विदेशमंत्री सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में शामिल होकर हाल ही में न्यूयॉर्क से लौटी हैं । यह लगातार तीसरा सत्र है, जिसे संबोधित करने गयीं सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के भारतीय दावे का जिक्र नहीं किया । विदेश मंत्री ने सुरक्षा परिषद में सुधार की भी चर्चा नहीं की ।
भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ शासनकाल का संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के हिसाब से 2018 अंतिम वर्ष ह । यह सत्र हर साल सितंबर के अंत में होता है । अगले सत्र से पहले होनेवाले आम चुनाव के परिणाम पर निर्भर है कि 2019 के संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में भारत का पक्ष किस रूप में रखा जाएगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में भारत के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष को कमजोर किया और वो है - सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का दावा । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस गठजोड़ शासन के 10 साल के कार्यकाल में स्थायी सीट का दावा जितना ही मजबूत हुआ था, नरेंद्र मोदी शासनकाल में उतना ही कमजोर हुआ । मनमोहन सिंह से पहले की सरकारों ने और यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली भाजपा गठजोड़ शासन में भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का दावा हमेशा सुर्खियों में रहा । स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधित करने जब भी अमेरिका गए या पी-5 देशों की यात्रा पर गए, स्थायी सीट के अपने दावे पर समर्थन जुटाना नहीं भूले ।
नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही पहले तो ऐसा जोरदार जलवा दिखाया मानो संयुक्त राष्ट्र सुधार करके और स्थायी सीट प्राप्त करके रहेंगे । लेकिन तुरंत ही उनका सारा सुधार भारत को सिर्फ एक आर्थिक और व्यापारिक महाशक्ति बनाने पर सीमित रह गया । पी-5, अर्थात् सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों से भारत का संबंध निवेश व्यापार और रक्षा में ही उलझकर रह गया । प्रधानमंत्री आए दिन विदेश दौरे पर जाते रहते हैं और विभिन्न फोरम में उनकी पी-5 के सदस्यों में से किसी-न-किसी से भेंट होती है । लेकिन प्रधानमंत्री कभी औपचारिक रूप से भो भारतीय दावे का जिक्र नहीं करते । पी-5 के ये सदस्य देश हैं - अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन । प्रधानमंत्री बनने के पहले और दूसरे वर्ष नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र को संबोधित करने न्यूयॉर्क गए । 2014 में प्रधानमंत्री का समय खरबपति बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संचालकों से मिलने में गुजरा ।
2015 में भारतीय प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को योगमय बना दिया । दोनों ही सत्रों में सिर्फ अतंरराष्ट्रीय आतंकवाद हावी रहा, जिसके सम्मिलित स्वर में पी-5 के देशों ने बाकी सदस्यों की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की आवाज दबा दो । नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र में योग का नया अध्याय शुरू करने के दौरान ही बड़े व्यावसायिकों से मिलना नहीं भूले । सुरक्षा परिषद में सुधार की आवाज तो उनके मुंह से निकली ही नहीं । उनसे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ । जो भी प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने गए, उनका पूरा समय विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों, विदेशमंत्रियों और उनके संयुक्त राष्ट्र स्थित प्रतिनिधियों से मिलकर समर्थन जुटाने में गुजरा ।
प्रधानमंत्री के एजेंडे पर चलते हुए विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दे उठाए, व्यापारिक और आर्थिक हित को प्राथमिकता दी । बची-खुची कसर पूरी हो गयी । अर्थात् सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का दावा बिल्कुल ही डंप हो गया ।
पिछले तीन वर्षों से संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र को संबोधित करने सुषमा स्वराज अमेरिका जा रही हैं । इस बार अपने संबोधन भाषण में सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान से जुड़ा कश्मीर वाला मुद्दा उठाया, वो तो सही था । वो अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का ऐसा पहलू है जिसे दुनिया के अन्य देश तरजीह नहीं देते । लेकिन विदेशमंत्री के भाषण में संयुक्त राष्ट्र सुधार की बात नहीं आयी । न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान जिन राजनयिकों से सुषमा स्वराज का मिलना-जुलना हुआ उनके बीच स्थायी सीट का दावा नहीं आया । न्यूयॉर्क से वापस लौटने से पहले अंतिम दिन 27 सितंबर को सुषमा स्वराज एंटिगुआ और बरमूडा के विदेशमंत्री ई पी चेट ग्रीन से मिली । यह मुलाकात सबसे महत्वपूर्ण मानी गयी, क्योंकि पंजाब नेशनल बैंक को 2 अरब डॉलर की चपत लगाकर भागनेवाले हीरा व्यापारी मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण पर केंद्रित था । भगोड़ा जालसाज मेहुल चोकसी, एंटिगुआ सरकार के संरक्षण में रह रहा है और वहां के कानून के अनुसार जल्द प्रत्यर्पण संभव नहीं है ।
सुषमा स्वराज के दिल्ली लौटने के समय तक गांधी जयंती करीब आ गया । महात्मा गांधी की इस वर्ष 150वीं जयंती के सालभर चलनेवाले आयोजन के उपलक्ष में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित थे । दो अक्टूबर को आयोजन समाप्त होने के बाद अगले दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव का राष्ट्रपति भवन में स्वागत के दौरान सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा उठाया । सरकार के लिए अब यह कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है, इसलिए राष्ट्रपति की संयुक्त राष्ट्र सधार चर्चा महज खानापूरी भर तक सीमित रही । अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव आए हुए थे तो उनसे बातचीत के दौरान सुरक्षा परिषद में सुधार की चर्चा न हो तो फिर और बात क्या हो । इसलिए यह झेंप मिटाने वाली साबित होकर रह गयी । लेकिन राष्ट्रपति ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का नाम नहीं लिया । भारत ने चार दशकों से जिस सुधार का अभियान चलाया हुआ है, वो सिर्फ सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करने पर केंद्रित है । स्थायी सीट का मतलब ‘वीटो पावर’, जो सिर्फ पी-5 के ही पास है और एक ही वीटा बाकी 188 सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से पारित महासभा प्रस्ताव को निरस्त करने के लिए पर्याप्त है । किसी सदस्य को उसके खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार नहीं है । इसी असमानता को समाप्त करने के लिए अब तक भारतीय नेताओं ने विश्वस्तर पर अभियान चला रखा था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठंडे बस्ते में डाल दिया ।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव को बुलाया जाना प्रधानमंत्री के लिए अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस की अगली कड़ी बनी । प्रधानमंत्री 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने गए तो उनके प्रयासों से गांधी जयंती को संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत करवायी और बाकी समय निवेशकों को न्योता देने में गुजारा । 26 जनवरी, 2015 के दिन अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली में थे । प्रधानमंत्री ने स्थायी सीट तो क्या संयुक्त राष्ट्र सुधार का भी जिक्र नहीं किया । 2018 में जब बाराक ओबामा आए तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें उसी चर्चा पर केंद्रित रखा । उतना ही नहीं, संयोग कुछ ऐसा रहा कि 2020 में ‘वीटो पावर’ युक्त पी-5 के पांचों सदस्य थोड़े-थोड़े अंतर से भारत आए और कांग्रेस गठबंधन सरकार ने बातचीत का मुख्य एजेंडा वही रखा ।
सभी जानते हैं कि पी-5 के देश अपनी दबंगई की बदौलत किसी भी अन्य सदस्य को अपनी पंगत में ‘वीटो पावर’ वाली कुर्सी पर बैठने नहीं देना चाहते । कहने के लिए विश्व पंचायत संयुक्त राष्ट्र संघ में स्पष्ट सामंत और रैयत वाली व्यवस्था है । सुधार अभियान से कम-से-कम दबाव तो बना रहता है ।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय शौचालय सम्मेलन और स्वच्छ भारत अभियान की चौथी वर्षगांठ में भाग लेने अभी दिल्ली आए थे । संयुक्त राष्ट्र के अंदर मौजूद गंदगी दूर करना उनके वश का नहीं है । क्योंकि महासचिव हमेशा रैयत देशों से चुने जाते हैं, जिनका वीटो के आगे कोई जोर नहीं चलता । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद की जा रही थी कि वे स्वच्छ भारत अभियान की तरह ही संयुक्त राष्ट्र में पारदर्शिता और समानता अभियान भी चलाए रखते ।
रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन से एस-400 हथियार डील के दौरान भी चर्चा की जा सकती थी । इस डील से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाराज हैं। उन्होंने 2017 में ही कहने के लिए भारत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था । लेकिन जब भारत को हो इसमें दिलचस्पी नहीं रही तो अमेरिका क्या करेगा । 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ओवल कार्यालय में भारतीय मूल के अमेरिकी अधिकारियों के साथ दिवाली मनाया और अपने संयुक्त राष्ट्र राजदूत निकी हैले के जरिए संदेश भिजवाया कि भारत वीटो पावर की जिद छोड़ दे । निक्की हेले भी भारतीय मूल की हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति का यह रवैया शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा । निक्की हेले ने 2018 की दिवाली से पहले इसी हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत पद से इस्तीफा दे दिया ।
उसके पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 72वें सत्र के संबोधन में इस मुद्दे को शामिल नहीं किया । उनका समय एच-1 बी, कारोबार, व्यवसाय और आई टी प्रोफेशनल से मिलने में बीता ।
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष 2004 में ‘वीटो पावर’ के चार प्रबल दावेदारों के ग्रुप की नींव तैयार की । भाजपा की हार के बाद प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह ने ग्रुप-4 का विधिवत गठन किया जो 10 साल में लगातार मजबूत होता गया । ग्रुप-4 में भारत के अलावे जापान, जर्मनी और ब्राजील हैं । अब इसका अस्तित्व नाममात्र का बचा है और कारोबार में लिप्त हैं ।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली विदेश यात्रा के क्रम में ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने ब्राजील गए और वीटो पावर के लिए 2015 की समय सीमा तय कर दी । शायद उन्हें याद भी न हो । ब्रिक्स के सदस्य देशों में वीटो पावर वाले रूस और चीन के अलावे दक्षिण अफ्रीका भी है, जो वीटो पावर का दावेदार है ।