भारत की उत्तर पूर्वी सीमा से लगे पड़ोसी देश म्यांमार में सैनिक जुंटा की सत्ता स्थापित हो जाने से लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय हो गया है । म्यांमार की फौजी तानाशाही तंत्र सैनिक जुंटा के संचालक मिन ओंग हलांग ने छद्म और छलावा वाला बंदूक की नोक पर चुनाव कराकर देश की कमान अपने हाथ में बरकरार रखी । सैनिक लोकतंत्र के इस सिद्धांत पर फिर से मुहर लग गयी कि वर्दीधारी शासन में विपक्ष की जरूरत ही नहीं है ।
दुनिया की सभी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका सरकार के समान है । चुनाव भी सत्तारूढ़ और विरोधी दलों के बीच मुकाबला के कारण होता है ।
लेकिन म्यांमार एकमात्र ऐसा देश है जहां सेना संचालित राजनीतिक दल को ही चुनाव में हिस्सा लेने और जीत दिखाकर सत्ता में बने रहने का ‘संवैधानिक’ अधिकार प्राप्त है । छद्म संसदीय चुनाव में तथाकथित ‘विजय’ हासिल करनेवाली यूनियन सोलिडेरिटी एंड डेवलपेंट पार्टी( यू एस डी पी. न्क्) प्रमुख मिन ओंग हलांग को संसद सदस्यों ने नेता चुन लिया और वे राष्ट्रपति बन गए ।
जनरल मिन ओंग हलांग द्वारा चुनाव से पहले नए सिरे से गठित युनियन इलेक्शन कमीशन(चुनाव आयोग) से सिर्फ एक ही दल यू एस डी पी को ही मान्यता प्राप्त थी । चुनाव आयोग ने सिर्फ इसी पार्टी का पंजीकरण वैध घोषित किया था ।
म्यांमार(पूर्व नाम वर्मा) में लोकतंत्र बहाली जनान्दोलन से उपजे क्षेत्रीय दलों के संयुक्त मंच नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी(एनएलडी. छस्क्) के सभी नेता जेल में हैं । एन एल डी अध्यक्ष नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सू की 27 साल की सजा काट रही हैं ।
देश की सबसे मजबूत लोकप्रियता और जनाधार वाली अवतारी महिला ओंग सान सूकी को 2020 में अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की देखरेख में हुए चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला । संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों के दबाव में फौजी जनरलों को बंदूक नीची करनी पड़ी । उसके बावजूद जनरल विन मिंट हीं राष्ट्रपति बने । ओंग सान सू की काउंसिलर(विदेश मंत्री) बनायी गयी, जिन्हें म्यांमार का अन्य देशों से राजनयिक सम्बन्ध बेहतर बनाने का काम सौंपा गया । म्यांमार के संविधान के अनुसार संसद की 25% सीटें सेना के कार्यरत और रिटायर सैनिक अधिकारियों के लिए रिजर्व हैं । उनके जीतने-हारने से कोई फर्क नहीं पड़ता । लेकिन बहुमत होने से एन एल डी के सांसद भी मंत्री बने, उनके हाथ में कुछ अधिक आए ।
एन एल डी सरकार ने म्यांमार को सेना घोषित गृहयुद्ध से उबारने और नागरिक अधिकार बहाली की दिशा में कदम उठाने शुरू किए । ओंग सान सू की सरकार ने जनभावना का ख्याल करके ऐसी नीति बनानी चाही, ताकि सिविलियन मामले में निर्वाचित सरकार की भूमिका हो और सारे निर्णय जनता पर मार्शल ला की तरह थोपे नहीं जाएं । राष्ट्रपति विन मिंट ने भी वक्त का तकाजा समझकर थोड़ा लचीला रूख अपनाया ।
चीफ फौजी कमांडर सैनिक जुंटा सुप्रीमो मिन ओंग हलांग को यह नागरिक सुधार अखर गया और एक साल बीतते-न-बीतते उन्होंने तख्तापलट कर दिया । फरवरी, 2021 में सैनिक जुंटा ने ओंग सान सू की, राष्ट्रपति विन मिंट समेत सभी मंत्रियों और एन एल डी नेताओं को जेल में डाल दिया । जुंटा के निशाने पर मुख्य रूप से ओंग सान सू की थी, जो व्यापक जनादेश की उम्मीदों के अनुसार फौजी शासन तंत्र को सिविलियन कलेवर देने के प्रयास में जुटी थी ।
जनरल मिन ओंग ने वापस सैनिक जुंटा राज कायम करने के बाद अपदस्थ स्टेट काउंसिलर ओंग सान सू की पर भ्रष्टाचार, संविधान का उल्लंघन और देश के अंदर की गोपनीय सूचनाएं लीक करने का आरोप लगाकर तख्तापलट को ‘देशहित’ में बताया । ओंग सान सू की समेत एन एल डी(नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) मंत्रियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के आदेश में भी सू की ‘नम्बर वन’ आरोपी बनायी गयी । सभी तंत्रों की तरह सैनिक जुंटा नियंत्रित अदालत में पहले तो ओंग सान सू की को उम्र कैद की सजा सुनायी और उसकी अवधि 100 साल तय की । यानी कि उमर और सजा दोनों की मियाद पूरी होने के बाद भी राजनीतिक सुधारक ओंग सान को जेल से मुक्ति नहीं मिलती ।
ऐसी विचित्र सजा आधुनिक युग में उसके पहले किसी भी देश में न किसी ने देखी न सुनी । म्यांमार शासन की बड़ी फजीहत हुई । दुनिया से बिल्कुल अलग-थलग लैंडलॉक्ड की आदी म्यांमार सैनिक जुंटा किसी भी देश में अपनी बदनामी की परवाह नहीं करती । लेकिन ऐसी सजा की खबर अन्य देशों में फैलने पर संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों के मानवाधिकार संगठनों ने म्यांमार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया । इसकी परवाह सैनिक जुंटा सरकार को करनी पड़ी । म्यांमार के दुनिया में मात्र दो हितैषी कम्युनिष्ट देश रूस और चीन ने भी दबाव बनाया । आखिरकार ओंग सानर सू की की सजा मई, 2021 में उनकी अपील पर कोर्ट में पेशी के बाद घटाकर 27 साल की गयी । निर्वाचित सरकार को हटाकर सत्ता पर काबीज होनेवाले जनरल मिन ओंग हलांग ने गद्दी हथियाते ही देश के नाम प्रसारित सेना संचालित टेलीविजन संदेश में कहा कि चुनाव ‘जल्द’ कराए जाएंगे ।
जनरल हलांग ने अपने टेलीविजन प्रसारण में मार्शल लॉ प्रशासक के अंदाज में कहा. कि गृहयुद्ध जैसे हालात के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा पर खतरे के मद्देनजर यह कदम उठाया गया । चुनाव कराने लायक माहौल बनाने में सैनिक जुंटा शासन को पांच साल लग गए, जो अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह म्यांमार के संविधान में भी प्रावधान है । 2020 में जनता ने जो सरकार चुनी थी, उसे 2021 में हटाकर जनरल हलांग के नेतृत्व में जुंटा ने संविधान के अनुसार पांच साल पूरा होने के बाद चुनाव का एलान 2025 में किया ।
उसके पहले उन सभी जातीय संगठनों को रौंदकर सेना ने खून खराबा का खौफ पैदा कर दिया, जिन्हें विश्वास में लेने के लिए ओंग सान सू की ने अमन वार्ता का न्योता दिया था । सबसे क्रूरतापूर्वक कत्लेआम अभियान रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ चलाया गया । इससे दक्षिण पूर्व एसियाई देशों के संगठन(एसियान) देश बिफर उठे । पश्चिम एसिया और दक्षिण एसिया के मुस्लिम देशों में भी विरोध हुआ । बौद्ध देश म्यांमार कहने को कम्युनिस्ट देश है, मगर धार्मिक मामले में इसकी नीतियां फासिस्ट देशों से भी शर्मनाक है ।
म्यांमार में सरकार के खिलाफ विरोध, प्रदर्शन, जुलूस पर स्थायी रूप से कड़ी पाबंदी है । इसके बावजूद सुरक्षा कारणों का हवाला देकर तीन चरणों में चुनाव कराने का एलान किया गया ।
28.12.2025 को पहले चरण का मतदान, 11 जनवरी, 2026 को दूसरे चरण का और 25 जनवरी को तीसरे चरण का मतदान हुआ । चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ कुछ भी बोलने पर जेल की सजा का प्रावधान था । जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि मुख्य विपक्षी दल एन एल डी गैरकानूनी घोषित था । अन्य छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल. शान नेशनेलिटी लीग फॉर डेमोक्रेसी(एस एन एल डी. छस्क)ए अराकान नेशनल पार्टी(ए एन पी. छच) की मान्यता रद्द कर दी गयी थी । चुनाव आयोग द्वारा मान्यता खतम किए गए दलों में पा.ओ नेशनल ऑर्गनाइजेशन(च्छ0.पीएनओ)ए कयाह स्टेट डेमोक्रेटिक पार्टी(ज़ल्क्.के वाई एस डी पी) भी शामिल हैं। ये सब अराकान, राखाइन समेत उन प्रांतों के विद्रोही गुट हैं, जिन्होंने म्यांमार की आजादी के समय से ही आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा हुआ है । इन गुटों ने राजनीतिक दल बनाकर हिंसा छोड़ लोकतांत्रिक तरीका अपनाया, जिसे म्यांमार की सैनिक सरकारों ने जवाबी हिंसा से कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी । मगर लोग न दबे, न झुके । इन्हीं गुटों से ओंग सान सू की ने शांति वार्ता शुरू की थी । ऐसे प्रांतों में मतदान केंद्र नहीं बने ।
म्यांमार की फौजी सरकारों का पुराना दस्तूर है कि अंतरराष्ट्रीय दबाब में जब भी चुनाव कराना पड़ता है, वोटों की गिनती और परिणाम का एलान लंबे समय तक टाला जाता है । खबरें भी छोटे-छोटे टुकड़ों में देर-देर से आती हैं ।
इस बार चुनाव के दौरान कर्फ्यू जैसे हालात थे । मतदाता घरों से कम निकले, वोट डालनेवाले ज्यादातर सैनिक परिवारों के सदस्य थे । आम मतदाताओं के पास विकल्प तो था नहीं । सिर्फ सैनिक जुंटा पार्टी यू एस डी पी पर ही मुहर लगाना था । संयुक्त राष्ट्र समेत अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, इंगलैंड जैसे कई देशों ने इसकी निंदा करते हुए इस चुनाव को लोकतंत्र के साथ धोखा, खिलवाड़ बताया ।
म्यांमार की जमीन से मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम में जारी उग्रवादी गतिविधियों से परेशान भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ।
चुनाव के चार महीने बाद सैनिक जुंटा पार्टी की एकतरफा भारी जीत और तख्तापलट जनरल मिन ओंग हलांग के राष्ट्रपति बन जाने पर भी भारत ने चुप्पी साध ली । रूस और चीन म्यांमार में लोकतंत्र दमन के समर्थक हैं।
अप्रील, 2026 में जनरल हलांग के शपथग्रहण के समय भी मणिपुर में म्यांमार अड्डे से उपद्रव मचानेवाली कूकी नेशनल आर्मी और नगा गुट भिड़न्त में तीर मारे गए, पांच घायल हो गए ।
जिस देश में लोग अपनी ही सेना द्वारा गुलामी जैसा दंश 78 साल पहले अंग्रेजों से छीनी गयी आजादी के थोड़े समय बाद से ही झेल रहे हैं, वहां हर साल आजादी की वर्षगांठ पर कैदियों की रिहाई का नाटक किया जाता है । ये वही लोग हैं, जिन्हें सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने पर जेल में डाल दिया जाता है और उनके संगठन के संघर्ष को गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने का दोषी करार दिया जाता है ।
04 जनवरी, 2026 को 6100 कैदी 78वें स्वतंत्रता दिवस के दिन चेतावनी के साथ छोड़े गए । फिर अप्रील में जब जनरल मिन ओंग हलांग ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली, तब ओंग सान सू की की सजा कम कर दी गयी । यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सजा कितने साल घटायी गयी है और बाकी सजा या सजा पूरी होने के बाद जेल में ही रखा जाएगा अथवा अपने घर में उन्हें नजरबंद रखा जाएगा । 2010 और उसके पहले के चुनावों में भारी जीत के बावजूद ओंग सान सू की के हाथ में सत्ता सौंपने के बजाए जनरलों ने उन्हें या तो जेल में डाला या अपने घर में नजरबंद रखा । 2010 चुनाव के बाद जनरल थेन सेन ने वर्दी की जगह सादे लिबास पहनकर सिविलियन शासक बनने का दिखावा किया । अभी जनरल हलांग के भी वही रवैया अपनाने की खबर सुनने में आयी है ।
लोकतंत्र की नस नागरिक अधिकार और मीडिया की हालत म्यांमार में परकटे परिंदे की तरह है । म्यांमार की थाइलैंड से लगी सीमा पर पीड़ित प्रताड़ित जातीय संगठनों के लोगों के जमावड़े से कुछ खबरें आ जाती हैं ।
1985-90 के दशक में लोकतंत्र बहाली के के लिए छात्र आंदोलन का झंडा खड़ा करनेवाली ओंग सान सू की ‘आंधी के रूप में गांधी’ के नाम से विख्यात हैं । भारत से स्कूल की पढ़ाई करके ओंग सान सू की ने अमेरिका और इंगलैंड से पढ़ाई की । इंगलैंड में ही उनका सहपाठी माइकेल एरिस से विवाह हुआ । अपने देश में लोकतंत्र लाने के लिए ओंग सान सू की ने अपना पारिवारिक जीवन दांव पर लगा दिया । अपनी ओर बंदूक ताने सैनिकों का मुकाबला उन्होंने शांति से किया । 1989 में चीन ने अपने यहां छात्र आंदोलन को टैंकों से कुचला और म्यांमार को भी वही सीख दी । दोनों देशों में हजारों छात्र मारे गए और जेलों में ढूंसे गए ।
म्यांमार में एक अघोषित विधान है कि कोई सिविलियन राष्ट्रपति न बने । 80 साल की हो चुकी ओंग सान सू की ने अपने जीवन के 40 साल लोकतंत्र के लिए संघर्ष में गुजार दिए । इतने वर्षों में एक बार नहीं, तीन बार उनके नेतृत्व में निर्वाचित सरकार को सैनिक जुंटा ने जेल में डाल दिया । नया संविधान बन गया कि ऐसी कोई महिला म्यांमार की कमान नहीं संभाल सकती, जिसने विदेशी से शादी की हो । सू की के जेल में रहते हुए उनके पति का कैंसर से लंदन में निधन हो गया । सू की को नोबेल शांति पुरस्कार मिला । उन्हें पुरस्कार ग्रहण करने नहीं जाने दिया गया ।
सूकी के आंदोलन को सबसे ज्यादा अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से समर्थन मिला । लेकिन वक्त और मतलब के हिसाब से नीतियां बदल जाती हैं । सिर्फ व्यापार के लिए कोई भी कदम उठाने के लिए मशहूर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने म्यांमार से बहुमूल्य रत्न, इमारती लकड़ी का व्यापार बढ़ाने के लिए आर्थिक प्रतिबंध ढीले कर दिए । ये निर्णय जनवरी, 2026 में ही किया गया, जब म्यांमार में जनभागीदारी के बगैर चुनाव हो गए ।
शुक्र है, दक्षिण पूर्व एसियाई देशों के संगठन(एसियान) देशों का, जिन्होंने म्यांमार को सदस्य के रूप में बुलाना बंद कर दिया । एसियान का हेडक्वार्टर है जकार्ता और इंडोनेशिया उसका वर्तमान अध्यक्ष है । सबसे ज्यादा मस्लिम आबादी वाला देश इंडोनेशिया ने म्यांमार के जुल्म से भागे रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह दी । बांग्लादेश का फोक्स बाजार रोहिंग्या से भरा है । भारत भी परेशान है ।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय(प्श्र) आई सी जे के हेग मुख्यालय में गांबिया के न्यायमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट की ओर से म्यांमार सेना और उसके समर्थित बौद्ध उग्रवादियों को रोहिंग्या तथा लोकतंत्र समर्थकों पर किए गए अत्याचार के लिए दोषी ठहराया है ।
झीलों से घिरे म्यांमार में जनता की और दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के सैनिक जुंटा के प्रयासों के बावजूद लोग सब कुछ देख रहे हैं, मगर लाचार हैं ।