म्यांमार में लोकतंत्र बहाली के लिए सड़क पर उतरी जनता के दमन के लिए सैनिक सरकार ने पहले इमर्जेंसी शासन की अवधि 6 महीने बढ़ायी और फिर मार्शल लॉ लागू कर दिया । इसका अंदाजा म्यांमार के अंदर और पड़ोसी भारत समेत दक्षिण पूर्व एसियाई देशों को पहले से ही था । म्यांमार में न तो सैनिक सरकार की तानाशाही नयी है, न ही लोकतंत्र आंदोलन को कुचलने के लिए मार्शल लॉ और फौजी जनरलों के सत्ता पर काबीज रहने के लिए इमर्जेंसी का एलान ।

वास्तव में म्यांमार में लोकतंत्र स्थापित कायदे से कभी हुआ ही नहीं । भारत और पश्चिमी देशों के दबाव में में चुनाव जरूर हुए । मगर फौजी शासन का अप्रत्यक्ष रूप से दबदबा बना रहा और किसी भी निर्वाचित सरकार के हाथ में जनरलों ने सत्ता नहीं जाने दी ।

फरवरी महीने में ही 2021 में ओंग सान सू की के नेतृत्ववाली एनएलडी(नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) सरकार को अपदस्थ पर सू की समेत सभी लोकतंत्र समर्थक नेताओं को जेल में डाल दिया गया । म्यांमार की सेना सैनिक जुंटा के नाम से जानी जाती है । सैनिक जुंटा के प्रमुख जनरल मिन ओंग हलांग ने ओंग सान सू की और उनके संगठन के नेताओं, मंत्रियों पर कई आधारहीन आरोप लगाकर उनके खिलाफ मुकदमा चलाना शुरू कर दिया । उसी समय अनुमान लग गया कि अब म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी अनिश्चित समय तक नहीं हो सकती । नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सू की सैनिक तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अपनी जवानी के दिन या तो जेल में गुजारी हैं अथवा घर में नजरबंद रहकर ।

संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, भारत और प्रमुख पश्चिमी प्रेक्षकों की देखरेख में सैनिक जुंडा को मजबूरन 2015 में आम चुनाव कराना पड़ा । 49 वर्षों के सैनिक शासन के अंत से दमित, पीड़ित म्यांमार की जनता ने खुली हवा में सांस ली । लेकिन फौजी जनरलों ने खुद को सहज महसूस नहीं किया और पूरे कार्यकाल तक ओंग सान सू की पर ऐसा शिकंजा कसने में कोई कसर नहीं छोड़ी ताकि चुनी हुई सरकार स्वतंत्र रूप से निर्णय न ले सके । आखिरकार जब ओंग सान सू की के दूसरा कार्यकाल शुरू होने का समय आ गया तो तख्तापलट करके फिर से दुनिया भर में बदनाम अपनी तानाशाही परंपरा कायम कर दी । म्यांमार में लोकतंत्र के इतिहास का पहला अध्याय पूरा होने से पहले ही समाप्त हो गया ।

लोकतंत्र बहाली का गला दबाए रखने का तीसरा वर्ष 2023 करीब आने से पहले ही जनरलों ने सत्ता में जन भागीदारी के आसार खत्म करने के उपाय शुरू कर दिए । म्यांमार में जनरल सत्ता में बने रहने के लिए अपनी ही जनता को गुमराह करते हैं, धूर्तता, चालाकी वाले तरीके अपनाते हैं । देशवासियों और दुनिया को झांसा देने के लिए ऐसा-ऐसा स्वांग रचते हैं, जिससे लगे कि वे गुलाम और लोकतंत्र के विरोधी नहीं है । अपने इतिहास को दुहराते हुए फरवरी, 2021 में जनरलों ने सैनिक जुंटा का नाम नेशनल डिफेंस एंड सिक्योरिटी काउंसिल(एनडीएससी) कर दिया और अपने नियंत्रण वाले एमआर टीवी प्रसारण में कहा. बहुदलीय चुनाव जनता की इच्छा के अनुसार अवश्य होंगे ।’ उसके साथ ही सेना संचालित दल को छोड़ सभी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ धरपकड़ अभियान चला ।

2023 शुरू होने के समय तक म्यांमार सैनिक जुंटा पूरी दुनिया से कट गयी । पश्चिमी देशों ने राजनयिक सम्बंध तोड़ लिए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए । दक्षिण एसियाई देशों के संगठन(एसियान) ने भी म्यांमार से किनारा कर लिया, जिसका म्यांमार सदस्य है । लेकिन इससे बिल्कुल बेखबर जनरल मिन ओंग हलांग हथकंडे अपनाने में जुटे रहे, ताकि ओंग सान सू की को जेल में रखा जाए और जनता आवाज न उठाने पाए । ओंग सान सू की के खिलाफ ऐसी अदालत में मुकदमा चलाया गया, जिसमें अपील और सुनवाई का रास्ता बंद था । 31/12/2022 को पहले से सजायाप्ता ओंग सान सू की सजा में 7 साल की और बढ़ोतरी करके ऐसा इंतजाम लाग दिया गया ताकि 77 वर्षीया सू की जिंदगी जेल में ही गुजारें । सू की को 38 साल कैद की सजा हुई है । उसके बाद 04 जनवरी, 2023 को इंगलैंड की गुलामी से मुक्ति की 75वीं वर्षगांठ पर जनरल ओंग हलांग ने दूसरी चाल चली और कहा कि इस वर्ष चुनाव कराने की उनकी योजना है । सैनिक तख्तापलट के तीसरे वर्ष के दिन 01 फरवरी, 2023 को इमर्जेंसी 6 महीने के लिए और बढ़ा दी गयी, जो जनरलों ने सत्ता पर कब्जा करते ही 2021 में लगा दी थी । 4 जनवरी को जनरल ने अपने देशवासियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और अन्य देशों से ‘वास्तविक और अनुशासित बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था’ कायम करने में सहयोग, समर्थन मांगा । स्वाधीनता दिवस के दिन आम माफी के तहत 7ए000 से ज्यादा सैनिकों को रिहा करने का भी एलान किया । लेकिन 01 फरवरी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया और 03 फरवरी को मार्शल लॉ लागू होने के बाद तो यह छलावा वाली संभावना भी खतम हो गयी ।

कार्यकारी राष्ट्रपति मिंट स्वे ने टीवी प्रसारण में कहा. ‘संविधान के सेक्शन 425 के अनुसार इमर्जेंसी सिर्फ दो बार घोषित की जा सकती है । मगर अभी हालात असामान्य हैं, इसलिए इसकी मियाद बढ़ायी जाती है ।’ जनरलों द्वारा ही तैयार किए गए इस संविधान में ऐसा प्रावधान है कि सरकार में किसी-न-किसी के रूप में फौज में कार्यरत और रिटायर अधिकारी शामिल रहेंगे ही । सेना के किसी फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती । अगर कोई करे भी तो अदालत सेना के पक्ष में ही फैसला सुनाएगी, क्योंकि हर महकमे पर सेना का नियंत्रण है । म्यांमार की जनता अपने ही देश की सेना की गुलामी 49-50 वर्षों से भुगत रही है । इसलिए जनरलों का झांसा समझना अब कठिन नहीं है । सू की सरकार को संविधान बदलने का प्रयास नाकामयाब हो गया । मार्शल लॉ लगाने के बाद देश को ‘अनुशासित’ रखने के लिए बंदूक की नोक पर की जानेवाली सेना की सारी कार्रवाई कानूनी होगी और मौत की सजा समेत किसी भी फैसले के खिलाफ कोई सुनवाई नहीं होगी । यानी कि अब लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे और चुनाव की उम्मीद नहीं रख पाएंगे । मार्शल लॉ लागू होने के दिन 03 फरवरी को ही एसियान की बैठक बैंकॉक में हुई, जिसमें म्यांमार के विदेशमंत्री को नहीं बुलाया गया । इसके पहले वाली बैठक में भी नहीं बुलाया था । सैनिक जुंटा विरोधियों की लोकतंत्र आंदोलन जारी रखने के लिए गठित समानान्तर भूमिगत नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट(एनयूजी) को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया । संयुक्त राष्ट्र संगठन और सभी पश्चिमी देशों ने म्यांमार सैनिक शासन के इस कृत्य की निंदा की । लेकिन जनरलों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि दुनिया के सामने सिर छिपाने के लिए म्यांमार के शासक विदेश यात्रा से परहेज करते हैं । म्यांमार का हमेशा से एकमात्र समर्थक चीन रहा है । भारत को फर्क पड़ता है । क्योंकि म्यांमार से लगी पूर्वोत्तर सीमा पर सक्फ्रय नगा समेत लगभग सभी उग्रवादी गुटों का एक पैर म्यांमार में है ।

नोट.(ओंग सान सू की पर मेरी किताब प्रभात प्रकाशनर से छपी हुई है ।)