संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य का मतलब ही होता है, ‘वीटो’ । 1945 में स्थापना के समय से ही पांच सुपरपावर देशों के पास ‘वीटो’ पावर है, जो दबंगई और दादागिरी से सिर्फ ताकत की बदौलत हासिल की हुई है । आज 72 वें वर्ष में भी पी-5 के नाम से संबोधित किए जानेवाले वही पांच स्थायी सदस्य हैं, जिनके चंगुल में संयुक्त राष्ट्र फड़फड़ा रहा है। ये पांचों देश हैं - अमेरिका, इंगलैंड, रूस, फ्रांस और और चीन । पी-5, अर्थात् परमानेंट(स्थायी) पांच, सदस्य, जो संयुक्त राष्ट्र को चलाते हैं और बाकी 188 सदस्यों को इन दबंगों के इशारे पर चलना पड़ता है । ऐसा करना शेष सदस्यों की मजबूरी है, क्योंकि इनमें से किसी की ताकत इतनी नहीं है कि अकेले तो दूर, आपस में मिलकर भी पी-5 में से एक का भी मुकाबला कर सकें । ये आर्थिक और सैनिक दृष्टि से भी इतने कमजोर हैं कि पी-5 से उन्हीं देशों की शर्तों पर संबंध बेहतर बनाए रखने के लिए विवश हैं ताकि उनसे सहायता मिले ।

भारत भी इसका अपवाद नहीं है, जो स्थायी सदस्यता की संख्या बढ़ाने के लिए अभियान चलाने के साथ-साथ स्वयं भी इसका प्रबल दावेदार है । अभी स्थापना दिवस के समय ही अमेरिकी विदेशमंत्री रेक्स टिलरसन ने दिल्ली आकर भारत को चेता दिया कि ‘वीटो पावर’ उन्हीं के पास रहेगा जो 72 वर्षों से स्थायी सदस्य हैं । भारत ने ही दशकों से यह बोड़ा उठाया हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र में भेदभावपूर्ण रवैया खत्म किया जाए और सभी देशों के पास समान अधिकार हों । पी-5 के देश संयुक्त राष्ट्र में ऐसा सुधार नहीं चाहते कि कोई छठा देश उनकी बाजूवाली कुर्सी पर बैठे । यह जानते हुए भी भारत न अपना दावा नहीं छोड़ा । यह दीवाली भारत के लिए स्थायी सदस्यता दावे के लिहाज से शुभ नहीं बीती । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को दिवाली के तोहफे के रूप में संदेश भिजवाया कि भारत संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता का दावा छोड़ दे । संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि निक्की हेले ने बेवकूफ बनानेवाली चाल खेली कि भारत अगर संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता चाहता है तो वीटो पावर की ‘जिद’ छोड़ दे । इधर भारत को यह संदेश भिजवाया और उधर ट्रंप ने अपने ओवल कार्यालय में वरिष्ठ भारतीय सदस्यों के साथ दिवाली मनाया । उसके तुरंत बाद टिलरसन ने भारत आने का प्रोग्राम बना लिया, और भारत-पाक क तनावपूर्ण रिश्ते में भारत को ‘अच्छी’ लगनेवाली झिड़की पाकिस्तान को भिजवायो । आतंकवाद पोषण में अमेरिकी निशाने पर ईरान भी है, जिससे भारत के ताल्लुकात हैं । इसलिए भारत को ‘नसीहत’ मिली कि वो ईरान से कैसा ‘रिश्ता’ रखे ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास गुरेज सेक्टर में सेना के जवानों के साथ दिवाली मना रहे थे । रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण अंडमान निकोबार द्वीप में ब्रीचीगंज सैनिक स्टेशन में सैनिकों के साथ दिवाली मना रही थी ।

प्रधानमंत्री ने लगातार चौथे वर्ष जवानों के साथ दिवाली मनायी और सैनिकों का मनोबल बढ़ाकर परिवार के साथ दिवाली नहीं मना पाने का जवानों का दुख बांटा । नरेंद्र मोदी शासनकाल की यह चौथा वर्ष है, जब संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता का भारत का दावा डंप हो चुका है । वीटो पावर तो इन चार वर्षों में भी कभी चर्चा में ही नहीं आया । संयुक्त राष्ट्र में या उससे इतर नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह भारत का दावा जोर देकर पेश नहीं किया । नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र में भाग लेने जब भी गए, भारत के स्थायी सदस्यता के दावे को योग और निवेशक न्योता मुलाकातों पर केंद्रित कर दिया । लेकिन वीटो दावा बिल्कुल खत्म नहीं हुआ । वर्ना संयुक्त राष्ट्र स्थित अमेरिकी राजदूत निक्की हेले इस संबंध में संदेश क्यों भिजवातीं ।

नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुधार में कभी ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली । वे हमेशा भारत के ‘तेजो’ से विश्व आर्थिक ताकत की ओर बढ़ते कदम की बात देश-विदेश में करते हैं । मगर तब भी दिवाली के समय अमेरिका से आए ऐसे अप्रिय संदेश को सुनकर प्रधानमंत्री दुखी तो अवश्य हुए होंगे । क्योंकि अमेरिका के ऐसे बयान से भारतवासियों को धक्का लगा । दिवाली का स्वाद थोड़ा खट्टा हुआ और याद करने की जरूरत पड़ गयी कि नरेंद्र मोदी शासनकाल में संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं रहा । दिवाली से कुछ दिन पहले सितंबर के अंतिम सप्ताह में हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र होता है । इस बार उसमें भाग लेने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गयीं । उनका पूरा समय प्रोफेसनल मुद्दा एच-1बी पर अमेरिकी रूख से उपजे संकट का हल ढूंढने में गुजरा । सिर्फ व्यवसाय, कारोबार, आईटी प्रोफेसनल पर चर्चा हुई । नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की ‘दोस्ती’ की दुहाई दी जाती है कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में एक ‘नए युग’ की शुरूआत है । गत वर्ष अमेरिका ने भारत को अपना प्रमुख ‘डिफेन्स पार्टनर’ का दर्जा दिया तो बड़ी वाहवाही हुई । डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ने इस बार भी दिवाली मनायी और पिछले वर्ष भी वर्जीनिया और फ्लोरिडा के मंदिरों में दिवाली मनाकर भारत से ‘पारिवारिक’ संबंध होने का संदेशा भिजवाया । नरेंद्र मोदी जून में अमेरिका गए और भारत में निवेश के सारे द्वार खोल दिए । अगले महीने हैदराबाद में होनवाले ग्लोबल दक्षिण एसिया उद्यमिता सम्मेलन की जोर-शोर से तैयारी चल रही है । भारत से अमेरिका की इतनी ‘नजदीकी’ में ‘वीटो’ पावर गोल है, जिसके बिना स्थायी सदस्यता की बात सोची ही नहीं जा सकती । नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह को हराकर प्रधानमंत्री बने हैं । मनमोहन सिंह देश के अंदर बहुत कम बोलते थे । लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह जब भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने गए या उनके 10 वर्षों के शासनकाल में जो भी विदेश मंत्री गए, उन्होंने भारतीय दावे की मजबूती के लिए समर्थन जुटाने का भरपूर प्रयास किया । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में ‘ग्रुप-4-(भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील) बनाया । यह ग्रुप आज कहीं चर्चा में नहीं है । अमेरिकी समर्थन के बिना संयुक्त राष्ट्र में कुछ नहीं हो सकता और अमेरिका के साथ-साथ पी-5 सुधार की चर्चा से आगे बात बढ़ने देना नहीं चाहता । प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी जुलाई में ‘ब्रिक्स’ सम्मेलन में भाग लेने ब्राजिल गए । जर्मनी और जापान से चर्चा के दौरान ‘वीटो’ हासिल करने के लिए ‘2015 की समय-सीमा’ निर्धारित कर दी । ‘ब्रिक्स’ गुट में रूस भी है जिसका रूख समझना कठिन हैं । ‘ब्रिक्स’ गुट का एक सदस्य दक्षिण अफ्रीका भी अफ्रीकी देशों के समर्थन से वीटो का दावेदार है । 26 जनवरी, 2015 को अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को नरेंद्र मोदी ने मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया । रंगारंग पम्प एंड शो समारोह में स्थायी सीट की बात दब गयी । सुषमा स्वराज 22 सितंबर, 2017 को जब संयुक्त राष्ट्र गयीं तो गत वर्ष की तरह आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात उठी, जिससे पी-5 भी त्रस्त है । ‘वीटो’ हासिल करने के लिए अन्य देश एकजुट नहीं हो पाते, इसीलिए दबंगई झेलना पड़ता है, जिससे आतंकवाद उपजा है । सुषमा स्वराज ने अमेरिकी विदेशमंत्री से आईटी उद्योग से जुड़ एच-1बी वीजा पर ट्रंप प्रशासन के कड़े रवैए के विषय में बात की । बचपन से अमेरिका में रह रहे भारतीय समेत विदेशी अप्रवासियों को ओबामा ने एच-1बी से संरक्षण दिया था । डोनाल्ड ट्रंप ने उसे रद्द कर दिया । ट्रंप के रूख से आठ लाख ऐसे अप्रवासियों को अगले वर्ष मार्च तक अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है, जिनमें आठ हजार भारतीय भी हैं । इनके बारे में अमेरिकी कहते हैं कि बच्चे में रूप में ये लोग अवैध रूप से लाए गए । अगले महीने का हैदराबाद सम्मेलन रोजगार अवसर तलाशने पर केंद्रित है । अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय में भारतीयों के साथ दिवाली और उसी समय भारत को ‘वीटो’ का दावा छोड़ने की चेतावनी । ये चर्चा अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ कैसे होगी । 17 अक्टूबर को अमेरिकी कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के साथ सुषमा स्वराज की बातचीत में भी संयुक्त राष्ट्र सुधार की जगह आईटी प्रोफेसनल रहे ।

2010 में ओबामा जब भारत आए तो पूरी चर्चा संयुक्त राष्ट्र सुधार पर केंद्रित रही । नरेंद्र मोदी ने बाराक ओबामा से ज्यादा डोनाल्ड ट्रंप से ‘नजदीकी’ स्थापित की है, मगर ‘वीटो’....