत्र में अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र बार-बार किया है । मनमोहन सिंह ने यह भी लिखा है कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के छह साल के कार्यकाल के दौरान किसी भी रूप में नेहरू मीमोरियल म्यूजियम लाइब्रेरी और तीन मूर्ति कॉम्प्लेक्स का स्वरूप बदलने की कोई कोशिश नहीं हुई ।

तीन मूर्ति भवन देश में नेहरू स्मारक संग्राहलय के रूप में ही जाना जाता है और राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मशहूर है । लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस धरोहर में कथित बदलाव के प्रयासों पर चिंता जतानेवाले पूर्व कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने चिंता जतायी है । मनमोहन सिंह ने जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संसद में 1964 में व्यक्त संवेदना का हवाला देते हुए तीनमूर्ति परिसर के साथ छेड़छाड़ न करने का नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है । अपने दो पन्ने के पत्र में जरा तल्ख अंदाज में मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी को लिखा है कि तीन मूर्ति कॉम्प्लेक्स को यथावत् रहने दिया जाए जैसा अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था । खबर ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन मूर्ति कॉम्प्लेक्स में सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय स्थापित करना चाहते हैं । जाहिर है कि नरेंद्र मोदी का अपना भी उनके प्रधानमंत्री रहते हुए आ जाएगा । अगर वे हट गए तो उनके बाद के प्रधानमंत्री को क्या जरूरत है, प्रथम प्रधानमंत्री के साथ संग्रहालय में जगह पाने की । नरेंद्र मोदी से पहले जितने गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए, किसी ने भी इस महात्त्वाकांक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया । मनमोहन सिंह ने भी सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी का और सिर्फ वाजपेयी की ही नेहरू के प्रति व्यक्त शोक संवेदना का जिक्र किया है । इससे एक बात झलक जाती है कि नरेंद्र मोदी सिर्फ इसलिए तीन मूर्ति भवन के साथ छेड़छाड़ करना चाहते हैं कि ऐसे प्रथम प्रधानमंत्री का ही यह धरोहर क्यों रहेगा, जो कांग्रेस के थे । मनमोहन सिंह के पत्र से स्पष्ट हो गया कि नरेंद्र मोदी का बदलाव के पीछे उद्देश्य जनता के बीच यह प्रचार करना है कि नेहरू देश के नहीं, कांग्रेस के थे । अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में लोग पहले से जानते थे कि 1952 में जब पहली बार वाजपेयी लोकसभा पहुंचे तो नेहरू ने कुछ विदेशी अतिथियों से परिचय कराते हुए वाजपेयी के विषय में कहा - ‘यह युवक एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा ।’ इसको अटल जी की मृत्यु के बाद भाजपा नेतृत्व ने प्रचारित किया और नेहरू स्मृति धरोहर के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में मनमोहन सिंह ने वाजपेयी का नेहरू के प्रति व्यक्ति शोक संदेश का हवाला दिया और इस बात पर जोर दिया कि भाजपा प्रधानमंत्री होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने तीनमूर्ति परिसर में बदलाव की कोशिश नहीं की ।

यह तो निर्विवाद सत्य है कि जवाहर लाल नेहरू सिर्फ एक स्वाधीनता सेनानी, कांग्रेस नेता और प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं थे । उनके पास एक समग्र विश्वदृष्टि थी और नेहरू ने ही विश्व मानचित्र पर भारत को एक स्वतंत्र अस्तित्व वाली छवि स्थापित की । नेहरू को पहले से किया धरा कुछ भी नहीं मिला था । उन्होंने भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भूमि की नींव तैयार की, जिस पर अभी तक भारत टिका है । देश को वैसी व्यापक सोचवाला कूटनीतिज्ञ नेहरू के बाद नहीं मिला । नरेंद्र मोदी आए दिन अपनी विदेश यात्रा के दौरान जिस राजनयिक सम्बन्ध की दुहाई देते हैं, वो नेहरू की स्थापित की हुई है । ऐसे देशों की भी यात्रा नरेंद्र मोदी ने की है, जहां नेहरू के बाद कोई प्रधानमंत्री नहीं गए । नेहरूवाली विश्व दृष्टि वाजपेयी के पास थी । वाजपेयी और नेहरू दोनों की ही छवि जनता के बीच दलीय राजनीति से ऊपर है । लेकिन नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही ऐसी कांग्रेस विरोधी नीति अपनाने में जुट गए मानो नेहरू और इंदिरा गांधी में कोई फर्क न हो । 2014 में नेहरू की 125वीं जयंती के उपलक्ष में एक नयी कमिटी बनायी, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद नेहरू के योगदान का इतिहास नए सिरे से लिखने का काम सौंपा गया । मनमोहन सिंह द्वारा गठित कमिटी को नरेंद्र मोदी ने बदल दिया, जिसमें वामपंथी विचारक और इतिहासकार थे । अभी ऐसे समय में नेहरू का मामला उठा है, जब भाजपा सरकार वाम उग्रवाद से जुड़े विचारक साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के दमन पर तुली है । केरल में वाममोर्चा की सरकार ने जनवरी, 2017 में केरल विधान सभा की हीरक जयंती समारोह में महात्मा गांधी, नेहरू और अंबेडकर की तस्वीर लगाना जरूरी नहीं समझा । केरल कांग्रेस ने ऐसे नेताओं के प्रति ‘असम्मान’ के खिलाफ आवाज उठायी । 2016 में कांग्रेस नीत मोर्चा को हटाकर वाममोर्चा ने केरल में सरकार बनायी ।

केरल से छपनेवाले मलयाली आरएसएस अखबार ‘केसरी’ ने 2014 में नेहरू जयंती उपलक्ष में छापा कि ‘नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी के बजाए नेहरू को मारना चाहिए था ।’

नेहरू का नाम इंदिरा गांधी की जगह सियासी राजनीति में घसीटा जा रहा है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने रास्ता इंदिरा गांधी वाला ही चुना है ।

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के एक साल के अनुभव पर लिखी किताब के विमोचन के अवसर पर 2 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा - ‘अगर कोई अनुशासन की बात करता है, जो तानाशाह कह दिया जाता है, लेकिन अनुशासन तानाशाही नहीं है ।’ उस अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा और मनमोहन सिंह भी मौजूद थे । इंदिरा गांधी का इमर्जेंसी नारा याद कर लें - ‘अनुशासन, दूर दृष्टि, पक्का इरादा ।’ इंदिरा विरोध से उपजे नेताओं के मुंह से अनुशासन की दुहाई शोभा नहीं देती । मोदी और मनमोहन सिंह ने नेहरू पर कोई बात की हो, ऐसी रिपोर्ट नहीं मिली । मनमोहन सिंह के पत्र लिखे 10 दिन हो गए ।

तिब्बत के आध्यात्मिक गुरू दलाईलामा को भी भाजपा की हवा लग गयी । गत अगस्त में बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में दलाईलामा ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए नेहरू का रवैया ‘आत्मकेंद्रित’ था, जबकि महात्मा गांधी मुहम्मद अलो जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे । दलाई लामा ने यह भी दावा किया कि यदि जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने की गांधी की इच्छा पूरी हो जाती तो भारत का विभाजन नहीं होता । दलाई लामा ने इस बयान के लिए माफी मांग ली । लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि चीन से विरोध मोल लेकर 1959 में अगर तिब्बतियों को नेहरू ने पनाह नहीं दी होती तो उनका अस्तित्व भी नहीं बचता ।