केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने 2018 में पूरे वर्ष अपनी वित्तीय योजनाओं और नीतियों को यह कहकर उचित ठहराने पर केंद्रित रखा कि ‘अच्छे दिन’ के लिए ये सारे कदम उठाए गए जो वायदा 2014 आम चुनाव में मतदाताओं से किया था । इस बात को सबसे ज्यादा देकर हर अवसर पर और हर जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं । ‘अच्छे दिन’ के लिए सबसे पहले चाहिए पैसा और पैसे को नियंत्रित करनेवाली संस्था भारतीय रिजर्व बैंक(आरबीआई) से सरकार का टकराव 2018 में अपने चरम पर रहा । अब करीब आ गया 2019 आम चुनाव, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी पार्टी को प्रचंड बहुमत दोबारा दिलाने के लिए वोटरों को आश्वस्त करना पड़ेगा कि आरबीआई से विवाद समेत वस्तु और सेवा कर(जीएसटी) तथा नोटबंदी जैसे सारे आर्थिक कदम जनहित में थे । कतारों में घंटों खड़े रहकर वोट डालनेवाले आम वोटरों को अभी तक यह बात समझ में नहीं आ रही है कि रिजर्व बैंक से सरकार का टकराव क्यों हुआ । 2016 में प्रधानमंत्री के नोटबंदी एलान के बाद दो साल के अंदर-अंदर दो रिजर्व बैंक गवर्नरों ने इस्तीफा दिया आर 2018 के अंत में तीसरे गवर्नर भी सरकार के साथ डीलिंग में खुद को सहज नहीं पा रहे हैं । दरअसल इसके बाद ही लोगों ने जाना कि रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है और सरकार इसे अपने नियंत्रण में लेना चाहती है । पहली बार यह विवाद उसी समय सामने आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर, 2016 में अचानक 500 और 1000 के नोट का चलन रोकने का एलान कर दिया । जबकि इस योजना से असहमति के कारण अगस्त, 2016 में ही रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । आम जनता में अराजक और आर्थिक प्रलय की स्थिति पैदा हो गयी, जिससे लोग अभी तक उबर नहीं पाए हैं । सिर्फ साक्षर वोटर ही जानते थे कि राष्ट्रीय मुद्रा का कस्टोडियन रिजर्व बैंक है । रघुराम राजन की जगह उर्जित पटेल आए और वो भी स्थिति संभाल नहीं पाए और दिसंबर, 2018 में उन्हें भी आरबीआई गवर्नर पद से इस्तीफा देना पड़ा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली पूरे दो साल तक नोटबंदी को जनहित में ठहराते रहे और जनता में त्राहि-त्राहि मची रही । इस दौरान आरबीआई गवर्नर अपने पूर्ववर्ती रघुराम राजन द्वारा उठाए गए मुद्दे को गलत नहीं बता पाए । बैंकों में अफरातफरी और जनता की तबाही का निदान आरबीआई नहीं खोज पा रही थी । उसी दौरान गवर्नर उर्जित पटेल को नए संकट का सामना करना पड़ गया । आम लोगों की समझ में सिर्फ इतनी सी बात आयी कि सरकार रिजर्व बैंक की ‘संचित पूंजी’ हड़पकर छोटे और मझोले उद्योगों को आसान शर्तों पर कर्ज देकर ‘अच्छे दिन’ का दूसरा चुनावी दांव खेलना चाहती है । क्योंकि रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक उपक्रम के बैंकों को कर्ज देने में और वसूलो में कड़ाई के निर्देश दिए । आरबीआई जब इसके लिए तैयार नहीं हुई, तब सरकार ने आरबीआई एक्ट के सेक्सन-7 का हवाला दिया । इसके पहले लोग न तो आरबीआई एक्ट जानते थे और न ही सेक्सन -7 का नाम लोगों ने सुना था । सेक्सन-7 की जानकारी जनता के बीच एक नए विवाद के साथ पहुंची । यह विवाद एक्ट के इस प्रावधान से जुड़ा है - ‘आरबीआई एक्ट के सेक्सन-7 के अंतर्गत केंद्र सरकार आरबीआई को समय-समय पर गवर्नर के परामर्श से वैसे निर्देश दे सकती है जो सरकार जनहित में आवश्यक समझे ।’ अब यह सवाल जनता के बीच है कि आरबीआई एक्ट के इस सेक्सन के इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ी और जब आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल इससे सहमत नहीं थे तब भी सरकार इसपर क्यों अड़ी रही । उर्जित पटेल को गवर्नर पद से इस्तीफा देना पड़ गया । उनकी जगह नियुक्त नए गवर्नर शशिकांत दास कुछ स्पष्ट बोलने से कतराते हैं ।
1934 में बने आरबीआई एक्ट के 83 वर्षों के इतिहास में कभी सेक्सन-7 का इस्तेमाल नहीं हुआ । उसके बाद से 50-55 वर्षों के कांग्रेस और कांग्रेस समर्थित शासनकाल में कभी आरबीआई को निर्देश देने के लिए एक्ट के इस सेक्सन का इस्तेमाल नहीं किया गया । आज नोटबंदी की तरह ही अचानक सेक्सन-7 के इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ी? इसके बिना जनहित का कौन काम बाधित हो रहा है? इस सवाल का जवाब केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के पास नहीं है । कांग्रेस शासनकाल की सभी नीतियों की एक सिरे से जनविरोधी बतानेवाले प्रधानमंत्री ने आरबीआई विवाद पर चुप्पी साध रखी है । जनता के बीच यह विवाद 11 दिसंबर से ‘हॉटकेक’ बना हुआ है, जब पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि जनता को सबसे ज्यादा तकलीफ नरेंद्र मोदी के वित्त प्रबंधन कारनामों से पहुंची है । जब विधान सभाओं का चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में था और नरेंद्र मोदी तूफानी चुनावी दौरे में जुटे थे, उसी समय आरबीआई को अपने अनुसार चलाने की अंदरूनी कवायद चरम पर थी । केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली और आरबीआई गवर्नर की रसाकस्सी ऐसे मोड़ पर थी कि वित्तमंत्री के हर स्पष्टीकरण से एक नया भ्रम पैदा हो रहा था । ठीक उसी समय गवर्नर उर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दिया । पांच दिसंबर को गवर्नर उर्जित पटेल ने डिपुटी गवर्नर विरल आचार्य के साथ मुंबई में मौद्रिक नीति की समीक्षा बैठक की और संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया । उसके पांच दिन बाद उर्जित पटेल को गवर्नर पद छोड़ना पड़ गया । वित्त मंत्री की यह सफाई मतदाताओं के बोच ठहर नहीं पायी कि उर्जित पटेल को इस्तीफा देने के लिए बाध्य नहीं किया गया । 10 दिसंबर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधान सभा चुनाव परिणामों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे और उसी दिन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दिया । उर्जित पटेल ने यह कहकर गवर्नर पद छोड़ा कि केंद्र सरकार केंद्रीय बैंक पर वित्तीय क्षेत्र से संबंधित विभिन्न मुद्दों का लेकर दवाब बना रही थी और 2018 में आर्थिक कुप्रबंधन के लिए आरबीआई को दोषी ठहरा रही थी । 11 दिसंबर को चारों विधान सभाओं के चुनाव परिणाम भाजपा के खिलाफ गया । 12 नवंबर को गवर्नर का कार्यभार ग्रहण करते ही शशिकांत दास ने सफाई दी कि ‘सरकार और आरबीआई के बीच बिल्कुल ‘स्वतंत्र निष्पक्ष और खुला विमर्श’ चल रहा है । सरकार कोई दावेदार नहीं है, बस प्रमुख नीतिगत निर्णयों का प्रबंधन करती है’ । इसका सीधा तात्पर्य यही निकलता है कि कहीं कुछ है जो स्पष्ट नहीं है और मतदाताओं के बीच सरकार-आरबीआई विवाद की सही तस्वीर नहीं पहुंच पा रही है । डिपुटी गवर्नर विरल आचार्य ने मतदाताओं को स्पष्ट बता दिया कि केंद्रीय बैंक पर दवाब बनाने की सरकार की कोशिशों से आरबीआई को स्वायत्तता पर आंच आ सकती है ओर 2018 से पहले सरकार-आरबीआई संबंध इतना खराब कभी नहीं हुआ ।
उसके बाद 19 दिसंबर को केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने एक साथ दो सफाई दी । पहले तो कहा कि गवर्नर उर्जित पटेल को इस्तीफे के लिए बाध्य नहीं किया गया, क्योंकि केंद्रीय बैंक के रिजर्व कोष के आकार जैसे मुद्दों पर आरबीआई के निदेशक मंडल की बैठक में सौहादपूर्ण चर्चा हुई । दूसरी सफाई में अरूण जेटली ने रिजर्व बैंक से 3.6 लाख करोड़ रूपये की पूंजी लेने के लिए सरकार के दवाब पर चुप्पी तोड़ी और कहा कि सरकार को इस साल रिजर्व बैंक से एक पैसा नहीं चाहिए । लेकिन उसके बावजूद इस चर्चा पर विराम नहीं लगा है कि केंद्रीय बैंक के 9.36 लाख करोड़ रूपये के रिजर्व कोष से एक हिस्सा देने की मांग रिजर्व बैंक से की गयी है । क्योंकि इसका मकसद 2019 आम चुनाव से पहले वोट लुभावन वायदों को पूरा करना है । आरबीआई एक्ट के सेक्सन-7 पर भी वित्तमंत्री ने स्पष्टीकरण दिया कि सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया है, सिर्फ इस सेक्सन के अंतर्गत विमर्श शुरू किया है । नए गवर्नर इस मुद्दे पर चुप हैं । लेकिन आरबीआई एक्ट की यह धारा विवाद के घेरे में है और 2019 में आम चुनाव तक तथा उसके बाद भी विवादित रहेगी । संसद के सत्र में भी विपक्ष के सवाल पर वित्तमंत्री पल्ला झाड़नेवाला जवाब देते देखे गए । अगर यह विवाद सार्वजनिक नहीं होता तो लोग जान नहीं पाते कि आरबीआई का रिजर्व कोष क्या है और इसका चुनावी लाभ उठाने के लिए आरबीआई एक्ट के सेक्सन-7 के इस्तेमाल के पीछे की असलियत क्या है । नोटबंदी के मारे गरीब मजदूर किसान मतदाताओं को समझाने के लिए पूर्व डिपुटी गवर्नर राकेश मोहन ने बड़े अच्छे तरीके से बताया कि केंद्रीय बैंक के रिजर्व कोष से एक हिस्सा लेना अपना मकान बेचकर शर्ट खरीदने जैसा है ।
2003 में अटल बिहारी वाजपेयी शासनकाल में रिजर्व बैंक गवर्नर बने आइ. बी. रेड्डी इस पद पर 2008 तक रहे, जब कांग्रेस सत्ता में थी । उन्होंने चेतावनी दी थी - ‘इतिहास बताता है कि केंद्रीय बैंक की आजादी या स्वायत्तता फीजिक्स के कानून जैसी नहीं है ।’ नरेंद्र मोदी सरकार ने जो विशेषज्ञ कमिटी बनायी है, उसकी अध्यक्षता रिजर्व बैंक के कांग्रेस शासनकाल के गवर्नर विमल जालान कर रहे हैं। यह विशेषज्ञ कमिटी रिजर्व बैंक के पूंजी भंडार पर विमर्श करेगी, जिसको लेकर पहली बार रिजर्व बैंक से सरकार का टकराव ने ऐसा विवादित मोड़ लिया ।
सरकार को ऐसा कदम उठाने की नौबत टाटा, अडानी और एस्सार जैसी पावर उत्पादक कंपनियों ने खड़ी की । पावर कंपनियां लोक उपक्रम बैंकों से लिए कर्ज में डूबी थी और उन पर शिकंजा कसने के आरबीआई के 12 फरवरी को सर्कुलर बनाने को तैयार नहीं थी । इन पावर कंपनियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी । सरकार ने इस कंपनियों के समर्थन में आरबीआई एक्ट के सेक्सन-7 के इस्तेमाल की इजाजत मांगी । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने 28 अगस्त के आदेश में ठीक वही कहा जो एक्ट में लिखा है । हाईकोर्ट ने कहा कि इस सेक्सन का इस्तेमाल मनमाने ढंग से अपनी सुविधानुसार नहीं किया जा सकता । सरकार आरबीआई को कोई निर्देश सेक्सन-7 के अंतर्गत तभी दे सकती है जब उसके समर्थन में पर्याप्त आधार हो । आधार तो है बड़ी कंपनियों का हित और आरबीआई के रिजर्व कोष हथियाने के प्रयास के पीछे चुनाव हित । हाईकोर्ट में सरकार ने सेक्सन-7 पर अपनी मंशा स्पष्ट नहीं की ।
केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) के अंदर सरकारी हस्तक्षेप से मची हाईप्रोफाईल उठापटक को आरबीआई विवाद ने दबा दिया । सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना दोनों ने ही एक-दूसरे पर काला धन कारोबारियों से करोड़ों रूपया रिश्वत लेने का आरोप लगाया । मामला सुप्रीम कोर्ट में है । सीबीआई निदेशक पद पर चयन प्रक्रिया की अवहेलना करके दिसंबर, 2016 में राकेश अस्थाना को कार्यवाहक निदेशक बनाने के बाद से ही विवाद शुरू हुआ । नोटबंदी का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया । दोनों ही विवाद लगभग साथ शुरू हुआ और 2017-18 पर हावी रहा ।