बौद्ध देश म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है । म्यांमार में हिंसा और खूनखराबा कोई नयी बात नहीं है । कट्टरपंथी बौद्ध सैनिक शासन का अपने ही देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के कारण गोलियों से भूनने का 60 साल का रक्तरंजित रिकार्ड रहा है । उसके खिलाफ 30 वर्षों तक लगातार शांतिपूर्ण संघर्ष करके नोबेल पुरस्कार विजेता औंग सान सूकी अर्द्ध-लोकतंत्र स्थापित करने में सफल हुई । सेना का नेपथ्य से वर्चस्व कायम होने के बावजूद औंग सान सूकी पश्चिमी देशों के समर्थन से शासक की भूमिका में हैं । उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि शांति और अहिंसा की प्रतीक के रूप में रही है । अपने ही देश में नागरिकों की पूर्ण आजादी और अधिकारों के खिलाफ तनी हुई बंदूकों से सीधे मोर्चा लेते हुए औंग सान सूकी जुझारू संघर्ष के 21 वर्ष या तो जेल में अथवा अपने घर में नजरबंदी में गुजार चुकी हैं । उसी दौरान औंग सान सूकी को 1991 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला, जिसे ग्रहण करने के लिए उन्हें अपनी देश की फौजी हुकूमत ने जेल से रिहा नहीं किया ।

आज उसी म्यांमार में औंग सान सूकी की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी(एनएलडी) 2016 से सत्ता में है । और उसी समय से रेखीन के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों पर म्यांमार सरकार का फौजी कहर जारी है । औंग सान सूकी हिंसा पर चुप और ‘तटस्थ’ हैं । उसी के कारण औंग सान सूकी अंतरराष्ट्रीय निंदा और आलोचना का शिकार बनी हुई हैं । अब ताजा हमला उनके नोबेल शांति पुरस्कार पर हुआ है ।

रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा नहीं रोक पाने में औंग सान सूकी के सामने क्या लाचारी है, यह मुद्दा अब पुराना पड़ गया । ताजा मुद्दा है सूकी को दिए गए नोबेल शांति पुरस्कार का विरोध और उसका मजहबी पहलू । इससे रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जातीय और राजनीतिक से ज्यादा मजहबी हो गया है । भारत को भी लपेटे में लेने के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से कहीं-न-कहीं यह भावना काम कर रही प्रतीत होती है ।

घटनाक्रम का जायजा लेते हैं । जिस प्रकार म्यांमार कट्टर बौद्ध देश है, ठीक उसी तरह ईरान फतवापंथी इस्लामी देश है । ईरान के सुप्रीम शासक अयातुल्लाह अली खामेनी ने रोहिंग्या मुसलमानों पर अपना आक्रोश औंग सान सूकी के नोबेल को निशाना बनाकर उतारा - रोहिंग्या पर म्यांमार का हमला दरअसल नोबेल शांति पुरस्कार की ‘मौत’ की निशानदेही है । अयातुल्लाह खामेनी ने अपना गुस्सा यों उतारा - ‘एक क्रूर सरकार है, जिसमें ऊंचे पद पर एक जालिम औरत बैठी है, जिसे नोबेल शांति पुरस्कार दिया जा चुका है और वो खामोश तमाशा देख रही हैं ।’

औंग सान सूकी खुद भी बौद्ध हैं । बांग्लादेश कोई घोषित इस्लामी देश तो नहीं है, मगर मुल्लाओं का इतना दबदबा है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना बिगाड़ मोल नहीं ले सकती । म्यांमार से भागे दो लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश ने पनाह दी है । कोक्स बाजार शरणार्थी शिविर में उनका हाल-चाल लेने गयीं शेख हसीना ने औंग सान सूकी का नाम तो नहीं लिया, मगर साफ-साफ कहा कि बौद्ध म्यांमार रोहिंग्या मुसलमानों पर ‘अत्याचार’ कर रहा है । ‘ढाका ट्रिब्यून’ में छपे विवरण के अनुसार बांग्लादेश को नए शरणार्थियों के लिए दूसरे स्थान की तलाश करनी पड़ी, क्योंकि 2015 में आए रोहिंग्या शरणार्थी भी स्वदेश लौटने के इंतजार में हैं ।

रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग, यूनिसेफ और अन्य मानवाधिकार संगठनों से जो भी हो रहा है, कर रहा है । लेकिन दुनिया के लगभग अधिकांश देशों ने सूकी के नोबेल शांति पुरस्कार को ही निशाना बनाया हुआ है । ईरान के अयातुल्लाह खामीनी के बयान से पहले नॉर्वे की नोबेल एकेडमी को 38,6000 अर्जियां मिली, जिसमें औंग सान सूकी को दिया गया नोबेल शांति पुरस्कार वापस लेने की अपील की गयी । आवेदनकर्ताओं ने अपनी अर्जियों में लिखा कि ‘औंग सान सूकी मानवता के प्रति अपराध की दोषी हैं, इसलिए उन्हें दिया गया नोबेल शांति पुरस्कार वापस ले लिया जाए और नोबेल एकेडमी के मूल सिद्धांत भी बदले जाएं ।

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ । नोबेल इंस्टीच्यूट के प्रमुख ओलाव जोल्सताद ने आवेदकों का आग्रह तो यह कहकर ठुकरा दिया कि एक बार प्रदान कर दिया गया नोबेल शांति पुरस्कार रद्द करना या लौटाना संभव नहीं है, मगर इस बात को लेकर बहस जारी है ।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करनेवाले नोबेल शांति पुरस्कार विजेता पादरी आर्कअिशप डेस्मोंड टूटू ने औंग सान सूकी से आग्रह किया कि वे रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में हस्तक्षेप करें और हिंसा रोकें । डेस्मोंड टूटू ने जोर देकर यह बात कही है कि साथी नोबेल शांति पुरस्कार विजेता को चाहिए कि ऐसे मुद्दे पर पूरी दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अनदेखी न करें । सोसल मीडिया पर लिखे गये अपने पत्र में आर्कबिशप ने कहा - ‘मैं कभी औंग सान सूकी का प्रशंसक रहा हूं, संघर्ष के दिनों में भी मैं समर्थक था और नोबेल शांति पुरस्कार का समाचार मिलते ही बधाई पत्र भेजा था । लेकिन आज 85 वर्ष की ढलती उम्र में औंग सान सूकी की आलोचना करनी पड़ रही है । आप हिंसा के खिलाफ संघर्ष की प्रतीक मानी जाती हैं । मगर आपके शीर्ष पद पर पहुंचने की राजनीतिक कीमत अगर खामोशी है तो यह कीमत ढलान की ओर है ।’

आंदोलन के दिनों में सूकी ने रेखीन, काछेन, कारेन तमाम उन प्रांतों का दौरा किया था, जहां हक की लड़ाई लड़ रहे विद्रोहियों का दमन चल रहा था । उन्होंने 2015 आम चुनाव में कुछ से तालमेल भी किया था ।

आज औंग सान सूकी का इससे बिल्कुल बेखबर होना विवाद का विषय तो है । अंतरराष्ट्रीय मंच पर सवालों से बचने के लिए औंग सान सूकी ने इसी महीने शुरू होनेवाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की वार्षिक बैठक में शामिल होने अमेरिका जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया । गत वर्ष सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में सूकी ने रोहिंग्या पर अपने सरकार की कारवाई का बचाव किया । अभी न्यू यॉर्क नहीं जाने की वजह सूकी क कार्यालय ने यह बताया कि उग्रवादी हमले की आशंका से उनकी सुरक्षा को खतरा है और वे देश में ‘स्थिरता’ लाने की प्रयास में जुटी हैं । सूकी को उससे भी ज्यादा नोबेल शांति पुरस्कार पर चौतरफा हमले का डर है ।

सूकी म्यांमार की राष्ट्रपति तो नहीं हैं । उनका दर्जा स्टेट काउंसिलर का है, जिसे विदेश मंत्री कहा जाता है । मगर सरकार में निर्णायक भूमिका निभाने की हैसियत रखती हैं । क्योंकि अपनी पार्टी की सर्वेसर्वा वे खुद ही हं । रेखीन प्रांत जाकर रोहिंग्या आतंकवादियों से औंग सान सूकी के मिलने की उड़ती हुई खबर आयी लेकिन फिर बैठ गयी । म्यांमार सरकार का कहना है कि 25 अगस्त को रोहिंग्या आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर दिए । तो फिर यह प्रश्न भी उठता है कि 10 सितंबर को जब आंतकवादियों ने एकतरफा युद्धविराम घोषित करके बातचीत की पेशकश की तो म्यांमार सरकार ने उसे ठुकराकर हमले जारी क्यों रखे? आंदोलन के दौरान युद्धविराम और बातचीत का प्रचार करनेवाली सूकी अभी तमाशबीन क्यों बनी हैं?

लेकिन सिर्फ औंग सान सूकी के नोबेल शांति पुरस्कार को रोहिंग्या हिंसा से जोड़कर इतना हायतोबा क्यों । ऐसे नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं की फेहरिस्त है जिन्हें नरसंहार के लिए यह पुरस्कार मिला । अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा हाल ही में अपने पद से हटे हैं, जिन्होंने ड्रोन हमले में सैनिकों से ज्यादा रिहाइशी इलाकों को निशाना बनाया । बाराक ओबामा नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त सुपरपावर हैं । क्या किसी को हिम्मत हुई कि उन्हें नोबेल से वंचित करने की चूं भी करे? औंग सान सूकी को अमेरिका का समर्थन जरूर मिला, मगर उनकी हैसियत बाराक ओबामा वाली नहीं हो सकती न महात्मा गांधी के हिंसा और शांति सिद्धांत पर चलकर दुनियाभर में लोगों ने नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त किया । वे गांधी एक बार नहीं, दो-दो बार नाम घोषित होने के बावजूद नोबेल से वंचित किए गए । ऐसे नोबेल की बात भारत में तो नहीं हो रही । महात्मा गांधी की भक्त औंग सान सूकी को दिया गया नोबेल शांति पुरस्कार वापस लेने की कवायद में भारत शामिल नहीं है ।

भारत रोहिंग्या से जुड़े दूसरे विवाद में फंसा है । केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू को जेनेवा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में भाग लेकर लौटने के बाद कहना पड़ा कि रोहिंग्या मामले में भारत की खलनायक वाली छवि बनाने की कोशिश की जा रही है । क्योंकि हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स बैठक में हिस्सा लेकर म्यांमार में रूके, औंग सान सूकी और अन्य नेताओं से मिले । रोहिंग्या मुद्दे से खुद को अलग रखा । उसके बाद संसदीय प्रतिनिधिमंडल भी म्यांमार गया, लेकिन रोहिंग्या की चर्चा नहीं की । भारत ने बांग्लादेशी मुसलमानों और बौद्ध चकमाओं को लेकर पहले से चले आ रहे संकट की मौजूदगी के कारण जब रोहिंग्या शरणार्थियों को लौटाया तो सब भारत के पीछे पड़ गए । असली खलनायक चीन के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी की नहीं है, जो हमेशा से म्यांमार की फौजी तानाशाही का मददगार रहा है और अभी भी रोहिंग्या के खिलाफ कार्रवाई को म्यांमार में ‘स्थिरता व विकास’ के लिए उचित बता रहा है । वही चीन है, जिसने अपने यहां के मानवाधिकार जेहादी लू शियाओवो को नोबेल शांति पुरस्कार देने को ‘पुरस्कार’ का अपमान बताया, जिनकी गत जुलाई में चीन की जेल में मौत हो गयी ।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने रोहिंग्याओं को पनाह देने के बाद जब कहा कि जब उनका देश अपनी 16 करोड़ आबादी को खिला सकता है तो दो-तीन लाख रोहिंग्या को क्यों नहीं । उसके बाद भारत की ओर से खाद्य और अन्य जरूरी उपयोग के सामान बांग्लादेश भेजना कुछ अजीबोगरीब नीति लगती है, जो रोहिंग्या को शरण देने को तैयार नहीं है ।

ठीक ऐसा ही विचित्र है, मानवाधिकार के संयुक्त राष्ट्र राजदूत जेद राद-अल हुसैन का पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या और गोरक्षा के नाम पर हिंसा का मुद्दा उठाकर भारत में ‘बढ़ती असहिष्णुता’ की बात करना । इसका जवाब भारत के जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र राजदूत राजीव के. चंदर ने दिया ।