2025 पूरे वर्ष पड़ोसी देशों में राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता का दौर रहा, जिसका भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्ते पर भी असर कमो-बेश पड़ा । लेकिन 2026 शायद अनुकूल साबित हो, ऐसी संभावना लग रही है । क्योंकि नए वर्ष की शुरूआत सैनिक तानाशाही वाले म्यांमार में चुनाव से हुई है, जहां की जनता ने आज तक सही माएने में लोकतंत्र देखा ही नहीं । बांग्लादेश और नेपाल में भी बिगड़े हालातों में चुनाव हो रहे हैं ।

भारत की पूर्वोत्तर सीमा से सटे म्यांमार एकमात्र ऐसा पड़ोसी है, जहाँ आजादी के 75 वर्ष से ज्यादा बीत जाने के बावजूद सेना सत्ता पर काबीज है । चुनाव होते रहे हैं, मगर वहां की सैनिक जुंटा ने जनप्रतिनिधियों के हाथ में शासन नहीं जाने दिया ।

उतना ही नहीं म्यांमार अकेला पड़ोसी देश है, जहां लगभग स्थायी रूप से मीडिया और संचार माध्यमों पर मार्शल लॉ ब्लैकआउट रहता है और जहां के जनरलों को भारत समेत पूरी दुनिया से कटे रहने की परवाह नहीं रहती । म्यांमार को मीडिया में ‘लैंडलॉक्ड’ देश कहा जाता है । खुद को बौद्ध कम्युनिस्ट कहनेवाले इस फौजी सरकार का एकमात्र हितैषी और मददगार चीन है, साथ-साथ म्यांमार में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को बेरहमी से कुचलने में सहयोगी रहा है ।

ऐसे देश म्यांमार से दिसंबर के अंतिम सप्ताह में चुनाव की खबर आयी । झांसा देनेवाला और दिखावे के लिए ही सही, 28.12.2025 को पहले दौर का मतदान हुआ । दूसरे दौर का मतदान 11 जनवरी को और तीसरा दौर 25 जनवरी को होगा । चुनाव का एलान सैनिक जुंटा सरकार ने मतदान से एक हफ़्ता पहले किया, लेकिन वोटों की गिनती कब होगी और चुनाव परिणाम कब घोषित होंगे, इसके बारे में कुछ नहीं बताया गया ।

सैनिक जुंटा को आर्थिक बदहाली और गृहयुद्ध की मार झेल रहे अपने लोगों को दिखाना है कि संविधान के अनुसार पांच साल बाद चुनाव कराए जा रहे हैं । साथ-साथ भारत समेत पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र को भी छद्म लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करनेवाला छलावा संदेश देना है । 2020 में हुए चुनाव में भारी वोटों से विजयी ओंग सान सूकी के नेतृत्ववाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी(एनएलडी) के हाथ में सत्ता जाना जनरलों को रास नहीं आया । वो चुनाव संयुक्त राष्ट्र, भारत और यूरोपीय पर्यवेक्षकों की देखरेख में कराए गए थे । इसके पहले 2015 आम चुनाव भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में हुए थे, जिसमें एनएलडी जीती, पर उसके बावजूद जनरलों ने ओंग सान सूकी के हाथ में सत्ता की बागडोर नहीं सौंपी ।

म्यांमार में लोकतंत्र की आवाज नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सूकी अंतरराष्ट्रीय जगत की सबसे मशहूर लोकतंत्र की अवतारी संघर्ष जारी मानी जाती है । इनकी तुलना महात्मा गांधी से की जाती है । 80 वर्षीया ओंग सान सूकी ने देश में आजादी और लोकतंत्र बहाली के लिए जनान्दोलन के 40 साल या तो जेल में अथवा अपने घर में ही नजरबंदी में यातनाएं झेलते हुए गुजार दिए । अपने ही देश के सैनिकों की बंदूकों की नोक के आगे शांतिपूर्ण संघर्ष पर डटी सूकी को ‘गांधी के रूप में आंधी’ कहा जाता है । म्यांमार के अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का भी यह 78वां साल है और वहां की जनता गुलामी तथा शोषण के दंश से मुक्त नहीं हो पा रही है ।

2021 में ठीक स्वाधीनता दिवस के समय 06 फरवरी को सैनिक तख्तापलट में ओंग सान सू की नीत निर्वाचित सरकार को ही जेल में डाल दिया गया । 2020 चुनाव के कुछ ही महीनों बाद जनरल मिन ओंग हलांग ने ओंग सान सूकी और उनका चुनाव गठजोड़ एलएलडी समर्थकों पर धांधली, भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता हाथ में लेने के बाद सू की के खिलाफ इस तरह मुकदमा चलाया, ताकि वो जेल से बाहर नहीं निकल पाएं । सैनिक जुंटा कोर्ट ने पहले चार साल की सजा सुनायी । भारत समेत अंतरराष्ट्रीय दबाव में जनरल ने सजा 2 साल कम कर दी । लेकिन सेना नियंत्रित कोर्ट ने कोरोना उल्लंघन समेत अन्य मनगढ़न्त आरोपों में फिर 27 साल की सजा सुनायी, जिसमें जज के अनुसार सजा की अवधि 100 साल तक भी हो सकती है । ऐसा इल्जाम लगा दिया गया ताकि ओंग सान सू की अपनी बाकी जिंदगी जेल में ही गुजारें ।

इस अमानवीय और जनविरोधी कृत्य की चारों तरफ निंदा हई । म्यांमार के सैनिक शासक विदेश यात्रा से परहेज करते हैं और किसी विदेशी राजनयिक के आगमन की भी उम्मीद नहीं करते । म्यांमार की आमदनी का मुख्य स्रोत इमारती लकड़ी, रत्न और चावल है । अमेरिका के बाद अन्य यूरोपीय देशों की आर्थिक नाकेबंदी से आर्थिक हालत म्यांमार की खस्ता हो गयी । सैनिक तख्ता पलट के विरोध में आंदोलन कर रहे कारेन, काकेन प्रांत के विद्रोही गुटों ने लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारियों का साथ दिया । सैनिक जुंटा ने तितरफा जनता की आवाज दबाने में देश को दांव पर लगा दिया । लाखों लोग देश छोड़कर भाग गए । उसी पलायन से रोहिंग्या मुसलमानों का संकट पैदा हुआ, जो बौद्धों की प्रताड़ना के कारण यत्र-तत्र भागे ।

पूर्वोत्तर के रास्ते रोहिंग्या घुसपैठ की समस्या भारत भी झेल रहा है । म्यांमार में चुनाव के समय संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य प्रोग्राम की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार में 12 मिलियन से ज्यादा लोग 2026 में भयंकर भुखमरी की हालत में होंगे । उनमें एक मिलियन से ज्यादा लोग जीवन रक्षक सहायता पर जी रहे हैं ।

पांच साल में देश को कंगाली और अराजकता के कगार पर लाकर म्यांमार सैनिक जुंटा चुनाव करा रही है । रिटायर जनरलों द्वारा संचालित यूनियन सोलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी(यूएनडीपी) उम्मीदवार सबसे ज्यादा मैदान में हैं । सेना नियंत्रित चुनाव आयोग ने एनएलडी समेत लोकतंत्र समर्थक दलों की मान्यता खतम कर रखी है । सैनिक जुंटा विरोधी सभी नेता जेल में हैं । सिर्फ यूएनडीपी और उसके कुछ सहयोगी पार्टियों को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त है । ऐसे चुनाव के एलान के समय जनरल मिन ओंग ने अपने नियंत्रण वाले ‘म्यांमार डिजिटल न्यूज’ पर वक्तव्य जारी करके कहा कि यह ‘लोकतंत्र की वापसी और सेना का विरोध कर रहे विद्रोहियों को शांति कायम करने का मौका है ।’

यह सब जानते-समझते हुए भी म्यांमार के लोगों को नए साल से उम्मीदें हैं । 28 दिसंबर के मतदान की रिपोर्ट म्यांमार की थाइलैंड सीमा से आयी जिसमें मतदाताओं की भागीदारी आशंका और अविश्वास के माहौल के कारण कम बतायी गयी । चुनाव आयोग परिणाम की घोषणा महीनों बाद करता है, लेकिन लोग चुनाव भूलते नहीं हैं । क्योंकि उनके पास इस दमन चक्की में पिसते रहने का अन्य कोई विकल्प नहीं है ।

अब देखिए कि बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ । बांग्लादेश में छात्र विद्रोह के कारण प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर जाने को अगस्त, 2024 में मजबूर किया गया । भारत से अच्छे संबंध होने के कारण शेख हसीना ने यहीं पनाह ली हुई है । वर्ष 2025 के अंतिम महीनों में बांग्लादेश में हिंसा और भारत विरोध चरम पर पहुंच गया । छात्र नेताओं ने नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनायी, जिस पर शेख हसीना विरोधी सबसे बड़ी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी(बीएनपी) द्वारा चुनाव कराने का दबाव है । दूसरी तरफ इस्लामपंथी छात्र संगठन हालात सामान्य होने तक चुनाव टालना चाहते हैं । हालात बेकाबू हो रहे हैं । पहचान करके हिंदू परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है । पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी सुप्रीमो बेगम खालिदा जिया की तबियत लगातर बिगड़ती देख उनके पुत्र तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद 2025 के अंत में लंदन से स्वदेश लौटे हैं । तारिक रहमान बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं । अंतरिम सरकार ने 12 फरवरी को चुनाव का एलान कर रखा है । तारिक रहमान ने ढाका में कदम रखते ही पार्टी रैली में भाईचाराए सर्वधर्म समन्वय और शांति का संदेश देकर मुल्क के नेतृत्व का आगाज किया । भारत से बांग्लादेश के राजनयिक रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं । इसका असर अन्य संबंधों पर भी पड़ा है ।

22 जनवरी से आयोजित बार्षिक कोलकाता पुस्तक मेला में हर साल की तरह बांग्लादेश की भागीदारी पर इस बार सवालिया निशान लगा है । 03 फरवरी तक चलनेवाले इस पुस्तक मेले में हर साल बांग्लादेश के 45 प्रकाशक हिस्सा लेने आते हैं । 49 वर्षों से कोलकाता पुस्तक मेला का आयोजन हो रहा है । 2025 में मेला नहीं लगा और इस बार भारतीय विदेश मंत्रालय से बांग्लादेश को हरी झंडी मिलेगी, इसकी उम्मीद कम लगती है । क्योंकि हिंदू संगठनों ने कोलकाता स्थित बांग्लादेशी मिशन पर हिंसा के विरोध में हमला किया है और तनाव बढ़ता ही जा रहा है । हालिया हिंसा भड़कने का कारण छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत है । उस्मान हादी को 12 दिसंबर को कुछ नकाबपोश लोगों ने सिर पर गोलियां दागी । अंतरिम सरकार ने उसे इलाज के लिए थाइलैंड भेजा, जहां से उसकी लाश लौटी । बांग्लादेश पुलिस उसका तार भारत से जोड़ रही है । क्योंकि बांग्लादेश की भी सीमा पूर्वोत्तर से लगी है और म्यांमार के रास्ते थाइलैंड भी भारतीय के रूट पर है, जो दक्षिण पूर्व एसियाई देशों का प्रवेश द्वार है । भारतीय अधिकारियों ने इस आरोप का खंडन किया है कि 12 दिसंबर को उस्मान हादी को गोली मारनेवालों में से दो मेघालय में वहां के स्थानीय लोगों की सहायता से घुसे और उनमें से दो संदिग्ध मददगार भारतीय पुलिस की हिरासत में है । उस्मान हादी को लेकर बबाल मचने का कारण ये है कि यही 2024 विद्रोह का मास्टरमाइंड था, जब शेख हसीना को सत्ता से हटना पड़ा ।

इतना सब देखते-सुनते हुए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी(बीएनपी) नेता तारिक रहमान ने तुरंत मतदाता सूची में नाम दर्ज कराया । चुनाव आयोग से पुष्टि मिलते ही 12 फरवरी चुनाव के लिए ढाका.17 संसदीय सीट से पर्चा भर दिया । पर्चा भरने के अगले दिन 30 दिसम्बर को तारिक रहमान की माँ बेगम खालिदा जिया का अस्पताल में इंतकाल हो गया । जब वे ढाका पहुंचे उसी समय से उनकी माँ की हालत चिंताजनक थी । दूसरी बड़ी पार्टी इस्लामपंथी जमायत-ए-इस्लामी को पाक-समर्थक माना जाता है । बीएनपी का भी रूख वैसा ही रहा है ।

शेख हसीना ने जमायत-ए-इस्लामी को प्रतिबंधित कर दिया था, जो प्रतिबंध अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनुस ने 2024 में हटा दिया । विद्रोही छात्रों की पार्टी नेशनल सिटिजेन पार्टी(एनसीपी) को यह अच्छा नहीं लगा । क्योंकि छात्र नेता 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी अत्याचारों को कभी भूल नहीं सकते । इसलिए एनसीपी नेता नाहिद इस्लाम और तनुवा जबीन जमायत-ए-इस्लामी से चुनावी गठजोड़ के पक्ष में नहीं है । ताकि रहमान सबको साथ लेकर चलने और भारत से रिश्ते अच्छे रखने की बात कह रहे हैं । इसलिए ज्यादा संभावना है कि बीएनपी से ही नेशनल सिटिजेन पार्टी का गठजोड़ होगा और निर्दलीय भी बड़ी संख्या में तारिक रहमान के बैनर तले चुनाव लड़ेंगे । उम्मीद की जा रही है कि 2025 की प्रतिकूल स्थिति नए वर्ष का पीछा नहीं करेगी ।

पाकिस्तान के भारत के साथ रिश्ते 2025 में इतने खराब हुए कि दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात बंद है । 22 अप्रील के पहलगाम आतंकी हमले के कारण करारा जवाब में भारतीय सेना का ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के बाहरी के अलावे अंदरूनी राजनीति को भी तनावपूर्ण बनाने में सफल रहा । आपसी रिश्ते का आलम ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच से पहले या बाद भारत ने क्रिकेटर अपने पाकिस्तानी काउंटरपार्ट से हाथ नहीं मिलाते । भारत से रिश्ते को लेकर ऑपरेशन सिंदूर की आड़ में पाकिस्तानी सेना और सरकार में मतभेद है । पूरे वर्ष जिस सच को पाकिस्तान सरकार नकारती रही, उसे 2025 समाप्त होने के समय स्वीकारा कि ऑपरेशन सिंदूर स्ट्राईक में पाकिस्तानी फौज को नुकसान उठाना पड़ा । पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 28 दिसंबर को एक कार्यक्रम में माना कि भारतीय हमले के कारण उनकी फौज बंकरों में छिपीए सीजफायर का प्रस्ताव रखना पड़ा । विदेश मंत्री इशाक डार ने भी स्वीकारा कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के नून खॉ एयरवेस को भारी नुकसान हुआ । पाकिस्तान एक ओर अफगान सीमा पर और दूसरी तरफ आजादी की मांग कर रहे विद्रोही बलूच आर्मी के हमलों का सामना कर रहा है । भारत पर बलूचियों को उकसाने का आरोप लगाता है । पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को सेवा जेल से निकलने नहीं देना चाहती । 2025 पूरे वर्ष उनके पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की पुलिस से झड़प होती रही ।

अफगानिस्तान में चार साल पहले इस्लामी तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया । अफगान विदेश मंत्री आमिर खाँ मुत्ताकी ने अक्टूबर, 2025 में भारत आकर द्विपक्षीय रिश्ते को नया आयाम दिया । 4 साल में किसी अफगान राजनयिक ने पहली यात्रा की और भरोसा दिलाया कि भारत के खिलाफ हमले के लिए अफगान जमीन का इस्तेमाल नहीं होने दिया जायेगा ।

ठीक उसी समय सितंबर में नेपाल में नौजवानों ने विद्रोह कर दिया और प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा । चुनाव 05 मार्च को होना है । सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए जोड़-तोड़ करनेवाले वामदलों से नाराज युवकों ने संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट भवन में आग लगा दी । भ्रष्टाचार के खिलाफ हिंसा और आगजनी के माहौल में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की अपील के बाद युवक इस आश्वासन पर शांत हुए कि 05 मार्च, 2026 को चुनाव कराए जाएंगे । इसके लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया । वर्ष 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे के पी शर्मा ओली । 2008 में रिपब्लिक बनने के बाद से 14 प्रधानमंत्री नेपाल में बन चुके हैं और कोई पांच साल नहीं रहे ।

पाकिस्तान और बांग्लादेश में सैनिक तख्तापलट होते रहे हैं । लेकिन चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि सरकार संभालते हैं । अभी भी दोनों देशों में सेना 2025 का रोल नेपथ्य से दिखा रही है । लेकिन म्यांमार की सेना जनभावना और भारतीय भावना की परवाह नहीं करती । भारत से ज्यादा चीन से नजदीकी पड़ोसी देशों की नीति रही है, जिसमें पाकिस्तान, नेपाल के साथ-साथ श्रीलंका भी शामिल है । श्रीलंका में पहली बार वामपंथी पार्टी प्रमुख अनुरा दिसानायके राष्ट्रपति बने हैं, जिन्होंने भारत के साथ रिश्ते में संतुलन बनाने का संकेत दिल्ली आकर दिया ।

एक बार फिर लौटते हैं म्यांमार की ओर, जहां असामान्य हालात से भारत की चिंता बढ़ जाती है । फरवरी, 2021 सैनिक तख्तापलट के कुछ महीने बाद विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंगला म्यांमार पहुंचे । उन्हें जेल में बंद ओंग सान सू की से मिलने की इजाजत नहीं मिली, जिनके आंदोलन का सबसे बड़ा समर्थक भारत रहा है ।

ताजा पहले दौर के मतदान में ही भारी जीत का दावा म्यांमार की सेना समर्थित पार्टी ने कर डाला । संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क समेत यूरोप के कई मानवाधिकार संगठनों ने ऐसे चुनाव की तीखी आलोलना करते हुए इसे सैनिक जुंटा का मार्शल लॉ बरकरार रखने का नाटक बताया है ।