लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने लोकपाल चयन समिति की बैठक का फिर बायकाट किया । चौथी बार ऐसा हुआ, जब मल्लिकार्जुन खर्गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकपाल चयन समिति की बैठक में शामिल होने से इन्कार कर दिया । लोकसभा में कांग्रेस नेता खर्गे ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा कि वे लोकपाल चयन समिति की बैठक में तभी शामिल होंगे जब उन्हें एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा देकर चयन समिति के पूर्ण सदस्य के रूप में आमंत्रित किया जाए ।
मल्लिकार्जुन खर्गे ने लोकपाल चयन समिति की बैठक में ‘विशेष आमंत्रित’(स्पेशल इनवाईटी) के रूप में बुलाए जाने पर एतराज किया है और यही बात उन्होंने अपने पहले के तीनों पत्रों में प्रधानमंत्री को बतायी है।
लोकपाल चयन समिति की हालिया बैठक का बायकाट करने के पीछे भी मल्लिकार्जुन खर्गे ने लोकपाल एक्ट, 2013 के प्रावधान का हवाला देते हुए इससे जुड़े संवैधानिक विंदु को उठाया है । लोकसभा में कांग्रेस नेता प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बार-बार बता रहे हैं कि लोकपाल एक्ट के अनुच्छेद 4 के अनुसार लोकपाल चयन समिति में ‘विशेष आमंत्रित’ का प्रावधान नहीं है और इसलिए वे बैठक का बायकाट कर रहे हैं । एक्ट प्रावधान के अनुसार लोकपाल चयन समिति की बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और उसमें सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भी होते हैं । मल्लिकार्जुन खर्गे ने उस बैठक का भी बायकाट किया, जिसमें चीफ जस्टिस दीपक मिश्र शामिल हुए । लोकपाल गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगातार पड़ रहे दवाब के कारण सरकार को चयन समिति की बैठक बार-बार बुलानी पड़ती है ।
पहली बार एक मार्च की बैठक का बायकाट करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र में मल्लिकार्जुन खर्गे ने यह बात भी कहा कि सरकार लोकपाल गठन को टाले रखना चाहती है । खर्गे ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के कारण यह बैठक बुलायी गयी । उसके बाद 10 अप्रील और 19 जुलाई की लोकपाल चयन समिति की बैठक का भी मल्लिकार्जुन खर्गे ने बायकाट किया । 19 जुलाई की बैठक के बारे में सरकार की ओर से अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में 24 जुलाई को जो हलफनामा दायर किया उस पर जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस आर. बानूमती की पीठ ने नाराजगी जतायी । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि लोकपाल गठन की दिशा में अभी तक क्या किया गया है, उसका पूरा विवरण के साथ दूसरा हलफनामा दायर किया जाए । 19 जुलाई की बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र समेत लोकपाल एक्ट प्रावधान के अनुसार लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और नवनियुक्त चयन समिति के सदस्य प्रमुख न्यायविद मुकुल रोहतगी शामिल हुए ।
गत हफ्ते 21 अगस्त को आयोजित चयन समिति की बैठक हुई या नहीं, इसके विषय में कोई जानकारी बाहर नहीं आयी । सिर्फ इतना पता चला कि कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बैठक में शामिल न होने के कारण में पिछले तीनों पत्रों का भी जिक्र किया । 20 अगस्त को वो पत्र प्रेस को जारी की गयी, जिसमें मल्लिकार्जुन खर्गे ने आरोप लगाया कि सरकार जनता के बीच यह संदेश भेजना चाहती है कि विपक्ष लोकपाल गठन में अड़ंगे डाल रहा है। पहले की तरह इसकी जानकारी भी सुप्रीम कोर्ट में सरकार की सफाई से ही मिल सकती है ।
सुप्रीम कोट में सुनवाई के दौरान सरकार पल्ला झाड़ो दलील अब नहीं दे पाती कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं होने के कारण लोकपाल चयन समिति के लिए गठन मुश्किल हो रहा है । लोकपाल चयन समिति में लोकसभा में विपक्षी नेता के सदस्य के रूप में होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट पीठ अब सरकार की यह दलील भी सुनना नहीं चाहती कि लोकसभा में विपक्षी नेता की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल किए जाने से संबंधित संशोधन संसद में लंबित है । सुप्रीम कोर्ट जजों को यह समझने में देर क्यों लगेगी कि इस दलील से लोकपाल गठन को टाले रखने की मंशा उजागर होती है । चार साल में चयन समिति का पचड़ा ही नहीं सुलझा, जिसको फिर लोकपाल खोज समिति गठित करनी है ।
इस संबंध में 23 नवंबर, 2016 को शीर्ष कोर्ट की टिप्पणी का जिक्र प्रासंगिक होगा । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने लोकपाल गठन प्रक्रिया लंबित रखने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान जो बात कही, वो आज बिल्कुल सही और सटीक बैठती है । उस वक्त सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि लोकसभा में विपक्षी नेता की जगह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल करनेवाला संशोधन संसद में लंबित है और इसे क्लियर करने का अर्थ ‘न्यायिक विधेयक’ को न्योता देना होगा ।
इस पर नाराजगी जताते हुए 23 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा ‘ढाई साल से हमारे पास विपक्षी नेता नहीं है और अगले ढाई साल में भी विपक्षी नेता हमें मिलना नहीं है, तो क्या सिर्फ इसीलिए लोकपाल एक्ट को डंप कर दिया जाए? जनजीवन में पारदर्शिता लानेवाले एके भ्रष्टाचार विरोध एक्ट को सिर्फ इसलिए खतम नहीं होने दिया जाएगा कि लोकसभा में विपक्षी नेता नहीं है ।’
तकरीबन उतना समय गुजर गया और स्थित आज वही है जो 2016 में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कही थी । लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने अपने पत्रों में प्रधानमंत्री से पूछा कि चार साल में उन्होंने उस संशोधन को संसद से पारित क्यों नहीं कराया? 19 जुलाई को प्रधानमंत्री के नाम भेजे गए पत्र में खर्गे ने यह भी ध्यान दिला दिया कि राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी ने एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनानेवाले संशोधन को मान्यता दे दी है ।
सुप्रीम कोर्ट में अभी तक सरकार की ओर से जो सफाई दी गयी है, उससे लगता है कि लोकपाल गठन को लटकाए रखना नियोजित है । बरिष्ठ वकील पी. पी. राव का सितंबर 2017 में निधन के बाद से लोकपाल चयन समिति के एक सदस्य प्रमुख न्यायविद का पद रिक्त था । 24 जुलाई, 2018 को अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि मुकुल रोहतगी को प्रमुख न्यायविद के रूप में चयन समिति का सदस्य बनाया गया है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार साल में अपने किसी भाषण में संसद के अंदर या बाहर भूलवश भी लोकपाल गठन की ‘अड़चनों’ का जिक्र नहीं किया । ‘मन की बात’ में भी प्रधानमंत्री यह प्रसंग नहीं उठाते । रविवार 26 अगस्त को ‘मन की बात’ में जनता को प्रधानमंत्री ने हालिया संपन्न संसद के मानसून सत्र को पिछले सत्रों के बजाए इस माएने में सबसे सार्थक बताया कि इस दौरान लोकसभा ने 21 और राज्यसभा ने 14 बिल पास किए ।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बावजूद इस सत्र में सरकार ने उस संशोधन बिल को पास कराने की जरूरत नहीं समझी, जिसके लटके रहने के कारण मल्लिकार्जुन खर्गे को सबसे बड़ी पार्टी के नेता की हैसियत से लोकपाल चयन समिति के पूर्ण सदस्य के बजाए ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में बुलाने की खानापूरी की जाती है और वे बायकाट करते हैं ।
25 जुलाई को संसद में लिखित उत्तर में केंद्रीय कार्मिक राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने वही जानकारी दुहरायी, जिसके चलते एक दिन पहले सरकार को सुप्रीम कोर्ट में फटकार सुननी पड़ी । मंत्री ने संसद में लटके संशोधन बिल का नाम नहीं लिया, जिसका हवाला शीर्ष कोर्ट में बार-बार दिया जा चुका है । सरकार ने मुकुल रोहतगी को ही प्रमुख न्यायविद के रूप में लोकपाल चयन समिति का सदस्य बनाया, जिनकी टालो दलील सुप्रीम कोर्ट सुनने को तैयार नहीं थी और वे अटोर्नी जनरल पद से हट गए थे ।
अब यह संभावना बनी हुई है कि सुप्रीम कोर्ट धारा-142 के तहत संविधान से प्राप्त अपने असाधारण शक्तियों का उपयोग करके लोकपाल गठन का सीधे कड़ा फरमान/आदेश दे सकती है । धारा-142 का उल्लेख लोकपाल याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में किया । धारा-142 का इस्तेमाल शीर्ष कोर्ट ने गत 24 अगस्त को पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव के संबंध में दिए गए आदेश में किया है ।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकार दोषी है । इस चार साल में इक्का-दुक्का सदस्य ने ही लोकपाल गठन और विपक्षी पार्टी नेता को चयन समिति में न होने के संबंध में संसद में कोई सवाल उठाया । 26 जुलाई, 2018 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भ्रष्टाचार निवारण(संशोधन) एक्ट को मंजूरी दी । उसमें जोड़ा गया नया अनुच्छेद 17ए गौर करने लायक है । इसके तहत कोई भी भ्रष्टाचार रोक एजेंसी(सीबीआई समेत) किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच केंद्र या राज्य सरकार की मंजूरी के बगैर नहीं कर सकती । संशोधित कानून के अंतर्गत किसी मौजूदा या पूर्व मंत्री के खिलाफ जांच के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए । विधायक, सांसद के खिलाफ जांच के लिए स्पीकर की मंजूरी चाहिए । धारा-311 के तहत संबद्ध मंत्री की इजाजत के बगैर पहले ही लोकसेवकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती ।
लोकपाल आंदोलन 2011 में अण्णा हजारे ने ऐसा लोकपाल गठन के लिए किया, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री भी हों । जनवरी, 2014 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मुहर के बाद लोकपाल एक्ट लागू हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री और बड़े अधिकारियों का मामला दब गया । फिर धीरे-धीरे लोकपाल गठन ही गोल हो गया । अब लोकपाल चयन दबाए रखकर भ्रष्टाचार ‘निवारण’ के नाम पर ऐसा सुरक्षा कवच बनाया गया कि कोई भ्रष्ट कानूनी शिकंजे में नहीं आ सकता । अण्णा हजारे ने दो अक्टूबर से लोकपाल गठन के लिए फिर आंदोलन की धमकी दी है । अब उनके आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला । मार्च, 2018 के अंत में अण्णा अनशन करने रामलीला मैदान पहुंचे, किसी ने नोटिस नहीं लिया ।