जेपी की संपूर्ण क्रांति का आह्वान छात्रों के लिए चुंबकीय साबित हुआ था। जेपी का दौर गुजर गया और आज के छात्र नेतृत्व की हालत आप देख ही रहे हैं। तब के छात्र आंदोलनकारी आज, मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव हो गए हैं। जेपी की मुख्य भूमि बिहार के युवा अब सोचते हैं- बिहार में नेतागिरी करके ही मौज किया जा सकता है, पढ़ाई-लिखाई करके मिलना ही क्या है? नारा तो फिर से वहाँ के छात्र-नेता संपूर्ण क्रांति का दे रहे हैं, मगर यह सचमुच कौनसी क्रांति होगी?

बिहार में इन दिनों कुछ छात्र संगठनों के नेताओं ने उस संपूर्ण क्रांति की बात पुनः शुरू कर दी है जिसका नेतृत्व १९७४ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन हुआ। बिहार छात्र आंदोलन के रूप में आरंभ संपूर्ण क्रांति सिर्फ राजनीतिक सत्ता पलट बन कर रह गई और उसका लाभ विभिन्न दलों से जुड़े चंद छात्र नेताओं को मिला, लेकिन वह छात्र समुदाय समग्र रूप में वंचित रह गया जिसकी आंदोलन में मुख्य भूमिका रही। लोकनायक सरीखे कोई महारथी देश में जिन्दा होते तो पूरी व्यवस्था में बदलाव और बिलकुल नई जिंदगी देने का मुलम्मा देकर शायद फिर से छात्रों को एकजुट कर सकते। मेरा तात्पर्य जेपी से है और चूँकि मैं १९७४ के छात्र आंदोलन में सक्रिय था, इसलिए आज मुझे उस आंदोलन के मारे छात्रों की ओर से इस बात की विवेचना करने का हक है कि संपूर्ण क्रांति ने छात्रों को क्या दिया और आज किस उम्मीद में छात्र फिर से आंदोलन शुरू करने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हैं।

२० वर्ष पूर्व मार्च महीने में ही छात्र आंदोलन का नेतृत्व जेपी ने थामा और राज्य में सारे छात्र स्कूल-कॉलेज छोड़कर उनके साथ हो गए। २० मार्च को सरकारी स्तर पर संपूर्ण क्रांति की बीसवीं वर्षगाँठ मनाई गई, क्योंकि बिहार की मौजूदा सरकार में लगभग सबके सब जेपी आंदोलन से प्राप्त मेवा खाने वाले लोग हैं। जनसाधारण को इन आयोजनों से कोई वास्ता नहीं था। आज भी गाँवों-कस्बों में रहने वाले अभिभावक जेपी आंदोलन के नाम से माथा पकड़ लेते हैं, क्योंकि मध्यवर्गीय आय वाले अधिकांश अभिभावकों के बच्चे नेताओं के पुछल्ले पकड़े कुछ अलभ्य पाने की आशा में दिग्भ्रमित जिदगी जी रहे हैं।

इस वर्ष जनवरी में जिस आंदोलन की शुरूआत हुई उसका कारण जानकर बिहार के सारे बुद्धिजीवी राज्य के भविष्य को लेकर काफी चितित रहे हैं। परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए कड़ाई कर दी गई। पुलिस का पर्याप्त बंदोबस्त कर दिया गया। छात्रों ने इसका विरोध किया, क्योंकि उन्हें नकल की छूट चाहिए थी। पुलिस ने उत्तेजित छात्रों पर काबू पाने के लिए गोली चलाई जिसमें एक छात्र मारा गया (दिसंबर, १९९२, मधुबनी) और उसके साथ ही सारे के सारे छात्र परीक्षा भवन और कक्षाएँ छोड़कर सड़कों पर उतर आए। यानी कि आंदोलन शुरू करने की असली वजह हुई परीक्षाओं में नकल की छूट का न मिलना और चूँकि पुलिस फायरिंग वगैरह हो गई तो छात्रों को काफी बल मिल गया। नकल वाली बात गौण हो गई और पुलिस ज्यादती को छात्रों ने जमकर उछाला। मौका देखकर विपक्षी दलों ने छात्रों की आवाज विधानसभा में बुलंद कर दी और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो गई।

इस आंदोलन में सभी दलों से सम्बद्ध छात्र संगठनों में लगभग सहमति देखी गई। किसी-किसी बात पर थोड़ा मतभेद उभरा लेकिन विश्वविद्यालयों का सारा कामकाज छात्रों की ही मर्जी से हो, इस मुद्दे पर सबके सब एकमत थे। १९७४ से पहले वाला परिदृश्य सामने आया। छात्रों के एक गुट ने कुलपति का पद हथिया लिया और दूसरे ने प्राचार्य का और सभी छात्र संगठनों ने संपूर्ण क्रांति की जरूरत पर बल दिया। यहाँ गौरतलब है कि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त अराजकता दूर करने के लिए आंदोलन किसलिए शुरू हुआ, क्योंकि आंदोलनकारी परीक्षाथियों को परीक्षा भवन में नकल करने की छूट नहीं दी गई। १९७४ के संपूर्ण क्रांति के आदर्शों को अगर आज के आंदोलन से जोड़ा जाए तो आज के नवयुवकों के सोच पर तरस आता है।

हालाँकि, १९७४ में भी जेपी ने जो नारा दिया वह बाद में चलकर खोखला साबित हुआ, लेकिन शुरू में वह नारा काफी लुभावना था। मुझे इसलिए कहीं से सबूत या उदाहरण प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कई भाषण मंचों पर मैं स्वयं जेपी के साथ था। जेपी ने छात्रों से कहा- "तुम मुझे एक साल दो, मैं तुम्हें बदले में बिलकुल नया समाज दूँगा, एक नया भविष्य तुम्हारे सामने होगा।" जेपी का कहना था- "हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था के खिलाफ है, संपूर्ण क्रांति का मुख्य उद्देश्य पूरी व्यवस्था में बदलाव लाना है।" और उन्होंने अपने जीवनकाल में ही देख लिया कि व्यवस्था वही रही, सिर्फ व्यक्ति बदले।

आंदोलन के बाद १९७७ में जो जनता पार्टी की सरकार बनी उसमें शामिल अधिकांश लोग ऐसे थे जिन्हें पहली बार सत्ता में आने का मौका मिला, इसलिए एक-दूसरे पर हावी होने के लिए उन लोगों ने कुर्सी का ऐसा खेल खेला कि मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई। जेपी की जुबान बंद हो गई और डायलीसिस पर चढ़े-चढ़े उनका सदमा कई गुना बढ़ गया। देश के सामने कहने को उनके पास कुछ रह नहीं गया था। देश की जनता को क्या मिला, यह सभी जानते हैं लेकिन देश के छात्रों को क्या मिला, इस पर आज चर्चा जरूरी है और इस चर्चा की शुरूआत बिहार से ही होनी जरूरी है, क्योंकि पूरे देश में उस आंदोलन को फैलाया बिहार के छात्र नेताओं ने।

अगले अंक में अब आदर्श क्या होंगे?