बहुप्रचारित लोकपाल गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट से सरकार को लगातार मिल रही फटकारों की बात करें तो फरवरी महीने के अंत तक लोकपाल खोज समिति को नाम सुझा देना है । उसके बाद लोकपाल पद के लिए खोजे गए नाम में से उपयुक्त व्यक्ति का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति करेगी । इस समिति के बाकी सदस्य हैं - भारत के प्रधान न्यायाधीश, लोकसभा स्पीकर, लोकसभा में विपक्षी नेता और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत प्रमुख न्यायविद ।

देखने-सुनने में तो लगता है मानो खोज समिति के बस नाम सुझाने भर की देर है और उसी के लिए लोकपाल चयन लटका हुआ है । लेकिन वास्तविकता ये है कि लोकपाल गठन प्रक्रिया पूरे पांच साल तक सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच झूलती रही । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल समाप्त होनेवाला है । 2019 चुनाव वर्ष है । भाजपा गठजोड़ शासन ने लोकपाल गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट आदेश को तामील नहीं करने के कारण नोटिस का जवाब देने में पांच साल गुजार दिए । इस अवधि में सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में सिर्फ लोकपाल खोज समिति गठित हुई । इसकी जानकारी आम लोगों को सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से दी गई सफाई से मिली । यह सफाई सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से बचाव में सिर्फ ‘पल्ला झाड़ो’ नीति है । चार साल लोकपाल खोज समिति गठित करने में लग गए, इतने वर्षों में लोकपाल चयन समिति की हर बैठक किसी-न-किसी पचड़े को लेकर बेनतीजा रही । तो अब इन दो-तीन महीनों में लोकपाल पद का विधिवत गठन हो जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती ।

जनवरी, 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि लोकपाल खोज समिति को आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य सुविधाएं मुहैया करायी जाए ताकि लोकपाल खोज का काम जल्दी हो । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एल. नागेश्वर राव और जस्टिस एस. के. कॉल की पीठ के सामने 17 जनवरी को सरकार की पेशी थी । केंद्र सरकार की ओर से पेश अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपल ने बचाव में कहा कि 27 सितंबर, 2018 को लोकपाल खोज समिति गठित की गयी । अटोर्नी जनरल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार लोकपाल खोज समिति की बैठक 16 जनवरी को हुई, अर्थात् शीर्ष कोर्ट में पेशी के मात्र एक दिन पहले । जाहिर है कि सरकार का इरादा सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ अपना पक्ष रखकर किसी भी प्रकार से ‘संतुष्ट’ करके पीछा छुड़ाना था । अटोर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने स्वीकारा कि लोकपाल खोज समिति इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ की समस्या से जूझ रही है । चार जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट पीठ द्वारा मांगी गयी कैफियत के जवाब में सरकार ने 17 जनवरी को यह जवाब दिया । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने जानना चाहा था कि लोकपाल पद चयन के लिए खोज कमिटी गठन की दिशा में अभी तक क्या कदम उठाए गए हैं । सुप्रीम कोर्ट में पेश विवरण के अनुसार 27 सितंबर, 2018 को लोकपाल खोज समिति का गठन हुआ । उसकी पहली बैठक चार महीने बाद 16 जनवरी, 2019 को हुई, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना था । चार जनवरी से पहले की सुनवाई में अटोर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को इतना बता दिया था कि लोकपाल खोज कमिटी गठित कर दी जाएगी । 17 जनवरी को जब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने खुद पूछा कि सितंबर से अब तक लोकपाल खोज कमिटी की कितनी बैठकें हुई । उसके जवाब में सरकार की ओर से अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने 16 जनवरी की बैठक की जानकारी दी, जो पहली बैठक थी । उसमें भी मुख्य समस्या थी इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी । वैसे अटोर्नी जनरल ने यह भी शीर्ष कोर्ट को बताया कि उसके लिए फंड आवंटित कर दिए गए हैं, लेकिन सचिवालय और स्टाफ अभी मिलने बाकी हैं ।

उसके बाद लोकपाल खोज कमिटी की पहली बैठक 30 जनवरी को हुई । इतना पता चला कि खोज कमिटी लोकपाल पद के लिए आवेदन मंगाएगी। लोकपाल खोज कमिटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की ही रिटायर जज रंजना देसाई को सौंपी गयी है । कमिटी के अन्य सदस्य हैं - इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज सखाराम सिंह यादव, पूर्व सोलिसिटर जनरल रंजीत कुमार, भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरमैन अरूंधती भट्टाचार्य, रिटायर आईएएस अधिकारी ललित के. पंवार, गुजरात के पूर्व पुलिस प्रमुख सब्बीरहुसन एस. खंडवावाला, प्रसार भारती के अध्यक्ष ए. सूर्य प्रकाश और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के पूर्व प्रमुख ए. एस. किरण कुमार ।

लोकपाल आंदोलन को अनशन करके लोकपाल एक्ट बनाने तक का मुकाम पार करानेवाले चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे के 30 जनवरी को लोकपाल गठन के लिए अनशन पर बैठने की खबर को भो सुर्खियां मिली । अण्णा हजारे का आठ साल में यह चौथा अनशन है । 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में अण्णा हजारे के अनशन का व्यापक असर हुआ । बहुत हाईप्रोफाइल लोग, नेता, नेतागिरी के लिए जमीन तलाश रहे युवाओं ने उस अनशन को हंगामेदार बनाया और अपनी राजनीतिक रोटी सेंकी । देर-सबेर एक परिणाम यह सामने आया कि लोकपाल बिल संसद में पेश हुआ और पारित हुआ । दिसंबर, 2013 में बिल पास हुआ और जनवरी, 2014 में राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद लोकपाल व लोकायुक्त बिल एक्ट बना । जनवरी, 2014 से जनवरी, 2019 तक के ब्रेक-अप पर गौर करने से पता चल जाता है कि कांग्रेस या भाजपा समेत कोई पार्टी लोकपाल गठित होते नहीं देखना चाहती । मई, 2014 तक सत्ता में रही कांग्रेस ने इसे अमल में लाना जरूरी नहीं समझा । मई, 2014 से लेकर अभी तक के विवरण से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन मामलों में बिल्कुल रूचि नहीं ली, उनमें पहले नंबर पर है लोकपाल गठन । 2014 के ही अंत में गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में चाचिका दायर की । 27 अप्रील 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लोकपाल गठन का आदेश दिया । तीन साल गुजर गए सुप्रीम कोर्ट को लोकपाल गठन की दिक्कतें बताने में और बाकी समय में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट आदेश की अवमानना का जवाब देने में गुजार ।

अवमानना नोटिस के जवाबों के दौरान सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस की मौजूदगी में लोकपाल चयन समिति की बैठकें होती रही, जिसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन भी शामिल हुई । लेकिन लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लगभग हर बैठक का बायकाट किया । उन्होंने बायकाट का जो कारण प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बताया, उसी को लोकपाल गठन की बाधा बताकर सरकार ने अवमानना से खुद को बचाया । लोकसभा में विपक्षी नेता नहीं होना लोकपाल गठन के लटके रहने का कारण बताने पर 23 नवंबर, 2016 को चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने बड़ी सटीक बात कही - ‘ढाई साल से हमारे पास विपक्षी नेता नहीं हैं और आगे ढाई साल में भी मिलना नहीं है, तो क्या इसीलिए लोकपाल एक्ट को डंप कर दिया जाए?’ विपक्षी नेता की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनाने वाला संशोधन बिल संसद में लंबित ही पड़ा रह गया । मल्लिकार्जुन खड़गे प्रधानमंत्री को पत्र लिख-लिखकर बताते रहे है कि चयन समिति की बैठक में शामिल होने का उनके पास संवैधानिक आधार नहीं है, इसलिए संशोधन बिल पारित कराएं ।

अब चला-चली के बेला में वर्तमान संसद का बजट सत्र चालू है । इस अल्पावधि में तो वो बिल सरकार की प्राथमिकता में नहीं है । नाम खोज के बाद लोकपाल चयन समिति की बैठक तो होगी ही और मल्लिकार्जुन खड़गे फिर शामिल नहीं होंगे । खड़गे ने भी सिर्फ लोकपाल गठन के लिए ही इस पचड़े को मुद्दा बनाया हुआ है । सीबोआई डायरेक्टर चयन समिति की हालिया बैठकों में वे बिना ‘संवैधानिक आधार’ के सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता की हैसियत से प्रधानमंत्री के साथ बैठे । उसके पहले केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और केंद्रीय सूचना आयुक्त चयन बैठक के लिए भी कांग्रेस नेता ने यह मुद्दा नहीं उठाया ।

अण्णा हजारे को सुप्रीम कोर्ट प्रकरण पता तो होगा ही । लेकिन अनशन शुरू करने से पहले उन्होंने सरकार की दुखती रगों पर ऊंगली रख दी । 17 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल खोज समिति को नाम सुझाने कहा और 21 जनवरी को अण्णा हजारे ने कह दिया कि लोकपाल अगर होता तो राफेल घोटाला नहीं होने देता । उतना ही नहीं, हजारे ने अपने गांव रालेगण सिद्धि में ही अनशन शुरू करने से पहले यह भी कह दिया कि राफेल घोटाला की जानकारी वे संवाददाता सम्मेलन करके देंगे । सुप्रीम कोर्ट की नोटिसों से परेशान सरकार अण्णा को शायद ही नोटिस ले ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार भ्रष्टाचार से लड़ाई ऊपर से शुरू करने की बात कर रहे है । ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगानेवाला लोकपाल गठन डंप रखा । जबकि लोकपाल एक्ट में ऐसे उलझे प्रावधान डाले गए हैं कि बड़ी मछलियों को पकड़ना मुश्किल है ।