राजनीतिक मसाला बनी लखीमपुर खीरी हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और उत्तर प्रदेश सरकार से एफआईआर की स्टेटस रिपोर्ट मांगी । एफआईआर के बारे में रिपोर्ट है कि इसमें केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र और उनके पुत्र आशीष मिश्र का नाम है, लेकिन पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार नहीं किया ।

3 अक्टूबर की इस हिंसक वारदात में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का काफिला उनके पुत्र के नेतृत्व में लखीमपुर खीरी में प्रदर्शनकारी किसानों को कुचलते हुए निकल गया । इसमें चार किसान और एक पत्रकार समेत आठ लोग मारे गये । इस वारदात में पुलिस को बचाने की सत्तारूढ़ दल की लीपापोती चल ही रही थी कि बीच में ही सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान ले लिया । उत्तर प्रदेश के दो वकीलों ने इस संबंध में भारत के चीफ जस्टिस एन. वी. रमना को लिखा कि इस वारदात की कोर्ट की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच करायी जाय । इस हिंसा में पुलिस की भूमिका पर ही मुख्य रूप से सवाल उठा है । क्योंकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र के काफिले की सुरक्षा में बड़ी संख्या में स्थानीय थाना और जिले के पुलिसकर्मी आगे-पीछे चल रहे थे । मंत्री-पुत्र आशीष उर्फ मोनू की काली कार को टक्कर मारते हुए तेजी से निकलते फुटेज टीवी कैमरों में भी कैद हुआ ।

उसी सिलसिले में राज्य के वकील शिव कुमार त्रिपाठी और सी. एच. पंडा ने सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर इसे जनहित याचिका के रूप में लेने का आग्रह किया । चीफ जस्टिस एन. वी. रमना की अध्यक्षता वाली शीर्ष कोर्ट पीठ ने तुरंत इस पर सुनवाई की ।

पांच अक्टूबर को वकीलों ने उच्चस्तरीय जांच कराने का आग्रह पत्र सुप्रीम कोर्ट को लिखा और सात अक्टूबर को शीर्ष कोर्ट पीठ ने एफआईआर की स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया । शीर्ष कोर्ट ने एक दिन का समय देकर यह बताने को कहा कि कितनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुए और उनमें कितने गिरफ्तार हुए । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का भी गठन कर दिया ।

अजय मिश्र ने 6 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की । उसका विवरण बाहर नहीं आया । लेकिन उस दिन तक और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एफआईआर स्टेटस मांगे जाने तक केंद्रीय गृह राज्य मंत्री या उनके पुत्र के गिरफ्तार होने की कोई सूचना नहीं थी । आशीष मिश्र उर्फ मोनू को पूछताछ के लिए समन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जारी हुआ और मंत्री-पुत्र लापता थे ।

उत्तर प्रदेश और केंद्र में भी भाजपा की सरकार है । विधान सभा चुनाव करीब है । कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसान लखीमपुर खीरी में प्रदर्शन के लिए जुटे थे, जो हिंसा के बाद सियासी राजनीति का अखाड़ा सभी गैर-भाजपा दलों के लिए बन गया । लेकिन उसमें पुलिस की राजनीतिक भूमिका लखीमपुर खीरी हिंसा से सिर्फ दो दिन पहले की शीर्ष कोर्ट की टिप्पणी के आलोक में देखी जानी चाहिए । शायद इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर हिंसा पर स्वतः संज्ञान भी तुरंत लिया ।

छत्तीसगढ़ के निलंबित अतिरिक्त पुलिस डीजी गुरजिंदर पाल सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा प्रदान करने से इन्कार कर दिया । छत्तीसगढ़ में अभी कांग्रेस की सरकार है । आईपीएस अधिकारी गुरजिंदर पाल सिंह 2015 में भाजपा शासनकाल के समय जबरन वसूली से अकूत संपत्ति अर्जित करने की शिकायत पर निलंबित हैं । उनके खिलाफ भ्रष्टाचार, रंगदारी और विद्रोह के मामले दर्ज हैं । इसे लेकर गुरजिंदर सिंह ने सुरक्षा की मांग के लिए याचिकाएं दायर की थी ।

इस मामले की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता वाली उसी पीठ ने की, जो लखीमपुर खीरी हिंसा पर सुनवाई कर रही है । दोनों में दो अन्य जज जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली हैं ।

गुरजिंदर पाल सिंह मामले में तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केंद्र और राज्य सरकारों के लिए भी झटका है, चाहे वो किसी भी पार्टी की क्यों न हो । चीफ जस्टिस ने कहा कि “नौकरशाहों खासकर पुलिस अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और ज्यादितियों की शिकायतों की जांच के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में स्थायी समिति बनाने की बात मैंने कभी सोची थी । इसे मैं सुरक्षित रखना चाहता हूँ, अब ऐसा नहीं चाहता ।”

इससे पहले 26 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा था कि पुलिस अधिकारियों को सरकार बदलने पर दूसरे दल का कोपभाजन बनना पड़ता है, ऐसी प्रवृत्ति देश में बढ़ती जा रही है, जो गलत है । इसके लिए पुलिस अधिकारी स्वयं जिम्मेदार हैं, जो सरकार के करीबी बने रहने का फायदा उठाते हैं । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि ऐसी चीजें करने का भुगतान बदली परिस्थितियों में सूद के साथ करना होगा ।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पुराने लोक सभा क्षेत्र गोरखपुर के एक होटल में एक प्रोपर्टी डीलर मनीष गुप्ता की कथित पुलिस पिटाई की मौत से पल्ला झाड़ भी नहीं पाए कि लखीमपुर खीरी हिंसा वाला पहले से ज्यादा झंझटिया मामला सामने आ गया । गोरखपुर के एक होटल में 28 सितंबर को तड़के हुई मनीष गुप्ता की मौत का कारण उसकी पत्नी ने उसके कमरे में जबरन घुसकर पुलिस द्वारा की गयी पिटाई बताया । 30 सितंबर को मनीष गुप्ता के परिजनों से मिलकर उसकी पत्नी मीनाक्षो को नौकरी देने और घटन की सीबीआई जांच कराने का एलान मुख्यमंत्री ने कानपुर में एक जनसभा में किया ।

उसी दिन यानी कि 30 सितंबर को ही मुंबई से राजनीतिक विवादों में फंसे पूर्व पुलिस आयुक्त परमवीर सिंह के फरार होने की खबर आयी । उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के पास मिले कार बम के मामले में पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त परमवीर सिंह पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के साथ आरोपी हैं । 30 सितंबर को महाराष्ट्र के वर्तमान गृहमंत्री दिलीप वालसे पाटिल ने ही कहा कि जांच एजेंसियों को और सरकार को परमवीर सिंह के पता-ठिकाने की जानकारी नहीं है । उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है । पूर्व पुलिस आयुक्त के रूस भागने की गृहमंत्री की आशंका अगर सही है तो बिना अधिकारियों और सरकार की जानकारी में क्या ऐसा संभव है?

लखीमपुर खीरी हिंसा पर भाजपा के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेन्दर सिंह ने आरोप लगाया कि ‘तथ्यों से संकेत मिले हैं कि यह घटना पूर्व नियोजित थी ।’

बहुविवादित और बहुप्रचारित 2002 के गुजरात दंगे के दौरान बिल्किस बानो सामूहिक बलात्कार के मामले में मार्च, 2019 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को बंबई हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी करने का आदेश गुजरात सरकार को देना पड़ा । दंगे के समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्किस बानो को पांच लाख मुआवजा देकर मुंह बंद करने की कोशिश की, जिसे उसने ठुकरा दिया ।

बंबई हाईकोर्ट के जज दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना ने 4 मई, 2017 के अपने फैसले में सात लोगों को दंगे के लिए दोषी ठहराया जिसमें पांच पुलिसकर्मी और दो डॉक्टर थे । इस फैसले के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई, 2017 में ठुकरा दी । उसक बावजूद एक आईपीएस अधिकारी आर. एस. भगोड़ा समेत चार पुलिसकर्मियों को गुजरात सरकार बचाती रही ।

29 मार्च, 2019 के शीर्ष कोर्ट आदेश के बावजूद दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की कोई सूचना अभी तक नहीं है । गुजरात में लगातार भाजपा की ही सरकार है । 2019 के अंत में दिल्ली दंगे से निपटने में केंद्र के अधीन दिल्ली पुलिस का आम आदमी पार्टी सरकार के समर्थकों पर फर्जी मामले दिल्ली अदालतों में पीस रहे हैं ।

पुलिसकर्मी की लापरवाही या सरकार के साथ मिलीभगत से मामला रफादफा करने की खबर दब नहीं पाती तो प्रायः राज्य सरकारें सीबीआई जांच का आदेश देकर पल्ला झाड़ लेती हैं । जबकि केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) खुदही राजनीतिक जांच एजेंसी बनी हुई है । 2018 से लेकर 2020 तक सीबीआई के अंदर दो डायरेक्टरों के बीच मचे ‘ऐतिहासिक’ घमासान के कारण राजनीतिक थे । गुजरात सरकार के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की 2002 दंगे में सरकार के अनुकूल काम करने के कारण नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के समय से ही उन्हें सीबीआई डायरेक्टर बनाने में जुटे । राकेश अस्थाना को अंतरिम डायरेक्टर बनाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित चयन समिति प्रक्रिया सरकार टालती रही बवाल बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट गया जो 2021 में राकेश अस्थााना के रिटायर होते तक चला ।

सीबीआई का इस्तेमाल केंद्र द्वारा राजनीतिक बदले की भावना से किए जाने की रिपोर्ट के कारण नवंबर, 2020 में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि सीबीआई को किसी राज्य में जांच के लिए उस राज्य सरकार की सहमति लेनी जरूरी होगी ।

इसकी शुरूआत पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी(दीदी) सरकार से 2020 में ही हुई जब दीदी ने अपने एक चहेते पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए सीबीआई को अपने यहां प्रवेश की इजाजत नहीं दी । उसके बाद कई गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों ने भी वैसा किया ।

राष्ट्रीय मोर्चा शासनकाल 1996-98 का एक मामला मुझे याद है । चारा घोटाला में फंसे बिहार के ‘किंगमेकर’ मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने अपने चहेते डीजीपी एस. के. सक्सेना को प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल के जरिए दो बार सेवा बिस्तार दिलवाया । उस वक्त केंद्रीय गृहमंत्री सीपीआई के इन्द्रजीत गुप्ता ने लालू प्रसाद का आग्रह ठुकरा दिया था ।