बहुप्रचारित और बहुविवादित लोकपाल गठन/चयन पर उल्लेखनीय इतना ही है कि अभी तक सुप्रीम कोर्ट अवमानना के सिवाए कुछ नहीं हुआ । भाजपा नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने इस संबंध में शीर्ष कोर्ट की अवमानना नोटिसों के जवाब में झिड़कियां/फटकार सुनने में पूरे पांच साल गुजार दिए । ऊंचे पदों पर बैठे हाईप्रोफाइल अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकपाल गठन को टालने और किसी-न-किसी बहाने लटकाए रखने की इंतहा हो गयी । ढाई साल गुजारे लोकपाल गठन के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का जवाब देने में और बाद के ढाई साल में भाजपा गठजोड़ सरकार ने शीर्ष कोर्ट आदेश की अवमानना नोटिसों पर पल्ला झाड़ो/पीछा छुड़ाओ सफाई देने में गुजार दिए ।

ताजा अवमानना नोटिस का जवाब देने के लिए केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए अटोर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने लोकपाल नियुक्ति के लिए चयन समिति की तारीख बताने कहा है । इसी हफ्ते सरकार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी देनी है । जनवरी के अंत में लोकपाल खोज समिति गठित करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया । वो भी बार-बार की अवमानना से नाराज होकर दिया गया आदेश था । एक महीने के अंदर सरकार को लोकपाल खोज समिति के सदस्यों और लोकपाल के लिए उपयुक्त व्यक्ति का नाम सुझा देने सुप्रीम कोर्ट ने कहा था । पहले की ही तरह अटोर्नी जनरल ने आदेश सुना, सरकार को बताया और सरकार ने चुनाव तैयारियों के आगे लोकपाल चयन प्रक्रिया को कोई महत्व नहीं दिया । सात(7) मार्च को सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार को चयन समिति की तारीख 10 दिन के अंदर बताने कहा । विगत एक महीने में यह भी पता नहीं चल पाया कि लोकपाल खोज कमिटी की बैठक हुई या नहीं और इस पद के लिए नाम पर कोई सहमति बनी या नहीं । अटोर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि खोज कमिटी ने अपनी सिफारिशें भेज दी हैं । अण्णा हजारे के नेतृत्ववाले लोकपाल आंदोलन से जुड़े रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जब अवमानना की अर्जी दी, तब जाकर केंद्र ने यह जानकारी कोर्ट को दी । लोकपाल गठन को लेकर एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है और उसके वकील के रूप में प्रशांत भूषण पेश होते हैं । सरकार के नियोजित टालो बिजनेस के खिलाफ प्रशांत भूषण की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल, 2017 को एक फैसले में लोकपाल गठन का आदेश सरकार को दिया । उसके बावजूद टालमटोल रवैए पर प्रशांत भूषण ने कोर्ट अवमानना की याचिका लगायी । एक के बाद एक अर्जी दायर होती रही, सरकार पल्ला झाड़ती रही ।

गत हफ्ते की अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से सरकार को लोकपाल नियुक्ति के लिए सुझाए गए नाम सार्वजनिक करने कहा । इस पर भी संशय है कि एक महीने में लोकपाल प्रमुख और इस संस्था के सदस्यों के नाम सुझाए गए हैं या नहीं । सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ के सामने अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि तीन खोज समितियों ने प्रत्याशियों के नाम 28 फरवरी को सरकार को भेज दिया है, जिनमें प्रत्येक में तीन सदस्य हैं । लेकिन इस सफाई में कितना दम है यह तो तभी पता चलेगा, जब केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को चयन समिति की बैठक की तारीख बताएगी और बैठक सही सलामत हो जाएगी । अटोर्नी जनरल ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज रंजन प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली लोकपाल खोज समिति ने तीन पैनलों के नाम तय किए हैं । प्रशांत भूषण की दलील पर चीफ जस्टिस ने उनसे कहा - ‘आपने काम अच्छा किया है, मगर कहीं न कहीं एक सीमा है जहां आपको रूक जाना है । हमें नहीं लगता कि नाम सार्वजनिक करने की जरूरत है ।’

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल चयन समिति में विपक्षी नेता की मौजूदगी को लेकर सरकार को ऐसे फांस में डाला, जिससे उबरने की कोशिश में सरकार फंसती चली जा रही है । जो दलील बार-बार देकर सरकार ने लोकपाल चयन में खुद को दोषमुक्त करने का असफल प्रयास किया, उसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सीधा कटघरे में खड़ा किया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अटोर्नी जनरल से पूछा कि चयन समिति में विपक्षी नेता के रूप में कौन शामिल होंगे, क्योंकि लोकसभा में किसी को भी यह दर्जा प्राप्त नहीं है । इसके जवाब में अटोर्नी जनरल ने कहा कि एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के नेता लोकपाल चयन समिति की बैठक में शामिल होंगे, जो प्रोटोकॉल सीबीआई डायरेक्टर चयन के लिए अपनाया गया । लोकसभा में एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है, जिसके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को सदन में विपक्षी नेता का दर्जा प्राप्त नहीं है । वे एक बार नहीं बार-बार लोकपाल चयन समिति की बैठक का बायकाट कर चुके हैं । हर बार मल्लिकार्जुन खड़गे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर चयन समिति की बैठक के बायकाट का कारण बता चुके हैं । जैसा सुप्रीम कोर्ट को बताया गया, उसकी असलियत तो तभी सामने आएगी, जब लोकपाल चयन समिति की बैठक की तारीख अटोर्नी जनरल शीर्ष कोर्ट को बताएंगे । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के सवाल के जवाब में जो दावा अटोर्नी जनरल ने पेश किया उसकी सच्चाई जानने के लिए बैठक का इंतजार करना पड़ेगा । यह देखना पड़ेगा कि लोकसभा में एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पहले की तरह इस बैठक का बायकाट करते हैं या नहीं । लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, 2013 के अनुसार लोकपाल चयन समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं, इसलिए बैठक की अध्यक्षता भी वही करते हैं । चयन समिति के बाकी सदस्य हैं - सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, लोकसभा स्पीकर और लोकसभा में विपक्ष के नेता । दिसंबर, 2013 में लोकपाल बिल संसद से पास हुआ और जनवरी, 2014 में राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद यह एक्ट बना । लागू होने के कुछ ही महीने बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस गठजोड़ सत्ता से बाहर हो गयी । भाजपा गठजोड़ के प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने के बाद कांग्रेस को लोकसभा में विपक्षी नेता का दर्जा पर्याप्त सीटें नहीं होने के कारण नहीं दिया गया । लोकपाल चयन समिति की बैठक हो तो कैसे, क्योंकि लोकसभा में विपक्षी नेता नहीं है । उसकी जगह एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के नेता को चयन समिति में शामिल करने के प्रावधान को संवैधानिक मुहर अभी तक नहीं लगा । लोकपाल एक्ट का यह संशोधन बिल संसद में लटका रह गया । वर्तमान संसद का अंतिम सत्र समाप्त हो चुका है । आम चुनाव की अधिसूचना जारी हो गया है ।

भाजपा गठजोड़ के पूरे कार्यकाल में लोकपाल गठन/चयन के मसले पर एक फांस से निकलकर दूसरे फांस में फंसने का लेखाजोखा सीधे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से लदा है । सरकार ने अपने बचाव में कांग्रेस पर दोषारोपण करने के साथ-साथ संसद का भी ढाल के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया ।

सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने लोकपाल चयन समिति में विपक्षी नेता के होने के विषय में अभी सरकार से क्या पूछा, यह तो आपने पढ़ा । अब देखिए कि 23 नवंबर, 2016 को चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार के अवमानना जवाब पर क्या कहा था - ‘ढाई साल से हमारे पास विपक्षी नेता नहीं है और आगे ढाई साल में भी मिलना नहीं है, तो क्या इसीलिए लोकपाल एक्ट को डंप कर दिया जाए?’ यह सटीक टिप्पणी चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने उस समय की, जब सरकार ने लोकपाल गठन लटके रहने का कारण लोकसभा में विपक्षी नेता का नहीं होना बताया । उस वक्त अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि विपक्षी नेता की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल करनेवाला संशोधन बिल संसद में लंबित है और जल्दी क्लियर होने का दवाब संसद पर नहीं डाला जा सकता । उससे नाराज होकर चीफ जस्टिस ने 23 नवंबर, 2016 को उपरोक्त टिप्पणी की और 27 अप्रैल, 2017 को लोकपाल गठन का आदेश सरकार को दिया । बार-बार की फटकार से खिन्न होकर मुकुल रोहतगी ने अटोर्नी जनरल पद से जून, 2017 में इस्तीफा दे दिया । उनकी जगह आए के. के. वेणुगोपाल विगत दो साल से सुप्रीम कोर्ट अवमानना के जवाब में लोकपाल जल्द गठित करने के लिए चयन समिति बैठक बुलाने की नोटिस की जानकारी सरकार को दे रहे हैं । हर बैठक बेनतीजा रहने के लिए अटोर्नी जनरल ने कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को भी लपेटे में लेने का प्रयास किया ।

इस पर गौर करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के दबाब में बुलायी गयी लोकपाल चयन समिति की बैठकों में शामिल होने से इंकार करने का क्या कारण कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र में लिखा । अगस्त, 2018 में चौथी बार बायकाट पत्र में मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री के सामने संवैधानिक विंदु को उठाया और ‘विशेष आमंत्रित’(स्पेशल इन्वाईटी) के रूप में बुलाए जाने पर एतराज किया । लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता ने लिखा कि लोकपाल एक्ट के अनुच्छेद 4 के अनुसार लोकपाल चयन समिति में ‘विशेष आमंत्रित’ का प्रावधान नहीं है, इसीलिए वे बैठक का बायकाट कर रहे हैं। उसके पहले के तीनों पत्रों में भी कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री को यह बात बतायी और आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझ कर संशोधन बिल को लंबित रखकर लोकपाल गठन टालने के लिए यह रवैया अपनाया ।

अब सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस के सवाल के आलोक में देखना पड़ेगा कि लोकपाल चयन समिति की अगली बैठक में कांग्रेस नेता शामिल होते हैं या नहीं । अगर शामिल नहीं होते हैं तो प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बायकाट के कारण में आमंत्रण के उस विंदु का हवाला देते हैं या नहीं, जो पहले दे चुके हैं । सरकार को अब सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी देनी होगी । कांग्रेस नेता उन बैठकों का बायकाट कर चुके हैं, जिनमें प्रधानमंत्री के साथ सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस भी बैठक में शामिल हुए । सरकार को सुप्रीम कोर्ट में यह भी बताना पड़ सकता है कि सीबीआई डायरेक्टर चयन की बैठक में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को क्या कहकर बुलाया गया कि वे शामिल हुए ।