नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार गठन का चौथा साल चल रहा है और उतने ही वर्षों से बहुप्रचारित लोकपाल गठन का मामला लटका हुआ है । भाजपा सरकार ने चार वर्षों में उन पचड़ों को क्लियर करन में कोई दिलचस्पी नहीं ली, जिसके चलते लोकपाल पद का गठन नहीं हो पा रहा है । अगर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब-तलब नहीं किया होता तो यह भी पता नहीं चल पाता कि कहां जाकर रोड़ा अटका हुआ है, जो लोकपाल नियुक्ति का रास्ता रोके है ।
लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने एक मार्च को तय लोकपाल गठन कमिटी की बैठक में ‘विशेष आमंत्रित’(स्पेशल इनवाईटी) के रूप में भाग लेने से इन्कार करने का पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा । इस बैठक का बहिष्कार करने का जो कारण कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में रखा है, वही कारण भाजपा गठजोड़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चयन प्रक्रिया का असली रोड़ा बताया हुआ है ।
लोकपाल एक्ट के अनुसार लोकपाल पद चयन कमिटी में प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायधीश, लोकसभा स्पीकर, लोकसभा में विपक्षी नेता और एक प्रमुख न्यायविद का प्रावधान है । लोकसभा में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने विपक्षी नेता वाले मुद्दे को उछालकर ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में बुलाए जाने पर सवाल उठाया है । लोकसभा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो है मगर कुल सीटों का 10 प्रतिशत नहीं होने के कारण मल्लिकार्जुन खर्गे को विपक्षी नेता का दर्जा प्राप्त नहीं है । लोकसभा में सबस बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन कमिटी में शामिल करने का संशोधन बिल 2016 से संसद में लंबित है । यही बताकर 2017 में बजट सत्र के समय केंद्र सरकार के अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से राहत ली ।
कांग्रेस नेता खर्गे ने प्रधानमंत्री को लिखा - ‘लोकपाल एक्ट में “विशेष आमंत्रित” का प्रावधान नहीं है, इसलिए मैं बैठक में शामिल होने का अधिकार नहीं रखता । मैं अपनी पार्टी और संपूर्ण विपक्ष की ओर से कहना चाहता हूँ कि इस तरह का बुलावा छलावा से ज्यादा कुछ नहीं है। आप मेरे और विपक्ष की राय को कोई तवज्जो नहीं देना चाहते । इसलिए महज खानापरी के लिए मैं इस बैठक में शामिल नहीं होना चाहता ।’
कांग्रेस नेता ने कहा कि यह बैठक सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के दो फरवरी के आदेश के अनुपालन के लिए बुलायी गयी । अगर सरकार वाकई लोकपाल पद गठन के प्रति गंभीर होती तो ‘विपक्षी नेता’ की जगह एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी का लोकपाल चयन कमिटी में शामिल करनेवाला संशोधन बिल पास करा सकती थी । मल्लिकार्जुन खर्गे ने यह भी ध्यान दिलाया कि ऐसे प्रावधान की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट(संशोधन) बिल समेत कई स्टेच्यूट सरकार ने संशोधित किए हैं ।
दिसंबर, 2013 में कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल के समय लोकपाल और लोकायुक्त बिल संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया । आम चुनाव वर्ष 2014 के शुरू में जनवरी में ही राष्ट्रपति की मुहर लग गयी और लोकपाल बिल एक्ट बन गया । मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाले कांग्रेस गठजोड़ सरकार के चार महीने बचे थे, मई में लोकसभा चुनाव होना था । मगर कांग्रेस सरकार पर चार महीने में लोकपाल पद गठन प्रक्रिया न शुरू करने का दोष मढ़ा जाए तो यह चार महीने बनाम चार साल का मामला अभी बनता है । नरेंद्र मोदी के खिलाफ जनता के कटघरे में आरोपपत्र मनमोहन सिंह के मुकाबले बहुत बड़ा तैयार हो गया है । इसमें पहला आरोप जानबूझकर लोकपाल गठन को टालने और उलझाए रखने का बनता है । मई, 2014 में नरेंद्र मोदी इतने प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बने कि कांग्रेस लोकसभा में विपक्ष का दर्जा पानेलायक सीटें भी हासिल नहीं कर पायी । कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा नहीं देने की बात तो समझ में आती है । लेकिन लोकपाल चयन कमिटी में विपक्षी नेता की जगह वैकल्पिक व्यवस्था के लिए ‘लोकसभा में एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी’ का प्रावधान वाला संशोधन चार साल से टल रहा है । यह क्यों टल रहा है और क्यों सरकार इसे पास नहीं कराना चाहती है, इसका एक ही कारण आम मतदाताओं की समझ में आ रहा है कि सरकार लोकपाल गठन नहीं चाहती । अध्यादेश लाकर भाजपा सरकार गठन का रास्ता साफ कर सकती थी । लोकपाल पचड़े पर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाइ के दौरान याचिकाकर्ता ‘कॉमन कॉज’ की आर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने नवंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि सरकार सबसे बड़ी पार्टी को विपक्षी पार्टी का दर्जा देकर लोकपाल गठन प्रक्रिया शुरू कर सकती है । पहले भी ऐसा करके संवैधानिक काम रूकने नहीं दिया गया है ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद छेड़ने की बात जितना शोर-शोर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं उससे कहीं ज्यादा बहुप्रचारित लोकपाल आंदोलन है । साल भर बाद होनेवाले आम चुनाव की तैयारी में सभी चुनाव एक साथ कराने की बात प्रधानमंत्री बार-बार करते हैं । मगर चार साल के शासनकाल में लोकपाल गठन प्रक्रिया डंप रखने पर प्रधानमंत्री चुप हैं ।
सुप्रीम कोर्ट की कैफियत का जवाब देने के सिलसिले का भी तीसरा साल चल रहा है । सुप्रीम कोर्ट की दिलचस्पी का एक कारण यह भी है कि चीफ जस्टिस से परामर्श करके प्रमुख न्यायविद की नियुक्ति राष्ट्रपति को जिस कमिटी की सिफारिश पर करनी है उसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं । उस कमिटी में दूसरे नंबर के सदस्य चीफ जस्टिस हैं ।
डंप मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर. बानुमती की पीठ को केंद्र सरकार के अटोर्नी जनरल के. के. वेणगोपाल ने गत 23 फरवरी को बताया कि सितंबर, 2017 से यह पद भी रिक्त पड़ा हे । पूर्व सदस्य पी. पी. राव के सितंबर में निधन के बाद से सरकार ने इस पर विचार नहीं किया कि यह पद भी भरा जाना जरूरी है । दो फरवरी के जिस आदेश का जिक्र मल्लिकार्जुन खर्गे ने प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में किया है, उसी के जवाब में 23 फरवरी को अटोर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को एक मार्च को लोकवाल चयन समिति की बैठक की जानकारी दी ।
इस चार साल में कई फेरबदल हुए, कई बदलाव आये । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बदलते रहे, सुनवाई पीठ के जज बदलते रहे । सरकार का पल्ला झाड़ो पक्ष रखने के लिए अटोर्नी जनरल बदले । सुप्रीम कोर्ट के सामने सफाइ का टोन भी बदलता गया । लेकिन प्रधानमंत्री का रवैया नहीं बदला, जो सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार मुक्त शासन की दुहाई देते हैं ।
नवंबर, 2016 में चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर की कैफियत का जवाब देने सरकार की ओर से अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी पहुंचे । चीफ जस्टिस की फटकार के बाद लोकपाल चयन पर विचार करनेवाले केंद्रीय मंत्रियों के समूह(जीओएम) की बैठक हुई । गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में जीओएम बनने की खबर सिर्फ सार्वजनिक हुई, किसी बैठक की नहीं । यह भी पता नहीं चला कि उस बैठक में क्या हुआ । जीओएम के एक मंत्री वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति बन गए ।
मार्च, 2017 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मुकुल रोहतगी ने यह कहकर सरकार की लाचारी दिखायी कि संसदीय समिति के पास लंबित अहम संशोधन जल्दी क्लियर करने के लिए दबाब नहीं डाला जा सकता । संसद का बजट सत्र चल रहा है, फोकस बजट पर है ।
अभी मल्लिकार्जुन खर्गे ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री को मौजूदा बजट सत्र में ‘विपक्षी नेता का दर्जा’ वाला संशोधन क्लियर करने का आग्रह किया है । पांच मार्च से संसद के बजट सत्र का दूसरा भाग शुरू है । के. के. वेणुगोपाल से पहले अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने नवम्बर 2016 में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है । फिर मार्च 2017 में कहा कि इस पर संसदीय संशोधन लंबित है । चीफ जस्टिस भी पहले वाले नहीं हैं ।
विपक्षी नेता वाला अड़ंगा सिर्फ लोकपाल के लिए है । पिछले वर्ष के शुरू में सीबीआई डायरेक्टर और सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयुक्त) की नियुक्ति के लिए आयोजित बैठक में मल्लिकार्जुन खर्गे ने हिस्सा लिया । यह बात वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने मार्च, 2017 में सुप्रीम कोर्ट को बताया । किसी पार्टी के सांसद लोकसभा गठन प्रक्रिया में तेजी लाना जरूरी नहीं समझते । 5 मार्च को बजट सत्र के दूसरे भाग के दिन दोनों सदनों के किसी सदस्य ने मल्लिकार्जुन खर्गे प्रकरण के संबंध में कोई सवाल नहीं उठाया । जबकि खर्गे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में अपनी पार्टी के साथ-साथ सम्पूर्ण विपक्ष की ओर से इन्कारनामा पेश किया था । सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे का लोकपाल आंदोलन कांग्रेस शासनकाल में सर्वाधिक चर्चित रहा । अभी उनकी दोबारा आंदोलन शुरू करने की धमकी की किसी को परवाह नहीं है । अण्णा आंदोलन से उपजे नेता अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी सबों ने अपने-अपने रास्ते बना लिये । अब किसी को भ्रष्टाचार से कोई लेना देना नहीं है ।