भारत की पूर्वोत्तर सीमा से सटे पड़ोसी देश म्यांमार में सैनिक तख्तापलट का एक साल पूरा होने जा रहा है । लोकतांत्रिक तरीके से निर्वासित औंग सान सू की के नेतृत्ववाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी(एनएलडी) सरकार को अपदस्थ करके सत्ता हथियानेवाले सेना प्रमुख जनरल मिन औंग हलांग इमर्जेंसी हटाने और लोकतंत्र बहाली प्रक्रिया के कोई संकेत नहीं दे रहे हैं ।

गत वर्ष 01/02/2021 को सेना ने एनएलडी प्रमुख म्यांमार की सबसे लोकप्रिय जननेता ओंग सान सू की, उनकी पार्टी के राष्ट्रपति यू विन मिंट और सारे कैबिनेट मंत्रियों को जेल में डाल दिया । सत्ता हाथ में लेते ही ‘तात्मादाउ’ (म्यांमार में सेना इसी नाम से जानी जाती है) संचालक मिन ओंग हलांग ने अपने टेलीविजन प्रसारण में सफाई दी कि ‘इतना चरम कदम उठाना जरूरी हो गया था, क्योंकि नवंबर, 2020 आम चुनाव एनएलडी ने भारी धांधली करके जीती थी ।’ सेना ने एक फरवरी, 2021 को ही एक साल के लिए देश में इमर्जेंसी लगा दी । मगर साथ में यह भी वायदा किया कि इमर्जेंसी हटने के बाद ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव कराए जाएंगे ।

एक साल पूरा होने में अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं । यह दिखावटी अवधि पूरा होने का समय जैसे-जैसे करीब आता गया, सैनिक जुंटा(सेना संचालित पार्टी का नाम) सरकार ने ऐसे-ऐसे झूठे बेतुके हथकंडे अपनाए ताकि ओंग सान सू की को जेल में ही डाले रखा जाए । विश्व की बहुचर्चित लोकतंत्र आंदोलन नेता नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सू की बेहद कठिन संघर्ष के बाद अपने देश में आंशिक लोकतंत्र बहाली में सफल हुई थी । 76 वर्षीया ओंग सान सू की ने अपनी युवावस्था के 22-23 वर्ष या तो जेल में या अपने घर में नजरबंदी में गुजारे हैं । अपने ही देश की सेना से ओंग सान सू की ने आजादी की लड़ाई व्यापक जन समर्थन की बदौलत शांतिपूर्वक लड़ी । म्यांमार में लोकतंत्र की आवाज को बर्बरतापूर्वक कुचलने और क्रूर दमन रवैया अपनाकर सैनिक तानाशाही बरकरार रखने का सिलसिला पुराना है । अंतरराष्ट्रीय दबाब में दूसरी बार ऐसा हुआ, जब नवंबर, 2020 में आम चुनाव हुए और ओंग सान सू की के नेतृत्व में एनएलडी को मिली भारी जीत सैनिक जुंटा को स्वीकार करनी पड़ी । शासक के रूप में सेना के जनरलों का सत्ता पर सीधा नियंत्रण नहीं रहा, लेकिन पर्दे के पीछे से सारी नीतियां. तात्मादाउ’ (सेना) अनुमोदित लागू होती थीं । उसे ‘छद्म लोकतंत्र’ कहा जाता था । स्टेट काउंसिलर(विदेश मंत्री) के रूप में सत्ता में मौजूद ओंग सान सू की के जनरलों से कभी अनुकूल संबंध नहीं रहे ।

नवंबर, 2020 के जिस आम चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर सेना ने ओंग सान सू की को जेल में डाला, वो संयुक्त राष्ट्र समेत यूरोपीय संघ और भारत से भी गए पर्यवेक्षकों की निगरानी में हुआ । सभी अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों ने ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ बताया । उसके बावजूद सेना ने चुनाव परिणाम को संघ चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी । उन दोनों संवैधानिक संस्थाओं पर भी सेना का अप्रत्यक्ष नियंत्रण होने के बावजूद अपील ठुकरा दी गयी ।

50 वर्षों के सैनिक शासन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ, जब सेना ने जनादेश प्राप्त राजनीतिक दल के हाथ में सत्ता नहीं जाने दिया । आंशिक ही सही, सत्ता का हस्तांतरण तो हुआ । लेकिन सेना प्रमुख मिन ओंग अपने पूर्ववर्तियों की तरह सत्ता पर नियंत्रण छोड़ना नहीं चाहते थे । विभिन्न सूत्रों से म्यांमार से बाहर निकली खबरों के अनुसार जनरल हलांग के रिटायर होने में एक साल रह गए थे और वे उसके पहले या उस समय तक राष्ट्रपति बनना चाहते थे । ओंग सान सू की समेत एनएलडी के सभी शीर्ष नेता इसके खिलाफ थे । इसलिए जनरल हलांग जनादेश का गला घोंटकर फौजी आदेश पर चलनेवाली कुव्यवस्था वापस ले आए । मार्शल लॉ का सिर्फ एलान नहीं किया, लेकिन सारे इंतजाम ब्लैकआउट वाले 01/02/2021 को ही लागू हो गए । राष्ट्रपति, कैबिनेट मंत्रियों, राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलावे सारे पत्रकार, लेखक, राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ट्रेड यूनियन नेताओं को जेल में डाल दिया गया । हड़ताल, प्रदर्शन, जुलूस और कहीं भी पांच आदमी के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गयी । सड़कों पर सेना का फ्लैग मार्च और प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने का सिलसिला जारी है । लेकिन उसके बावजूद पूरा देश उबल रहा है । छात्र, शिक्षा, वकील, डॉक्टर, मजदूर और समाज के सभी वर्गों के लोगों का शांतिपूर्ण तथा हिंसक प्रदर्शन सैकड़ों को गोली मारने के बावजूद थम नहीं रहा है । इन प्रदर्शनों में सैनिकों के भी शामिल होने की रिपोर्ट है । जबकि मीडिया, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क समेत सारे संचार माध्यमों को सत्तापलट होते ही डाउन कर दिया गया ।

2015 में जब ओंग सान सू की के दल एनएलडी को चुनाव लड़ने की इजाजत मिली, तो उनकी जीत को दबाए रखने के लिए सैनिक जुंटा ने परिणाम घोषित करने में कई महीने लगा दिए । वो चुनाव भी अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों की देखरेख में हुए थे । बड़ी खींचतान के बाद ओंग सान सू की को चुनाव लड़ने की इजाजत और उनके दल को मान्यता चुनाव आयोग से मिली ।

1988 में सैनिक शासन के खिलाफ देशव्यापी छात्र आंदोलन के जरिए लोकतंत्र बहाली के लिए संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आनेवाली ओंग सान सू की को 1990 के चुनाव में ही म्यांमार की जनता ने अपना नेतृत्वकर्ता चुना । लेकिन जवाब में सैनिक जुंटा ने ओंग सान सू की को और उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया । इस लोकतंत्र दमन अभियान में एकमात्र चीन लगातार म्यांमार का समर्थक बना रहा । भारत समेत सभी यूरोपीय देशों ने अपने सम्बन्ध म्यांमार से तोड़ लिए । चीन ने छात्र आंदोलन को बेहरमी से कुचलने का पहला प्रयोग 1988 में म्यांमार में ही सेना की मदद करके आजमाया । फिर चीन ने भी 1989 में लोकतंत्र की आवाज उठानेवाले अपने ही हजारों छात्रों को टैंकों से कुचला । दमन अभियान की वो जगह ध्यान आन मेन चौक के नाम से कुख्यात है । कम्यूनिस्ट तानाशाही वाले चीन और म्यांमार दोनों ही बौद्ध धर्म की दुहाई देते हैं ।

2010 में ओंग सान सू की को नजरबंदी से मुक्त किए जाने से पहले तक सैनिक जुंटा ने वैसा संविधान बना दिया था, ताकि सू की राष्ट्रपति न बन पाए । 2008 में बनाए गए संविधान के अनुसार सू की इसलिए राष्ट्रपति नहीं बन सकती, क्योंकि उन्होंने विदेशी से विवाह किया हुआ है । सू की के पति माइकल एरिस इंगलैंड के थे, जिनकी कैंसर से मौत उस समय हुई, जब सू की जेल में थी । जेल में रहते हुए सू की को 1991 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला । महात्मा गांधी और अहिंसा भक्त ओंग सान सू की ने आजीवन शांति और अहिंसा धर्म का पालन किया । म्यांमार के अंदर और बाहर ओंग सान सूकी को ‘आंधी के रूप में गांधी’ कहा जाता है । अभी उनकी रिहाई और लोकतंत्र बहाली के लिए जनता ने विरोध प्रदर्शन के जितने तरीके अपनाए, उनमें सबसे ज्यादा चर्चा सत्तापलट के एक ही महीने बाद सड़कों पर कूड़ा जमा कर कूड़ा-हड़ताल की हुई, जब सैनिकों ने 500 प्रदर्शनकारियों को गोली मार दी ।

गत हफ्ते ओंग सान सू की को सजा सुनायी गयी है, उसकी मिसाल पूरी दुनिया में आज तो क्या सल्तनतों के पुराने इतिहास में भी शायद नहीं मिलेगी । उन्हें बाकी टॉकी के इस्तेमाल, कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन जैसे आरोपों में पहले चार साल जेल की सजा हुई और अन्य आरोपों की भी जांच जारी है, जिसमें उन्हें 100 से ज्यादा वर्षों तक जेल की सजा हो सकती है ।

म्यांमार में कुछ भी होता है तो उसका भारत पर असर पड़ता है । क्योंकि पूर्वोत्तर से लगी 600 किमी सीमा पर सक्रिय विद्रोही गुटों का एक पैर म्यांमार में है । खासकर मणिपुर के लगभग सभी नगा और गैर-नगा गुटों का म्यांमार में अड्डा है । भारत म्यांमार में लोकतंत्र का समर्थक रहा है, लेकिन सैनिक सरकार से भी अच्छे सम्बन्ध रहे । मौजूदा तख्तापलट के बाद से भारत द्विविधा में है । लोकतंत्र बहाली प्रक्रिया की वकालत भारत ने जरूर की, मगर चीन के कारण भारत म्यांमार से रिश्ता बिगाड़ना नहीं चाहता । गत दिसंबर में विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंगला सत्तापलट के बाद पहली बार म्यांमार दौरे पर गए । मिन ओंग हलांग समेत सभी जनरलों से मिले, लेकिन श्रृंगला को ओंग सान सू की से मिलने की इजाजत नहीं दी गयी ।

13 नवंबर को मणिपुर की म्यांमार सीमा के पास असम राइफल्स के काफिले पर घात लगाकर किए गए हमले में एक कंमाडिंग ऑफिसर पत्नी, बच्चे समेत पांच जवानों के साथ मारे गए । इस हमले की जिम्मेदारी लेनेवाले उग्रवादी गुट पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट के म्यांमार में अड्डे होने के सबूत राष्ट्रीय जांच एजेंसी को मिले हैं । इन हमलावरों की सूचना देनेवाले के लिए 50 लाख रूप, इनाम की घोषणा की गयी है ।

दक्षिण एसियाई देशों के संगठन(एसियान) ने म्यांमार पर दबाव बनाया है । गत वर्ष एसियान ने मिन ओंग हलांग को सम्मेलन के लिए आमंत्रित नहीं किया । एसियान अध्यक्ष कंबोडिया के हुन सेन को भी दिसंबर में म्यांमार जाने पर ओंग सान सू की से मिलने नहीं दिया गया । अभी एसियान के एक सदस्य फिलीपीन्स के विदेशमंत्री रियोदोरो लॉकसिन ने नॉर्वे के विदेशमंत्री अन्निकेन हुइटफेल्ड का समर्थन करते हुए कहा कि कोई भी वार्ता ओंग सान सू की बगैर नहीं हो सकती । अमेरिका ने भी फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं ।