ऊंचे और प्रभावशाली पदों पर आसीन अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए बने लोकपाल अपने गठन के पांच साल में एक भी भ्रष्ट अधिकारी को कटघरे में खड़ा नहीं कर सका ।
ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि लोकपाल के हाथ में वो अधिकार नहीं हैं ताकि किसी भी भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ सीधी कार्रवाई कर सके । किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत की जांच करने और मुकदमा चलाने का अपना अधिकार लोकपाल कार्यालय के पास नहीं है । गठन ही उसी हिसाब से किया गया है और ऐसा दिखावे के हाथी दांत वाला लोकपाल गठित करने में भी केंद्र सरकार की लोकपाल एक्ट पास होने के 12 साल तक दिलचस्पी नहीं थी ।
लोकपाल जैसे उच्चाधिकार प्राप्त पद का गठन लगभग तीन दशक तक ऐसा बहुप्रचारित और बहुविवादित राजनीतिक मुद्दा बना रहा मानो सभी दल भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने को प्रतिबद्ध हों । सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली में अनशन आंदोलन करके लोकपाल गठन की मांग को 20 साल तक सुर्खियों में रखा ।
लेकिन सच साबित हो रही है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कोई भी दल ऐसे संवैधानिक अधिकार प्राप्त पद के पक्ष में नहीं है जो राजनीतिक प्रभाव से मुक्त स्वतंत्र रूप से कड़ा कदम उठा सके । आम जनता के लिए यह समझना कठिन नहीं है कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने वाली सारी एजेंसियां राजनीति प्रेरित काम करती हैं । भ्रष्टाचार सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है और जांच करनेवाली एजेंसियां ‘निष्पक्ष’ ‘स्वतंत्र’ का लबादा ओढ़कर सत्तापक्ष के हित में काम करती है ।
लोकपाल जैसा पद अगर आज पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर और ताकत के साथ अपना सक्षम कार्यालय संचालित करने की स्थिति में होता तो गठन के पांच साल में सिर्फ 24 मामले सामने नहीं आते । उन 24 मामलों में से जिस 6 के खिलाफ जांच का आदेश लोकपाल ने दिया वो केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) के हाथ में है। लोकपाल के पास सीवीसी और सीबीआई से इस बात के लिए जवाबतलब करने का अधिकार नहीं है कि उन भ्रष्टाचार मामलों का क्या हुआ । वास्तव में केंद्र सरकार के लिए लोकपाल गठन महज औपचारिकता से आगे कुछ नहीं था । अगर सरकार उच्च पदस्थ अधिकारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर उन्हें जांच के दायरे में लाने के प्रति गंभीर होती लोकपाल आज अधिकार संपन्न रहता । जांच निदेशक और अभियोग निदेशक जैसे पदों पर नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार के पास लोकपाल की ओर से कई बार प्रस्ताव भेजे गए हैं । शायद अभी तक उस पर विचार भी नहीं हुआ ।
ये तथ्य लोकपाल स्थापना दिवस के समय इस हफ्ते सामने आए है । इस अवसर पर भारत के प्रधान न्यायाधीश(सीजेआई) संजीव खन्ना को भी कहना पड़ा कि सिर्फ लोकपाल गठन कर देने से भ्रष्टाचार की समस्या का निदान नहीं निकल सकता । अगर यह आयोजन खबर में नहीं आता तो लोग जान भी नहीं पाते कि लोकपाल पद अस्तित्व में है भी या नहीं ।
2013 में जब लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट पास हुआ, उस समय कांग्रेस नीत गठजोड़ सरकार थी । 2004 से लेकर 2013 तक 9 साल में संसद में मुख्य विपक्षी दल के रूप में भाजपा ने ऐसे लोकपाल गठन के लिए सरकार पर दवाब बनाया जो पर्याप्त अधिकारों से लैस हो । इस दौरान दिल्ली में रामलीला मैदान से लेकर जंतर.मंतर तक चले अन्ना हजारे आंदोलन का भाजपा समेत सभी विपक्षी दलों ने संसद के अंदर और बाहर भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया । अन्ना हजारे आंदोलन की उपज अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में सत्ता में है । दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल भ्रष्टाचार के मुकदमे में फंसे हैं ।
कोलब्लॉक आवंटन, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसने के विवाद के कारण 2014 में कांग्रेस सत्ता से हट गयी । नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में पूर्ण बहुमत से आयी भाजपा नीत गठजोड़ सरकार ने लोकपाल एक्ट को फाइलों में ही छोड़ दिया ।
लोकसेवकों के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए लोकपाल जैसे पद की नरेंद्र मोदी सरकार को अपना पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद 2019 में आम चुनाव के समय याद आयी 19 मार्च, 2019 को जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष देश के पहले लोकपाल नियुक्त किए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद । उनके साथ और भी आठ सदस्य नियुक्त किए गए । लेकिन उनके पास बैठने के लिए न तो अपना कार्यालय था, न ही काम करनेवाले स्टाफ । 70 साल पूरा करने के बाद जस्टिस पिनाकी घोष रिटायर हो गए । मार्च, 2024 में फिर लोकसभा चुनाव से पहले जस्टिस ए. एम. खानविलकर(सेवानिवृत्त) की दूसरे लोकपाल के रूप में नियुक्ति हुई । उन्होंने ही 16.01.2025 को पहला लोकपाल दिवस का आयोजन दिल्ली में किया ।
इस संबंध में एक और बात याद रखने की जरूरत है । जिस सीवीसी(केंद्रीय सत्तर्कता आयोग) पर लोकपाल की जांचधअभियोग प्रक्रिया टिकी है, वो सीवीसी एक्ट 2003 में बना । उस समय केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे । उसके बावजूद सीवीसी की नियुक्ति टलती रही ।
वाजपेयी शासनकाल में ऐसे पद की जरूरत महसूस की गयी, जो सीबीआई के कामकाज पर नजर रखे । उसी के तहत सीवीसी का मसौदा तैयार हुआ और संसद से सीवीसी एक्ट पास कराया गया । लेकिन सीवीस की नियुक्ति तब हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर याचिका पर केंद्र सरकार को एक निश्चित समय.सीमा के अंदर सीवीसी की नियुक्ति का निर्देश दिया । एन. विठ्ठल पहले सीवीसी बने । उस समय तक कांग्रेस गठजोड़ केंद्र में सत्ता में आ चुकी थी । अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली सीबीआई किसके प्रति जवाबदेह है और सीवीसी के पास किस सीमा तक रिपोर्ट करने को बाध्य है । सुप्रीम कोर्ट में वर्षों तक चले मुकदमे के बावजूद इस पर संशय बरकरार है कि सीबीआई स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी है या नहीं ।
लोकपाल को जिन दो पदों. जांच निदेशक और अभियोग निदेशक पर नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार के फैसले का इंतजार है, वो सीवीसी के अंदर ही होनी है । दोनों ही पद संयुक्त सचिव पद के होंगे, जो लोकपाल द्वारा प्रेषित मामलों की प्रारंभिक जांच करेंगे । सीवीसी एक्ट के सेक्सन 11(ए) में यह प्रावधान है । इसी के साथ लोकपाल को जोड़ दिया गया । लोकपाल गठन एक्ट के सेक्शन 60 के अन्तर्गत अपने काम को ज्यादा बेहतर और मजबूत बनाने में जुटा है, जो सरकार से सहयोग के बिना संभव नहीं है । जिस लोकपाल को सरकार अधिकारियों की बदौलत ही भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ जांच प्रक्रिया चलानी है, उसका काम किस मुकाम तक पहुंचेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । ऐसे लोकपाल से प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायतों की जांच पहले से ही धूल भरी जनता की आंखों में और धूल झोंकने के सिवाए क्या है ।
लोकपाल कार्यालय सूत्रों के अनुसार गत वर्ष अक्टूबर.दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीन शिकायतें मिली और जांच लोकपाल को सीवीसी और सीबीआई के जरिए करानी है । दरअसल लोकपाल एक्ट के सारे प्रावधान ऐसे बनाए गए हैं जो कम पढ़े-लिखे लोगों की समझ से परे हैं । प्रबुद्ध वर्ग भी चकरा जाते हैं । शिकायत करनेवाला फोर्मेट(प्रारूप) ही उलझाकर बनाया गया है । तभी तो पांच साल में लोकपाल कार्यालय ने 90 प्रतिशत शिकायतें इसी आधार पर रद्द कर दी कि सही फोर्मेट में नहीं भरा गया है ।
अन्ना हजारे आंदोलन के समय से लेकर एक्ट बनाने तक लोकपाल का साथ मामला दिग्भ्रमित करनेवाला है । पहले तो अन्ना ने अनशन की शुरूआत ऐसे लोकपाल गठन के लिए कीए जिसके दायरे में राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री और संसद सदस्य समेत सब.के.सब उच्च पदासीन व्यक्ति आ जाएं । बाद में जब इसको लेकर विवाद हुआ कि इसके लिए तो नया संविधान चाहिए, जिसमें राष्ट्रपति के समकक्ष या उससे ज्यादा अधिकार प्राप्त पद का प्रावधान हो । तब अन्ना ने राष्ट्रपति को बख्त दिया । 2013 में एक्ट बनने के बाद अन्ना हजारे ने खुद को इससे अलग कर लिया । पहले स्थापना दिवस के अवसर पर अन्ना हजारे को सम्मानित कर लोकपाल आंदोलन को याद किया गया । कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज एन. संतोष हेगड़े, अटोर्नी जनरल आर. वेंकटरमनी भी सम्मानित किए गए ।
इस आयोजन के दिन भारत के प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने पर्चा लीक, नौकरियों में फर्जीवाड़ा और सरकारी ठेका देने में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद तथा रसूखवाले लोगों की तूती समेत कई मामलों का जिक्र किया । उनके साथ लोकपाल जस्टिस ए. एम. खानविलकर ने भी कहा कि भ्रष्टाचार से सरकार के प्रति जनता का विश्वास कम हो गया है । लोकपाल उच्चपदस्थ लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली सशक्त संस्था है ।
लेकिन आम लोग लोकपाल की शक्ति की असलियत नहीं समझ सकते । लोकपाल कार्यालय सूत्रों के अनुसार पांच साल में जितनी शिकायतें मिली हैं वो प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य, केंद्र सरकार के ए बी सी और डी ग्रुप के अधिकारी, केंद्र सरकार के विभिन्न निकायों के अध्यक्षों के खिलाफ है । क्या यह संभव है कि लोकपाल के मौजूदा सेटअप में ऐसे किसी अधिकारी के खिलाफ दोषसिद्ध हो जाए । लोकपाल एक्ट के सेक्शन 53 के तहत कथित अपराध की तारीख के सात वर्षों के अंदर शिकायत मिलने पर ही लोकपाल देखेगा ।