बहुप्रचारित और बहुआंदोलित लोकपाल गठन अब सरकार या विपक्ष के लिए कोई मुद्दा नहीं रहा । सत्तारूढ़ दल समेत किसी भी पार्टी को इस चर्चा में दिलचस्पी नहीं है कि लोकपाल एक्ट बनने के चार साल बीत जाने के बावजूद लोकपाल गठन किन कारणों से कहां अटका है ।

केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के लिए मुश्किलें ये हैं कि लोकपाल गठन पर सुप्रीम कोर्ट की लताड़ का जवाब देने में आए दिन कोई-न-कोई ऐसी समस्या बतानी पड़ती है, जिसका समाधान प्रस्तुत करना संभव न हो ।

दरअसल लोकपाल एक्ट पास होने के बाद हो ठंडे बस्ते में चला गया । 2014 में भाजपा गठजोड़ सरकार के प्रचंड जनादेश से सत्ता में आने के बाद ये नौबत आयी । मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाले कांग्रेस गठजोड़ शासन के 10 साल के कार्यकाल के दौरान लोकपाल आंदोलन लगातार चला और सबसे ज्यादा चर्चित मुद्दा बना रहा । 2013 में आखिरकार संसद से लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट पारित हुआ । एक जनवरी, 2014 को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी और 16 जनवरी को लोकपाल एक्ट लागू हो गया । मई, 2014 आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, भाजपा गठजोड़ सरकार बनी और उसी के बाद लोकपाल ठंडे बस्ते के अन्दर डाल दिया गया ।

एक गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी । अब सुप्रीम कोर्ट के चलते बस्ता गर्म होता रहता है, लेकिन लोकपाल गठन प्रक्रिया बस्तें में ही है । अब यह चर्चा पहले की तरह जनता के बीच नहीं पहुंचती । सरकार को गठन में कोई रूचि नहीं है । सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार लोकपाल गठन के रास्ते में आ रही ‘अड़चनें’ बताकर सुप्रीम कोर्ट की नोटिसों का जवाब देने की जिम्मेदारी मात्र निभा रही है ।

लोकपाल गठन लटक मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट जज रंजन गोगोई और जस्टिस आर. बानूमतो की पीठ ने अबकी कड़ा रूख अपनाया है । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 17 जुलाई से पहले सरकार को यह स्पष्ट करने कहा है कि लोकपाल गठन के लिए क्या-क्या कदम उठाए जाने हैं और निश्चित समय-सीमा भी बतानी है ।

यह सुनवाई सुप्रीम कोर्ट आदेश की अवमानना पर चल रही है और उसमें भी केंद्र सरकार ‘टालो पल्ला झाड़ो’ नीति से काम चलाना चाहती है । 27 अप्रील, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को लोकपाल गठन का आदेश दिया । सरकार के टालमटोल रवैए पर ‘कॉमन कॉज’ ने अवमानना की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की । याचिकाकर्ता के वकील हैं शांति भूषण, जो अण्णा हजारे के लोकपाल आंदोलन से जुड़े रहे हैं और भाजपा को भी उसमें अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते देख चुके हैं । शांति भूषण सरकार की कमजोर नस से वाकिफ हैं । इसलिए वैसे विंदु सुप्रीम कोर्ट में उठा देते हैं कि सरकार का पक्ष रखने में अटोर्नी जनरल बगलें झांकने लगते हैं ।

दो जुलाई की सुनवाई के रोज अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सरकार से प्राप्त निर्देश लिखित में सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने रखा, जिसमें कहा गया कि लोकपाल चयन कमिटी की बैठक जल्द होगी । यह सुप्रीम कोर्ट पीठ को पहले जैसा ही लगा । इसलिए अबकी कड़ा रूख अपनाते हुए जजों ने लोकपाल नियुक्ति के लिए उठाए जानेवाले उपायों की जानकारी 10 दिनों के अंदर देने कहा । जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार को जवाब की समय सीमा दी, ठीक उसी तरह लोकपाल नियुक्ति के लिए भी सरकार को समय-सीमा बताने कहा । 17 जुलाई को सरकार को अपना पक्ष रखना है । मगर उसके पहले ही सुप्रीम कोट को सारी जानकारी देनी है । सरकार के सामने अब समस्या है ‘माकूल’ जवाब की । अभी तक सिर्फ जवाब देने में कोई खास मुश्किल नहीं आ रही थी ।

‘माकूल’ जवाब की मुश्किलें सीधे तौर पर लोकपाल चयन कमिटी की बैठक और कमिटी का कोरम पूरा होने से जुड़ी हैं । यही बताकर अटोर्नी जनरल ने 15 मई की सुनवाई में भी किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहा ।

लोकपाल एक्ट के मुताबिक चयन कमिटी में प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायाधीश, लोकसभा स्पीकर, लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और एक प्रमुख न्यायविद का प्रावधान है । न्यायविद की नियुक्ति प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश की राय से होने की व्यवस्था है ।

पहली मुश्किल लोकसभा में विपक्षी नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लेकर है, जिन्हें लोकपाल चयन समिति की बैठक में शामिल होना है । दूसरी मुश्किल एक प्रमुख न्यायविद को लेकर है, जो पद नौ महीने तक रिक्त पड़ा रहा और सरकार ने नए न्यायविद की नियुक्ति जरूरी नहीं समझी । जब नियुक्ति हुई भी तो सरकार उसस जुड़ा विवाद साथ लिए शीर्ष कोर्ट पहुंची । 15 मई को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी को लोकपाल चयन समिति में प्रमुख न्यायविद के रूप में नियुक्त किया गया है । नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही मुकुल रोहतगी को जून, 2014 में अटोर्नी जनरल नियुक्त किया । सरकार की ओर से एक ही तरह का जवाब बार-बार सुप्रीम कोर्ट में पेश करने के कारण मुकुल रोहतगी को लताड़ सुननी पड़ती थी । उससे चिढ़कर रोहतगी ने 2017 के जून में ही अटोर्नी जनरल पद से इस्तीफा दे दिया । मार्च, 2017 में संसद के बजट सत्र के समय मुकुल रोहतगी ने लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल करनेवाले संशोधन बिल के 2016 से संसद में लंबित होने की जानकारी दी । उन्होंने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि संसद पर ‘जल्दी’ का दवाब नहीं डाला जा सकता । उनके जवाब पर सुप्रीम कोर्ट पीठ ने नाराजगी जतायी ।

लोकपाल चयन समिति के प्रमुख न्यायविद सदस्य बरिष्ठ वकील पी. पी. राव का 11 सितंबर, 2017 को निधन हो गया । उसके बाद से सरकार को प्रमुख न्यायविद मिल नहीं रहे थे । इस वर्ष अर्थात् 6 मार्च, 2018 की सुनवाई के दिन अटोर्नी जनरल के. के. वेगुगोपाल की प्रमुख न्यायविद की नियुक्ति ‘जल्द से जल्द’ कर लेने की सफाई पर सुप्रीम कोर्ट जजों ने उनकी खिंचाई की। क्योंकि उसके पहले दो बार सरकार की ओर से वैसा ही जवाब मिला था ।

प्रमुख न्यायविद सरकार को लोकपाल चयन समिति के लायक मुकुल रोहतगी ही मिले । अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि इसमें प्रधान न्यायाधीश की सहमति ली गयी है या नहीं, जो लोकपाल एक्ट के मुताबिक जरूरी है ।

अब देखिए लोकसभा में बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता का मामला । कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, मगर उसके नेता को विपक्षी नेता का दर्जा प्राप्त नहीं है । क्योंकि उसके लिए अपेक्षित सीटें कांग्रेस के पास नहीं है । इसलिए यह संशोधन रखा गया कि लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनाया जाए ताकि लोकपाल गठन प्रक्रिया रूके नहीं । प्रक्रिया रूकी रहनी थी और है । उस प्रक्रिया पर सुप्रीम कोट को जवाब भर देना है और वो चल रहा है । लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने एक मार्च, 2018 को लोकसभा चयन समिति की बैठक का बायकाट किया और फिर 10 अप्रील को दूसरी बार भी न्योता ठुकरा दिया ।

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने दोनों ही बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वही अहम संवैधानिक मुद्दे उठाए जिस पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना पड़ रहा है । एक मार्च को और 10 अप्रील को भी सुप्रीम कोर्ट के कहने पर लोकपाल चयन समिति की बैठक बुलायी गयी । मल्लिकार्जुन खर्गे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में पहले तो ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में बुलाए जाने पर एतराज जताया और कहा कि लोकपाल एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है । उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ खानापूरी कर रही है और लोकपाल नियुक्ति के प्रति गंभीर नहीं है । लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल करना तभी संभव है, जब लोकपाल एक्ट के अनुच्छेद 4(10) में संशोधन किया जाए । यह संशोधन बिल चार साल से संसद में लंबित है । सरकार ने इसे किसी भी सत्र में बहस या वोटिंग वाली सूची में शामिल नहीं किया ।

यह पचड़ा सिर्फ लोकपाल चयन के लिए है । 2014 में ही भाजपा सरकार ने दिल्ली पुलिस विशेष स्थापना एक्ट में संशोधन करके सीबीआई डायरेक्टर चयन समिति के एक सदस्य के रूप में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी नेता को शामिल करने का प्रावधान कर डाला ।

लोकपाल चयन समिति की ‘जल्द’ बैठक पर 10 दिनों के अंदर प्रक्रिया के सारे मामलों में ये सब आएंगे । अब संसद के मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र में सरकार की प्राथमिकता लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को चयन समिति का सदस्य बनाने का संवैधानिक अधिकार वाला संशोधन बिल तो प्राथमिकता हो नहीं सकता । अगले वर्ष चुनाव है । मुकुल रोहतगी को प्रमुख न्यायविद के रूप में सदस्य बनाने पर भी सुप्रीम कोर्ट जज कुछ-न-कुछ टिप्पणी जरूर करेंगे । 2001 में गुजरात दंगे के समय नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उसको लेकर चले मुकदमे में मुकुल रोहतगी नरेंद्र मोदी के वकील थे ।

अण्णा हजारे 23 मार्च को फिर से रामलीला मैदान में लोकपाल गठन के लिए अनशन पर बैठे । किसी न भी सरकार में नोटिस नहीं लिया । 2011 में जब आंदोलन वाला अनशन अण्णा ने शुरू किया तो उस वक्त लोकसभा में विपक्षी नेता सुषमा स्वराज ने जंतर-मंतर पर डान्स मार्च किया । लोकपाल पचड़े पर और ‘विमर्श’ के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बने ‘मंत्रियों के समूह’(जीओएम) की एक सदस्य विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी हैं । जीओएम की भी बैठक हुई हो, यह जानकारी उपलब्ध नहीं है ।