बहुप्रचारित और बहुविवादित लोकपाल के लिए अनशन, आंदोलन ने इसे लगातार कई वर्षों तक सुर्खियों में रखा । यहां तक कि लोकपाल एक्ट पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद गठन को लेकर सरकार की उदासीनता के कारण भी यह मामला खबरों में आता रहा । लेकिन आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से लोकपाल गठित होने के बाद ठंडे वस्ते में चला गया ।

विदित हो कि उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामले की जांच के लिए लोकपाल जैसे पद का गठन किया गया । 19.03.2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष को देश के पहले लोकपाल पद की शपथ दिलायी । बस इतनी सी जानकारी मीडिया के जरिए आम लोगों के बीच पहुंची । उसके बाद से ही यह पद और लोकपाल कार्यालय कोल्ड स्टोरेज में है । 4 वर्षों बाद अचानक लोकपाल चर्चा अभी वैसे समय में ठंडे वस्ते से निकाली गयी है, जब भ्रष्टाचार का मुद्दा संसद के अंदर और बाहर गर्म है । संसदीय समिति की ही एक रिपोर्ट से यह चर्चा बाहर निकली है कि गठन के चार वर्षों में लोकपाल ने किसी भी आरोपी के खिलाफ एक भी मुकदमा नहीं चलाया । जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष का लोकपाल के रूप में तीन साल का कार्यकाल समाप्त हो गया । मई, 2022 से लोकपाल अध्यक्ष का पद खाली है । केन्द्र सरकार को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है ।

संसदीय समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में लोकपाल अध्यक्ष पद नहीं भरे जाने पर भी सवाल उठाया है और सरकार से पूछा है कि रिक्तियों के भरने के लिए अगर कोई कार्रवाई की गयी है तो बताए ।

लोकसभा चुनाव के मात्र एक साल बचे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में अडानी प्रकरण और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त होने को लेकर विपक्षी दलों की एकजुटता के जवाब में कह रहे हैं कि ‘सारे भ्रष्टाचारी एक प्लेटफार्म पर आ गए ।’ पूरे देश के मतदाता देख रहे हैं कि गौतम अडानी भ्रष्टाचार प्रकरण विपक्ष के लिए मुद्दा है और संसद में गतिरोध का कारण है । उधर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए भाजपा लंदन में राहुल गांधी की टिप्पणी पर उनसे माफी मंगवाने पर अड़ी है ।

प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं कि पहले की सरकारों ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, जिससे देश का विकास अवरुद्ध हो गया । भाजपा ने देश को ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ सरकार दी है । 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ सरकार के दूसरी बार पूर्ण बहुमत में आने से पहले लोकपाल पद का गठन हो गया था । देश के पहले लोकपाल बनाने का श्रेय भी भाजपा ने लिया ।

अभी चुनाव के समय संसदीय समिति ने यह खुलासा किया है कि लोकपाल और लोकपाल समिति की नियुक्ति के चार साल में किसी भ्रष्टाचार आरोपी पर कोई केस दर्ज नहीं किया । जबकि लोकपाल पद का गठन सिर्फ भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने के लिए किया गया । तो क्या माना जाए कि इन चार वर्षों में नीचे से ऊपर तक कोई अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाए गए या कोई लोकपाल की पकड़ में नहीं आए ॆ अथवा यह सही है कि लोकपाल ने भ्रष्टाचार के किसी शिकायत का निबटारा इस तरह नहीं किया कि वो जांच के दायरे में आए और उसमें शामिल अधिकारी को कानून के शिकंजे में लाकर मुकदमा चलाया जाए घ

यह मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि संसदीय समिति की रिपोर्ट में उठाया गया है । संसदीय समिति ने लोकपाल के कामकाज के बारे में कहा. ‘संतोषजनक नहीं प्रतीत होता ।’ संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि लोकपाल द्वारा कई शिकायतों का निपटारा इस आधार पर किया जा रहा है कि वे निर्धारित प्रारूप में नहीं हैं । संसदीय समिति ने लोकपाल से वास्तविक शिकायतों को खारिज नहीं करने भी कहा है । उसके बाद लगभग एक साल से खाली रिक्तियों को भरने के लिए की गयी कार्रवाई पर सरकार से जवाब मांगा है ।

देशवासी भूले नहीं होंगे कि तकरीबन तीन दशकों तक लोकपाल आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने सुर्खियों में रखा । सरकारें व्यवस्था बदलती रही । अन्ना हजारे का दिल्ली में कभी रामलीला मैदान, कभी राजघाट तो कभी जंतर.मंतर पर अनशन जारी रहा । यह आंदोलन 2014 से पहले कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में जोर पकड़ा ।

अन्ना हजारे ने ऐसा ‘सुप्रीम पावर’ युक्त लोकपाल पद सृजित करने के लिए अनशन शुरू किया, जिसके जांच के दायरे में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जज सभी हों । यानी किसी भी सरकारी, न्यायिक पद की ऊंची से ऊंची कुर्सी भी लोकपाल से बच नहीं पाए, जो भ्रष्टाचार मामले की जांच करनेवाली मौजूदा एजेंसियों के अधिकारक्षेत्र में नहीं आते । वह आंदोलन तो आकाशी था, क्योंकि तब वैसा लोकपाल चाहिए, जो राष्ट्रपति के समकक्ष या उससे ऊपर हो, तभी तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से पूछताछ कर सकता है । ऐसा प्रावधान संविधान में नहीं है ।

इसलिए अन्ना हजारे आंदोलन पूरी तरह राजनीतिक मुद्दा बना । सारे कांग्रेस विरोधी दलों ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकी । उनमें सबसे आगे भाजपा थी, जिसे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दो बार के कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में भ्रष्टाचार मामला उछाले जाने का चुनावी लाभ 2014 में मिला । अन्ना हजारे आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट बनने के बाद से दिल्ली में सत्ता में है । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे मुहिम से जनाधार बनाने वाली अरविंद केजरीवाल के नेतृत्ववाली दिल्ली सरकार के दो मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपी हैं । कांग्रेस और भाजपा दोनों को पछाड़ने में कामयाब हुई आम आदमी पार्टी ने आज भाजपा के लिए दिल्ली के बाद पंजाब में भी सरकार बनाकर चुनौती खड़ी की हुई है । किसी भी पार्टी के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल प्राथमिकता नहीं है ।

सरकार की स्थिति का अंदाजा तो तब लगेगा, जब संसदीय समिति को दिया गया जवाब सार्वजनिक होगा । लेकिन लोकपाल गठन कांग्रेस, भाजपा या किसी भी दल के एजेंडे में कभी रही ही नहीं । रसूखवाले हाई प्रोफाईल सांसदों, विधायकों, अधिकारियों, मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने के अधिकार से संपन्न लोकपाल गठन दुहाई अन्ना आंदोलन और राजनीतिक फायदा उठाने तक के लिए सीमित रह गयी । ऐसी लचर लोकपाल समिति के लिए लोकपाल एक्ट ही ऐसा बनाया गया ताकि लोकपाल किसी वीआईपी की कौन कहे एक छोटे अधिकारी के खिलाफ भी सीधी कार्रवाई न कर सके । सीबीआई और ईडी को खिलाफ सीधी कार्रवाई करने का अधिकार है । लोकपाल के अधिकार सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयोग) के भाया मीडिया हो गया जो सीबीआई को निर्देश दे सकता है, जिसे मानने को सीबीआई बाध्य नहीं है । ऐसे में लोकपाल का कोई प्रमुख हो न हो, लोकपाल कुछ करे न करे, क्या फर्क पड़ता है । भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार चुनावी बनकर रह गया है ।

लोकपाल एक्ट दिसंबर, 2013 में पास हुआ और जनवरी, 2014 में राष्ट्रपति की मुहर लगी । उस समय तक कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी, जो मई, 2014 में सत्ता से बाहर हो गयी । भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकपाल गठन को प्राथमिकता नहीं दी । पांच साल तक सुप्रीम कोर्ट की नोटिसों का जवाब देने के दौरान सितंबर, 2018 में लोकपाल खोज कमिटी गठित की गयी । खोज कमिटी को लोकपाल पद के लायक उपयुक्त व्यक्ति रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज पिनाकी चन्द्र घोष 2019 में आम चुनाव से दो महीना पहले मिले । हो सकता है, फिर वही स्थिति दुहरायी जाए । एक साल से खाली पड़े लोकपाल अध्यक्ष पद के लिए नई खोज कमिटी बनी है या नहीं, पुरानी खोज कमिटी कुछ कर रही है या नहीं, यह भी तो पता नहीं चला है । वैसे भाजपा गठजोड़ सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश रखनेवाले सीवीसी, केंद्रीय सूचना आयोग और यहां तक कि सीबीआई । ईडी प्रमुखों की नियुक्ति टालने तथा सुप्रीम कोर्ट में सफाई देकर विवादास्पद बनाने में दक्ष है ।