आजादी की लड़ाई के इतिहास में वर्णित 9 अगस्त, 1942 भारत छोड़ो आंदोलन दिवस और 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में लोग जानते हैं । हर साल 9 अगस्त से ही स्वतंत्रता संघर्ष को याद करने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है, जिसकी परिणति 15 अगस्त को राष्ट्रीय जश्न और उत्साह के साथ होती है ।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सीपीआई(भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी) की भूमिका को लेकर भारतवासियों का संदेह आज तक दूर नहीं हो पाया । अभी भारत छोड़ो आंदोलन की 77वीं वर्षगांठ के समय इसका एक नया रूप देखने को मिला । सीपीआई को आजादी की लड़ाई में अपने ‘योगदान’ की बार-बार सफाई देनी पड़ी । उस समय एक ही कम्यूनिस्ट पार्टी थी, जो सीपीआई के रूप में जानी जाती थी । 1964 के भारत-चीन युद्ध के बाद फूट पड़ी । तब से सीपीआई और सीपीएम(मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) नाम चलता है ।
9 अगस्त को पूरा देश अभी जब भारत छोड़ो आंदोलन की 77वीं वर्षगांठ के समय राष्ट्रध्वज तिरंगा लहराते हुए स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहा था, उस समय सीपीआई और सीपीएम जम्मू कश्मीर से धारा-370 और 35-ए खत्म करने का विरोध दिवस मना रहे थे । कम्यूनिस्ट पार्टियों ने हमेशा 9 अगस्त के किसी आयोजन से खुद को अलग रखा । 15 अगस्त, 1947 के दिन भी सत्ता में होने की स्थिति में खानापूरी मजबूरी में करनी पड़ती है । सिर्फ वामदलों का ही ऐसा रिकार्ड है कि 9 अगस्त की किसी भी गतिविधि से खुद को अलग रखते हैं । इस बार 42 क्रांति के समय सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई(एमएल) को मार्च पास्ट करते देखा गया । लेकिन वो मार्च पास्ट 42 क्रांति का नहीं, धारा-370 हटाकर जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के भाजपा गठजोड़ सरकार के फैसले के खिलाफ था । संयोग से इसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद सत्र समाप्त होते-होते धारा-370 और 35-ए के अंतर्गत प्राप्त जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करनेवाला बिल दोनों सदनों से पारित कराया । प्रधानमंत्री ने इस कदम को ‘ऐतिहासिक’ बताया और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तुरंत बिल को मंजूरी देकर अध्यादेश जारी कर दिया । इसीलिए कम्यूनिस्ट पार्टियां 42 क्रांति के समय सक्रिय देखी गयीं ।
9 अगस्त को सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और सीपीआई महासचिव डी. राजा कश्मीर जाना चाहते थे । श्रीनगर हवाई अड्डे पर उन्हें रोक दिया गया । वापस दिल्ली लौटकर दोनों कम्यूनिस्ट नेताओं ने संवाददाताओं का बताया - ‘जम्मू व कश्मीर का असली सच सामने नहीं आया है । अगर सब ठीक-ठाक है, तो हमें क्यों रोका गया ।’ एक और खबर आयी कि ये दोनों कश्मीर के सीपीएम नेता और एकमात्र विधायक मोहम्मद युसुफ तरीगामी को देखने जाना चाहते थे जो बीमार हैं । सीपीएम, सीपीआई नेता कश्मीर जाकर देश में ऐसा संदेश भेजना चाहते थे, मानो कांग्रेस और भाजपा की तरह इनका राष्ट्रीय जनाधार हो । आजादी के समय से लेकर अभी तक कश्मीर पर कांग्रेस और भाजपा का रवैया तो देशवासी जानते हैं । मगर कम्यूनिस्ट पार्टियों के रूख से लोग परिचित नहीं है । सीपीआई कश्मीर में कहीं नहीं है, वर्षों से सीपीएम के भी एक ही विधायक हैं ।
धारा-370 और 35-ए हटाए जाने के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान देखिए क्या हुआ । मंडी हाउस से बाराखभा रोड होते हुए जंतर-मंतर तक इस विरोध जुलूस में तकरीबन 500-600 प्रदर्शनकारी थे । नेतृत्वकर्ताओं में सीपीआई महासचिव डी. राजा और सीपीएम पोलित ब्यूरो नेता वृंदा करात आगे-आगे चल रही थी । डी. राजा ने जोर देकर कहा - ‘हम(वामलोग) अंग्रेज से लड़े और हम हिन्दू फिरकापरस्तों से भी लड़ेंगे ।’ सीपीआई नेता की यह पंक्ति गौर करने लायक है । उनका मीडिया से बात करने का अंदाज ऐसा था, मानो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में कम्यूनिस्टों की अहम भूमिका रही हो और भाजपा ने अंग्रेज की तरह भारत पर कब्जा कर लिया हो ।
उसी समय सीपीआई ने चुनाव आयोग के पास सफाई दी - ‘हम देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से हैं और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया । हमने अपनी राष्ट्रीय उपस्थिति बरकरार रखी है और उसे रहने दें ।’ सीपीआई अर्थात् मूल भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का अगर ऐसा रिकार्ड रहा है, तो आज ये हालत क्यों हो गयी कि राष्ट्रीय दल के रूप में दर्जा समाप्त होने को है । इस संबंध में चुनाव आयोग के अल्टीमेटम के जवाब में सीपीआई को यह सफाई देनी पड़ी है ।
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिखनेवाले ज्यादातर वामपंथी हैं । सबों ने आजादी की लड़ाई में कम्यूनिस्टों की भूमिका को इस तरह पेश किया, मानो सीपीआई का हर कदम भारत के हित में हो । जबकि वास्तविकता ये थी कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ की सीपीएसयू(कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ दि सोवियत यूनियन) का डिक्टैट लागू करना चाहा । सीपीआई रूस की ओर से तय किए एजेंडे पर आजादी से पहले भी चली और उसके बाद भी चलती रही । 9 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने जब ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नारा बुलंद किया तो पूरा देश उनके साथ था, सीपीआई को छोड़कर । दूसरे विश्वयुद्ध का समय था । उस समय के हालातों का विश्लेषण करें, तो इसका कोई माकूल जवाब नहीं मिलता कि सीपीआई ने भारत छोड़ो आंदोलन से खुद को अलग क्यों रखा? उतना ही नहीं, रूस के निर्देश पर सीपीआई ने 42 क्रांति का विरोध किया । अंग्रेज सीपीआई की कमजोरी जानते थे । इसीलिए रूस के जरिए इंगलैंड ने आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया । अंग्रेजों को रूस के साथ मिलकर जर्मनी का मुकाबला करना था । इसलिए भारतीय नेताओं को झांसा दिया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध में इंगलैंड का साथ दें तो भारत को आजाद कर देंगे । 1945 में युद्ध समाप्ति के दो साल बाद तक अंग्रेज जमे रहे । उस दौरान कम्यूनिस्ट क्या कर रहे थे, ये सिर्फ वही जानते हैं ।
अंग्रेजों ने अपने हित में समर्थन मांगा था, भारत के हित में नहीं । सीपीआई ने रूस के हित में 42 क्रांति का विरोध किया था, भारतीय आजादी के हित में नहीं । महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस समेत अमूमन सभी स्वतंत्रता सेनानियों से कम्यूनिस्टों का मतभेद रहा । स्वतंत्रता आंदोलन के एकमात्र सबसे बड़े मंच कांग्रेस की नीतियों से कम्यूनिस्ट सहमत नहीं होते थे । नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भारत को आजाद कराने के लिए इंगलैंड और रूस के सबसे बड़े दुश्मन जर्मनी तथा जापान से सैनिक मदद मांगने युद्ध के दौरान ही बर्लिन, टोक्यो गए । उसमें गलत क्या था? लेकिन भारतीय कम्यूस्टों ने नेताजी को फासिस्ट घोषित कर दिया । भारतीय नीति शास्त्र के प्रणेता कौटिल्य के अनुसार शत्रु के शत्रु से तो मित्रता स्वाभाविक है । कम्यूनिस्ट भाजपा को भी फासिस्ट कहते हैं, जो दूसरी बार लोकसभा में भारी बहुमत हासिल करके 21वीं सदी की सबसे मजबूत जनाधार वाली पार्टी साबित हुई है ।
1942 से 1947 तक और उसके बाद भी शोषित पीड़ित कारखाना श्रमिकों तथा जमींदारी शोषण के शिकार गरीब रैयत किसानों के हक की लड़ाई से उपजी सीपीआई का आज वजूद खतरे में है । 1952 में पहले आम चुनाव में लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी सीपीआई को आज बगलें झांकनी पड़ रही है । तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा देनेवाला किसान आंदोलन आजादी की लड़ाई के दौरान ही तेज हुआ और आजादी के बाद भी तेज रहा । उसका नेतृत्व कम्यूनिस्टों ने किया । तेलंगाना राज्य बना तो जरूर, मगर उसका श्रेय भाजपा और कांग्रेस ने लिया ।
कम्यूनिस्टों ने भारतीय जनमानस की नब्ज को नहीं समझा । ये ‘जनवादी’ जनता के हिसाब से नहीं चलते, जनता को रूस और चीन के हिसाब से चलाना चाहते हैं । अवाम कम्यूनिस्टों के साथ रहा, कम्यूनिस्ट अवाम के साथ नहीं रहे । भारतवासियों को महात्मा गांधी और मार्क्स, लेनिन, माओ में से किसी का रास्ता अपनाना होगा तो पहले लोग किसे चुनेंगे, इसे कम्यूनिस्ट समझ नहीं पा रहे हैं। क्या सीपीआई, सीपीएम इस बात को झुठला सकते हैं कि जापान की तरह रूस और चीन की भी अंग्रेजों के जाने के बाद भारत पर प्रभुत्व कायम करने की योजना थी? 1949 में माओ के शक्तिशाली नेता के रूप में उभरने के बाद भारत में नक्सल हिंसा को बढ़ावा कैसे मिला । कम्यूनिस्ट लोग भारत में मार्क्स और लेनिन की जयंती मनाते हैं और गांधी जयंती से खुद को अलग रखते हैं ।
सीपीआई जैसी ही गत सीपीएम की भी होनेवाली है । सीपीआई ने चुनाव आयोग को 2024 लोकसभा चुनाव तक अपना राष्ट्रीय दर्जा रहने देने का आग्रह किया है और उसी के एवज में आजादी की लड़ाई लड़ने की दुहाई दी है । 2014 में ही चुनाव आयोग ने सीपीआई को नोटिस दिया था और उसी दलील पर राहत दी थी । 2024 में कम्यूनिस्ट समेत सभी भाजपा विरोधी पार्टियां एकजुट होकर भी भाजपा को शिकस्त दे पाएंगी, इसमें संदेह है ।
चीन के करीब सीपीएम और रूस के करीब सीपीआई को समझना होगा कि न तो अभी चीन माओ के समय का है, न ही रूस आज खुश्चेव और स्टालिन के समय का है । डी. राजा ने जंतर-मंतर पर कहा कि कश्मीर पर उठाया गया कदम संसद में भाजपा के बहुमत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता । उन्होंने इस असंवैधानिक कदम का विरोध नैतिक दायित्व बताया । उसके तीन दिन बाद 10 अगस्त को रूस ने भारतीय संसद के इस कदम को सही ठहराया । पाकिस्तान धारा-370 खत्म करने का मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गया । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से पहला देश रूस है, जिसने कहा कि यह भारतीय गणतंत्र के संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत उठाया गया कदम है । भारतीय सोच को ‘प्रगतिशील’ बनाते-बनाते जमीन से उखड़ चुके कम्यूनिस्टों को सोचना चाहिए कि भूमिहीन जोतदारों को जमीन का हक दिलानेवाले खुद कहां और क्यों पिछड़े?
बिहार से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार डी. राजा और सीताराम येचुरी को श्रीनगर में रोकने का बिहार के कम्यूनिस्ट नेताओं ने विरोध किया । लेकिन 11 अगस्त को खुदीराम बोस के बलिदान दिवस के दिन बंगाल से सिर्फ उनके परिजन मुजफ्फरपुर पहुंचे । 11 अगस्त, 1908 को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर में फांसी दे दी गयी थी । बिहार को तो छोड़िए, बंगाल को अपनी जागीर माननेवाले कोई कम्युनिस्ट ‘जनवादी’ इस स्वतंत्रता सेनानी के शहादत दिवस में शिरकत करने नहीं गए ।