बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना जब दिल्ली आयी हुई थीं, उस समय भारत के सेना प्रमुख नेपाल के दौरे पर थे । यह इसी हफ्ते की घटना है । गत अगस्त में नेपाल के विदेशमंत्री नारायण खड़का चीन गए हुए थे । एक साल पहले शेर बहादुर देउवा के नेपाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल का वो पहला उच्चस्तरीय चीन दौरा था । शेर बहादुर देउवा स्वयं 01.04.2022 को भारत पहुंच गए । उन्होंने न केवल आपसी द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर भारतीय नेताओं से बात की, बल्कि भाजपा के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मुख्यालय भी गए । उसको लेकर कम्युनिस्ट प्रभाव वाले नेपाल में खलबली मच गयी । नेपाल में असंतुष्ट कम्युनिस्ट पार्टी विपक्ष में है । उप प्रधानमंत्री रह चुके विपक्षी नेता भीम रावल ने उसको लेकर बवाल मचाया । काठमांडू से रिपोर्ट मिली कि कम्युनिस्ट नेताओं ने सवाल उठा दिया कि शेर बहादुर देउवा नेपाल के प्रधानमंत्री की हैसियत से भारत गए या नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में । यहां तक कि देउवा की अपनी सरकार और पार्टी में भी विवाद हुआ । नेपाली विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार आम तौर पर कोई प्रधानमंत्री जब भारत के प्रधानमंत्री के न्योते पर जाते हैं तो प्रोटोकॉल की औपचारिकता में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और मंत्रियों, राजनीतिज्ञों से मिलते हैं । भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आमंत्रण पर शेर बहादुर देउवा भारत गए और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बुलावे पर उनके पार्टी मुख्यालय गए । नेपाल में चीन के समर्थन से कम्युनिस्ट ताकतवर हैं, सभी जानते हैं । उसके बावजूद नेपाल के प्रधानमंत्री ने भारत सरकार के साथ-साथ सत्ताधारी दल से भी निकटता स्थापित की ।

शेख हसीना ने दिल्ली में कदम रखते ही कहा कि अगर भारत और चीन के बीच कोई समस्या है, तो मैं उसमें नहीं पड़ना चाहती, मैं अपने देश का विकास चाहती हूँ ।’

चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने गत हफ्ते बांग्लादेश पहुंचकर खुद को ‘बांग्लादेश का सबसे विश्वसनीय लंबी अवधि वाला सामरिक साझीदार’ बताया । लेकिन बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने दो दिन बाद ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ (लंदन) को बताया कि ढाका और बीजिंग का रिश्ता सिर्फ चीन से कर्ज लेने तक सीमित है ।

शेख हसीना ने अपने स्वागत में सबसे पहले कहा. ‘भारत सबसे ज्यादा भरोसेमंद और सहयोगी पड़ोसी है । ‘भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा. ‘हमारी ‘पड़ोसी पहले’ठ वाली नीति के अंतर्गत नेपाल सबसे महत्वपूर्ण भागीदार है ।’

शेख हसीना की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात तथा जल, जमीन, कट्टरवाद, आतंकवाद से सम्बन्धित समझौते के विस्तार में जाने के पूर्व एक और जानकारी देते चलें । नेपाल के प्रधानमंत्री के 01.04.2022 को दिल्ली आने के मात्र हफ्ता भर पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने 26 मार्च को काठमांडू जाकर 9 समझौतों पर हस्ताक्षर किए ।

नेपाल के बाद भारत का दूसरा पड़ोसी भुटान के प्रति भी भारत सजग है, ताकि चीन का भुटान को अपने करीब लाने का प्रयास कमजोर हो । 29 अप्रैल को विदेशमंत्री एस. जयशंकर थिंपू गए और हिमाचल में चीन के मुहाने पर स्थित रक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण भुटान से नैतिक तथा भावनात्मक करीबी स्थापित की ।

विगत एक-दो दशक में भारत ने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने में चीन को पछाड़ने में सफलता हासिल की है । जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो यह चीन से ज्यादा भारत के नजदीक नहीं हो सकता । क्योंकि भारत से तनातनी लगातार कायम रखने की पाकिस्तान की नीति को चीन बढ़ावा देता है, जिसमें युद्ध के हालात की आशंका में पाकिस्तान की सहायता के लिए चीन की तत्परता भी शामिल है ।

दुनिया की एक प्रभावशाली सैनिक और आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरे भारत को ‘पड़ोसी पहले’ की विदेश नीति में कामयाबी मिल रही है । इसका मूल कारण है, पास-पड़ोस में अस्थिरता और राजनीतिक उथल-पुथल पैदा न करने का भारत का परंपरागत सिद्धान्त, जो दूसरी महाशक्ति चीन से मेल नहीं खाता । उतना ही नहीं, रिश्ते में खटास के बावजूद भारत हमेशा सहायता का हाथ बढ़ाए रखता है । पाकिस्तान में अभी बाढ़ से मची तबाही में भारत ने मदद की पेशकश की है । जबकि जम्मू व कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने के बाद 2019 से भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता बंद है । चीन से सीमा पर तनाव कम करने के लिए भारत की ओर से की जा रही वार्ता की हर पहल बेनतीजा साबित होती है ।

चीन हमेशा से पड़ोसी देशों से भारत के संबंध बिगाड़ने के लिए सैनिक सहायता वाला हथियार अपनाता रहा है, ताकि उन देशों को भारतीय सीमावर्ती इलाकों में अलगाववादी हिंसा भड़कायी जाए । भारत की पूर्वोत्तर सीमा म्यांमार और चीन से लगी है, जिसका दूसरा छोर बांग्लादेश से सटा है । 1971 में भारत की सहायता से पाकिस्तानी कब्जे से मुक्त होने के बाद आजाद बांग्लादेश का उदय हुआ । आज बांग्लादेश में भारत के सहयोग से राजनीतिक स्थिरता है ।

बांग्लादेश में 2023 में आम चुनाव है । अगर फिर से जीती तो प्रधानमंत्री शेख हसीना का लगातार चौथा कार्यकाल होगा । कहा जाता है कि भारत के अप्रत्यक्ष सहयोग से शेख हसीना चुनाव जीत रही हैं । बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन ने गत माह एक जनसभा में कहा कि भारत यह सुनिश्चित करे कि क्षेत्रीय स्थिरता के हित में शेख हसीना फिर जीतें ।

मजबूत पकड़ का सबूत है, असम में बांग्लादेश समर्थित उग्रवाद काबू में है और बांग्लादेश के साथ बस तथा ट्रेन सेवा । बांग्लादेश का भुटान और नेपाल से व्यापार का रास्ता भारतीय बंदरगाह से जाता है । बांग्लादेश दक्षिण एसिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है । इस बार का जल-बंटवारा समझौता तो 25 वर्ष में पहला है ।

भारत के लिए चीन की वजह से म्यांमार सिरदर्द बना हुआ है । बंगाल की खाड़ी से लगे म्यांमार के रास्ते चीन पूर्वोत्तर में नगा और अन्य उग्रवादियों को उकसाता है । कम्युनिस्ट सैनिक तानाशाही के चंगुल में फंसे म्यांमार में चीन लोकतंत्र कायम नहीं रहने देगा । भारत और पश्चिमी देशों के सहयोग से चल रही नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सू की सरकार को 01.02.2021 को अपदस्थ करके जनरलों ने जेल में डाल दिया । लेकिन उसके बावजूद म्यांमार ने भारत से नजदीकी कायम रखी है । म्यांमार के समर्थन में दूसरा कम्युनिस्ट देश रूस हाल में सामने आया है । रूस के विदेशमंत्री सर्गेई लैवरोव अगस्त के पहले सप्ताह में म्यांमार गए । रूस और चीन में यूक्रेन युद्ध के बाद अचानक ‘करीबी’ स्थापित हुई है । कम्युनिस्ट होने के बावजूद इन दोनों देशों में दोस्ती नहीं रही । म्यांमार के रास्ते भारत को अपने समुद्री पड़ोसी आसियान(दक्षिण पूर्व एसियाई देश) देशों में चीन को शिकस्त देने में आसानी हुई है, जहां चीन का दशकों से दबदबा रहा है । भारत-म्यांमार-थाइलैंड हाइवे परियोजना में बांग्लादेश भी साझीदार बनना चाहता है ।

समुद्री पड़ोसी श्रीलंका को भी भारत ने इस बीच चीन के पसोपेस से मुक्त किया है । भारत ने श्रीलंका को अभूतपूर्व आर्थिक संकट से उबरने में मदद की । उसके बाद अगस्त में जब चीन का सैनिक पोत कोलंबो के हम्बनटोटा बंदरगाह पर लगा तो भारत के कड़े विरोध के आगे श्रीलंका को झुकना पड़ा । श्रीलंका चुप रहा । कोलंबो स्थित चीन के राजदूत की झेन्होंग ने जब भारत के विरोध को श्रीलंका की ‘संप्रभुता’ में हस्तक्षेप बताया तब श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने सफाई दी । दो साल पहले महिंदा राजपक्षा के शासनकाल में भी कोलंबो के हम्बनटोटा बंदरगाह पर चीन ने नौसैनिक परियोजना शुरू की, लेकिन भारत के कड़े प्रतिवाद के कारण श्रीलंका सरकार को चीन से कर्ज के बदले किया गया वो करार रद्द करना पड़ा ।

थोड़ा दूरस्थ पड़ोसी और दुनिया की एक दबंग आर्थिक महाशक्ति जापान के मुहाने पर भी भारत ने चीन को एक कदम पीछे करने को विवश किया हुआ है । चीन से तनाव का एक कारण जापान भी है, जो तेजी से सैनिक महाशक्ति भी बना है । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री जयशंकर दोनों ही इस हफ्ते टोक्यो में थे । दो दशकों से भारत और जापान के बीच चला आ रहा रक्षा तथा व्यापारिक आदान-प्रदान का असली मकसद है, भारत-प्रशांत क्षेत्र को ‘स्वतंत्र व खुला’ रखनाए जहां पश्चिम में जापान स्थित है । इसमें अमेरिका और आस्ट्रेलिया भी भारत का सहयोगी है ।

निकटतम पड़ोसियों के साथ बंगाल की खाड़ी में भारत की बिमस्टेक(BIMSTEC्म्ज़. बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल) भी चीन के लिए बड़ी चुनौती है । इस संगठन में भारत, श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, थाइलैंड और माल्दीव्स भी है ।