केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को जब बता रही थी कि रोहिंग्या शरणार्थी को बसाने और उनके भारत में रहने से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है, क्योंकि म्यांमार से भाग-भागकर आ रहे रोहिंग्या मुस्लिम ‘अवैध आप्रवासी’ हैं, ठीक उसी समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र के तर्क को काट रही थी ।

केंद्र ने अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट को 18 सितंबर को बताया कि रोहिंग्या मुसलमानों के इस्लामी आतंकवादियों से ताल्लुकात हैं और ये भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई तथा इस्लामिक स्टेट(आईएस) आतंकवादी गुट का हिस्सा हैं । उसी दिन ममता बनर्जी(दीदी) ने कोलकाता में बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री मोहम्मद शहरियार आलम की मौजूदगी में भारत सरकार की दलील को यह कहकर काटा कि सारे रोहिंग्या आतंकवादी नहीं हैं । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को भारत सरकार से ज्यादा बांग्लादेश सरकार की बात सही लगी । एक सेमीनार में भाग लेने कोलकाता आए बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री ने रोहिंग्या मुसलमानों के मामले को पूरी तरह इन्सानियत से जुड़ा मुद्दा बताते हुए भारत सरकार को यह समझाने का प्रयास किया कि रोहिंग्या को किसी आतंकवादी गुट से कोई सहायता नहीं मिल रही है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो । जाहिर है कि यह टिप्पणी बांग्लादेश के मंत्री ने केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हलफनामे के जवाब में दी । उनकी हां में हां मिलाते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ के आतंकवादियों से संपर्क हो सकते हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं कि सभी रोहिंग्या को उसी श्रेणी में रखा जाय । ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर अमूमन सीधा प्रहार करते हुए कहा कि हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, अगर कुछ रोहिंग्या मुसलमानों के इस्लामी आतंकी गुटों से संपर्क हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि बाकी के साथ वैसा ही अमानवीय सुलूक किया जाए । दीदी ने कहा कि अगर वैसे सामान्य रोहिंग्या परेशान होते हैं, तो इन्सानियत ‘परेशान’ होती है ।

म्यांमार में जुल्म के शिकार रोहिंग्या मुसलमानों की सबसे बड़ा हमदर्द बनकर बांग्लादेश उभरा है और बांग्लादेश चाहता है कि भारत भी वैसा ही रवैया अपनाए । इसलिए बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री ने भारत में आकर मानवाधिकार और मानवीय पहलू की दुहाई दी । मोहम्मद शहरियार आलम यादवपुर यूनिवर्सिटी में ‘बांग्लादेश टुडे’ सेमीनार में भाग लेने कोलकाता आए थे और उन्होंने सही माएने में आज तो क्या ‘अभी’ के बांग्लादेश की चर्चा की । इसलिए रोहिंग्या पर केंद्रित होना स्वाभाविक था । आराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी और विदेशी आतंकी गुट से संपर्क होने के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में मोहम्मद आलम ने कहा - ‘हमें ऐसे किसी संपर्क की जानकारी नहीं है, क्योंकि यह बांग्लादेश की जमीन से संचालित नहीं हो रहा है ।’

बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री ने भारत में आकर यह जाहिर नहीं होने दिया कि उनकी सरकार भी रोहिंग्या शरणार्थियों के बढ़ते हुजूम से परेशान है या नहीं । संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद रोहिंग्या के बचाव में बोली हैं । भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करने गयीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने देश की लाचारी से दुनिया को अवगत कराया और आतंकवाद की निंदा की । केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में जेनेवा में लताड़ सुननी पड़ी है ।

कमाल है कि सुषमा स्वराज और हसीना वाजेद की न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र में भेंट के दौरान रोहिंग्या पर चर्चा नहीं हुई ।

सयुंक्त राष्ट्र शरणार्थी हाई कमीशन(उच्चायोग) से शरणार्थी के रूप में रजिस्टर्ड दो रोहिंग्या आप्रवासी मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर से भारत में रहने का कानूनी अधिकार हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की । उसमें रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने की केंद्र की नीति को चुनौती दी गयी । सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ की नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि रोहिंग्या मामले में शीर्ष कोर्ट को अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘यह विषय पूरी तरह कार्यपालिका के नीतिगत फैसले के अंतर्गत आता है ।’

लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार को इसमें अपनी राजनीति दिखायी दी और ‘नीतिगत’ फैसले में केंद्र की भाजपा सरकार का हिंदुत्व नजर आया । ममता बनर्जी अभी भाजपा नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के विरोधी खेमे की राजनीति में खास महत्व रखती हैं । इसलिए उन्हें रोहिंग्या के म्यांमार से आने और बांग्लादेश के जरिए भी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करनेवाले इन मुसलमानों को बसाने में कोई एतराज नहीं है । वे सब के सब देर सबेर दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के वोटर हो जाएंगे । इसलिए दीदी ने रोहिंग्या को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताने के केंद्र के हलफनामे को सही नहीं माना । सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के अगले दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने म्यांमार और बांग्लादेश से लगने वाली मिजोरम के अराकान(म्यांमार सीमा) तथा मणिपुर की सारी सीमाओं पर बड़ी चौकसी के साथ सतर्क रहने का निर्देश दिया । रोहिंग्या को रोकने के लिए सभी राज्यों को सीमाएं सील करने का भी निर्देश दिया गया । खासकर मिजोरम में गुप्तचरों की विशेष तैनाती हुई । रोहिंग्या घुसपैठ की सही संख्या का सत्यापन करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों से जब राज्यवार आंकड़ा मांगा गया तो पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की नरमी की वजह से रोहिंग्या के पहुंचने की आशंका जतायी गयी ।

रोहिंग्या को लेकर जम्मू व कश्मीर में लगभग विभाजन की नौबत है । यहां भी रोहिंग्या बसे हैं । कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस मामले में फंसी हुई है । एक तरफ संविधान की धारा- 35ए को समाप्त करने और दूसरी तरफ रोहिंग्या को भगाने की नीति दो विपरीत ध्रुव हैं । कांग्रेस नेता मनमोहन सिंह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह दोनों ही अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल के साथ जम्मू भी गए और कश्मीर भी, लेकिन कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे ।

मुल्लापंथी मुस्लिम बहुल बांग्लादेश और बौद्ध देश म्यांमार के बीच रोहिंग्या मुसलमानों को भगाने-बसाने का धंधा काफी समय से चल रहा है । वहां आबादी संतुलन बिगड़ने और तुष्टीकरण की राजनीति की नौबत नहीं आती । लेकिन भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों के चलते पिछले कई दशकों से आबादी संतुलन और सामाजिक सद्भाव बिगड़ा हुआ है ।

क्योंकि बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाना और नागरिकता प्रदान करना वोट राजनीति का हिस्सा है । इसके चलते सबसे ज्यादा सामाजिक विद्वेष और तनाव वाला राज्य असम रहा है, जहां आए दिन आबादी संतुलन का बिगड़ना हिंसा का कारण बनता है । उसी पर वोट राजनीति की रोटी सिंकती है । अभी तक असम में जो काम कांग्रेस कर रही थी वही भाजपा कर रही है। जो भाजपा असम से बांग्लादेशी घुसपैठियों में बंगाली मुसलमानों को स्वदेश भेजने का अभियान चला रही थी, उन्हें कांग्रेस के खाते से निकालकर अपना वोट बैंक बनाने पर तुली है । ऐसी स्थिति आगे न आए, इसके लिए रोहिंग्या मुसलमानों से छुटकारा चाहती है । इसी समय अरूणाचल प्रदेश में चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को नागरिकता देना चाहती है ।

13 सितंबर का जब रोहिंग्या पर देश के अंदर और बाहर सफाई देना कठिन हो रहा था, उसी दिन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने चकमा और हाजोंग को नागरिकता प्रदान करने के लिए दिल्ली में बैठक बुला ली । बैठक में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू के अलावे अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल भी शामिल हुए । किरण रिजिजू ने तो सफाई दी कि चकमा और हाजोंग को नागरिकता प्रदान करने का फैसला गृह मंत्रालय का नहीं है, यह 2015 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, जिसे लागू करना है । मगर ऐसे तनावपूर्ण माहौल में इसे लागू करने के फैसले पर अरूणाचल प्रदेश में बवाल मच गया । किरण रिजिजू बार-बार अपने प्रदेश अरूणाचल प्रदेश जाकर भी लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाए और उन्हें कहना पड़ा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू नहीं किया जाएगा । मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने ईटानगर से राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर बताया कि इससे राज्य के मूल आदिवासियों के परंपरागत अधिकार छिन जाएंगे और वे अपने ही घर में दूसरे दर्जे के नागरिक हो जाएंगे । किरण रिजिजू का कहना है कि चकमा और हाजोंग 1944 में बसे शरणार्थी हैं, जो पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) से आए थे । लेकिन विरोध जारी है । इसमें चकमा बौद्ध हैं और हाजोंग हिन्दू हैं । ऑल अरूणाचल प्रदेश छात्र संघ नेता तोबोम दइ के आह्वान पर 19 सितंबर का 12 घंटे का बंद सफल रहा ।

1964 में ही पूर्वी पाकिस्तान का असंतोष भड़क उठा था, जिससे 1971 में युद्ध के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ । उसी समय से असम बांग्लादेशी घुसपैठियों की राजनीति का अड्डा बनना शुरू हुआ । 1979-80 में उसी के खिलाफ हिंसक असम छात्र आंदोलन भड़का और 1985 में असम समझौते के बाद जब असम गण परिषद की सरकार बनी तो उसने बांग्लादेशियों को निकाल बाहर करने का मुद्दा छोड़कर उन्हें अपना वोट बैंक बनाने की राजनीति शुरू कर दी ।

वर्षों के कांग्रेस राज के बाद 2015 में असम में भाजपा को सत्ता में आने का अवसर मिला । पूरा 2016 असम में हिंसा और जातिगत विद्वेष की तांडव मचा । भाजपा ने चकमा और हाजोंग का नाम नहीं लिया ।

बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करके स्वदेश भेजने का अभियान भाजपा भूल गयी । उनका वोट लिया, घुसपैठिया मुसलमानों को पार्टी का टिकट दिया और 2016 में नागरिकता संशोधन एक्ट भी भाजपा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने पारित कर दिया । जबकि यह विवाद सुलझ नहीं पाया कि घुसपैठियों की पहचान का कट-ऑफ इयर 1951 हो कि 1971 हो या 1983 का अवैध आप्रवासी(ट्रिब्यूनल द्वारा पहचान) एक्ट बरकरार रहे ।

रोहिंग्या पर म्यांमार में हो रहे जुल्म के खिलाफ गुवाहाटी रैली में शामिल होने के कारण भाजपा ने मुस्लिम महिला नेता बेनजीर अरफान को पार्टी से निकाल दिया जो 2015 विधान सभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार थी । असम में कृषक मुक्ति संग्राम समिति नेता अखिल गोगोई को 2016 एक्ट का विरोध करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया है और राज्य में फिर से आंदोलन की तैयारी है ।