सीवीसी(केंद्रीय सतर्कता आयुक्त) के चयन के लिए निर्धारित संवैधानिक मानदंड और प्रक्रिया को धता बताकर संजय कोठारी को सीवीसी नियुक्त कर दिया गया । संजय कोठारी राष्ट्रपति के सचिव थे । सीवीसी चयन के लिए बनी खोज कमिटी के पास आवेदकों की सूची में कहीं संजय कोठारी का नाम नहीं था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई हाईपावर कमिटी की बैठक में भी कोठारी का नाम नहीं आया । उसके बावजूद संजय कोठारी की नियुक्ति सीवीसी के रूप में कर दी गयी । केंद्रीय सतर्कता आयोग भ्रष्टाचार पर अंकुश रखनेवाली शीर्ष स्टेचुटरी संस्था है, जिसे सीबीआई(केंद्रीय जांच ब्यूरो) के कामकाज पर नियंत्रण का अधिकार है । इसीलिए सीवीसी जैसे पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति की प्रक्रिया सीवीसी एक्ट में रखी गयी, जो सरकार के प्रभाव से सर्वथा मुक्त हो और जिसमें चयन समिति की सहमति हो । संजय कोठारी ने गत हफ्ते सीवीसी बनने के बाद बैंकर सुरेश एन. पटेल को केंद्रीय सतर्कता आयोग के दूसरे सदस्य सतर्कता आयुक्त पद की शपथ दिलायी । एक्ट के अनुसार उसके लिए भी चयन समिति की सहमति जरूरी है ।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में गृहमंत्री और लोकसभा के विपक्षी नेता के भी होने का संवैधानिक प्रावधान है । लोकसभा में कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, मगर उसके नेता को विपक्षी नेता का दर्जा प्राप्त नहीं है । फरवरी में हुई चयन समिति की बैठक में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल हुए । 19 फरवरी को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दावा किया कि सीवीसी चयन प्रक्रिया गैरकानूनी और असंवैधानिक है । उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के सचिव संजय कोठारी का नाम ‘अपनी जेब’ से निकाला और नियम तथा प्रक्रिया को ताक पर रखकर ‘तुगलकी फरमान’ जारी कर दिया कि कोठारी अगले सीवीसी होंगे । मनीष तिवारी ने उसी समय संकेत दे दिया कि यह बेहद गंभीर और संवेदनशील मसला है कि चयन प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी जा सकती है । कांग्रेस प्रवक्ता ने लोकसभा में पार्टी नेता अधीर रंजन चौधरी के हवाले से और भी कुछ मुद्दे उठाए, जो चयन प्रक्रिया के सरकारीकरण को उजागर करते हैं । खोज कमिटी पर भी कांग्रेस ने उंगली उठायी । वित्त सचिव राजीव कुमार सीवीसी पद के लिए आवेदक भी थे और खोज कमिटी के सदस्य भी थे । खोज कमिटी के सदस्यों - मंत्रिमंडल सचिव राजीव गौबा कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग(डीओपीटी) सचिव सी. चन्द्रमौलि और राजीव कुमार के पैनल ने हाईपावर कमिटी को जो सूची सौंपी उसमें संजय कोठारी का नाम नहीं था । उसके बावजूद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई चयन कमिटी की बैठक से संजय कोठारी का नाम क्लियर होने की जानकारी बाहर आयी ।
2018 में सीबीआई के अंदर दो डायरेक्टरों के बीच रिश्वतखोरी को लेकर मची उठापटक लोग भूले नहीं है । घमासान इतना जोर पकड़ा कि सुप्रीम कोर्ट में गया, जहां सरकार की दागी भूमिका खुलकर सामने आ गयी । भ्रष्टाचार शिकायतों की जांच करनेवाली देश की सबसे बड़ी एजेंसी सीबीआई के अंदर की रिश्वतखोरी और उसमें शामिल रसूखदार लोगों को बचाने के लिए सीबीआई को अपनी पॉकेट संस्था बनाने की सरकारी नीति का पर्दाफाश हुआ । सीवीसी ने भी सरकार के इशारे पर घोलमट्ठा करने का प्रयास किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण कामयाबी नहीं मिली । अभी भी दिल्ली की एक निचली अदालत में विशेष सीबीआई जज संजीव अग्रवाल के सामने सुनवाई चल रही है । 12 फरवरी को जज ने सीबीआई से जानना चाहा कि रिश्वतखोरी में बड़ी भूमिका निशाने वाले पूर्व स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना और ‘रॉ’ प्रमुख एस. के. गोयल को क्यों ‘क्लीन चिट’ दी गयी । जज ने सवाल उठाया कि सीबीआई ने क्यों अपने ही डीएसपी देवेन्द्र कुमार को 2018 में गिरफ्तार किया, और क्यों सोमेश्वर श्रीवास्तव को ‘छुट्टा घूमने’ छोड़ दिया गया है । जांच में श्रीवास्तव का मुख्य रोल पाया गया, जो दुबई स्थित कारोबारी मनोज प्रसाद का भाई है । मनोज प्रसाद सीबीआई के अंदर हाई प्रोफाइल रिश्वतखोरों में कथित बिचौलिया है और मुख्य अभियुक्त है । सीबीआई के डीएसपी देवेन्द्र कुमार 2018 में जमानत पर छूटे । स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को गिरफ्तार नहीं किया गया । सीबीआई ने अस्थाना के खिलाफ हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू साना की शिकायत पर रिश्वत खाने का मामला दर्ज किया था । जबकि सतीश बाबू साना स्वयं 2017 के एक मामले में जांच के घेरे में था, जिसमें ‘बड़े-बड़ों’ से ताल्लुकात रखनेवाले गोश्त निर्यातक मोईन कुरेशी शामिल था ।
2018 के अंत में इस रिश्वतखोरी की जांच में सीवीसी के. वी. चौधरी विवाद के घेरे में आए । इसकी शुरूआत दिसंबर 2016 में ही हो गयी, जब नरेंद्र मोदी सरकार सीबीआई डायरेक्टर का चयन टालने और ऐसे अधिकारी को अंतरिम निदेशक बनाए रखना चाहती थी, जो ‘कामचलाऊ’ हो । डायरेक्टर अनिल सिन्हा के रिटायर होने के बाद गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक बना दिया गया । मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, फटकार मिलने पर चयन समिति की बैठक बुलायी गयी । दिल्ली पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा का डायरेक्टर के रूप में चयन तो हुआ, मगर राकेश अस्थाना को उनके समानान्तर स्पेशल डायरेक्टर के रूप में बरकरार रखा गया । बताते चलें कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाले भाजपा गठजोड़ शासनकाल में 2003 में सीवीसी एक्ट बना । लेकिन गठन सुप्रीम कोर्ट के जवाबतलब के बाद हुआ । 2003 में ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए एक चयन कमिटी बनाने और दो साल से पहले न हटाए जाने का निर्देश दिया । सुप्रीम कोर्ट ने नाम खोजने का अधिकार सीवीसी के हाथ में रखने का प्रावधान किया ।
उसी भाजपा गठजोड़ शासनकाल में सीबीआई और सीवीसी की किरकिरी हुई, जैसी पहले कभी नहीं देखी गयी थी । 2018 के अक्टूबर तक दोनों सीबीआई डायरेक्टरों के एक-दूसरे पर रिश्वतखोरों के आरोपों ने इतना तूल पकड़ा कि सुप्रीम कोर्ट को कमान अपने हाथ में लेनी पड़ी । सीवीसी के. वी. चौधरी ने सरकार की मर्जी के अनुसार आलोक वर्मा की छुट्टी कर दी । वर्मा ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, क्योंकि उनका दो साल का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 तक था ।
चीफ जस्टिस रंजन गोगाई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार और सीवीसी के आदेश को निरस्त करके आलोक वर्मा को फिर से सीबीआई डायरेक्टर पद पर बहाल कर दिया । सरकार और सुप्रीम कोर्ट में तो किसी-न-किसी राजनीतिक मामले को लेकर प्रायः ठनी रहती है । लेकिन इस ठनने में सीवीसी इंस्ट्रुमेंटल रहे । सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई डायरेक्टर चयन समिति की तत्काल बैठक बुलाने का निर्देश दिया । 10 जनवरी, 2019 को अफरातफरी में हाई पावर कमिटी बैठक हुई । इस कमिटी में भी प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित कोई जज और लोकसभा में विपक्ष के नेता होते हैं । बैठक में सीवीसी की जांच रिपोर्ट को ‘आधार’ बनाकर आलोक वर्मा को दोबारा डायरेक्टर पद से हटा दिया गया और एम. नागेश्वर राव को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया । उसके बाद तो यह मामला पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट में आ गया । उस समय भी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने एम. नागेश्वर राव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आदमी और सीवीसी को सरकार का काम करनेवाली संस्था बताया । कांग्रेस नेता ने आलोक वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच रिपोर्ट और 10 जनवरी, 2019 बैठक की मिनट्स सार्वजनिक करने की मांग कर डाली । सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा के खिलाफ लगे रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच का काम अक्टूबर, 2018 के अंत में सीवीसी को सौंपा । मगर उनकी भूमिका संदिग्ध और विवादित होने के कारण निगरानी जस्टिस ए. के. पटनायक को करने कहा । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस की ओर से 10 जनवरी, 2019 की हाईपावर कमिटी बैठक के लिए नामित जज ए. के. सीकरी आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी की रिपोर्ट से सहमत नहीं थे । सीवीसी के. वी. चौधरी ने 16 नवंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट को दी गयी जांच रिपोर्ट में भी आलोक वर्मा को क्लीन चिट नहीं दी । जांच की निगरानी कर रहे जस्टिस ए. के. पटनायक ने अलग से एक नोट शीर्ष कोर्ट को दिया । यह बात छिपी नहीं रह सकी कि जस्टिस पटनायक के नोट में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई ।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने जस्टिस पटनायक की भी नोट सार्वजनिक करने की मांग की और अंतरिम निदेशक की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया । दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट(डीएसपीइए) में अंतरिम निदेशक का प्रावधान नहीं है । सीवीसी ने भी उसी एक्ट के अनुच्छेद 4(1) और 8(1) का हवाला देकर सीबीआई निदेशकों के कामकाज और जांच प्रक्रिया की निगरानी का दावा किया । 1946 में बने इस एक्ट डीएसपीइए के अंतर्गत सीबीआई के गठन को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 2013 में असंवैधानिक करार दिया । सुप्रीम कोर्ट से लिए गए स्टे पर सीबीआई काम कर रही है ।
मई, 2019 आम चुनाव में दोबारा प्रचंड जनादेश प्राप्त करने के बाद भाजपा गठजोड़ सरकार सीवीसी और सीबीआई को छोड़ पारदर्शिता वाली संवैधानिक संस्था केंद्रीय सूचना आयोग के पर कतरने में लग गयी । सीवीसी और दूसरे सतर्कता आयुक्त जून, 2019 में ही रिटायर हो गए । सरकार एकमात्र सतर्कता आयुक्त शरद कुमार का अंतरिम सीवीसी बनाकर उदासीन बनी रही। जब लगा कि कहीं कोई सुप्रीम कोर्ट में न चुनौती दे दे, तब फरवरी, 2020 में चयन प्रक्रिया शुरू हुई । नौ महीने सरकार के लिए नया नहीं है । सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयुक्त) का पद भी नौ महीने रिक्त रहा । 2014 में भाजपा गठजोड़ सरकार बनने के बाद जब मामला दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में गया तब दिसंबर, 2015 में आर. के. माथुर सीआईसी बने । उस चयन पर भी विवाद हुआ । 10-12 वर्ष कांग्रेस और भाजपा गठजोड़ सरकारों में हील-हुज्जत और सुप्रीम कोर्ट की फटकारों के बाद लोकपाल का गठन मार्च, 2020 में हुआ और जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष देश के पहले लोकपाल बने । सिर्फ इतना ही लोग जानते हैं । किसी को पता नहीं कि लोकपाल काम क्या कर रहा है । हाई प्रोफाइल भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने के लिए बहुप्रचारित और विवादित लोकपाल एक्ट, 2014 के अनुसार लोकपाल भ्रष्टाचार मामले सीवीसी को भेजेगा, जहां से जांच के लिए सीबीआई के पास जाएगा । 2013 में कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में भी सीवीसी पद पर पी. जे. थॉमस की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा । उनके पामोलिन घोटाले में फंसे होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति रद्द कर दी । उसी समय से सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की मॉनिटरिंग अपने हाथ में लिया । तत्कालीन डायरेक्टर रणजीत सिन्हा पर प्रभावशाली राजनीतिज्ञों के दबाव में 2जी स्पेक्ट्रम और अन्य घोटालों की जांच रिपोर्ट में फेरबदल करने का आरोप था । सीबीआई ने सीवीसी के हस्तक्षेप से मुक्त करने की अर्जी सुप्रीम कोर्ट में लगायी । दिल्ली स्थित केंद्रीय सतर्कता आयोग के भवन पर लिखा है - ‘सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा’ ।