अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरूसलेम को इसराईल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर अमेरिका की परंपरागत फिलस्तीन नीति त्याग दी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके जवाब में देश-विदेश को स्पष्ट बता दिया कि भारत अपनी फिलस्तीन समर्थक विदेश नीति पर कायम है और अमेरिका के दबाव में यह नीति नहीं बदलेगी । यह कदम भाजपा गठजोड़ सरकार की 2017 में प्रमुख उपलब्धियों में से एक मानी जाएगी ।

अमेरिका की पश्चिम एसिया नीति हमेशा से ही फिलस्तीनी-इसराइली लड़ाई में ऐसे शांति ‘मध्यस्थ’ की रही है, जिसमें इसराइल का बचाव करते हुए फिलस्तीन को समर्थन जारी रखा जाए । अमेरिका में देश के अंदर या बाहर राजनीति के आगे धार्मिक और सामाजिक सद्भाव को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता । यरूसलेम को अपनी राजधानी बताने का दावा फिलस्तीन और इसराइल के बीच झगड़े का एक बड़ा कारण है । उससे भी बड़ा मुद्दा ये है कि यरूसलेम पूरे पश्चिम एसिया में सर्वधर्म समन्वय और सद्भाव का पवित्रतम स्थल माना जाता है । इस समन्वय और समरसता में कभी कोई तनाव या झगड़ा आज तक बाधक नहीं बना । पहली बार ऐसा हुआ, जब डोनाल्ड ट्रंप के रवैए से सद्भाव की जगह तनावपूर्ण माहौल कायम हो गया । यरूसलेम से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार ऐसा फीका और अप्रिय क्रिस्मस पहले कभी नहीं देखा गया । लगता है, सोची-समझी रणनीति के तहत डोनाल्ड ट्रंप ने ठीक छह दिसंबर को यरूसलेम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दी, जिस दिन को याद करके भारत समेत अरब देशों के मुस्लिम बहुल समाज में लोग असहज हो जाते हैं । भाजपा और हिंदुत्व के लिए 6 दिसंबर की तारीख का महत्व सभी जानते हैं । यह भी लोग भूले नहीं हैं कि इस तारीख को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढांचा गिराए जाने के विरोध में पड़ोसी बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत इस्लामी देशों में रह-रहे हिन्दुओं पर क्या गुजरी थी । यहूदी देश इसराइल की भाजपा से करीबी का कारण यहूदी धर्म और हिंदुत्व में समानता है या नहीं, इस संबंध में तो कोई निश्चित राय देना मुश्किल है । मगर 6 दिसंबर को यरूसलेम को इसराईल की राजधानी के रूप में अमेरिकी मान्यता के बाद से इसराइल का नरेंद्र मोदी से तो मोहभंग हुआ ही, साथ-साथ अभी तक जिस यरूसलेम में सभी धर्मों के लोग पवित्र क्रिस्मस के समय गले मिलते थे, वहां यहूदियों के प्रति नफरत का भाव पैदा हो गया । यरूसलेम स्थित अल अक्सा मस्जिद मुस्लिमों के पवित्रतम धर्मस्थलों में से एक है ।

इस वर्ष 4-6 जुलाई को नरेंद्र मोदी इसराईल के दौर पर गए, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इसराइल यात्रा थी । नरेंद्र मोदी ने पूरा समय इसराइल में ही बिताया और फिलस्तीन के मुख्यालय रामल्ला नहीं गए । उनसे पहले कांग्रेस शासनकाल में जो भी राजनयिक इसराइल के दौरे पर गए, वे रामल्ला भी गए । नरेंद्र मोदी के ऐसा न करने पर उनकी अपने देश में और अरब देशों में आलोचना हुई । 24 जुलाई को संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में कांग्रेस सदस्यों ने नियम 267 के तहत नोटिस देकर उस दिन के लिए सूचीबद्ध कार्यों को निलम्बित करके इसी मुद्दे पर बहस करानी चाही कि नरेंद्र मोदी ने एक ही ट्रिप में दोनों देशों के दौरे के भारतीय नेताओं की अबतक की परंपरा का पालन क्यों नहीं किया । लेकिन इसराइल ने नरेंद्र मोदी के दौरे को यह कहकर ‘ऐतिहासिक’ बताया कि भारत के प्रधानमंत्री का ‘विशेष’ स्वागत अमेरिका के राष्ट्रपति और पोप जैसा किया गया । इसराईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बेन गुरिअन हवाई अड्डे पर नरेंद्र मोदी की अगवानी करने स्वयं गए । नरेंद्र मोदी भारत-इसराईल राजनयिक संबंध की 25वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में गए थे । लेकिन वर्ष समाप्त होते-होते भारत के एक ही झटके से इस संबंध में खटास आ गयी । उसके बावजूद बेंजामिन नेतन्याहू ने नए वर्ष में भारत आने का कार्यक्रम बना लिया ।

क्रिसमस के समय पोप इस स्थिति में नहीं थे कि पवित्र यरूसलेम स्थित मंजेर स्क्वायर में सामान्य स्थिति कायम करने इसराइल को कह सकें कि क्रिस्मस के समय पहले की तरह अबकी भी विभिन्न देशों से सभी धर्मों के पर्यटक जुटें । नरेंद्र मोदी के दौरे से कुछ दिन पहले ही ट्रंप और पोप इसराइल ‘सद्भावना’ यात्रा पर गए थे ।

डोनाल्ड ट्रंप के विश्वास तोड़नेवाले इस अपवित्र कदम के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के सारे अरब देश सदस्यों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया । उन देशों की मांग पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की विशेष आपात सत्र बुलाकर वोटिंग गरायी गयी । महासभा में पेश प्रस्ताव मसौदे में अमेरिका या इसराईल का नाम नहीं था । सिर्फ इतना उल्लेख था कि यरूसलेम ऐसा मुद्दा है, जिसका हल आपसी बातचीत से ही निकाला जा सकता है और इसके स्टेटस पर किसी एकतरफा निर्णय का कानूनी औचित्य नहीं है, इसलिए यह हर हाल में वापस लिया जाना चाहिए । भारत ने इस प्रस्ताव के समर्थन में वोट डाला । वोटिंग से पहले 20 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र स्थित फिलस्तीनी राजदूत रियाद मंसूर ने कहा कि महासभा को इस प्रस्ताव पर वोट डालना है कि ट्रंप अपनी घोषणा वापस लें । 193 सदस्यों में से 128 ने समर्थन में वोट दिया । भारत ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव्स के साथ बैठकर प्रस्ताव का समर्थन किया । अमेरिका बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया । क्योंकि विरोध में सिर्फ नौ वोट पड़े, जिनमें दो स्वयं अमेरिका और इसराइल के थे । उसके पहले इसी मुद्देपर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भी विशेष आपात बैठक बुलायी गयी । 15 सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद के समर्थन प्रस्ताव को निरस्त करने के लिए अमेरिका ने वीटो पावर का इस्मेमाल किया ।

वोटिंग से पहले की इसराइल के प्रधानमंत्री का वक्तव्य तो सीधा भारत की ओर इंगित था - ‘संयुक्त राष्ट्र के अंदर और बाहर कई देशों का इसराइल के प्रति रवैया बदला है, लेकिन “झूठों के सदन संयुक्त राष्ट्र” में भी उनकी नीतियां फिल्टर होकर सामने आएंगी । मसौदे में ‘डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर गहरा दुख’ जाहिर करनेवाले यमन और तुर्की द्वारा अरब तथा इस्लामी देशों की ओर से यह प्रस्ताव तैयार किया गया था । इस्राईल को अंदाजा लग गया था, इसलिए वोटिंग से पहले ही नेतन्याहू न ‘संयुक्त राष्ट्र को झूठों का सदन’ बताकर वोट को पारित होने के पूर्व ही खारिज कर दिया था ।

डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद अरब देशों के भारत स्थित राजदूतों ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात की । वे लोग विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर से भी 11 दिसंबर को मिले और भारत से जोरदार बयान की गुजारिश की । एम. जे. अकबर ने वोट से पहले साफ शब्दों में इस्राईल और अमेरिका को संदेश दिया कि भारत किसी ‘तीसरे देश’ द्वारा जबरन थोपी गयी स्थिति के अनुकूल कोई निर्णय नहीं लेने जा रहा है । वोट के बाद विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में स्पष्ट कर दिया गया कि भारत सिद्धांतों पर चलता है और प्रस्ताव के समर्थन वोट से अपने पुराने रूख पर कायम रहने की पुष्टि हुई है । डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मुंह से ही अमेरिकी नीति की असलियत उजागर करते हुए कहा - ‘ये देश अरबों डॉलर हमसे लेते हैं और वोट के समय हमारा साथ नहीं दिया ।’ संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने वोट से पहले संयुक्त राष्ट्र फंड में कटौती की धमकी दी । प्रस्ताव समर्थक देशों की ओर से तुर्की के राष्ट्रपति रीसेप तय्यीप एडोंगन ने सटीक टिप्पणी की - ‘मि. ट्रंप, डॉलर से जमीर नहीं खरीदी जा सकती ।’ भारत ने चुपचाप अमेरिका और इसराईल को जवाब दिया ।

अमेरिका और इसराइल को फर्क तो पड़ा है । लेकिन अमेरिका ने झट से अपना इसराइल दूतावास तल अवीव से यरूसलेम शिफ्ट कर दिया । उसके पिछलग्गू ग्वाटेमाला और होंडुरास ने भी वैसा ही किया ।

भारत को उन्हीं देशों में शुमार करनेवाले अमेरिका और इसराइल को सबक सिखाना जरूरी था । नरेंद्र मोदी ने इसराईल रवाना होने से पहले वहां के अखबार ‘इसराइल हेयोम’ से बातचीत के दौरान संयुक्त राष्ट्र में इसराइल से जुड़े मामले के संबंध में स्थिति स्पष्ट कर दी - ‘भारत हमेशा इसराइल की तरह फिलस्तीन के भी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का समर्थक रहा है ।’ पंप एंड शो में यह बात दब गयी । फिलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने फ्रांस में अमेरिका को ‘गद्दार मध्यस्थ’ बताया । राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के इसराईल दौरे में भी फिलस्तीन को लेकर जिच हुई थी । उसके बाद इसराइली राष्ट्रपति रियूवेन रिवलीन नवंबर में भारत आए । उसी समय फिलस्तीन राष्ट्रपति का दिल्ली आना लो प्रोफाइल में रहा ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका और इसराइल समेत पूरी दुनिया को बता दिया कि भारत की विदेश नीति सियासी मतलब से नहीं, सिद्धांत से संचालित होती है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार की इसराइल और अमेरिका से बढ़ती नजदीकी को लेकर भारत की पश्चिम एसिया नीति लगतार विवाद के घेरे में थी । विवाद का करण यह था कि नरेंद्र मोदी समेत सभी भाजपा नेताओं ने फिलस्तीन के प्रति भारत का परंपरागत रवैया बदल दिया है । रवैया बदलने का प्वाइंट ये था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल से नजदीकी बढ़ा रहे हैं और फिलस्तीन से दूरी । जबकि भारत की परंपरागत विदेश नीति फिलस्तीन की आजादी की लड़ाई का समर्थन और इसराइल से सिर्फ औपचारिक राजनयिक संबंध रखने तक सीमित रही है । डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से मोदी - ट्रंप दोस्ती भारत ही नहीं, दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ था । इसराइलरी नेता भी नरेंद्र मोदीसे बढ़ती ‘दोस्ती’ को लेकर काफी उत्साहित थे । अमेरिका और इसराइल ऐसा ही मतलब का दोस्त बनाते हैं, जो सही या गलत का विचार किए बगैर आंख मूंदकर हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे और खासकर फिलस्तीन जैसे झंझटिया मामले में सिर्फ ‘दोस्ती’ निभाए । इन दोनों देशों ने भारत को अपना ऐसा ही दोस्त समझ लिया । एक ही झटके में भाजपा गठजोड़ सरकार ने अमेरिका और इसराइल दोनों को समझा दिया कि भारत की विदेश नीति दोस्ती वाली है, पिछलग्गू वाली नहीं ।