म्यांमार में हिंसा के शिकार रोहिंग्या मुसलमान भागकर बांग्लादेश आए और फिर भारत में घुसे । भारत ने जब सुरक्षा कारणों से उनकी वापसी की व्यवस्था शुरू की तो दुनिया भर के देश हाथ धोके भारत के पीछे पड़ गए ओर अमानवीय रवैया अपनाने का आरोप लगाया । म्यांमार में लोकतांत्रिक आंदोलन से उपजी नेता औंग सान सू भी लगातार चुप रही । बांग्लादेश समेत कई देशों ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों से रोहिंग्या के बहाने सिर्फ भारत ओर औंग सान सू की पर निशाना साधा । म्यांमार अभी पूरी तर सैनिक शासन से मुक्त नहीं हुआ है, मगर औंग सान सू की विदेशमंत्री हैं । भारत पर दबाव बनाया गया कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भगाना नहीं चाहिए और मानवीयता के आधार पर उन्हें बसाना चाहिए । औंग सान सू की की निंदा इसलिए हुई कि उनका लोकतांत्रिक एप्रोच राखाइन प्रांत के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति दबा क्यों है ।
औंग सान सू की ने न तो भारत से, न ही बांग्लादेश से रोहिंग्या शरणार्थियों के विषय में बात की, न ही इन दोनों देशों के विषय में कोई टिप्पणी की ।
औंग सान सू की के मन में बात कुछ और थी ।
कैथोलिक इसाई समुदाय के नेता पोप फ्रांसिस रोहिंग्या शरणार्थियों का हाल जानने बांग्लादेश गए । उसके पहले म्यांमार गए । फ्रांसिस के म्यांमार से निकलकर बांग्लादेश जाने और वहां से निकलने तक पूरे म्यांमार में सोसल मीडिया पर बवाल मच गया ।
पोप फ्रांसिस भारत में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों का हाल पूछने नहीं आए । लेकिन तबतक औंग सान सू की चीन के राष्ट्रपति शी जिन्पिंग से रोहिंग्या संकट पर बात कर आयी थीं। चीन की शिसुवा समाचार एजेंसी के मुताबिक औंग सान सू की कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना(सीपीसी) के विश्व ारी की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मिलने के कार्यक्रम में भाग लेने बीजिंग(चीन की राजधानी) पहुंची, लेकिन म्यांमार की नेता ने शी जिन्पिंग से मुख्य रूप से रोहिंग्या संकट पर चर्चा की। औंग सान सू की चीनी राष्ट्रपति से इस मुद्दे पर म्यांमार और बांग्लादेश के बीच मध्यस्थता का आग्रह किया। भारत की कोई जिक्र नहीं किया।
औंग सान सू की से पहले म्यांमार के सेना प्रमुख सीनियर जनरल मिन औंग हलाइंग चीन जाकर राष्ट्रपति समेत चीनी सैनिक अधिकारियों से रोहिंग्या संकट पर बात कर आए थे । भारत किस प्रकार रोहिंग्या संकट से जूझ रहा है, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगस्त से ही चर्चा का विषय बना हुआ है - जब म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन शुरू हुआ और वे बांग्लादेश से भागकर भारत आए । चीन विश्व का एकमात्र देश है, जिसने रोहिंग्या विवाद से अपने को अलग रखा । शरणार्थियों ने अपने यहां पनाल देने की भारत जैसी परंपरा चीन की नहीं रही है, न ही ऐसे किसी मामले में चीनी नेता रूचि लेते हैं । लेकिन म्यांमार और बांग्लादेश का कोई मामला अगर भारत से जुड़ा हो तो चीन उसमें गहरी दिलचस्पी लेता है । क्योंकि इन दोनों पड़ोसी देशों की सीमाएं भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों से मिलती हैं, जिधर से दक्षिण पूर्व एसियाई देशें(एसियान) का प्रवेश द्वार निकलता है ।
म्यांमार भारत से ज्यादा चीन को अपना ‘हितैषी’ मानता है । चीन म्यांमसार को अपनी गिरफ्त से निकलने देना नहीं चाहता और बांग्लादेश को भी इस तरह फंसाकर रखना चाहता है ताकि वो भारत के निकट न होने पाए । इसके पीछे चीन के व्यापारिक और सामरिक स्वार्थ हैं, जो दक्षिण पूर्व एसिया में भारत से सीधे टकराते हैं । पूर्वोत्तर का सुरक्षा संकट तो सीधे तौर पर म्यांमार और बांग्लादेश से जुड़ा है, जिसके लिए एकमात्र चीन जिम्मेदार है ।
रोहिंग्या संकट के बहाने चीन ने जो चाल खेली है, वो भारत को चौकन्ना करने के लिए काफी है । इसमें एकमात्र पेंच है, भारत को इस क्षेत्र से अलग रखे यह दिखाना कि चीन यहां का एकमात्र चौधरी है ।
चीन के विदेश मंत्री वांग ची नवंबर के अंतिम सप्ताह में म्यांमार गए और फिर बांग्लादेश भी गए । दोनों देशों को चीनी विदेश मंत्री ने ‘आश्वस्त’ कर दिया कि रोहिंग्या संकट का ‘हल’ चीन के पास है । उसी समय ढाका में बांग्लादेशी विदेश मंत्री अबुल हसन महमूलद अली ने जापानी विदेश मंत्री से मुलाकता के दौरान कहा कि म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी पर बातचीत चल रही है । 23 नवंबर को बांग्लादेश - म्यांमार समझौता हो गया । उसके बाद 24 नवंबर को म्यांमार के सेना प्रमुख बीजिंग गए और फिर औंग सान सू भी स्वयं एक दिसंबर को गयीं । चीनी विदेश मंत्री के म्यांमार के राष्ट्रपति हतिनर क्याऊ और सेना प्रमुख दोनों से रोहिंग्या पर विमर्श किया । म्यांमार की तरह बांग्लादेश की भी प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद समेत किसी भी नेता ने भारत से रोहिंग्यश पर बात करने की जरूरत नहीं समझी । औंग सान सू की ने भारत को ‘मध्यस्थता’ के लायक नहीं समझा । जब उन्होंने चुप्पी तोड़ी है, तब राज खुला है कि वो चीन से नजदीकी कायम रखना चाहती हैं और रोहिंग्या के बहाने पहले की ही तरह म्यांमार को अप्रत्यक्ष रूप से चीन के हवाले करना चाहती हैं । बांग्लादेश के मन में भी जो बात थी, वो उस समय प्रकअह नहीं हुई, जब 23-24 अक्टूबर को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज रोहिंग्या संकट समेत विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर बात करने ढाका गयीं । उसके पहले बांग्लादेश के भारत स्थित हाई कमिश्नर सै“यद मुआज्जीम अली ने दिल्ली में कहा कि भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए । म्यांमार-बांग्लादेश के बीच मध्यस्थता की बात नहीं की । लेकिन सुषमा स्वराज जब ढाका गयीं तो बांग्लादेश के विदेश मंत्री ए. एच. महमूद अली ने भारत से रोहिंग्या संकट के हल में वैसा सहयोग नहीं मांगा, न ही सहयोग करने का ठोस वायदा किया । बांग्लादेश के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने भी भारत से कोई मदद नहीं मांगी । भारत ने ही बार-बार बांग्लादेश का दरवाजा खटखटाया है, क्योंकि रोहिंग्या शरणार्थियों बांग्लादेश के रास्ते भारत पहुंचे हैं । सितंबर के अंतिम सप्ताह में संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के समय भी भारत को इस पर काफी कुछ सुनना पड़ा । सुषमा स्वराज ने उसी बिंदु पर महमूद अली से बात की । पूरे प्रकरण के दौरान चीन पर्दे के पीछे से अपना कूटनीतिक पेंच फिट करने में जुटा रहा । 14 नवंबर को मनीला में एसियान और पूर्वी एशियाई देशों के सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एन्टोनियो गुएर्डेस समेत 19 देशों के नेता जुटे थे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गए थे, जिनकी डोनाल्ड ट्रंप से वार्ता में मुख्य बिंदु था रोहिंग्या । उस सम्मेलन में भाग लेने आए संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने देखा कि किस प्रकार संयुक्त राष्ट्र महासचिव से मुलाकात के दौरान भी औंग सान सू की ने किसी को भनक नहीं लगने दी कि वे किसी मध्यस्थता में कैसा ‘हल’ चाहती हैं । एशियान के मनीला सम्मेलन में भी यही मुद्दा छाया रहा कि बौद्ध देश म्यांमार में बड़े पैमाने पर हिंसा के कारण तकरीबन 6,00,000 रोहिंग्या मुसलमानों ने भागकर बांग्लादेश की शरण ली है । उसके बाद 19 नवंबर को चीनी विदेश मंत्री म्यांमार गए और फिर एक दिसंबर को औंग सान सू की बीजिंग जाकर मध्यस्थता का न्योता दे आयीं । बांग्लादेश की प्रधानमंत्री चार दिसंबर को कम्बोडिया गयीं, जिसका रोहिंग्या संकट से कोई नाता नहीं । इसका मकसद दूसरा है । केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सात दिसंबर को कोलकाता में बांग्लादेश की सीमा से लगे पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों से रोहिंग्या घुसपैठियों से उत्पन्न सुरक्षा समस्या पर विचार-विमर्श किया । अमेरिका और अन्य यूरोपीय देश म्यांमार पर रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लेने का दबाब आर्थिक नाकेबंदी का दबाव देकर बना रहे थे । लेकिन संकट के ‘हल’ में चीन की घुसपैठछ पर सब चुप हैं । कैथोलिक चर्चों के पोप सिर्फ कहने के लिए आर्थिक नेता हैं, उसकी मानवीयता राजनीति प्रेरित होती है । पोप फ्रांसिस ने म्यांमार में रोहिंग्या शब्द का उच्चारण नहीं किया, मगर बांग्लादेश के कोक्स बाजार स्थित शरणार्थी शिविरों में जाकर ‘रोहिंग्या-रोहिंग्या’ कहकर रोए । म्यांमार में रोहिंग्या को ‘बंगाली’ अवैध आप्रवासी कहा जाता है । 50 वर्षों तक सारी दुनिया से अलग-थलग रहे म्यांमार वासियों को हाल ही में खुली हवा में सांस लेने का अवसर मिला है । सोसल मीडिया पर पोप के दौरे को तो राजनीति-प्रेरित बताया गया, लेकिन चीन की भूमिका पर खामोशी रखी । औंग सान सू की वो दिन भूल गयीं, जब लोकतंत्र बहाली के लिए सैनिक तानाशाही के खिलाफ लड़ने के औंग सान सू की वो दिन भूल गयीं, जब लोकतंत्र बहाली के लिए सैनिक तानाशाही के खिलाफ लड़ने के दौरान उन्हें 22 साल तक या तो जेल में या घर में नजरबंद रहना पड़ा । आंदोलन के दमन में एकमात्र चीन ने फौजी शासकों को लगातार सहायता पहुंचायी । म्यांमार लगभग चीन की गिरफ्त में रहा । फौजी शासन के संस्थापक जनरल ने विन ने रोहिंग्या को दोयम दर्जे की नागरिकता के बावजूद उनके लिए ‘सफेद कार्ड’ जारी किया, जिससे उन्हें वोट डालने का अधिकार प्राप्त था । 2015 में औंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने चुनाव जीतने के बाद लोकतंत्र बहाली वाला ‘सफेद कार्ड’ रद्द कर दिया ।
चीन-म्यांमार-बांग्लादेश की रोहिंग्या के बहाने बन रही तिकड़ी के आलोक में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) समेत सीमावर्ती असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय के मुख्यमंत्रियों से कोलकाता में विमर्श किया । ममता बनर्जी का नजरिया ‘बंगाली’ और मुस्लिम रोहिंग्या के प्रति अलग है । भारत ने रोहिंग्या मुसलमानों के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और इस्लामी आतंकी गुट(आईएस) से ताल्लुकात होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया । ममता बनर्जी ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के समय कोलकाता आए बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री मोहम्मद शहरियार आलम की मौजूदगी में रोहिंग्या की वापसी का विरोध किया । सभी गैर-भाजपा पार्टियां रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में उतर आयीं । इससे ‘उत्साहित’ होकर रोहिंग्या शरणार्थियों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के शरणार्थी कार्ड के आधार पर भारत में रहने का दावा सुप्रीम कोर्ट में ठोंक दिया । केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर रोहिंग्या को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बतानेवाले हलफनामे को दीदी ने सही नहीं माना ।